समकालीन जनमत
ज़ेर-ए-बहस

महाजनी सभ्यता और महामारी के सबक

डॉ. दीना नाथ मौर्य


सभ्यता के विकासक्रम में मानव जाति पर समय-समय पर आयी प्राकृतिक आपदाओं के ऐतिहासिक अनुभव से यह सीख ली जा सकती है कि कोई भी प्राकृतिक आपदा, उससे निपटने के सार्थक प्रयासों की असफलता के चलते एक समय के बाद मानव निर्मित त्रासदी के रूप में सामने आती है. कोरोना वायरस के चलते आज की यह आपदा भी इसका अपवाद नहीं है. जहाँ वायरस के साथ ही साथ मानव जीवन पर आयी तमाम तरह की अन्य आपदाओं को भी साफतौर पर देखा जा सकता है. भुखमरी, पलायन और बेरोजगारी इनमें से प्रमुख हैं. हमें याद रखना होगा कि इस महामारी के फलस्वरुप श्रमजीवी मजदूरों के पलायन और उनके जीवन में आने वाली दुखद बेरोजगारी के गंभीर परिणाम समाज और राष्ट्र के जीवन में दिखने अभी बाकी हैं. श्रम का इस कदर दोहन और फिर उसका पलायन एक खतरे की घंटी है जिससे कोई भी अछूता नहीं रहेगा.

भूमंडलीकरण के अंतर्विरोधों की पड़ताल में उसकी मूल्यहीनता के सन्दर्भ को सामने रखकर नवमध्यवर्गीय समाज की सीमाओं को रेखांकित करते हुये कभी पी.सी. जोशी ने लिखा था कि एक ऐसे देश में जहाँ का अधिकांश जन-समूह अभाव, दरिद्रता और गरीबी से ग्रस्त हो, अनियंत्रित भोग की ओर उन्मुख कोई भी वर्ग नेतृत्व की भूमिका निबाहने में असमर्थ रहेगा, वह जन साधारण में ईर्ष्या और आक्रोश तो उभार सकता है लेकिन उनके आदर का पात्र नहीं बन सकता, न ही उनकी नैतिक स्वीकृति प्राप्त कर सकता है. पी.सी.जोशी या किसी भी विचारक के हर एक विश्लेषण से आप सहमत हों यह जरूरी नहीं है पर इधर के कुछ वर्षों से जिस तरह से इस धारणा के व्यवहारिक रूप हमें हमारे आस-पास के जीवन में दिखायी पड़ने लगे हैं, उससे यह तो साफ़ है कि हमारे देश में औद्योगीकरण और नब्बे के दशक में शुरू हुये नवउदारवाद ने एक ऐसे मानस के निर्माण में अपनी अहम् भूमिका निभायी जिसके लिए जीवन में मुनाफा और उपभोग उनकी प्राथमिकताओं में शामिल होता चला गया. व्यक्तिगत जीवन से लेकर सार्वजनिक जीवन तक फायदे के नए–नए कायदे विकसित किये जाने लगे. अपने शुरूआती दिनों में यह प्रवृत्ति लोगों के बीच बेरोजगारी और सामाजिक बंधनों से मुक्ति की चाहत के रूप में सामने आयी पर ढाई से तीन दशकों में ही इस उपभोग और उत्पादन की अनियंत्रित लिप्सा ने भारतीय सरजमीं पर भी अपने असली रूप दिखाने शुरू कर दिए. वही जिसको कभी मुंशी प्रेमचन्द ने महाजनी सभ्यता कहकर उसके अंतर्विरोधों की सटीक पहचान की थी.

सार्वजनिक सेवाओं के बुनियादी ढाँचे को कमजोर करने में इस ‘महाजनी सभ्यता’ की अहम भूमिका है. इसने प्रकृति और पर्यावरण को ही नहीं प्रभावित किया बल्कि इस नजरिये ने हमारे सामाजिक-राजनीतिक ढाँचे पर भी गहरे असर डाले हैं. हम निजी जीवन में ही नहीं अपने सार्वजानिक जीवन में भी मुनाफे के पलड़े को ही थामे रहे और हमारी बुनियादी चीजों की जमीन लगातार खिसकती गयी. हमारी शिक्षा, चिकित्सा और परिवहन के विविध आयामों में इस महाजनी सभ्यता ने अपनी सेंध लगायी. इसने धीरे-धीरे संवैधानिक रूप से कल्याणकारी राज्य के दायित्वों को भी मुनाफाखोरी की शर्तों की आड़ में सीमित किया.

