रूपम की कविताएँ पितृसत्ता की चालाकियों की बारीक़ शिनाख़्त हैं

कविता

दुर्गा सिंह


हिंदी समाज एक ऐसी कालावधि से गुजर रहा है, जिसमें एक तरफ निरंतरता की ताकतें, सामाजिक वर्ग- समूह आजादी के बाद के सबसे आक्रामक और संगठित संस्थानिक हमलों को अंजाम देने में अपनी पूरी ताकत से लगी हैं, वहीं उसी के भीतर से मुक्ति और परिवर्तन की आकांक्षाएं विभिन्न रूपों में प्रकट हुई हैं। कहीं वे सीधे टकरा रही हैं तो कहीं वे कला रूपों, रचनाओं में व्यक्त हो रही हैं।

रूपम मिश्र  की कविताओं को इसी क्रम में देखा जा सकता है। हिंदी समाज और परिवार के भीतर एक स्त्री लिंग आधारित भेदभाव के चलते जिन अहसासों से गुजरती है, रूपम मिश्र की कविता उसे दर्ज करती है।

जलती उँगलियों पर गीला आटा चिपकाती
सुनती रही सास की कड़क आवाज
कि एक भी शऊर नहीं सिखाया माई ने

चलीं थीं कलेक्टर बनाने !

यह भावबोध, अनुभव और अहसास स्त्री पुरुष के बीच भेद-भाव विहीन व्यवहार, बराबरी और रिश्ते की आकांक्षा से उपजे हैं। सबसे बड़ी खासियत इन कविताओं की यह है कि इसमें स्त्री संबंधी पितृसत्तात्मक पुरुष वर्चस्व वाली सोच की प्रक्रिया को ऐसी घटना और क्रियाओं के माध्यम से व्यक्त किया गया है, जिससे हमारे हिंदी समाज की हर स्त्री गुजरती है, भले ही सबकी चेतना उसे दर्ज न कर पाती हो।

रूपम मिश्र की कविताओं में स्त्रियों की तरफ से कोई शिकायत पत्र नहीं है, बल्कि पितृसत्ता की वह प्रतिक्रियाएँ, प्रतिबंध और चालाकियाँ हैं, जिन्हें वे रोज जीती हैं। एक बानगी देखिये

चूड़ियां हमेशा अभिसार में नहीं टूटती
कुछ क्रूर और कसैली कहानी
कलाई में बचे कंगन भी कहते हैं!

 

पितृसत्ता की इन बारीक़ चालाकियों पर अपनी नज़र रखे हुए रूपम की कविताएँ न केवल उसकी वास्तविकता को परत दर परत बेनक़ाब करती हैं बल्कि हौले से ही सही विद्रोह की एक स्पष्ट आवाज़ को स्वर देती हैं।

हमें सवाल करने की आजादी नहीं थी

फिर भी हम सवाल करने को मचले
हमें प्रेमी चुनने की भी आज़ादी नहीं थी
फिर भी हम दिल हारे..

 

रूपम मिश्र की कविताएँ

 

1. चली थीं कलेक्टर बनाने !

पहली बार स्कूल जाते हुए ख़ूब रोयी तो
दादी ने माँ को डाँटा , नहीं पढ़ती तो जाने दो !

चलीं हैं कलेक्टर बनाने!

चूल्हे के पास राख पर उँगली से लिखाती
माँ फिर डाँट दी गई कि
अभी तक खाना तैयार नहीं हुआ

चली हैं कलेक्टर बनानें!

माँ ये शब्द सुनते -सुनते बूढ़ी हो रहीं थीं
और मैं बड़ी
इतनी बड़ी कि जब स्कूल में किसी लड़के के चिठ्ठी
फेकने पर हंगामा हुआ तो
बाबा लाठी लेकर माँ की ओर दौड़े

घूँघट में सहमी माँ रसोई घर के
किवाड़ के कोने में छिपी कांपती रहीं

और मैं ओसारे में बुआ से लिपटी रोती रही
शायद उन्हें दया आ गयी हम निरीहों पर

वहीं आँगन से लाठी चूल्हे के पास फेंकते हुए
फिर वही कहा बाबा ने

चली थी कलेक्टर बनाने !

