स्कूली बच्चे और ऑनलाइन पढ़ाई: क्या हम तैयार हैं?

शिक्षा

डॉ. दीना नाथ मौर्य


पिछले दिनों स्पेन में जब 49 दिनों की तालाबंदी के बाद बच्चों को खेलने के लिए पार्कों में ले जाया गया तो बच्चे वापस घर लौटने को तैयार न थे.

तस्वीरों में अभिभावक और बच्चों की आँखों में लाकडाउन की विवशता साफ़ तौर पर दिखायी पड़ रही थी. घर और बाहर की दुनिया के बीच इस दौरान रिश्ते-नाते में आये बदलाव को बच्चों के साथ भी देखा जा सकता है.

लॉकडाउन की इस अवधि में बच्चों के सवाल निश्चित रूप से नये आकार पा रहे हैं वे अब केवल स्कूल और शिक्षक के भरोसे नहीं रहे बल्कि उनकी दुनिया में अभिभावक का सार्थक हस्तक्षेप बढ़ा है. संवेदनशील होना,तर्क-वितर्क करना सब कुछ बच्चे अपने परिवार के साथ सीख रहे हैं. सहभागी हस्तक्षेप और लैंगिक संवेदनशीलता के साथ ही साथ सामूहिक पारिवारिक निर्णय के अच्छे-बुरे व्यावहारिक आयाम इस दौरान बच्चों के जेहन में घर की दीवारों के बीच ही निर्मित हो रहे हैं. सीखने की स्कूली घंटी उनके इस घरेलू दायरे में फिलहाल नहीं है. सीखना और शिक्षा दोनों चीजें अलग नहीं बल्कि अपनी व्यापक परिभाषा में दोनों एक ही हैं.

जो समाज यह मानकर चलता था कि बच्चों को सीखने का एक मात्र जरिया स्कूल ही हैं उनकी शायद इस धारणा में बदलाव हो रहा होगा कि स्कूल के बगैर भी सीखा जा सकता है. बंदी के इस दौर में बच्चों की दुनिया अपने सामाजिक सांस्कृतिक परिवेश के साथ बदल गयी है.

ऑनलाइन चलने वाली कुछेक कक्षाओं को छोड़ दें तो अभिभावक और बच्चों के बीच से स्कूल की पूरी दुनिया गायब है.संस्था के रूप में स्कूल का वर्चुअल हो जाना हम सबके अनुभव की नई चीज बनकर सामने आयी है.इसका पूरा असर दिखना शायद अभी बाकी है पर जो साफ़ तौर पर इन दो महीनों में दिखा वह यह कि दिखावे की स्कूली संस्कृति की जड़ें भी इस दौरान खोखली साबित हुई है.

तथाकथित अच्छे माहौल की वह मिथ्या धारणा भी टूट गयी जिसमें बच्चों के स्कूल के साथ अभिभावक की सामाजिक आर्थिक प्रतिष्ठा को जोड़कर देखे जाने की मानसिकता का निर्माण होता है.

अब जब प्राइवेट स्कूलों द्वारा अभिभावकों से ली गयी मोटी फीस के बदले आनलाइन पढ़ाई के नाम पर कुछ न कुछ कर गुजरने का क्रियाकलाप किया जा रहा है तो सवाल उठता है कि स्कूली शिक्षा के उस दायरे में जहाँ बच्चों को उनके घर के माहौल से दूर करने या घर के माहौल से काटकर एक अलग तरह के माहौल में उनके व्यक्तित्व के निर्माण के लिए ही फीस ली जाती थी अब उसका क्या होगा?

बच्चे के भावी जीवन में सुरक्षित कैरियर की उम्मीद में अभिभावक बच्चों के साथ अपनी गतिविधियों को सीमित कर लेता था.लेकिन लॉकडाउन ने यह भी सिखा दिया कि बच्चों की परवरिश और उसके शुरूआती दिनों में में सीखने की पूरी प्रक्रिया के साथ अभिभावक की भूमिका कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण होती है.

हम जानते हैं कि एक लोकतांत्रिक समाज के निर्माण में शिक्षा न्यूनतम मानवीय अधिकार के रूप में होती है और हमारे देश में शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 बच्चों को उनके सीखने के अधिकार को सुनिश्चित करने का संवैधानिक प्रावधान करता है.

ब्राजील के शिक्षाविद और दार्शनिक पाउलो फ्रेइरे ने शिक्षण को बैंकिंग व्यवस्था के विरोध के रूप में देखा है. शिक्षा को वे उत्पीड़ितों के न्यूनतम मानवीय अधिकार की श्रेणीं में रखते हैं. शिक्षा में किये जाने वाली किसी तरह की अनिवार्यता सामान्य तौर पर समाज के सभी लोगों को और विशेष तौर पर उत्पीडित समाज के लोगों के जीवन को गहरे स्तर पर प्रभावित करती है. वह चाहे समाज का कोई भी उत्पीड़ित समाज हो.

सीखने के किसी भी माध्यम को अपनाने के साथ हमें पाउलो फ्रेइरे के इस विचार साथ हम अपनी सहमति रख सकते हैं जिसके जरिये वे समाज में ज्ञान के लोकतान्त्रिक और समावेशी स्वभाव का दर्शन विकसित करते हैं.

ऑनलाइन शिक्षा इस महामारी के दौरान अपना ली जाने वाली अनिवार्यता के रूप में सामने आयी है पर राष्ट्र और समाज के जीवन में व्यावहारिक धरातल पर इस माध्यम के पूर्णरूप से फलीभूत होना अभी बाकी है. बुनियादी तालीम की शैक्षिक प्रक्रियाएं अपने स्वरुप में अनिवार्यतः कक्षागत प्रक्रियाओं और समूची स्कूली पाठ्यचर्या से जुड़ी होती हैं.