इस महाजनी सभ्यता के वशीभूत होकर हमने एक दौर में विकास और उन्नति के उन्हीं मानकों के साथ अपने को जोड़ लिया जिसमें ‘सबसे आगे’ का भाव होता है. यह एक मानसिकता है जिसके लिए हम अपने को तैयार करते रहने का असफल प्रयास करते हैं, जबकि इस सोच की दीवार कितनी भुरभरी है कि यह कोरोनाकाल में 40-45 दिनों की बंदिशे भी नहीं झेल पाया. नवमध्यवर्गीय समाज आज परेशान है. जिस दिखावे के लिए सारी जिन्दगी कमाकर संचित करते रहे अब वही जब प्रतिबंधित हो गया तो बैचैनी का होना स्वाभाविक है. अब दिखावे की जगह ही न बची तो क्या करें? महंगें सोफे, बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ किस काम की जब उनके जरिये पड़ोसी पर रौब ही न जमा पाए.

पूंजीवादी व्यवस्था का यह अजीब अंतर्विरोध हमारे मानस में कुछ इस तरह निर्मित हुआ है कि हम सब नौकरी तो सरकारी करना चाहते हैं पर अपने सारे काम प्राइवेट करवाना चाहते हैं. केवल स्कूल तक ही नहीं, हर जगह यह बात लागू होती है, हास्पिटल से लेकर यात्रा करते समय भी हमारी यही मानसिकता रहती है. आज 40 दिनों का लाकडाउन हुआ तो हमारा यह अभिमान भी टूटा कि जब कभी जिन्दगी और मौत के बीच हम फँसे होते हैं तो सार्वजनिक सेवाएँ ही काम आती हैं. इसकी मिशाल वे लोग पेश कर रहे हैं जो इस दौरान प्रशासन में काम कर रहे हैं, फिर डाक्टर और स्वयंसेवी के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं.

आज जब हर बुनियादी चीजों को सांस्थानिक तौर पर निजीकरण के हवाले कर बाजार को सौंपने की पूरी नीति ही काम कर रही है तो फिर कल्याणकारी राज्य की परिभाषा सिर्फ इस बात तक सीमित होती नजर आती है कि वह अपने नागरिकों को उस बाजार के लायक अच्छा ग्राहक बना सके. महामारी के दौर में जब पूरी मानवता ही संकट में है तब एक चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकार के कर्तव्यबोध का यह अजीब विरोधाभास हमारे सामने आता है, जब वह अपने सारे दायित्व को नागरिक के कर्तव्यों से जोड़ने में ही खुद को कल्याणकारी मान लेती है. सरकारी नीतियां लगातार निजीकरण के हित संवर्धन को पोषित करने में लगी हैं और आम जनता जो अभाव, दरिद्रता और गरीबी से आज भी ग्रस्त है, उसके लिए चिकित्सा और स्वास्थ्य जैसी जरूरी सुविधाओं का अभाव लगातार बना हुआ है. जबकि हम जानते हैं कि शिक्षा और स्वास्थ्य पर किये गये व्यय महत्वपूर्ण दीर्घकालिक प्रभाव डालते हैं और उन्हें आसानी से बदला नहीं जा सकता. इसलिए सरकारी हस्तक्षेप अनिवार्य है. जब बुनियादी शिक्षा और स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं को नागरिकों का अधिकार मान लिया जाता है, तो यह अनिवार्य है कि सभी सुपात्र नागरिकों को, विशेषकर सामाजिक दृष्टि से वंचित रहे वर्गों को सरकार ये सुविधाएं निःशुल्क प्रदान करे. आज के समय की इस महामारी ने इस बात का संकेत दे दिया है कि अंततः सार्वजानिक संसाधन ही हमारे कठिन समय में साथ देते हैं. कोरोना से निपटने में उन देशों को अपेक्षाकृत ज्यादा सफलता मिली है जिन्होंने इस दिशा में सार्थक दिशा हासिल की है. क्यूबा जैसा देश इस समय में एक मिशाल के तौर पर सामने आया है.

