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‘ कविताएँ बदलाव की : सौंदर्य और वैचारिकी ’ : कुछ बात, कुछ सवाल

उषा राय की किताब ‘ कविताएँ बदलाव की : सौंदर्य और वैचारिकी ’ में शामिल कवियों और उनकी कविताओं पर लिखे लेखों को साथ पढ़ने पर समकालीन हिंदी कविता की एक ऐसी तस्वीर सामने आती है, जिसमें कविता सिर्फ ज़ाती भावनाओं या सुंदरता की अभिव्यक्ति नहीं रह जाती, बल्कि अपने वक़्त के सामाजी और सियासी सवालों से लगातार टकराती है। उषा राय का बुनियादी कहना है कि कविता को उसके सामाजी ज़िन्दगी से अलग करके नहीं समझा जा सकता। उनके लिए कविता सिर्फ सुंदरता की चीज नहीं है।

इस किताब में शामिल गोरख पांडेय पर लिखा गया लेख उषा राय की आलोचना-दृष्टि को सामने लाता है। वे गोरख को सिर्फ प्रतिबद्ध कवि की शक्ल में नहीं, बल्कि भाषा, शिल्प, गेयता, लोकधर्मिता और सियासी चेतना के कवि की शक्ल में देखती हैं। लेख की शुरुआत गोरख की इन पंक्तियों से होती है—“हजार साल पुराना है उनका गुस्सा / हजार साल पुरानी है उनकी नफरत…”। उषा राय इनमें गोरख की काव्य-दृष्टि का आधार देखती हैं। गोरख की स्त्री-चेतना को भी उषा राय गंभीरता से पढ़ती हैं। ‘बुआ के लिए’, ‘बंद खिड़कियों से टकराकर’ और ‘कैथरकला की औरतें’ में औरत चुपचाप दुख सहने वाली नहीं, बल्कि प्रतिरोध की ताकत बनकर सामने आती है।

सारा शगुफ्ता पर लिखा लेख इस आलोचनात्मक किताब में एक अलग मुक़ाम रखता है। उषा राय सारा को सिर्फ़ दुख की शायरा मानने से इनकार करती हैं। उनका दुख चुप नहीं है; वह सवाल करता है और भाषा के भीतर विद्रोह पैदा करता है। निजी पीड़ा सामाजी तजुर्बे में बदल जाती है।

शोभा सिंह पर लिखे दोनों लेखों में उषा राय उनकी कविता को जीवन-अनुभव, सामाजी संघर्ष, वामपंथी विचार और जन आंदोलनों से जोड़कर देखती हैं। उषा राय शोभा सिंह की कविता के दो ख़ास पक्षों को सामने रखती हैं, पूंजीवादी व शोषणकारी व्यवस्था का विरोध और पितृसत्ता के भीतर औरत के तजुर्बे की अभिव्यक्ति। इन दोनों को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता, क्योंकि वर्ग, जेंडर, घरेलू श्रम, बाजार और सत्ता के सवाल एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।

अनिता भारती पर लिखा लेख इस आलोचनात्मक संसार में जाति का नया पहलू जोड़ता है।इस लेख की बड़ी खूबी यह है कि उषा राय दलित स्त्रीवाद को सिर्फ़ पुरुषवादी सत्ता के विरोध तक महदूद नहीं करतीं। दलित स्त्री के सवालों को सवर्ण स्त्रीवाद, जाति-व्यवस्था और दलित समाज के भीतर मौजूद पुरुषवादी सोच के साथ जोड़ना जरूरी है। लेकिन यहीं कुछ सवाल भी पैदा होते हैं। वे अनिता भारती की कविता ‘रुखसाना का घर ‘ पर बात करते हुए लिखती हैं कि “मुजफ्फरनगर में हिन्दू-मुस्लिम, जाट और दलित समुदाय लगभग नौ सौ वर्षों से साथ रहते आए थे और अचानक ही वे सब एक-दूसरे के खून के प्यासे हो गए।” यह जुमला सुनने में सांप्रदायिक सौहार्द के टूटने की त्रासदी जैसा लगता है, लेकिन सियासी और तारीखी स्तर पर यह मुजफ्फरनगर की हिंसा को बेहद सरल बना देता है।

