मार्कण्डेय की कहानियों में बनते हुए राष्ट्र की तस्वीर

जनमत शख्सियत

मार्कण्डेय (2 मई 1930 – 18 मार्च 2010) हिंदी के जाने-माने कहानीकार थे। आज उनके जन्मदिवस पर अपने एक लेख के माध्यम से उन्हें याद कर रहे हैं दुर्गा सिंह


1930 का दशक हिन्दुस्तान की आजादी की लड़ाई में कई नये तत्वों के प्रवेश का भी दशक है। इस दशक के भीतर राष्ट्र निर्माण के तत्व अपने निर्णायक दौर में पहुँचते हैं।

एक तरफ मुस्लिम लीग, हिन्दू महासभा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक जहाँ पिद्दड़े हुए आधुनिकता विरोधी मुल्यों के साथ राष्ट्र की बात कर रहे थे, तो दूसरी तरफ भगत सिंह के साथी भगत सिंह द्वारा बताये रास्ते पर राष्ट्र निर्माण का लक्ष्य लेकर चल रहे थे जिसमें आधुनिक और प्रगतिशील राष्ट्र के तत्व विद्यमान थे।

इसी दशक में सहजानन्द का किसान आन्दोलन और बी॰ आर॰ अम्बेडकर का आन्दोलन भी आधुनिक और प्रगतिशील मूल्य को लेकर चल रहा था। कांग्रेस इसमें अपनी सुविधानुसार जगह तय करती रही। आधुनिकता, प्रगतिशील, धर्मनिरपेक्षता को लेकर चला यह

राजनीतिक-सामाजिक द्वन्द्व आजादी के बाद नेहरू के नेतृत्व में कुद्द समय के लिए एक दिशा लेता हुआ सा लगा। नई कहानी इसी दौर में अपना रूप-स्वरूप ग्रहण कर रही थी।

हिन्दी में जहाँ इस दौर की कहानी में आधुनिकता, लोकतन्त्र, प्रगतिशीलता, धर्मनिरपेक्षता जैसे मूल्य अपने सामाजिक सन्दर्भ तलाश रहे थे जहाँ उनका सामना चले आ रहे वर्णवादी सामान्ती मूल्यों से हो रहा था जो कभी सीधे तो, कभी रचना के स्तर पर रहस्य और अद्वैत के दर्शन का चोला पहनकर आ रहा था।

उर्दू कहानीकार भी मुस्लिम समाज के भीतर के इसी द्वन्द्व में अपना रूप ग्रहण कर रहे थे और आधुनिकता व लोकतंत्र विरोधी मूल्यों से रचना के स्तर पर आमने-सामने हो रहे थे। अर्थात हिन्दी उर्दू दोनों भाषाओं में अन्धविश्वास, धर्मान्धता, वर्णवादी विभाजन आदि के खिलाफ रचनात्मक संघर्ष 1930 के दशक में शुरू हुए राजनीतिक संघर्षों से ही प्रभाव ग्रहण कर रहे थे और आजादी के बाद की राजनीति के लिए कसौटी भी बन रहे थे। मार्कण्डय इसी दौर में बतौर कहानीकार सामने आते हैं।

मार्कण्डेय का पहला कहानी संग्रह ‘पान-फूल’ 1954 ई0 में नवहिन्द प्रकाशन हैदराबाद से द्दपकर आया। हालाँकि मार्कण्डेय ने कहानी-लेखन  1948 में ही शुरू कर दिया था। मार्कण्डेय तब प्रतापगढ़ में रहते थे और वहाँ चल रहे किसान आन्दोलन से गहरे प्रभावित थे।

प्रतापगढ़ के इस किसान आन्दोलन में कांग्रेस के समाजवादी नेता आचार्य नरेन्द्र देव की भूमिका महत्वपूर्ण थी। आचार्य नरेन्द्र देव मार्क्सवाद  की कक्षाएं चलवाया करते थे। मार्कण्डेय इन कक्षाओं में शामिल होते थे।