समय की मांग का हवाला देने वाले मानस को यह बात समझ में क्यों नही आती कि आज समय की मांग निजीकरण और मुनाफाखोरी की प्रवृत्ति को हतोत्साहित करने की है, साथ ही सर्वसमावेशी समाज के विकास के लिए कुछ दीर्घकालिक सार्वजनीकृत योजनाओं पर कार्य करने की जरूरत है. आज भी भारतीय सन्दर्भ में हम देखें तो चिकित्सा और स्वास्थ्य के स्तर पर बुनियादी सुविधाओं के आधारभूत ढाँचे के विकास की जमीनी हकीकत को बदलने की दरकार है. उदाहरण के तौर पर हम देखें तो प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों के साथ सरकारी प्राथमिक विद्यालयों का रिश्ता इस कोरोना काल में एक नये रूप में सामने आया आया है .कोरोना की महामारी के समय में बड़े शहरों के मजदूर जब अपने गाँव घर को लौटे तो क्वारंटीन के लिए उन्हें 14 दिनों का सहारा उन्हीं सरकारी सकूलों में मिल सका जिसके लिए कभी नागार्जुन ने लिखा था कि ‘फटी भीत है छत छूती है, आले पर बिस्तुतिया नाचे’. इस दौरान वहां पानी, बिजली और शौचालय की बुनियादी सुविधाओं की न सिर्फ पोल खुली बल्कि लोगों को इस बात का अहसास भी हुआ कि इस तरह की सार्वजनिक संस्थाओं को संसाधनों के स्तर पर सशक्त होना कितना जरूरी होता है.

मानवीय विकास को समझने के लिए सन 1983 में गठित ब्रंटलैंड आयोग जिसका पूरा नाम ‘पर्यावरण और विकास पर संयुक्त राष्ट्र विश्व आयोग’ था, की अध्ययन रिपोर्ट जब 1987 में सामने आयी तो उसके जरिये कई महत्वपूर्ण अवधारणाओं पर विचार विमर्श शुरू हुआ. आयोग ने अपनी रिपोर्ट ‘अवर कामन फ्यूचर’ शीर्षक में लिखा कि ‘पर्यावरण समेत विभिन्न आर्थिक संसाधनों के प्रयोग में अंतरपीढ़ी समता ही संपोषणीय विकास है’. ब्रंटलैंड आयोग की यह सिफारिश महत्वपूर्ण व्यवहारिक रूप में सामने आई है कि अंतरपीढ़ी समता के मानक के रूप में हमें अपनी जरूरत को न सिर्फ सीमित करना होगा बल्कि कुछ ऐसी सामाजिक-आर्थिक निर्मितियों को व्यावहारिक धरातल पर प्रस्तुत करना होगा जिससे भविष्य में इस तरह की किसी भी स्थिति से निपटा जा सके. निवेश वह चाहे पैसे का हो, या फिर बौधिक संपदा का, हमारे अपने समय को तो प्रभावित करता ही है; उससे कहीं जयादा वह हमारे भविष्य की पीढ़ियों पर असर डालता है. मनुष्यता की बात करते हुए लगातार आमानुषिक होते जाना, यह एक शगल हमें पूँजीवाद की संस्कृति देती है. जिसके वश में हम जीवन को नष्ट करने के तमाम साधन तो निर्मित करते हैं पर जिन्दगी बचाने के लिए उपयोगी चीजों पर बुनियादी ढांचा निर्मित नहीं कर पाते हैं. पर्यावरण से लेकर आर्थिक और सांस्कृतिक स्तर के दस्तावेजों में संपोषणीय विकास की कागजी कार्यवाही तो हमने खूब की पर अपनी व्यवस्था में ‘अंतर पीढ़ीगत समता’ की बात करते हुए भी इस धरती को खुद के रहने लायक नहीं रखा.