किताबों को हाथ में ही थाम्हें
मैं अब ससुराल आ गयी थी

अबोध मन अभी गिरस्ती नहीं सिख पाया था
कदम -कदम पर होती रही गलतियाँ

जलती उँगलियों पर गीला आटा चिपकाती
सुनती रही सास की कड़क आवाज
कि एक भी शऊर नहीं सिखाया माई ने

चलीं थीं कलेक्टर बनाने !

 

2.ये लड़कियाँ बथुआ की तरह उगी थीं!

जैसे गेहूँ के साथ बथुआ
बिन रोपे ही उग आता है!

ठीक इसीतरह कुछ घरों में बेटियाँ
बेटों की चाह में अनचाहे ही आ जाती हैं!

पीर से जड़ी सुधियों की माला
पहन कर ये बिहसती रहीं!

खुद को खरपतवार मान , ये साध से गिनाती रही कि
भाई के जन्म पर क्या – क्या उछाह हुआ!

और गर्व से बताती कि कितने नाज नखरे से पला है
हम जलखुम्भीयों के बीच में ये स्वर्णकमल!

बिना किसी डाह के ये प्रसन्न रही
अपने परिजनों की इस दक्षता पर कि

कैसे एक ही कोख से ..एक ही रक्त-माँस से
और एक ही
चेहरे -मोहरे के बच्चों के पालन में
दिन रात का अंतर रखा गया!

समाज के शब्दकोश में दुःख के कुछ स्पस्ट पर्यायवाची थे!
जिनमें सिर्फ सटीक दुखों को रखा गया
इस दुःख को पितृसत्तात्मक वेत्ताओं ने ठोस नहीं माना!

बल्कि जिस बेटी के पीठ पर बेटा जन्मा
उस पीठ को घी से पोत दिया गया
इस तरह उस बेटी को भाग्यमानी कहकर मान दे दिया!

लल्ला को दुलारती दादी और माँ ने
लल्ला की कटोरी में बचा दूध बताशा इसे ही थमाती!

जैसे गेहूँ के साथ बथुआ भी अनायास सींच दिया जाता है !प्यास गेहूँ की ही देखी जाती है!

पर अपने भाग्य पर इतराती
ये लड़कियाँ कभी देख ही नहीं पायीं कि
भूख हमेशा लल्ला की ही मिटायी गयी!

तुम बथुए की तरह उनके लल्ला के पास ही उगती रही
तो तुम्हें तुरंत कहाँ उखाड़ कर फेंका जाता !?

इसलिए दबी ही रहना ज्यादा छतनार होकर
बाढ़ न मार देना ! उनके दुलरुआ का!

जो ढेरों मनौतियों और देवी -देवता के अथक आशीष का फल है !

 

3.तितली जैसी लड़कियों को हमेशा भाये गुस्सैल प्रेमी!

उन्होंने मान लिया था कि
ये क्रोधी कुँवर कथाओं में से चलकर
उनके लिए आया है!

वो कल्पना करती कि ये निरंकुश प्रेमी
एकदिन शिव की तरह
उन्हें बाहों में उठाकर चीत्कार करेगा!

उनके हठ पर हिरन की हत्या करने वाले
क्षत्रिय राम की तरह
उनके वियोग में वन में भटकता रोयेगा!

पेड़ों और लताओं से उनका पता पूछेगा
ये धनुर्धारी रूढ़ि और रवायतों
को उनके लिए झटके तोड़ देगा !

वो हावी रहे , जिद्दी प्रेमी को
दृढ़प्रतिज्ञ मान लहालोट रहीं!

वो नहीं याद रख पायीं
भरत को गर्भ में लिये
भटकती निर्वासित शकुंतला को!

नहीं निश्चित निलय मिला इसी भूमि पर भूमिजा को!
जुए की शर्त तोड़ना आवश्यक नहीं लगा था
पार्थ को पांचाली के लिए!

सजा के लिए जरूरी नहीं था
अहिल्या का अपराधी होना
स्त्री होना काफ़ी था !

कुछ सिंड्रेला की खोयी चप्पल कभी नहीं मिलती
और हमेशा हीरों को रांझे भी नही मिलते!

चूड़ियां हमेशा अभिसार में नहीं टूटती
कुछ क्रूर और कसैली कहानी
कलाई में बचे कंगन भी कहते हैं!

इस लिए प्रेम उससे करो जो
तुम्हें रोता देख रोने लगे !