प्रारम्भिक कहानियों में ‘रक्तदान’, हैदराबाद निजाम के खिलाफ लड़ रहे किसानों के त्याग और बलिदान पर केन्द्रित कहानी थी, ‘गरीबों की बस्ती’, जो मार्कण्डेय की पहली लिखी हुई कहानी है, भारत-पाक विभाजन के बाद बंगाल के साम्प्रदायिक दंगों पर केन्द्रित हैं।

यह पहली कहानी इस बात के लिए महत्वपूर्ण है, कि मार्कण्डेय इस कहानी में ही मध्य वर्ग के वर्णवादी साम्प्रदायिक चरित्र को उभार देते हैं अर्थात राष्ट्र निर्माण के तत्वों के द्वन्द्व की पृष्ठभूमि में इस कहानी को रखकर देखा जा सकता है, इसका नायक मूँगफली बेचने वाली मुस्लिम लड़की नूरी से प्रेम करता है और पढ़ा-लिखा युवक है, लेकिन साम्प्रदायिक दंगा फैलने पर वह नूरी की बस्ती जलाने वाले दंगाइयों में सबसे आगे रहकर नेतृत्व करता  है।

भारत के नये बनते मध्य वर्ग के सांस्कृतिक पिद्दडे़पन को रेखाँकित करती यह पहली कहानी सिर्फ मार्कण्डेय के सचेत कहानीकार होने को ही नहीं दिखाती बल्कि भारतीय समाज के एक ऐसे यथार्थ को सामने रखती है, जिससे लोकतन्त्र और आधुनिकता का भविष्य तय होना था।

‘गुलरा के बाबा’ मार्कण्डेय की किसी पत्रिका में द्दपी पहली कहानी है। यह हैदराबाद से निकलने वाली पत्रिका ‘कल्पना’ में 1951 ई0 में द्दपी।“गुलरा के बाबा” कहानी का प्रस्थान बिन्दु समाज का वर्णवादी विभाजन ही बनता है जहाँ चैतू अहीर अपनी झोपड़ी के लिए ठाकुर के बगीचे से सरपत काटता है, जो गुलरा के बाबा को नागवार गुजरता है।

जाति-वर्ण से परे यहाँ ठाकुर और चैतू में एक समानता है और वह है कि दोनों पहलवान हैं। वर्णवादी  मूल्यों में यह एक द्वद्वात्मक मूल्य की तरफ इशारा करता है जिसमें मानवीय पहलू महत्वपूर्ण हो उठता है। अर्थात दोनों पहलवान है और अखाड़े के उसूल से चलते हैं।

अखाड़े में वर्णवादी नैतिकता  अपना रूप बदल लेता है, उसके धोखे अपनी जगह हैं, लेकिन गुलरा के बाबा मानवीय मूल्यों  से बद्ध होते हैं।  गुलरा के बाबा एक पिद्दड़े हुए वर्णवादी समाज से आते हैं, लेकिन वे उदार मानवीय मूल्यों को द्दोड़ते नहीं। अर्थात मार्कण्डेय वर्तमान पीढ़ी के सांस्कृतिक पिद्दड़ेपन और विगत पीढ़ी के उदार मानवीय मूल्य दोनों को उद्घाटित करते हैं।

यह आजादी के समय के भारतीय समाज का एक सामान्य  चरित्र है जिसे मार्कण्डेय अपनी कहानियों में विषय बनाते हैं। और जिसका सीधा सम्बन्ध नये बनते लोकतंत्र और राष्ट्र निर्माण से था। राष्ट्रनिर्माण का यह रास्ता सीधा नहीं था बल्कि वह तमाम जटिलताओं से भरा था।

एक ही समय में कई समयों का समाज एक साथ अस्तित्व में था और मार्कण्डेय इसे बखूबी परख रहे थे। गुलरा के बाबा का समाज एक जातिभेद वाला समाज है लेकिन उसमें कुद्द उदार मानवीय मूल्य हैं जो किसी भी आधुनिक समाज के लिए भी बेहद जरूरी हैं, जिसे द्दोड़कर आगे नहीं बढ़ा जा सकता है, और जो तमाम मानवीय विकास के चरणों में एक मौजूद मूल्य रहा है, एक जिन्दा मूल्य रहा है।

