द्वितीय स्मृति दिवस
झारखंड आंदोलनकारी दादा उम्मीदलाल गोप का जन्म 03 फरवरी 1971 को हेसालौंग, डाड़ी, हजारीबाग में एक मध्यम वर्गीय किसान परिवार में हुआ था. वे महज 15 वर्ष की उम्र से प्रगतिशील विचारधारा के प्रबल समर्थक एवं जुझारू कार्यकर्ता बने और जीवनपर्यंत रहे. अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत अपने काका कालेश्वर गोप से प्रेरित होकर की, एक सड़क हादसे के बाद से गम्भीर असाध्य रोग ने जीवन भले ही बदल दिया तब भी बीमारी से लड़े और अंततः 10 नवम्बर 2023 दिन शनिवार को दोपहर में अलविदा कह दिए. दादा अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत आईपीएफ, जो बाद में भाकपा माले बना, से की. वर्ष 1985 ई. से पार्टी की सांस्कृतिक टीम, जो जयंत गांगुली के निर्देशन में बनी थी, से जुड़े एवं वर्ष 1987 में झामकिस के पहले अधिवेशन के सांस्कृतिक कार्यक्रम में उम्मीदलाल गोप झारखंड आंदोलन के गीत गाए थे. ‘जागरण टीम’ हेसालौंग से जुड़कर झारखंड आंदोलनों के लिए बेखौफ आज़ादी के गीत गाये, झारखंड राज्य के विभिन्न गांवों में कई नाटकों में अभिनय कर अपने पात्र को जीवंत कर देने वाले हँसमुख एवं मिलनसार मिज़ाज के थे उम्मीदलाल दादा. 30 अक्टूबर 1988 ई. को बरकाकाना रामगढ़ के घुटुवा में पुलिस के द्वारा फायरिंग कर तीन निर्दोष लोगों (रिझनी देवी, बलकहिया देवी एवं रामप्रसाद महतो) की निर्मम हत्या कर दी गयी थी. निर्मम हत्या व पुलिसिया जुर्म के खिलाफ घुटुवा में विशाल जनसभा हुई थी. उस जनसभा में तत्कालीन पार्टी के महासचिव नागुसन पटनायक आये थे. पार्टी की सांस्कृतिक टीम के द्वारा ‘ऐ लाल फरेर तेरी कसम गीत गा कर’ रैली को सफल बनाने वाले समूह के सदस्य थे. जसम के आखिरी कार्यक्रम बगोदर में लालधन महतो के शहादत दिवस के सांस्कृतिक कार्यक्रम में जागरण टीम के द्वारा मंचित नाटक (हमें मंजूर नहीं) में बेहतरीन अभिनय कर यादगार बना दिये थे. बाद में इन्हें पार्टी की जिम्मेवारी मिली, पार्टी के हर मोर्चे पर सक्रिय भूमिका निभाई, जब भी पार्टी के द्वारा घोषित झारखंड आंदोलन व बाद में चुनावी प्रचार प्रसार हो, अकेले सुदूरवर्ती इलाकों प्रचार गाड़ी लेकर निकल जाते थे और अपनी भूमिका मजबूती से निभाते थे. 26 जुलाई 1991 मेंरलिगड़ा की घटना में सक्रिय भूमिका में थे और इस घटना में बाल-बाल बचे थे. 26/93 गिद्दी थाना संख्या जो 1993 ई की आर्थिक नाकेबंदी को सफल बनाने के लिए पार्टी के तत्कालीन झारखंड के प्रदेश संयोजक वर्तमान में झामकिस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हीरा गोप ने 17 मार्च 1993 ई. को प्रेस कांफ्रेंस कर झारखंड आंदोलनकारियों को जेल प्रशासन के द्वारा उचित व्यवस्था नहीं देने व अनशन में बैठे साथियों की मांगो के समर्थन और आर्थिक नाकेबंदी को सफल बनाने का आह्वान झारखंड की जनता से किये थे. स्वंय झामकिस के प्रदेश संयोजक हीरा गोप हेसालौंग