जिसमें प्रबुद्ध और पुरूष होने का दम्भ न हो ।

 

4.मेरा जन्म वहाँ हुआ
जहाँ पुरूष गुस्से में बोलते तो
स्त्रियाँ डर जाती

मैंने माँ ,चाची और भाभी को
हँसकर पुरुषों से डरते देखा

वो पहला पुरूष , पिता को
किसी से भी तेज बोलते देख मैं डर जाती

वो दूसरा पुरूष भाई
जिसे मुझसे स्नेह तो बड़ा था
मेरी किताबी बातों को ध्यानस्थ सुनता
पर दुनियादारी में मुझे शून्य समझता

वो कहता दी ! यहाँ नहीं जाना है
मैं कहती अरे ! जरूरी है क्यों नहीं जाना !
तुम नहीं समझोगी!
उसके चेहरे पर थोड़ा सा गुस्सा आ जाता
मेरा मन डर कर खुद को समझा देता था कि
बाहरी दुनिया तो उसी ने देखी है
मैंने घर और किताबों के सिवा क्या देखा है

फिर तुम….
जीवन में तुम आये तो मुझे लगा
ये पुरूष मेरे जीवन के उन पुरुषों से अलग है
ये वो पुरूष थोड़ी न है
ये तो बस प्रेमी है

मिथक था वो मेरा
पुरूष बस प्रणय के क्षणों में प्रेमी होते हैं
स्थायी रूप से वो पुरूष ही होता है

क्यों कि जब तुम पहली बार गुस्से से बोले तो
वही डर झट से मेरे सीने में उतर आया
जो पिता और भाई के गुस्से से आता था

मैं ढूँढने लगी उस पुरूष को
जो झुक कर महावर भरे पैरों को चूम लेता था
कहाँ गया वो पुरुष जो कहता था कि
तुमसे कभी नाराज नहीं हो सकता

मुझे गुस्सा आया उन कवियों पर
जिन्होंने नारी को नदी
और पुरुष को सागर कहा

मैं अचरज से तुम्हें देखती रह गयी
तुम वही सदियों के पुरूष थे
मैं वही सदियों की स्त्री

मैं ,आज ठीक माँ चाची और भाभी के बगल में खड़ी थी
और जान गई थी कि
क्षणिक प्रणय आवेग जीवन नहीं होता

 

5.ये लड़कियाँ कहीं और से चलकर नहीं आयीं थीं

ये लड़कियाँ कहीं और से चलकर नहीं आयीं थीं
जिन्हें अपने ही घर में गैरों ने बार -बार कहा कि अब आ गयी हैं ना!
घास फूस की तरह भी नहीं उगीं थी आँगन के किसी कोने में
जिसे अपनी जड़ से उखाड़ फेंकने की जल्दी थी घरवालों को
जिस तरह भाइयों ने जन्म लिया था ठीक उसी तरह ये रोती हुई जन्मी थी और इस घर से हमेशा रोती हुई गयीं
ये वही लड़कियाँ थी जिन्हें हांथ में चूड़ी पहनाते हुए
हुए समझाया गया था कि नैहर सासुर एक बराबर नहीं होना चाहिये
तो इन्होंने हाथ में ज्यादा भरी चूड़ी को नैहर की ओर रखा
और मन ही मन नैहर को सासुर से ज्यादा समृद्ध रखने की ईश्वर से प्रार्थना की

 

6. ये शयनकक्ष से संसद तक कांटेदार हंकना लेकर खड़े हैं!

ये शयनकक्ष से संसद तक कांटेदार हंकना लेकर खड़े हैं!

जो हमारे ज़रा से इनकार पर हमारी आत्मा पर पड़ेगा!

स्त्रियों चलो कहीं और चले !
ये उनकी दुनिया है !उनके बनाये हुए नियम हैं

जिसमें उन्होंने स्त्रियों को मनुष्य न मानकर
जऱ जमीन में जोरू जोड़कर संपत्ति की संज्ञा दी!

हम स्त्रियां इसपर इठलाती फिरीं कि हम पुरुष की सम्पत्ति हैं!

तुम आज़ादी ओढ़ने शहर की ओर चली थी ना !
हम सभ्यता का अलाप सुनकर रोमांचित थे
उसके अन्तरे पर आकर ठगे से उदास खड़े हैं!