‘पान-फूल’ मार्कण्डेय की एक अन्य सर्वाधिक चर्चित कहानी है। ‘गरीबों की बस्ती’ और ‘गुलरा के बाबा’ के बरक्श इस कहानी की भाषा वस्तुनिष्ठता लिए हुए नहीं हैं। ‘पान-फूल’ की भाषा सांकेतिक हो गयी है, लेकिन कहानी का केन्द्रिय विषय भारतीय सामाजिक संरचना का यथार्थ ही है। इसमें भी जातिभेद और वर्णभेद वाला पिद्दड़ा हुआ समाज है।

इसमें गुलरा और चैतू की कहानी अपना रूप बदल लेती है। पान-फूल में उदारता, त्याग, बलिदान जैसे मूल्य और भाव निचली जाति के भीतर घटित होते दिखाए गये हैं। रीती-नीली को बचाने के लिए आगे आती है। दोनों दोस्त हो जाती हैं।

वे अपने गुड्डे और गुड़ियों के माध्यम से नये सामाजिक रिश्ते की बुनियाद रखते हैं। यह सामाजिक रिश्ता प्रतिबन्धित हैं, लेकिन नीली और रीती इससे अलग एक सहज रिश्ता कायम करते हैं.

यह सहजता नये मानव समाज और राष्ट्र की कल्पना से जुड़ा है, जिसमें सामाजिक भेद-भाव न हो, लेकिन यह कल्पना साकार नहीं हो पाती नीली और रीती दुर्घटना के शिकार हो जाते हैं।

पान और फूल उनके रिश्ते के रूप में मान्यता पाते हैं, लेकिन हकीकत में वह सम्भव नहीं हो पाता। एक आधुनिक राष्ट्र के निमार्ण की जो कल्पना आजादी के लड़ाई के दौरान देखी गयी थी, वह भी साकार कहाँ हो पाती है? वह भी दुर्घटना ग्रस्त हो जाती है। सामाजिक भेदभाव विहीन राष्ट्र प्रतीकों में ही पूजा जाता है, हकीकत में वह सम्भव नहीं हो पाता।

पान-फूल में लोककथा को नया संस्कार दिया मार्कण्डेय ने, उसे अपने समय के सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ से जोड़ा है, नये सामाजिक सन्दर्भों में उसे घटित किया है।

‘नीम की टहनी’, ‘पान-फूल’ ’संग्रह की ही कहानी है और ‘पान-फूल’ का ही एक अन्य सामाजिक सन्दर्भ लिए विस्तार है। ‘नीम की टहनी’ अन्धविश्वास और लोकविश्वास के बीच कुमार और पियारी की कहानी है। सामाजिक रीति-रीवाज और प्रतिबन्ध के पार कुमार और पियारी का सम्बन्ध है।

यह प्रेम कहानी भी दुर्घटना की शिकार हो जाती है। यह प्रेम कहानी भी एक अन्धविश्वास का रूप ले लती है। ऐसे सारे सामाजिक सम्बन्ध जो भेद-भाव पर टिके समाज के नियम तोड़ते हैं और एक सहज मानवीय सम्बन्ध निर्मित करते हैं समाज उसे लेकर एक कहानी गढ़ता है, जैसे ‘पान-फूल’, जैसे ‘नीम की टहनी’ अर्थात सामाजिक भेद-भाव सनातन है उसके विरूद्ध जाने पर ऐसी ही दुर्घटनाएँ होती हैं। लोकतन्त्र अपनाये एक नये बनते राष्ट्र में भी ऐसी ही दुर्घटनाओं को जन्म दिया जाता है।

ताकि उसका वर्णवादी आधार बना रहे। लेकिन रीती और नीली, कुमार और पियारी इस आधार को भंग करतें हैं, समता और समानता और सहज मानवीय सम्बन्ध को विकसित करते हैं।

