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कार्ल मार्क्स : एक जीवन परिचय

दुनिया के मजदूरों के, सिद्धांत और कर्म दोनों मामलों में, सबसे बड़े नेता कार्ल मार्क्स (1818-1883) का जन्म 5 मई को त्रिएर नगर में हुआ जो प्रशिया के राइन प्रदेश में था । पिता पेशे से वकील थे, यहूदी थे लेकिन बाद में प्रोटेस्टेंट धर्म स्वीकार कर लिया था । त्रिएर नगर में प्रारंभिक शिक्षा जिम्नेजियम यानी विशिष्ट पाठशाला में हुई । जिम्नेजियम में ही उन्होंने पेशे के चुनाव पर विचार करते हुए एक लेख लिखा था जिससे आगामी जीवन की उनकी गतिविधियों का अनुमान होता है । इसमें उन्होंने दूसरों के लिए काम करने में हासिल प्रसन्नता को अपने जीवन का ध्येय घोषित किया था । त्रिएर स्थित जिम्नेजियम से उत्तीर्ण होने के बाद पहले बोन, फिर बर्लिन विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा ली । इन विश्वविद्यालयों में उन्होंने कानून, इतिहास और दर्शन का अध्ययन किया । लेकिन बर्लिन विश्वविद्यालय की जगह जेना विश्वविद्यालय से उन्होंने मशहूर ग्रीक दार्शनिक एपीक्यूरस के दर्शन पर शोध-निबंध प्रस्तुत किया था । इस पर उन्हें शोधोपाधि मिली । उसके बाद उन्हें मजाक में रेड डाक्टर भी कहा जाता था ।

बर्लिन में रहते हुए वे उस समय के सबसे प्रभावशाली दार्शनिक हेगेल की बौद्धिक विरासत की क्रांतिकारी व्याख्या करने वाले युवा-हेगेलपंथियों के साथी थे जो हेगेल के दर्शन से अनीश्वरवादी और भौतिकवादी नतीजे निकालने की कोशिश करते थे । उनकी इच्छा प्रोफ़ेसर बनने की थी लेकिन उनके एक साथी लुडविग फ़ायरबाख को पहले तो विश्वविद्यालय में अध्यापन से वंचित किया गया फिर दोबारा आने से रोक दिया गया । दूसरे साथी ब्रूनो बावेर से अध्यापन का अधिकार छीन लिया गया । ऐसी स्थिति में मार्क्स को अध्यापक बनने की उम्मीद छोड़नी पड़ी ।

फ़ायरबाख ने ‘ईसाई धर्म का सार’ शीर्षक किताब में धर्म की भौतिकवादी व्याख्या की थी । उनके प्रभाव में मार्क्स भी भौतिकवादी हो गए । इसी समय राइन प्रदेश के कुछ उद्यमियों ने कोलोन से एक अखबार ‘राइनिशे जाइटुंग’ निकालने की योजना बनाई और मार्क्स उसके मुख्य संपादक बनकर कोलोन आ गए । उनके लेखन की क्रांतिकारी धार के चलते अखबार पर सरकारी सेंसरशिप लगने लगी और उसके बाद बंद करने की योजना बनी । इसी काम के दौरान उन्हें राजनीतिक अर्थशास्त्र से अपने अपरिचय और उसके महत्व का पता चला ।

इसी दौरान उन्होंने बचपन की अपनी सहेली जेनी से शादी की जो प्रशिया के एक अमीर घराने की थीं । खास बात यह कि जेनी उम्र में उनसे चार साल बड़ी थीं । उस समय की सामाजिक मान्यताओं के विरोध में यह विवाह हुआ । जेनी के साथ घरेलू सहयोगिनी हेलेन देमुथ भी आईं जो जीवन भर मार्क्स परिवार के साथ रहीं और अंत में उन्हीं के साथ दफनाई गईं । शादी के बाद मार्क्स एक क्रांतिकारी पत्रिका के प्रकाशन के सिलसिले में पेरिस चले गए । पत्रिका का एक ही अंक निकल सका लेकिन उसके लेखों से मार्क्स के तेवर का अंदाजा होता है । पेरिस में रहते हुए वे समाजवादी विचारों के प्रभाव में आए । साइमन, फ़ूरिए और राबर्ट ओवेन के विचार उस समय के समाजवादी आंदोलन के प्रेरणा स्रोत थे । मार्क्स के पेरिस प्रवास के दौरान ही एंगेल्स कुछ दिनों के लिए वहां आए और हमेशा के लिए मार्क्स के घनिष्ठ मित्र बन गए । इस मित्रता के चलते दोनों की गतिविधियों में तूफानी तेजी आई । इस मित्रता की मिसाल नहीं मिलती । जीवन भर दोनों एक दूसरे के सहकर्मी, सहयोगी और साझेदार रहे ।