मुझे देश के सारे शहर एक जैसे लगे जिनकी दीवारें नपुंसकता के इलाज की गारंटी से पटी थीं
और अखबार बलात्कार की घटना से पटे थे !

ये इश्तिहार और अखबार देखकर मुझे कस्बे में गरीब के आहाते में कूदा हुआ वो व्यक्ति याद आया
जिसने पकड़े जाने पर बेहयाई से कहा कि मुझे तो इसकी बेटी ने बुलाया था !

हम किसी उदार पंथ की ओर मुँह उठाये
कब तक खड़े रहेंगे
क्यों कि हर पंथ में एक पंथ खड़ा है पुरुष पंथ
जिसका स्त्रियों को लेकर अपना दंड विधान है

तुम सारी विसंगति को त्यागकर प्रेम चुनना चाहती हो
तो जान लो
इस युग में सबसे कठिन है पुरुष को प्रेम होना
और भयावह है स्त्री को अनायास मोह होना ।

 

7.मैं हैरान और निहाल हूँ तुम्हें देखकर

मैं हैरान और निहाल हूँ तुम्हें देखकर !
जीवन में मैंने तुमसे बड़ा अचरज नहीं देखा !

तुम नदी से बातें कर सकते हो
चिड़िया के साथ गा सकते हो
तुम्हारा बस चले तो किसी स्त्री की प्रसव पीड़ा समझने के लिए गर्भ धारण कर सकते हो!

तुम किसी किन्नर की मौत पर फूट- फूट कर रो सकते हो!
तुम किसी समलैंगिक की शादी में बधाई गा सकते हो!

तुम अपनी सारी डिग्रियां जला कर मेर साथ गाँव के भगवती देवी विद्या मंदिर में पढ़ सकते हो !

तुम अपनी उदास छोटी बहन की गुड़िया की साड़ी भाभी की ब्रांडेड लिपिस्टिक चुराकर रंग सकते हो!

तुम अपनी प्रेमिका के नये प्रेम के किस्से हँसकर सुन सकते हो !

दरवेश ! तहज़ीबें चकित तुम्हें देखकर !
तुमने सारे मठों और मान्यताओं को तोड़कर
अनलहक को आत्मा का दस्तार बनाया!

तुम संसार के सारे युद्धस्तम्भों पर इश्क़ की इबारत लिख सकते हो!
और युद्धरत सारे हाथों में उनकी प्रेमिकाओं के पत्र थमा सकते हो!

रंगीले फ़कीर ! अभिजात विद्रूपता को मुँह चिढ़ाकर
तुम मेरे डिहवा पर के मुसहर टोली में बैठकर महुआ की शराब पीकर रात भर नाच सकते हो!

मैं तुम्हारे मांथे पर चुम्बन का नजर टीका लगाती हूँ मेरे अजब प्रेमी !
मेरे साथ मेरी चिर लजाधुर संस्कृति भी अवाक है तुम्हें देखकर कि
तुम अपनी माँ को नवीन प्रेम में देख सकते हो।

 

8. मुझसे कभी मिलने आना 

मुझसे कभी मिलने आना , तो उपहार में वही चमकदीदे की गुड़िया लाना !!

जिसे दादी ने मेले में मेरे हाथ से धरा दी थी!

अलगरज़ी से पारे गये कजरौटे का काजल
आँखों में बहुत गड़ता है
तुम अबकी आते हुए जो रूह को ठंडक दे दे
ऐसी तासीर वाला कोई सुरमा लाना!

तुम सीख लेना अपनी बिटिया की चोटी गांछने का शऊर
क्योंकि जन्म से लटें मेरी उलझी हैं किसी को साध नहीं तो किसी को फुरसत नहीं मिली सुलझाने की
तुम एकबार उन्हें इत्मीनान से संवार कर चिर आश्वस्ति की किलिचें टांग देना !

सुना है आदिवासी स्त्रियाँ जानती हैं अपने प्रेमी को रिझाने की कला
उनके जुड़े के पत्ते प्रेम के सांकेतिक परचम होते हैं
उनके गीतों में प्रेमी का पता होता है

तुम किसी वनकन्या से मनुहार करके मांग लेना मेरे लिए कोई प्रेम की जड़ी- बूटी जिसके असर से मैं भूल जाऊँ संसार की सारी वर्जनायें व कुधारणायें!