लोक में वे किसी न किसी रूप में याद किये जाते हैं, वर्णवादी अधार का क्रम भंग करने वाले आज भी मारे जाते हैं, तब भी मारे जाते थे। लोक उन्हें अपनी स्मृति में जिन्दा रखता है।

लोकतंत्र में लोक की इस स्मृति और वर्णवादी पुरातन पंथियों की गढ़ी गयी, बनायी गयी झूठी स्मृति का द्वंद्व अभी भी जारी है। वर्णवाद का गढ़ा झूठ अभी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र के निर्माण को दुर्घटनाग्रस्त करता रहता है।

एक बनते हुए लोकतात्रिक राष्ट्र के भीतर बहुत सारी इच्द्दाएँ-आकाक्षाएँ नयी होती है। नये बनते राष्ट्र का भविष्य, उसकी दिशा इन्ही इच्द्दाओं-अकांक्षाओं से पहचानी जाती है।

राष्ट्र बनने की प्रक्रिया में जो सामाजिक समूह, जाति, भाषाई समाज, वर्ग रहते हैं, उनकी इच्द्दा-आकाक्षा की यथास्थिति क्या है, उसके साथ एक बनते हुए राष्ट्र का, लोकतंत्र का व्यवहार ही उसके चरित्र, उसके स्वरूप की कसौटी हौती है। मार्कण्डेय की कहानियाँ इन स्थितियों से गुजरती हैं, उन्हें एक रचनात्मक दस्तावेज के रूप में दर्ज करती हैं।

सामाजिक यथार्थ का यह रूप खास कर ग्रामीण संरचना के भीतर के उपस्थित यथार्थ को नये बनते राष्ट्र के सन्दर्भ में कहानी में प्रस्तुत करने वाले मार्कण्डेय हिन्दी भाषा के अनूठे रचनाकार हैं।

स्त्री, दलित, पिद्दड़ा और अल्पसंख्यक बनते हुए राष्ट्र में अपने लिए जगह तलाशते समूह हैं ये राष्ट्र बनने की राह में हैं। मार्कण्डेय की कहानियों में इनकी यथार्थ स्थिति को उकेरा गया है, जिसे देखकर नये-नये आजादी पाये हुए देश को हू-ब-हू पहचाना जा सकता है, कि वह उसमें है क्या ?

स्त्रियों को केन्द्र में रखकर मार्कण्डेय ने कई कहानियाँ लिखी हैं। कहानी के लिए नारी पात्र चाहिए, प्रिया सैनी, मिस शान्ता और माही को प्रतिनिधि कहानी के रूप में रखा जा सकता है। कहानी के लिए नारी पात्र चाहिए की जमुना बारी के आठ पति जैसे नये बनते राष्ट्र और लोकतंत्र के आठ द्वार हैं जिनसे पार पाकर ही स्त्री बतौर राष्ट्र खुद को स्थापित कर सकती है।

जमुना बारी चूँकि समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़ी है, इसलिए उसके लिए संघर्ष ज्यादा कठिन है। इस प्रक्रिया में वह, सात पतियों को द्दोड़ देती है और आठवें की हत्या कर देती है।

सात पति वे सात द्वार हैं, जो एक दलित स्त्री के लिए समता, समानता, लोकतंत्र का रास्ता रोके खड़े हैं। जमुना बारी का संघर्ष एक स्त्री के साथ एकं अपवंचित राष्ट्र का भी संघर्ष है। संध्या, रमोला, लक्ष्मी, रशीदा से होते हुए कहानी जमुना बारी तक पहुँचती है।  संध्या, रमोला, लक्ष्मी, रशीदा अपनी सामाजिक आर्थिक स्थिति में जमुना बारी से ऊपर के स्तर पर रहती हैं, लेकिन अभी उन्हें मनुष्य का दर्जा नहीं प्राप्त है।  ये सभी स्त्रियाँ लड़ती हैं और खुद को निर्णायक बनाती हैं।

