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यूं ही लोग उन्हें भाभी नहीं कहते थे: प्रणय कृष्ण

01अगस्त को मीना राय के जन्मदिन पर इलाहाबाद में ‘स्मरण में है आज जीवन’ कॉम. मीना राय की स्मृति में प्रलेसं, जलेसं, जसम और समकालीन जनमत द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया गया। जिसमें शहर के बुद्धिजीवी, शिक्षक, लेखकों ने उनसे जुड़ी हुई स्मृतियां साझा की और हाल ही में उनकी नवारुण प्रकाशन से प्रकाशित ‘समर न जीते कोय’ किताब पर बातचीत की।

अनीता गोपेश ने उनके घरेलू जीवन से गुजरते हुए कठिनाइयों का सामना करते हुए उनकी प्रगतिशील प्रतिबद्धता को याद किया. पद्मा सिंह ने मीना भाभी के साथ अपने 40 साल के सम्बन्धों का ज़िक्र किया और कहा कि उनका सहज होना हमारे लिए सबसे अधिक आकर्षक था, इसी के साथ उन्होंने उनकी सकारात्मकता को भी याद किया. गायत्री गांगुली ने उन्हें याद करते हुए कहा कि वे जितनी अधिक साधारण महिला थीं उनका लेखन उतना ही अधिक प्रभावशाली था. उन्होंने मीना भाभी को कम्युनिस्ट पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ता, मासिक पत्रिका समकालीन जनमत, किताब और प्रगतिशील उद्धरणों के पोस्टर के स्टॉल लगाने से लेकर तथा CAA-NRC के खिलाफ़ आंदोलन में शामिल होने के साथ कई संस्मरणों के माध्यम से याद किया. रूपम मिश्र ने कहा कि मीना भाभी को संघर्षों के साथ जीते हुए हमको भरोसा रहा कि हम भी ऐसे जी सकते हैं. उन्होंने उनकी किताब में प्रयुक्त मातृभाषा को लेकर सकारात्मकता प्रकट की. प्रणय कृष्ण ने उनके आत्मीयपन को याद किया और कहा कि यूं ही लोग उन्हें भाभी नहीं कहते थे. उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय के 1975 से 1990 के दौर के छात्र आंदोलनों को भी याद किया और कहा कि यह किताब उनके जीवन का आईना है. उन्होंने यह भी कहा कि मीना भाभी ने साधारणता में भी असाधारण जीवन जिया. सुरेन्द्र राही ने मीना भाभी की ममता और सहानुभूति को याद किया और हिन्दी लेखकों से आशा जताई कि उनके आत्मकथात्मक लेख की भाषा मीना भाभी के लेखन की तरह सहज होगी. उन्होंने कहा कि रामजी राय को मीना भाभी जैसी साथी मिलीं, यह एक सुखद संयोग ही है. नीलम शंकर ने मीना राय को याद करते हुए कहा कि उन्होंने अपने ममत्व का सीमित नहीं असीमित विस्तार किया. हरिश्चंद्र पाण्डे ने उनकी किताब में उनके नजरिए की सकारात्मकता को व्याख्यायित किया और कहा कि उनके सरल वाक्यों में गहन अर्थ है साथ ही उन्होंने उनकी पंक्ति लड़कियां पौधा नहीं पेड़ होती हैं को भी दुहराया. प्रख्यात कवि देवी प्रसाद मिश्र ने कहा कि हिन्दी के सबसे सरल वाक्य उन्होंने ही लिखे, उन्होंने मीना भाभी की किताब की तुलना एनी फ्रैंक की डायरी से की और कहा कि यह किताब पूरे हिंदुस्तान के समाज के विषैले और खोखले तंत्र को दर्शाती है. सुनील मौर्य ने कहा कि उन्हें वर्तमान के साथ भविष्य में करने वाले काम की भी चिंता रहती थी और वे कई जनपक्षधर पत्रिकाओं, रैलियों, अधिवेशनों की हरसंभव मदद करती थीं. संध्या नवोदिता ने कहा कि मीना भाभी ने साधारण स्त्री के असाधारण संघर्ष को लेखन में दर्ज़ किया और जसम ने इसको किताब के रूप में प्रकाशित करवाकर लोगों के बीच पहुंचाया इसके लिए जसम की आभारी हूँ. कवि धूरिया ने उनको याद करते हुए कहा कि हम उन्हें कहते भाभी ही थे लेकिन हमारे उनके बीच रिश्ता और संवाद दादी की तरह होते थे. अनिल भौमिक ने उनकी अंतिम यात्रा को याद किया. इस पूरे कार्यक्रम का संचालन शिवानी ने किया और इसमें विवेक, भानु, राहुल, बसंत त्रिपाठी, अनीता, साक्षी, सोनाली, प्रेमशंकर, रानी, राधा, शशांक, राणा, श्वेता समेत कई लोग मौजूद रहे.

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