सदियों की जागी मेरी आँखें नींद से जल रही हैं
तुम सीख कर आना कोई लोरी
पर ध्यान रखना उसमें कोई ऐसा राजकुमार न हो जो घोड़े में पर चढ़कर आता है और बाँह पकड़कर अपने देश ले जाता है।

 

9.एक दिन मैं बारी – बारी से उन सारी जीवट और
कर्मठ स्त्रियों पर कविता लिखूँगी!

 

एक दिन मैं बारी – बारी से उन सारी जीवट और
कर्मठ स्त्रियों पर कविता लिखूँगी!

जो एकदम नमक की तरह होतीं हैं
खारेपन से बनी होती है उनकी देह !

कविता लिखूँगी !
चहक रहीं उन मेघवर्णी स्त्रियों पर
जिनकी आँखें छोटी , होंठ मोटे और बाल रूखे थे ,
जिनको शायरों ने कभी आँख उठाकर नहीं देखा
पर हमेशा जरूरी रहीं वो जीवन मे जल की तरह

कविता लिखूँगी उस स्त्री पर
जो वज्र गर्मी में भी धुँए से भरे घर में
घूघट काढ़े घंटो जलते चूल्हे पर गढ़ती है रोटियां
और देह के साथ मन भी अछल – विछल हो जाता है

जो पीठ में बच्चा बांधकर
भट्ठे पर चिलचिलाती धूप में काम करती है

जो घूघट और लाज बचाये
मशीन में चारा बालती हैं जेठ या देवर के साथ

कविता लिखूँगी उस स्त्री पर
जिसे कहा जाता है कि व्यभिचारी
बीमार ससुर का पैर दबाना तुम्हारा धर्म है
और हवाला दिया जाता है सेवा और परलोक
जिसे सोचकर कांप जाती हैं
हम स्त्री विमर्श पर बात करती स्त्रियाँ

कविता लिखूँगी बाबूसाहब के घर की उस स्त्री पर
जो अक्सर रात को भूखें सोती है
मर्यादा के नाम पर
जिसकी जिंदगी कही बद्दतर
एक मजदूर स्त्री से

कविता लिखूँगी !
उस स्त्री पर जो
जीवन भर डरती रही पिता और पति से
और ढलती उम्र में डर जाती है बेटे के गुस्से से

कविता लिखनी है उस स्त्री पर भी
जो गाँव के प्राइमरी स्कूल में पढ़ाती है
मैं उसे रोज देखती हूँ
दूसरे गर्भ के प्रकाश से भरी वो
पहले बच्चे की उंगली थामे धूप में स्कूल जाती है
राह में किसी की बाइक पर
इसलिए नहीं बैठती कि
चौराहे पर गुटखा चबाता
उसका निठल्ला पति नाराज हो जायेगा

और वहीं सहायिका हैं वो स्त्री भी
जो खुद बच्ची होते हुए भी एक बच्चे की माँ है

कविता तो लिखना था !उस स्त्री पर भी जो
माँ थी ऐसे बेटे की जिसने तेज़ाब डाल दिया था
उस फूल सी बच्ची की चेहरे पर
पर बेटे के गले को पैर से दबाकर मार नहीं सकी
कि गलती से राक्षस को जन्म दे गई थी वो

और भी बहुत किस्म – किस्म की स्त्रियां हैं
जिन्हें मुझे लिखना था
पर संवेदनायें थक कर शिथिल हो जाती हैं !

मेरे मन में सारी स्त्रियां बैठकर रोती रहती हैं

मैं खुद आत्मवंचना में जीती , पर उन्हें सांत्वना देती हूँ
कि तुम सब आस न छोड़ो !

एकदिन ये सारी स्त्रियां इकठ्ठा होगी
और जबाब मांगेगी
पितृसत्ता से कि

माप कर बताओ अपने मापदंड से कि
आखिर स्त्रियों को कितना सहना चाहिये !?

 

10. स्त्रियाँ प्रेम पीकर जीती है!!

स्त्रियाँ प्रेम पीकर जीती है!!

ये आजीवन एक प्रेम जोन में रहना पसंद करती हैं
कभी पिता ,प्रेमी ,पति या भाई
तो आगे चलकर संतति प्रेम!

इन्हें हमेशा भाते हैं प्रेम के गल्प!
खासकर एक मुख्य प्रजाति का प्रेम
इन्हें हमेशा सौभाग्य लगा !