के गेहूम टांड में बैठक की अध्यक्षता कर आर्थिक नाकेबंदी को सफल बनाने व छापामार युद्ध की रणनीति तैयार करने पर ज़ोर दिया था. इसमें जो भी जिम्मेवारी उम्मीदलाल गोप को मिली, उन्होंने बखूबी निभाया और झारखंड आंदोलन की चर्चित आर्थिक नाकेबंदी को सफल बनाने में महती भूमिका निभाकर इतिहास के पन्नों में अपना नाम दर्ज कर दिया. इस आर्थिक नाकेबंदी में नापो जंगल के पास चक्का जाम करके एक ट्रक को जलाया गया था, जबकि पुलिस की जबरदस्त पेट्रोलिंग थी. ट्रक जलाकर इस आर्थिक नाकेबंदी को सफल बनाये. इस आंदोलन में रघु गोप को पुलिस ने पकड़ा था. और पुलिस ने उन्हें हाज़त में इतना बर्बरतापूर्ण ढंग से मारा था कि जब अगले पुलिस अधिकारी ने कहा कि और मारो तब हाज़त वाले पुलिस ने कहा अब रघु गोप के शरीर में कोई जगह नहीं है, ऐसा उन्होंने बातचीत के क्रम में कहा. इस घटना के बाद आंदोलनकारी रघु गोप को 6 माह तक जेपी कारा में बंदी के रूप रखा गया था. बाद में दर्जन भर आंदोलनकारी वेलबॉण्ड पर रिहा हुए. अपने आंदोलनकारी जीवन संघर्ष के साथ-साथ उम्मीदलाल गोप एक सामाजिक कार्यकर्ता भी थे. जब उन्हें वर्ष 1995 ई में पार्टी के द्वारा प्रखंड की जिम्मेवारी मिली, तो अपने घर से लगभग 60 किलोमीटर दूर जाकर सरकार की योजनाओं को अपने पंचायत में लाने का काम किया करते थे. इस कार्य के लिए पार्टी ने इन्हें याम्हा मोटरसाइकिल दिया था. गांव में पानी की समस्या को हल करने के लिए जब पार्टी के निर्णय के अनुसार आंदोलन को धार देने के लिए कमिटी बनाया, जिसके सदस्य बतौर इसका व्यापक प्रचार किया, जब मिट्टी के घड़ा लेकर गांव की महिलाओं ने तत्कालीन चुरचू प्रखंड के बीडीओ के समक्ष प्रदर्शन कर गाँव की महिलाओं ने घड़ा फोड़ा तब इस आंदोलन ने व्यापक रूप लिया. जनप्रतिनिधियों के साथ प्रशासन की आँख खुली और हेसालौंग पंचायत ने इस ऐतिहासिक लड़ाई से पूरे प्रखंड व जिले में पहचान बनाई. बाद के वर्षों में सेंट्रल कोल्ड फ़ील्ड लिमिटेड अरगड़ा के द्वारा पचास फीट का एक कुआं बनवाया गया, तत्कालीन सांसद के द्वारा भी तीन पचास फीट कुआं का निर्माण योजना आयी, बाद के वर्षों में पुनः सांसद के द्वारा चार डीप बोरिंग दिया गया, आज भी एक बोरिंग चिन्हित स्थान में पानी नहीं निकलने के बाद जब बोरिंग गाड़ी रात में जाने लगी तो उम्मीदलाल दादा ने ही आगे आकर गाड़ी रोके और पुनः दूसरे पॉइंट में ले जाकर बोरिंग करवाई गई जो आज भी प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र के पास है और लाइफ लाइन पॉइंट है. इसी संघर्ष को गाँव के युवाओं ने आगे बढ़ाया, जिसका परिणाम है आज गांव में झारखंड सरकार की महत्वाकांक्षी ग्रामीण जलापूर्ति योजना के तहत जलमीनार बना गाँव के लोगों के घरों में पानी पहुँचना शुरू हुआ. 1994 ई के आस पास गाँव में बिजली लाने का प्रयास पार्टी के बैनर तले उम्मीदलाल दादा ने बखूबी किया, जिसके बाद गाँव के लोग इन्हें प्यार