ज्ञान कोई तैयार माल नहीं है उसे एक प्रक्रिया के क्रम में शिक्षक और विद्यार्थी औपचारिक अतः अनौपचारिक रूप में पूरा करते हैं.ज्ञान का निर्माण केवल पुस्तकों के जरिये ही नहीं होता है. व्यापक आयामों में देंखें तो यह एक सामुदायिक क्रम का हिस्सा होता है. माध्यम के रूप में जब हम शिक्षा की समूची पाठ्यचर्या को आनलाइन बना देगें तो यह ध्यान रखना होगा कि हमारे शैक्षिक दस्तावेजों और अनुसंधानों में दर्ज स्कूली शिक्षा के महत्त्वपूर्ण आयाम शिक्षक और विद्यार्थियों के आपसी सहयोग और उनके बीच परस्पर होने वाली अंतर्क्रिया का क्या होगा?

जिसमें सिर्फ विद्यार्थी भर ही नहीं सीखता बल्कि शिक्षक भी दिन प्रतिदिन अपने को समृद्ध करता चलता है. विकल्प के तौर पर आनलाइन प्रणाली अपनाने में फिलहाल कई तरह की व्यावहारिक दिक्कतें सामने आ रही हैं.

वह चाहे गरीबी के कारण इन्टरनेट और मोबाइल की अनुपलब्धता का मसला हो या फिर अभिभावक की आर्थिक-सांस्कृतिक स्थिति.दूर दराज के इलाकों में नेटवर्क की एक अन्य दिक्कत भी है जो इन दोनों उपर्युक्त चीजों की संपन्नता के बावजूद भी इस माध्यम को अव्यवहारिक बना देता है.

दिल्ली विश्वविद्यालय की शिक्षिका प्रज्ञा उपाध्याय ने अपने आनलाइन कक्षा के अनुभवों को दर्ज करते हुये इस बात का नोटिस लिया है कि लड़कों की तुलना में लड़कियों के लिए इन कक्षाओं के साथ जुड़ पाना कहीं ज्यादा कठिन होता है. निम्न और मध्यवर्गीय परिवारों में जहाँ पर स्कूल ही वह जगह होती थी जिसके लिए घर से लड़कियों को निकलने की छूट हुआ करती है.

आमतौर पर इन घरों की लड़कियों पर घरेलू कार्यों का पूरा दबाव होता है.स्कूल के नाम पर 3-4 घंटे घर से बाहर निकलने की छूट रहती है. समय के इन घंटों में वे दुनिया को घर की चाहरदीवारी से आजादी की कलपना और उसके बन्धन से मुक्ति की स्वप्न भी देखती हैं.

अपने दोस्तों के दायरे में जीवन को देखने और जीवन की अलग-अलग परिस्थितियों में निर्णय लेने के तैर तरीके भी सीखती हैं. समाज का वह नजरिया जिसमें लड़कियों कि शिक्षा को ही दोयम दरजे का मान लिया जाता है बच्चियों का इस कदर अपने को समझने का अवसर स्कूल ही देता है.

आनलाइन शिक्षा के साधन को हम विद्यार्थियों के लिए पूरक स्रोत के तौर पर तो इस्तेमाल कर सकते हैं पर वह कक्षायी शिक्षण की पूरी प्रक्रिया का विकल्प फिलहाल नहीं हो सकता है.भौतिक संसाधनों के स्तर पर इसमें बहुत सारी दिक्कतें तो हैं ही साथ में एक बड़े समाज के बच्चों का इस पूरी प्रक्रिया से अलगाव भी दिखायी देता है.

ऑनलाइन पढ़ाई की बात करते हुए जब हम यह तर्क देते हैं कि यह विद्यार्थी और ज्ञान को मुक्त करती है तो भारतीय सन्दर्भ में हम केवल उन शहरी बच्चों की बात कर रहे होते हैं जिनके अभिभावक इस तरह की शिक्षा के लिए माहौल दे पाते हैं. इस दौरान वे बच्चे हमारे विचार के दायरे से बाहर होते हैं जो दूर दराज के ग्रामीण इलाकों में लाखों की संख्या में सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं.

अभी तक के अनुभव यही रहे हैं कि आनलाइन माध्यम की व्यवस्था दरअसल उपलब्ध भौतिक संसाधनों के दायरे को विस्तार देने के क्रम में ही सफल और उनकी सार्थक रही है. भारत जैसे देश में इसे विकल्प के तौर पर देखना शायद अभी जल्दबाजी ही होगी.

जरूरत इस बात कि है हम सीखने के इन नये माध्यमों की व्यावहारिकता को अपने सामान्य जीवन का हिस्सा बनाने के लिए न सिर्फ भौतिक संसाधनों का समुचित विकास करना होगा यह भी सुनिश्चित करना जरूरी है कि समाज का कोई भी बच्चा इस माध्यम की अनिवार्यता के चलते सीखने की प्रक्रिया से बाहर न हो जाए.

एक लोकतांत्रिक राष्ट्र के विकास में शिक्षा जगत के ऐतिहासिक अनुभव हमारे जेहन में रहने चाहिए कि देश और समाज के जीवन में समान शिक्षा और स्कूल में शत-प्रतिशत प्रवेश के स्वप्न अभी पूरे होने बाकी हैं इसलिए तात्कालिक तौर पर इन नए माध्यमों को अपनाना तो सराहनीय है पर भविष्य में बगैर बुनियादी तैयारी के इस माध्यम को अनिवार्यता के रूप में देखना शिक्षा में भारतीय समाज के बहुलतावादी चरित्र को नकारना होगा.

 

(लेखक एन.सी.ई.आर.टी. में प्रोजेक्ट फेलो रहे हैं और वर्तमान में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं.)

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