माही, मिस शान्ता, सूर्या और प्रिया सैनी भी खुद को निर्णायक बनाती स्त्रियाँ हैं, जिन्हें मार्कण्डेय ने अपनी कहानियों का मुख्य पात्र बनाया है। उन्हें एक आइडेण्टिटी के बतौर वे पेश करतें हैं और कहानी का नाम सीधे इन्हीं पात्रों के नाम पर रखते हैं। वर्णवादी समाज में स्त्री की पहचान बिना पुरूष के नहीं होती। अर्थात माँ, पत्नी, प्रेमिका, बहन आदि से अलग उसे नहीं जाना जाता है।

मार्कण्डेय जब प्रिया सैनी, मिस शान्ता, माही, सूर्या जैसे नाम से कहानी लिखते हैं तो यह वर्णवादी समाज की स्त्री को लेकर रची गयी व्यवस्था का संरचना भंग है, उससे अलग एक नयी बात है।

इन कहानियों के भीतर से गुजरने पर वह और स्पष्ट होता है। प्रिया सैनी, माही, सूर्या, मिस शान्ता स्त्री को लेकर स्थापित सारी वर्णवादी पितृसतात्मक नैतिकता के आधार को अस्वीकार कर देती हैं। वे अपने जीवन को लेकर खुदमुख्तारी तय करती हैं।

पुरूष को अपने जीवन में निर्णायक नहीं होने देती हैं। नये बनते राष्ट्र में स्त्री के तरफ से आ रही यह नयी आकांक्षा थी, जिसका राष्ट्र के भीतर उपस्थित वर्णवादी पुरूष सत्ता चरित्र से संघर्ष स्वभाविक था।

प्रिया सैनी का नैरेटर नायक,सूर्या का सुनील, माही का प्रीतीश, मिस शान्ता का बरोरा लोकतंत्र और बराबरी का सपना लेकर आजाद हुए देश के आधार में उपस्थित वर्णवादी तत्व के मध्यवर्गीय प्रतीक हैं।

ये देखने में आधुनिक और प्रगतिशील हैं लेकिन अपने असल व्यवहार में स्त्री को बतौर आब्जेक्ट मानते हैं। वे स्त्री को शुध्दता, एकनिष्ठता, पवित्रता, समार्पण जैसे वर्णवादी पुरूष नैतिकता के दायरे में ही देखना चाहते हैं, प्यार करना चाहते हैं।

बराबरी, समता, समानता के आधार पर नहीं। मार्कण्डेय इसे ग्रामीण समाज में भी उनके यथार्थ रूप में पेश करते हैं। ग्रामीण समाज में बिन्दी के सामाजिक सन्दर्भ माही से भिन्न हैं लेकिन बिन्दी का संघर्ष ग्रामीण भू-आधारित सामाजिक संरचना की नैतिकता से होता है। यहाँ दिखावटी आधुनिकता नहीं है बल्कि पुरानी बर्बरता की जगह धूर्तता, मक्कारी, चालाकी ने ले ली है।

इसे पहचानना और मुश्किल है, लेकिन बिन्दी, मंगी, जसवंती जैसी ग्रामीण स्त्रियाँ इसे पहचान लेती हैं और उससे संघर्ष की अलग राह बनाती हैं। बिन्दी ग्रामीण समाज में प्रभु समाज कीे प्यार और घृणा, दया और दण्ड से निर्मित राजनीति को ही अपना हथियार बना लेती है।

समता, समानता न्याय और लोकतंत्र के सपने ने सबसे अधिक किसी के भीतर उम्मीद भरी तो वह था दलित और पिद्दड़ा ग्रामीण समाज। ग्रामीण सामाजिक यथार्थ को पेश करने वाला कोई भी रचनाकार इससे बचकर कोई यथार्थ नहीं रच सकता था।

मार्कण्डेय यह यथार्थ रचते हैं, बच-बचाकर नहीं बल्कि बहुत स्पष्ट रहते हुए। हलयोग, कल्याणमन, भूदान,बवण्डर, हल लिए मजूर आदि कहानियों में इसे देखा जा सकता है। चैथी मास्टर समता, समानता न्याय जैसे मूल्य पालने के लिए, सपना देखने के लिए, उसे व्यवहार में उतारने के लिए वर्णवादी सामाजिक सत्ता द्वारा दण्डित किया जाता है।