हमने अपनी प्राथमिकता में हाइवे और चमकती सड़कें चुनी, हमने बड़े-बड़े माल चुने, हमने बुलेट ट्रेन चुनी, हमने इस पूरे ब्रह्माण्ड में शरारे भर देने वाले विनाशक हथियार चुने. इस सबके साथ हमारे हाथ से प्रकृति का वह रूप निकलता गया जिसके चलते बाद के दिनों में यह धरती हमारे होने की खूबसूरत गवाही देती. विकास के इस चयन में हमने बुनियादी चिकित्सा और बुनियादी शिक्षा को दोयम दर्जे के रूप में मान्यता दी. हालांंकि दिखावे के लिए सर्वाधिक प्रयोग हमारी सरकारों ने इन्हीं दो क्षेत्रों पर किया पर आर्थिक और बौद्धिक संसाधनों का अपेक्षाकृत कम निवेश इन दो क्षेत्रों में हो सका. इसके चलते सामाजिक निर्मिती में एक खाईं बन गयी. फिर तो विभाजन की बनती दीवार को कम करने के बजाय हम उसे और ऊंची करने में ही अपनी सारी उर्जा लगाते रहे. परिणाम यह हुआ कि तमाम तरह की तथाकथित श्रेष्ठता की मिथ्या श्रेणियां बनती गयीं और वहीं से गरीबी, अमीरी, सुविधाभोगी और सुविधाविहीन जैसी सामाजिक वर्गिकी तैयार हुयी. जिसे समाजशास्त्रीय विचारकों ने इण्डिया और भारत के रूप में रेखांकित किया है.

आज लाकडाउन के इस समय में पूंजीवादी महाजनी सभ्यता के अंतर्विरोध साफतौर पर दिखायी दे रहे हैं. वे तमाम चीजें ध्ववस्त होती नजर आया रही हैं, जिनके जरिये हम खोखली मर्यादाएं निर्मित करते रहे हैं. ‘बीमारी कौन फैलाया ?’ का नरेटिव बदल देने से न तो बीमारी ठीक होने वाली है और न ही उसके गंभीर परिणाम समाप्त होने वाले हैं. जो लोग इस गलतफहमी में हैं कि किसी और पार्टी की सरकार होती तो स्थितियां भिन्न होती, वे जरा राज्यों में अन्य पार्टियों की सरकारों के कामकाज को देखकर अपनी गलतफहमी को दूर कर सकते हैं. याद रखना होगा कि लोकतान्त्रिक सरकार और संविधान में सार्वजनिक जीवन को सार्वजनीकरण के जरिये ही बचाया जा सकता है. आज इस भीषण विभीषिका में भी उम्मीद बाकी है. जरूरत है दबाव समूहों के जरिये निजीकरण और श्रम कानूनों में हो रहे आमानवीय बदलावों के खिलाफ़ एक आवाज उठाने की और पूंजीवादी अर्थशास्त्र के अंतर्विरोधों की पहचान के साथ नीतियों के निर्माण की. कोरोना की महामारी ने इन सबके बीच जो एक नया सबक सिखाया वह यह कि सुपरफिसियल चींजें, वह चाहे धार्मिक आडम्बर हो अथवा मिथ्या वाह्याचार, इन सबके ऊपर है मनुष्य होने की बुनियादी शर्त. हर एक चीज को उपभोग और उपभोक्ता के नजरिये से देखने की विचारधारा इस लाक डाउन के समय औंधेमुंह गिरी है. इस लाकडाउन ने हमें जरूरत और शौक में अन्तर करना सिखाया है जबकि बाजार इस हमेशा इस बात पर आमादा रहता है कि हमारे शौक ही हमारी जरूरत का रूप ले लेंं.जीवन के बीच रिश्तों की अहमियत और बुनियादी चीजों की ओर लौटने का यह सही समय है.

(दीनानाथ मौर्य ने इलाहाबाद और जेएनयू से अपनी पढ़ाई पूरी की है। इलाहाबाद में लाइब्रेरी आंदोलन से जुड़े हुए हैं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं।)

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