मुस्लिम-विरोधी हिंसा को भारत में लंबे वक़्त से “हिन्दू-मुस्लिम दंगा” कहकर देखने की एक रवायत रही है। इस भाषा में अक्सर हमलावर और पीड़ित को समान शक्ति वाले दो पक्षों की शक्ल में पेश कर दिया जाता है। जबकि सांप्रदायिक हिंसा को समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि हिंसा किसने संगठित की, किस सियासी विचारधारा ने उसे हवा दी, किसके पास सत्ता और संसाधन थे और सबसे ज़्यादा नुकसान किस समुदाय को उठाना पड़ा। मुजफ्फरनगर को भी सिर्फ़ दो समुदायों के अचानक एक-दूसरे के खून का प्यासा हो जाने की घटना की तरह नहीं देखा जा सकता। हिंदुत्ववादी सांप्रदायिक सियासत की भूमिका, मुस्लिम-विरोधी लामबंदी और सत्ता-संरक्षण के सवाल को सामने रखना जरूरी है। एक तरफ संगठित हिंदुत्ववादी राजनीतिक शक्ति और उसके संसाधन हैं, दूसरी तरफ मुस्लिम समुदाय है, जो ऐसी हिंसा में पीड़ित और रक्षात्मक स्थिति में दिखाई देता है। इसलिए उषा राय की यह भाषा अनजाने में हिंसा की असमानता को ढक देती है और हिंदुत्व की सियासी जिम्मेदारी और जवाबदेही को कम करके दिखाती है।

यह समस्या इसलिए भी गंभीर है कि ऐसी भाषा सिर्फ दक्षिणपंथी या उदारवादी लेखन तक महदूद नहीं है। प्रगतिशील और वामपंथी पृष्ठभूमि के लेखक भी कई बार “दोनों तरफ से हिंसा”, “आपसी दंगा” और “दोनों समुदायों की कट्टरता” जैसे मुहावरों का इस्तेमाल करते हैं। इस तरह की भाषा से सांप्रदायिक हिंसा की संरचनात्मक असमानता छिप जाती है। इसी तरह लेख में ‘स्त्री नैतिकता का तालिबानीकरण’ नाम के एक कॉलम का ज़िक्र आता है। तालिबान निस्संदेह कट्टरपंथी, अल्ट्रा-दक्षिणपंथी और हिंसक संगठन है और उसकी स्त्री-विरोधी सियासत की आलोचना जरूरी है। लेकिन भारत में औरतों की आज़ादी पर अंकुश लगाने वाली हर रूढ़िवादी मानसिकता के लिए ‘तालिबानीकरण’ शब्द का इस्तेमाल करना तटस्थ नहीं है। भारतीय सार्वजनिक भाषा में ‘तालिबान’ कई बार पूरे मुस्लिम समाज और इस्लाम को पिछड़ेपन, रूढ़िवाद और स्त्री-विरोध का प्रतीक बनाने वाली हिंदुत्ववादी भाषा का हिस्सा बन जाता है। इसलिए सवाल यह है कि भारतीय संदर्भ में ‘तालिबानीकरण’ ही क्यों?तालिबान की आलोचना अपनी जगह जरूरी है, लेकिन भारत के अपने सत्ता-संबंधों और हिंदुत्ववादी राजनीति को समझने के लिए किसी बाहरी प्रतीक का इस्तेमाल करना कई बार यहां मौजूद बहुसंख्यकवादी संरचना को देखने से बचने का रास्ता बन जाता है। मुस्लिम समाज का दानवीकरण हिंदुत्ववादी राजनीति की एक केंद्रीय प्रवृत्ति रहा है।

उषा राय के इस लेख में एक और वाक्य इसी तरह सोचने को मजबूर करता है। अनिता भारती की कविता ‘रुखसाना का घर ‘ की कुछ पंक्तियों पर बात करते हुए वे लिखती हैं कि “रोज होने वाले बलात्कार किसी धर्म, जाति, वर्ग या उम्र के कारण नहीं होते, सिर्फ़ ‘जनाना’ होने के कारण होते हैं।” पितृसत्ता और औरत होने की सामाजी स्थिति निश्चित रूप से यौन हिंसा को समझने की बुनियादी शर्तें हैं, लेकिन इस कथन को अंतिम सत्य मान लेना भी एक तरह का सरलीकरण है। हर औरत का तजुर्बा एक जैसा नहीं होता। किसी दलित या मुस्लिम औरत के साथ होने वाली यौन हिंसा को सिर्फ़ पितृसत्ता के आधार पर समझना काफ़ी नहीं है। जातिगत प्रभुत्व, सामाजी हैसियत, सत्ता-संबंध और सम्प्रदायिकता भी उसके पीछे काम करते हैं। इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि सवर्ण औरतें पितृसत्ता से आज़ाद हैं। उनके सामने भी यौन हिंसा, घरेलू हिंसा और समाजी भेदभाव की गंभीर समस्याएं हैं। लेकिन यह मानना भी गलत होगा कि हर औरत को हर तरह की हिंसा एक जैसी झेलनी पड़ती है। इसीलिए दलित स्त्रीवाद का वास्तविक महत्व ही यह है कि वह ‘औरत’ को एक समान और एकरूप श्रेणी मानने से इनकार करता है।