से ‘बिजली मंत्री’ का उपनाम दे रखे थे. कई गरीब परिवारों को जवाहर योजना में काम दिलवाने, पंचायत के गरीबों को बीपीएल सूची, अंत्योदय योजना का लाभ दिलाने, वृद्धा पेंशन का लाभ दिलवाने व जागरूक करने का कार्य वे चुरचू प्रखंड जाकर बख़ूबी करते थे. कई युवाओं को सरकारी नौकरी के लिए जाति, आय व आवासीय प्रमाण पत्र बनवाकर ला देते थे और पढ़ाई के प्रति जागरूक करते थे ताकि अपने गांव के युवा ज्यादा से ज्यादा शिक्षित होकर रोजगार से जुड़े. यह जनकार्य 90 दशकों में करते जब गाँव से 60 किलोमीटर दूर प्रखंड मुख्यालय हुआ करता था और सूचना के साधन आम लोगों से दूर थे. इन्हीं जनकार्य से प्रभावित होकर पार्टी ने वर्ष 2003 ई तत्कालीन राज्य सरकार के द्वारा पंचायत चुनाव की अधिसूचना जारी हुई तो इन्हें हेसालौंग पंचायत का मुखिया उम्मीदवार बनाया था. जो बाद में पेसा कानून के तहत चुनाव की मांग को लेकर स्थगित हो गया. वर्ष 2007 में डाड़ी प्रखंड निर्माण हुआ. इस चिरपरिचित मांग की लडाई भी लड़े. प्रखंड बना लोगों के लिए सुलभ हो गया तब इन्होंने बाल बच्चों के शिक्षा, स्वास्थ्य ख़ातिर ठोस रोजगार से जुड़े तब भी राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों में अपनी भूमिका कम नहींं होने दिए. कम्पनी के काम से वर्ष 2017 में राँची रोड़ जाने के क्रम में दुर्घनाग्रस्त हुए. इनका उपचार बरियातू के पास मेडिकल में हुआ बाद में फिर समस्या हुई तो विभिन्न अस्पतालों के चक्कर लगा, रिम्स से वेल्लोर तक सफर, तब तक एक गम्भीर असाध्य रोग से ग्रसित हो चुके थे. इस बीमारी में पहले आवाज़ और फिर शरीर का हड्डियों से जुड़ाव कम होने लगा. जीवन के अंतिम दिनों में जब तक बोल पाते थे तब तक राज्य सरकार से आपने झारखंड आंदोलनकारी पहचान व बच्चों के लिए आंदोलनकारी पुत्र/पुत्री के सरकार द्वारा घोषित आरक्षण लागू करने के संबंध में अक्सर पूछते रहते थे.जब बीमारी के कारण कंपनी ने बैठा दिया, तब ज्यादा तनाव में रहने लगे. दादा का बड़ा बेटा अपनी पढ़ने के उम्र में घर चलाने के लिए रोजगार पकड़ा, दादा का दवाई का खर्च सभी बच्चों ने अपने सामर्थ्य से रोजगार पकड़कर करने लगे. अक्सर इस संबंध में मुझे राज्य के विधायकों व मुख्यमंत्री तक बात पहुँचने के लिए कहते रहते थेे, इशारों – इशाारों. क्योंकि उनके मुख से इस बीमारी से पीड़ित होने के बाद आवाज़ ही चली गई थी. अखबारों में झारखंड आंदोलनकारी चिन्हित सूची जारी हुई, लेकिन तब तक दादा अलविदा कह दिए और अपने संघर्षों की यादों को छोड़ गए. आंदोलनकारी बडका दादा हम सभी भाइयों में बड़े थे. इनके संघर्षों को मंजिल तक पहुँचाने की जिम्मेवारी अब हमारी है. उनके बेटे मनीष गोप, अनीश, बेटी प्रभा एवं ज्योति के द्वारा प्रथम स्मृति दिवस के अवसर पर रांची में गरीबों के बीच कंबल वितरण करने का काम किया गया. दादा को अंतिम हुल जोहार…
डॉ. कृष्णा गोप
संस्थापक/अध्यक्ष:-खोरठा डहर