एक नये बनते राष्ट्र में ब्राह्मणवाद अपना रूप बदलकर आता है। वह अपनी बर्बरता और अमानवीयता को धर्म के द्वारा औचित्य प्रदान करती है।

नये आजाद हुए राष्ट्र और लोकतंत्र में धार्मिक अन्धविश्वास और धर्मान्धता के आगे नागरिक आर्दश और नेहरू का नेतृत्व दोनों लाचार नजर आते हैं। उस समय अपनायी गयी यह लाचारी ही आज के यथार्थ को भयावह और डरावना बनाती है, जब आर एस एस के नेतृत्व में राष्ट्र निर्माण में उपस्थित सारे आधुनिक तत्वों और लोकतन्त्र को खत्म कर देने का खुला अभियान संचालित हो रहा है, और सरकार तथा न्यायालय उसे जस्टीफाई कर रहा है।

मार्कण्डेय जैसे रचनाकारों ने आजादी पाए राष्ट्र के भीतर मौजूद इन तत्वों के निर्णायक होते जाने को उसी समय पहचाना और कहानियों का विषय बनाया।

‘हलयोग’ कहानी का चौथी मास्टर, ‘भूदान’ कहानी का जतन, ‘दौने की पत्तियाँ’ कहानी का भोला, बीच के लोग का बुझावन आदि सभी ऐसे पात्र हैं जो नये बनते राष्ट्र की प्रक्रिया से बाहर धकेल दिए जाते हैं।

यह अपनाये गये लोकतंत्र द्वारा अपने क्रोड में वर्णवाद को द्दिपाने की वजह से होता है। आज यही द्दिपा वर्णवाद लोकतंत्र को ग्रस लेने को आतुर है। आज वह हिन्दुवाद की खोल में अपने सबसे आक्रमक दौर में है।

सच्चर कमेटी की रिपोर्ट ने मुसलमानांे की जो  दारूण  तश्वीर पेश की, उसने 75 साल के लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, समता, समानता, न्याय के तमाम दावों की असलियत उघाड़ दी। ऐसा नहीं था कि सच्चर कमेटी की रिपोर्ट से पहले यह तथ्य ज्ञान का हिस्सा नहीं था।

आजादी के बाद लगभग सारे जनसरोकार वाले रचनाकारों ने इस ज्ञान के आलोक में अपनी रचनाएं दी। मार्कण्डेय ने खासकर इसे अपनी नई कहानियों में विषय रूप में या सामाजिक सन्दर्भ के रूप में अंकित किया। उनकी एक स्वतंत्र कहानी ही ‘बरकत’ नाम से है, जिसमें मुसलमानों के प्रति भारत के लोकतंत्र की संस्थाओं के द्वारा किये जाने वाले साम्प्रदायिक बर्ताव को तो चिन्हित किया  ही जा सकता है, साथ ही उनकी गरीबी, अशिक्षा के प्रति नये बनते राष्ट्र में किसी उद्देश्य, चिन्ता का अभाव स्पष्टतः दिखता है और, सबसे बढ़कर अपने जनतांत्रिक अधिकार के लिए संघर्ष करने उतरे मुसलमान युवक को अपराधी घोषित करने की प्रवृत्ति का भी निदर्शन होता है।

‘आदर्श कुक्कुट गृह’ में गरीब मुसलमानों के लिए अपनायी गयी योजना का चरित्र स्वयं में तो आपत्तिजनक है ही, जहाँ उनकी शिक्षा के लिए कोई प्रबन्ध नहीं होता है, बल्कि उन्हें मुर्गी पालने वाला समझकर ही पंचवर्षीय योजना का कार्यक्रम बनता है।

यह नये बनते राष्ट्र और अपनाये गये लोकतंत्र की ज्ञान मीमांसा  में मौजूद वर्णवाद था, पंचवर्षीय योजनाओं तक में घुसा था।