अजय सिंह पर लिखा लेख सियासी प्रतिरोध, सामाजी न्याय, स्त्री-मुक्ति, प्रेम, सांप्रदायिकता और तारीख़ के सवालों को साथ लेकर चलता है। ‘खिलखिल को देखते हुए गुजरात’ पर चर्चा लेख का मजबूत हिस्सा है। गुजरात 2002 की मुस्लिम विरोधी हिंसा और एक बच्ची के जन्म को आमने-सामने रखकर कविता ज़िन्दगी की उम्मीदों और सामूहिक हिंसा के बीच तीखा फर्क पैदा करती है। रामचंद्र शुक्ल की ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ पर अजय सिंह की आलोचना भी महत्वपूर्ण है। मीर, गालिब और नजीर को हिंदी की साझा साहित्यिक विरासत में वापस स्थापित करने का आग्रह भाषा को मज़हब और समुदाय के खांचों में बांटने वाली सोच के खिलाफ है।
उषा राय का सुभाष राय पर लिखा लेख ‘स्त्रियों के स्वर्णकाल का मिथक’ अक्क महादेवी की ज़िन्दगी और वचनों के जरिए औरत की आजादी, देह, इच्छा और बराबरी के सवाल उठाता है। बारहवीं सदी के वीरशैव आंदोलन और अनुभव मंडप की पृष्ठभूमि में सामने आने वाली अक्क महादेवी को आज के अर्थ में ‘स्त्रीवादी’ कहना इतिहास को आज की भाषा में बांध देना होगा। लेकिन उनकी कविता और ज़िन्दगी में औरत की अपनी आज़ादी पहचान की जो चाह दिखाई देती है, वह आज के स्त्री-विमर्श से गहरा रिश्ता बनाती है।

भगवान स्वरूप कटियार की कविताओं पर लिखे लेख में स्त्री सिर्फ़ करुणा की पात्र नहीं है, बल्कि फैसला लेने वाली और संघर्ष करने वाली इंसान है। ‘स्त्री का लोकतंत्र’ में वह कहते है “अपने लोकतंत्र का संविधान / मैं स्वयं लिखूंगी” यह पंक्ति स्त्री-मुक्ति के बुनियादी सवाल को बहुत सरल ढंग से सामने रखती है। औरत किसी दूसरे के दिए हुए अधिकार या आजादी से संतुष्ट नहीं है; वह अपनी ज़िन्दगी के नियम खुद तय करना चाहती है। लेकिन इस आजादी का मतलब पुरुष-विरोध नहीं है। ‘स्वामी’ के बजाय ‘साथी’ की मांग बराबरी पर टिके रिश्ते की इच्छा है।

भाषा सिंह की कविता इस सवाल को और बड़े सामाजी संदर्भ में ले जाती है। उनके यहां औरत का बंधन सिर्फ़ पति या परिवार तक महदूद नहीं है। वह जाति, वर्ग, मज़हब, सियासत और सत्ता से भी जुड़ा हुआ है। ‘खूंटा’ इसी बड़े बंधन का रूपक बन जाता है। औरत जिस समाज में रहती है, उसमें कई तरह की ताकतें एक साथ काम करती हैं। इसलिए आजादी के लिए सिर्फ़ एक बंधन को तोड़ देना काफी नहीं है। भाषा सिंह की कविताओं की खास बात यह है कि वे औरत को एक जैसी सामाजी श्रेणी नहीं मानतीं। भारतीय समाज में पितृसत्ता और जाति कई बार एक-दूसरे को मजबूत करती हैं। इसलिए औरत की आज़ादी को जाति और वर्ग के सवालों से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

उषा राय का लेख “नेहा नरूका : स्त्री संघर्ष और मुक्ति के प्रश्न” की केंद्रीय स्थापना “प्रेम कभी मुक्ति नहीं देता, हां मुक्त होकर प्रेम जरूर संभव है” औरत की आज़ादी और प्रेम के रिश्ते को नए ढंग से सामने रखती है। “पार्वती यानि” में धार्मिक प्रतीकों पर सवाल, “फटी हथेलियां” में घरेलू श्रम और “जवान लड़की की लाश” और “बलात्कारियों की सूची” में औरत पर हिंसा के सामाजी चरित्र को उषा राय रेखांकित करती हैं। लेख की बड़ी उपलब्धि यह है कि यह औरत को सिर्फ पीड़ित नहीं, बल्कि सवाल करने और प्रतिरोध रचने वाली आवाज के रूप में देखता है। “मुक्ति सबकी होती है और एक साथ होती है” यही इस आलोचना और संग्रह का केंद्रीय आग्रह है।