ये प्रेम जब भी जीवन में नहीं मिलता तो बुझ जाती हैं
कभी-कभी प्रेम अनाधिकृत भी करती हैं
और कभी उम्र ढलने पर प्रेम न मिलने पर
चिड़चिड़ी भी हो जाती है!

ये बचपन में बतातीं आज शुक्ला सर ने मुझे बेटा कहा !
आज पापा के दोस्त ने मेरे गालों को प्यार से छुआ!

फिर ये बड़ी होती हैं और कहती हैं
आज एक लड़के ने मुझे अपना दोस्त कहा
आज एक प्यारे से बच्चे ने मुझे दीदी कहा!

फिर दीदी दोस्त से ये भाभी-चाची और माँ बन जाती हैं !
ये ख़ूब खुश होकर बताती हैं
कि डाँट से बचाने में देवर मेरी कितनी मदद करता है
जेठानी का बेटा मेरे ही हाथ से खाना खाता है
बेटी को मुझसे ही होमवर्क कराने हैं!

फिर माँ बनकर वो एकबार फिर जीवन के स्वर्णिम पल में डूबती हैं
वात्सल्य पोर -पोर रस से भर देता है!

पर मुश्किल ये है कि समय रुकता नहीं
बच्चा बड़ा हो जाता है उसकी दुनिया माँ पर नहीं ठहरती
बेचारी एकबार फिर रिक्त हो जाती है!

घर मे सभी व्यस्त हैं फिर भी वो खुश है
और मंदिर पूजा पाठ करती खुद को सिंचित करती रहती है!

उसे खुश रहने के लिए काफी होता है कि आज प्रवचन से लौटते हुए
पुलिस वाले ने माता जी कहकर सड़क पार करवाई!

पर असली अकेलेपन का पड़ाव तो अभी आगे है
जब इनके नेह का घट बेटा शाम को घर आने पर
माँ को सामने देखना जरूरी नहीं समझता !

अब ये घर के किसी कोने में अनमनी पड़ी रहती है
और सब कहते हैं कि माँ कितना सोती हैं !

 

11. हमें सवाल करने की आजादी नहीं थी

हमें सवाल करने की आजादी नहीं थी

फिर भी हम सवाल करने को मचले
हमें प्रेमी चुनने की भी आज़ादी नहीं थी
फिर भी हम दिल हारे
जबकि प्रश्न और प्रेम दोनों को कितना करना है उन्होंने पहले ही तय कर रखा था
पर जब भी बाहों में लेकर सिर पर हाथ फेरते हैं तब हम भूल जाते हैं अपनी औकात
और पूछ लेते हैं कोई ऐसा सवाल जिसका जबाब उनके पास नहीं होता
फिर शुरू होता है प्रेम यातना का वो बेकल पल
जिसमें तिरस्कार और त्याग देने की असहनीय पीड़ा होती है
हम अवाक से देखते हैं उनको कि वो कोई और था क्या जो कहता था मेरी सांसे तुम्हारी हैं
फिर क्या सवाल सांसों से भारी होते हैं
क्या हम सवाल करते बेहत बदसूरत और गलीज हो जाते हैं
या वो देह जिसकी आगोश में वो आखिरी सांस लेना चाहते हैं
सवाल करते ही उसमें असाध्य रोग उभर आता है
जिसे देख उन्हें उबकाई आने लगती है
उनको चाहिए था ना कि वो प्रेम की प्रस्तावना में लिखते कि प्रेम में पड़ी स्त्री का प्रेमी से सवाल करना कुफ़्र है
चलो फिर से प्रेम – प्रेम खेलते हैं
जीवन भर के साथ की कसमें खाते हैं
अभिसार की रात में केतकी के फूलों की तरह महक जाते हैं
अबकी आँखें बंद और होंठ सिल लेते हैं क्योंकि वे सवाल से खत्म होते हैं और हमें हमेशा प्रेम ने खत्म किया

 

(कवयित्री रूपम मिश्र, पूर्वांचल विश्वविद्यालय से परस्नातक हैं  और प्रतापगढ़ जिले के बिनैका गाँव की रहने वाली हैं. कुछ  पत्र पत्रिकाओं में इनकी कविताएँ  प्रकाशित  हैं। 

टिप्पणीकार दुर्गा सिंह आलोचक और संस्कृतिकर्मीं

हैं )

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