बहरहाल उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों का नतीजा निकला कि प्रशियाई सरकार के आग्रह पर उन्हें पेरिस से निर्वासित कर दिया गया और वे बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स चले गए । 1847 में दोनों ही गुप्त संगठन ‘कम्युनिस्ट लीग’ में शामिल हुए और उसकी दूसरी कांग्रेस में उन्हें लीग का घोषणापत्र लिखने की जिम्मेदारी मिली ।

1848 में प्रकाशित इसी दस्तावेज को हम ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ के नाम से जानते हैं । इसका पहला वाक्य ‘दुनिया का आज तक का समस्त ज्ञात इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास रहा है’ और अंतिम वाक्य ‘दुनिया के मजदूरों एक हो’ आज भी सैद्धांतिक और व्यावहारिक स्तर पर मजदूर आंदोलन की सबसे कीमती थाती हैं।

संयोग से फ़रवरी 1848 में क्रांति भड़क उठी और मार्क्स को फिर निर्वासित कर दिया गया । वे पेरिस आ गए और वहाँ से कोलोन चले आए तथा ‘न्यू राइनिशे जाइटुंग’ के प्रधान संपादक का काम सँभाला । जर्मनी में उन पर मुकदमा चलाकर उन्हें निर्वासित कर दिया गया । पहले वे पेरिस गए लेकिन वहाँ से भी क्रांतिकारी प्रदर्शनों के बाद उन्हें निर्वासित कर दिया गया । 1849 में उन्होंने लंदन को आखिरी ठिकाना बनाया और देहांत तक वहीं रहे।

लंदन पूंजीवादी देश इंग्लैंड की राजधानी तो था ही, सबसे अधिक उपनिवेशों पर भी उसका अधिकार था । इस परिस्थिति का लाभ उठाते हुए उन्होंने एक ओर पूंजीवाद का गहन अध्ययन किया, मजदूर आंदोलन के पहले अंतर्राष्ट्रीय संगठन का निर्माण किया जिसे हम प्रथम इंटरनेशनल के नाम से जानते हैं और संसार भार की राजनीतिक हलचलों के बारे में पत्रकारीय लेखन किया । इसी क्रम में उन्होंने भारत में अंग्रेजी राज के विरोध में भड़के 1857 के समर्थन में भी लेख लिखे ।

लंदन में रहते हुए उन्होंने एंगेल्स के साथ मिलकर मजदूर आंदोलन के लिए जरूरी सैद्धांतिक और व्यावहारिक काम किए । फ़्रांस की राजनीतिक क्रांतियों और इंग्लैंड की औद्योगिक क्रांति ने उन्हें यह अवसर दिया कि ऐतिहासिक घटनाओं पर लिखते हुए राजनीतिक बदलावों की वर्गीय व्याख्या कर सकें और दूसरी ओर पूंजीवादी अर्थतंत्र का गहन अध्ययन करके मजदूरों के हाथ में उससे मुक्ति पाने का औजार सौंप सकें । ये दोनों काम उन्होंने अपने लेखन के जरिए पूरे किए जिसका प्रमाण ‘फ़्रांस में वर्ग संघर्ष’, ‘लुई बोनापार्त की अठारहवीं ब्रूमेर’, ‘पेरिस कम्यून’ और ‘पूंजी’ जैसा विशाल ग्रंथ है । साथ ही दुनिया के मजदूरों की चेतना को उन्नत करने के लिए ‘वर्कर्स इंटरनेशनल’ का गठन और संचालन किया । 1883 में पैंसठ वर्ष की उम्र में उनका देहांत हो गया ।

उनकी मृत्यु के अवसर पर एंगेल्स ने कहा कि मार्क्स के निधन से मानवता का कद कुछ कम हो गया है । उन्होंने यह भी कहा कि सबसे आगे बढ़कर वे क्रांतिकारी थे ।
उनके जीवन और आचरण के आधार पर लेनिन ने कहा कि उनके विचारों के तीन स्रोत हैं: एक, जर्मन दर्शन जिससे उन्होंने सतत परिवर्तन का द्वंद्ववादी दर्शन लिया और इसे पूंजीवादी समाज की समाप्ति के दर्शन में बदल दिया । दूसरा, फ़्रांसिसी समाजवाद जिसे उन्होंने ठोस वैज्ञानिक स्वरूप प्रदान किया । तीसरे, ब्रिटिश क्लासिकल अर्थशास्त्र जिससे उन्होंने मूल्य का श्रम सिद्धांत लेकर उसके सहारे ‘अतिरिक्त मूल्य’ का सिद्धांत दिया । वर्तमान वैश्विक आर्थिक संकट की व्याख्या के लिए अब भी उनके इस सिद्धांत का सहारा लिया जा रहा है ।

 

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