“विमल किशोर : वह सुबह जरूर आएगी” उनके कविता-संग्रह पंख खोलूँ उड़ चलूँ का शीर्षक ही सदियों की सामाजी कैद से बाहर निकलने की स्त्री-आकांक्षा का प्रतीक बन जाता है। “हम बंधे हैं / या बांध दिए गए हैं / सिर से पांव तक जंजीरों में / आभूषण नाम दिया गया है”—इन पंक्तियों में उषा राय पितृसत्ता की उस संरचना को पहचानती हैं जो बंधन को परंपरा और प्रेम का नाम देकर स्वीकार्य बनाती है।

उषा राय की इस किताब में हरे प्रकाश उपाध्याय के संग्रह ‘ काली मुसहर का बयान ‘ पर लिखा लेख समकालीन हिंदी कविता में जाति, श्रम और हाशिए के जीवन को समझने की महत्वपूर्ण कोशिश है। उषा राय कविता को सिर्फ़ सौंदर्य की वस्तु न मानकर उसके सामाजी और सियासी संदर्भों में पढ़ती हैं। कविता की पंक्ति “ साहेब हम मनई नहीं, मुसहर हैं ” जाति-व्यवस्था के ज़रिये इंसान की पहचान को निर्धारित किए जाने की भयानक विडंबना सामने लाती है। लेख में जिस हिस्से पर सबसे ज़्यादा विचार की जरूरत है, वह मशीनीकरण और तकनीक से संबंधित है। उषा राय गांधी के हिन्द स्वराज के संदर्भ में मशीनों के ज़रिये रोजगार छीन लिए जाने की आशंका को सामने लाती हैं और फिर कविता की पंक्तियों से इसे जोड़ती हैं “पता नाहीं कौन-कौन मसीन है आया / हमनी के जिनगी मसीनवा रौंदत है भाया।” लेख की यह चिंता मुसहर समुदाय के तजुर्बे के स्तर पर समझ में आती है, लेकिन इसे सिर्फ़ मशीन बनाम इंसान की शक्ल में देखना काफ़ी नहीं होगा। मशीनीकरण या तकनीक अपने आप में न तो शोषक होती है और न मुक्तिदायक। मूल सवाल यह है कि तकनीक पर नियंत्रण किसका है और उसका इस्तेमाल किस समाजी उद्देश्य के लिए किया जा रहा है।

एक मशीन किसी किसान का श्रम हल्का कर सकती है, किसी मजदूर को खतरनाक काम से मुक्त कर सकती है, उत्पादन बढ़ा सकती है और समाज के लिए ज़्यादा संसाधन उपलब्ध करा सकती है। लेकिन वही तकनीक अगर कुछ पूंजीपतियों के नियंत्रण में हो और उसका मक़सद सिर्फ़ मुनाफा बढ़ाना हो, तो वह बड़ी संख्या में श्रमिकों को विस्थापित भी कर सकती है और बेरोजगारी पैदा कर सकती है। इसलिए समस्या सिर्फ़ यह नहीं है कि मशीन आई और मजदूर का काम छीन लिया। असली सवाल यह है कि मशीन किसके स्वामित्व में है, उत्पादन का उद्देश्य क्या है और तकनीकी प्रगति से पैदा होने वाला मुनाफा किसके हिस्से में जाता है।

उषा राय की नरेश सक्सेना से बातचीत पूरी किताब के वैचारिक सवालों को समेटने वाला महत्वपूर्ण पड़ाव है। सोशल मीडिया पर नरेश सक्सेना का यह कहना कि “फेसबुक लाइक सिर्फ़ नमस्कार करने का तरीका है” कविता के तात्कालिक मूल्यांकन की प्रवृत्ति पर टिप्पणी है। हालांकि सोशल मीडिया ने पारंपरिक साहित्यिक संस्थानों से बाहर के कवियों को नए पाठक भी दिए हैं। इस तरह तकनीक कविता के लिए चुनौती और संभावना दोनों है। बातचीत में कविता का केंद्रीय उद्देश्य मनुष्यता का विस्तार और संवेदना को बचाए रखना बताया गया है। जो सत्य है वही सुंदर है जैसी स्थापना कविता के सौंदर्य और समाजी सच को एक-दूसरे से जोड़ती है।