‘आदर्श कुक्कुट गृह’ का एक पक्ष तो यह है, दूसरा है कि पेश की गयी इस योजना को भी वर्णवादी सामन्त अधिकारी वर्ग अपना ग्रास बना लेता है। यह अधिकारी वर्ग जिसे निरन्तर और जिम्मेदार, और निरपेक्ष, और न्यून होते जाना था, वह नवकुलक, नवसामन्त, के रूप में खुद लोकतंत्र के कन्धे पर सवार हो चुका है, ‘आदर्श कुक्कुट गृह’ कहानी इस यथार्थ को उद््घाटित करती है, कि एक तत्व के रूप में तो वह राष्ट्र निर्माण के प्रारम्भ में ही मौजूद था जो आगे और शक्तिशाली हो चुका है।

पंचवर्षीय योजनाओं में राष्ट्रनिर्माण की जो आकाँक्षा पाली गयी, उसका क्रियान्वयन जिस संस्थाओं के जिम्मे आया, उन संस्थाओं पर वही लोग काबिज हुए, जिनके खिलाफ लड़कर आजादी पायी गयी, सपने देखे गये थे, आकंाक्षाएँ पाली गयी थीं।

पंचवर्षीय योजनाएँ 1951ई0 से प्रारम्भ होती है। मार्कण्डेय का पहला कहानी संग्रह 1954 में आता है। पहली कहानी द्दपती है 1951 में ही। पहले ही संग्रह में पंचवर्षीय योजना, भूमि सुधार जमीदारी उन्मूलन की यथार्थ स्थिति को केन्द्र में रखती कहानियाँ हैं।

‘सवरइया’ इस संग्रह में ऐसी कहानी है, जो आजादी के बाद के विकास के दावे को उद्घाटित करता है, साथ ही नये बनते राष्ट्र में ग्रामीण समाज में कौन से तत्व प्रभावी होते जाते हैं, उसकी भी कहानी है।

महराजिन की जमीन और बैल पर आँख गड़ाए उसके पट्टीदारों के पक्ष में अमीन और पुलिस दोनों खड़े है, दोनों बिक जाते हैं। अमीन खेतों की माल गुजारी वसूलने वाला सबसे निचले स्तर का अधिकारी जिसका ग्रामीण खेतिहरों से सीधा सम्पर्क रहता है, वह अमीन आजादी के बिल्कुल प्रारम्भ में ही बड़ी जोत वालांे के पक्ष में अपनी भक्ति प्रदर्शित कर देता है, ऐसे में अगर आजादी के झूठी होने का नारा लगा, तो गलत नहीं था।

दूसरी पंचवर्षीय योजना 1956 से 61 तक चलती है। इसी दौरान मार्कण्डेय के तीन कहानी संग्रह आते हैं महुए का पेड़-1955, हंसा जाई अकेला -1956 । ‘महुए का पेड’ संग्रह में नौ सौ रूपये और एक ऊँट दाना, साबुन, महुए का पेड़, हंसा जाई अकेला संग्रह में कल्याणमन, दौने की पत्तियाँ, चाँद का टुकड़ा, प्रलय और मनुष्य तथा भूदान संग्रह में आदर्श कुक्कुट गृह, भूदान, बिन्दी, दाना भूसा कहानियों के माध्यम से नये बनते राष्ट्र, जिसमें 95 प्रतिशत कृषि अर्थव्यवस्था के मातहत थे उनकी यथार्थ स्थिति को सामने रखती हैं।

साथ ही अपनाए गये लोकतंत्र के नये मान-मूल्य और उसके निर्णायकों को भी ये कहानियाँ प्रकट कर देती हैं। इन कहानियों में स्पष्ट हो जाता है कि आजादी के संघर्ष, उसके मूल्य आदि पर कौन सी सामाजिक शाक्तियाँ काबिज हो जाती हैं और उस समय की नेहरू सरकार, जिसे आधुनिक और प्रगतिशील माना जाता था, कैसे घुटने टेक देती है या समर्पण कर जाती है।

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