मज़हब, लोकतंत्र और हिंसा के संदर्भ में उनका यह आग्रह भी महत्वपूर्ण है कि डर कविता को भोथरा कर देता है। इसलिए साहस साहित्यिक मूल्य भी है। लेकिन बातचीत का एक प्रसंग गंभीर सवाल भी खड़ा करता है। नरेश सक्सेना इतिहास के झूठ की चर्चा करते हुए महमूद गजनवी को मंदिर तोड़ने और सोना लूटने वाले आक्रांता के रूपक में रखते हैं और समकालीन सत्ता के ज़रिये वोट लूटने और मस्जिदें तोड़ने से उसकी तुलना करते हैं। जब इस पर सवाल उठता है तो उनका जवाब है कि कविता उस वक़्त लिखी गई थी, जब वर्तमान सत्ता इतनी मजबूत नहीं थी। यह स्पष्टीकरण राजनीतिक संदर्भ तो देता है, लेकिन उस मूल सवाल का समाधान नहीं करता कि बाबरी मस्जिद ध्वंस के विरोध में बोलते हुए भी खलनायक के लिए महमूद गजनवी जैसा मुस्लिम तारीखी रूपक ही क्यों चुना गया ? यहीं इस कविता की धर्मनिरपेक्ष मंशा और उसके रूपक-चयन के बीच अंतर्विरोध दिखाई देता है।

भारतीय तारीख़ में धार्मिक स्थलों के विनाश और सांस्कृतिक हिंसा के कई प्रसंग हैं; बौद्ध मठों के विनाश से लेकर जैन और दूसरे मज़हबी परंपराओं के संस्थानों पर हुए हमलों तक कई वैकल्पिक तारीखी संदर्भ मौजूद हैं। फिर तथाकथित मुस्लिम आक्रांता को ही उस सार्वभौमिक खलनायक की शक्ल में चुनना एक ऐसे सांस्कृतिक स्मृति-तंत्र को अनजाने में दोहराता है, जिसमें मुस्लिम पहले से ही आक्रमण, विध्वंस और लूट के प्रतीक की शक्ल में स्थापित है। सवाल यह नहीं है कि महमूद गजनवी कैसा था; सवाल यह है कि मुस्लिम इतिहास के पात्रों को बार-बार ऐसे नैतिक रूपक में बदल देने की प्रवृत्ति किस तारीखी चेतना को मजबूत करती है। क्या मुसलमानों पर हो रहे अन्याय के विरोध में लिखते हुए भी मुसलमानों को ही खलनायक के सांस्कृतिक स्रोत की शक्ल में इस्तेमाल करना जरूरी है ? इस अंतर्विरोध को आज की सियासत के उस व्यापक विमर्श से अलग नहीं किया जा सकता जिसमें मुसलमानों को आतंक और हिंसा के साथ जोड़ने की प्रवृत्ति बार-बार दिखाई देती है। फर्क इतना है कि यहां मुसलमानों की सामूहिक निंदा नहीं की जा रही, बल्कि मुस्लिम तारीख़ से ही खलनायक के रूपक चुने जा रहे हैं। लेकिन प्रतिनिधित्व के स्तर पर यह चयन फिर भी एक समस्या पैदा करता है: अगर खलनायक की कल्पना के लिए लगातार मुस्लिम तारीख़ ही सबसे सहज स्रोत बनता रहे, तो वह अनजाने में उसी पूर्वग्रह को पुनरुत्पादित करता है, जिसका सियासी स्तर पर विरोध किया जा रहा है।

इसलिए नरेश सक्सेना की इस पंक्ति को उनकी पूरी जनपक्षधरता के बावजूद आलोचना से मुक्त नहीं किया जा सकता। कविता का प्रतिरोधी आशय महत्वपूर्ण है, लेकिन प्रतिरोध की भाषा और उसके सांस्कृतिक रूपक भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। एक कवि जब सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के ख़िलाफ खड़ा होता है, तब उससे यह उम्मीद भी स्वाभाविक है कि उसके रूपक उस ध्रुवीकरण की तारीखी स्मृतियों को अनजाने में मजबूत न करें। यही इस संवाद का एक महत्वपूर्ण अंतर्विरोध है।

इन लेखों को साथ पढ़ने पर उषा राय की सबसे बड़ी खासियत ये सामने आती है कि वे कविता को सामाजी हक़ीक़त से अलग करके देखने के खिलाफ हैं। उनके लिए विचार कविता की कलात्मकता का दुश्मन नहीं है। बड़ी मेहनत से लिखी गई इस किताब के लिए उषा राय को बहुत बहुत मुबारकबाद।

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