समकालीन जनमत
जनमत

‘ भारतीय कृषि अपने अब तक के सबसे बड़े संकट के दौर से गुजर रही है ’

( पुरुषोत्तम शर्मा, राष्ट्रीय सचिव-अखिल भारतीय किसान महासभा द्वारा 11 मार्च 2019 को काठमांडू में आयोजित किसान संगठनों के अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में दिया वक्तव्य )
इस अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के सम्मानित अध्यक्ष और दुनिया के तमाम देशों से आए हमारे संघर्षशील साथियों!
मैं अपने संगठन आल इंडिया किसान महासभा की ओर से आप सब का क्रांतिकारी अभिवादन करता हूँ. मैं नेपाल के कामरेडों व वर्तमान सरकार की इस बात के लिए प्रशंसा करता करता हूँ कि उन्होंने अपने देश में “राष्ट्रीय किसान आयोग” का गठन कर अपनी कृषि और किसानों के सवालों को समझने और हल करने की एक आवश्यक पहल ली है. नेपाल के राष्ट्रीय किसान आयोग को भी धन्यवाद, जिसने हम सब को एक जगह पर अपने अनुभवों और समस्याओं को साझा करने और समाधान के लिए सामूहिक विमर्श करने का मौक़ा दिया है.
मित्रों ! भारत और नेपाल सदियों से आपस में न सिर्फ सबसे विश्वसनीय पड़ोसी मित्र हैं, बल्कि हमारी भौगोलिक परिस्थितियां, समस्याएं और संस्कृति भी एक जैसी है. हम दोनों कृषि प्रधान देश हैं. हमारी आबादी के बड़े हिस्से की आजीविका आज भी खेती और उससे जुड़े सहायक रोजगार पर ही टिकी है. इसलिए नेपाल की इस पहल से भारत में हमको भी जरूर सीखने को मिलेगा.
भारतीय कृषि के सम्मुख चुनौतियां – (भाग–एक) 
जीडीपी में कृषि का हिस्सा
भारत जब 1947 में आजाद हुआ तो उस वक्त हमारी जीडीपी में कृषि का हिस्सा 52 प्रतिशत था. हमारी आबादी का 70 प्रतिशत हिस्सा तब सीधे कृषि से जुड़ा था. जबकि आज भी हमारी आबादी का 55 प्रतिशत हिस्सा सीधे कृषि से सीधे जुड़ा है और जीडीपी में कृषि का हिस्सा लगभग 14 प्रतिशत बचा है.
कृषि में सार्वजनिक निवेश में कमी
1960-65 में भारत की कुल योजना मद का 12.16 प्रतिशत कृषि पर खर्च हुआ. जबकि 2007 की ग्यारहवीं योजना में कृषि के लिए सार्वजनिक निवेश की यह राशि घटकर 3.7 प्रतिशत रह गई. खाद्य एवं कृषि संगठन के अनुसार अभी भारत की कृषि में बोया गया कुल क्षेत्र 140.8 मिलियन हैक्टेयर है. आजादी के 72 साल बाद भी इसमें से 78 मिलियन हैक्टेयर यानी 64 प्रतिशत क्षेत्रफल अभी भी वर्षा आधारित है. पर्वतीय क्षेत्रों की स्थिति और भी बुरी है. उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र में 10 प्रतिशत के करीब ही सिंचित क्षेत्र है. 1990 के बाद सिंचाई बजट में कमी की जाने लगी. मोदी सरकार के हाल में पेश अंतिम बजट में तो सिंचाई बजट में लगभग 65 प्रतिशत की कटौती की गई है.
भारत में जोतों का आकार 
भारत में 67 प्रतिशत किसानों की जोत का आकार 1 हैक्टेयर से कम है. जबकि 18 प्रतिशत के पास 1 से 2 हैक्टेयर जमीन है. मात्र 2 प्रतिशत किसानों के पास ही 10 हैक्टेयर से ज्यादा भूमि है. 0.7 प्रतिशत किसानों के पास कुल खेती की जमीन का 10.5 प्रतिशत हिस्सा है. बटवारे के बाद सीमांत व छोटी जोतों की संख्या बढ़ रही है. जबकि भूमि के कुछ हाथों में केंद्रीकरण की नीति के कारण बड़ी जोतों के आकार में बढ़ैतरी हो रही है. भारत की 45 प्रतिशत ग्रामीण आबादी भूमिहीन है जिसमें से कुछ के पास नाम मात्र की जमीन है. भूमिहीनों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है. 2001 से 2011 के बीच 90 लाख किसान खेती से बाहर हुए और खेत मजदूरों की संख्या में 35 प्रतिशत की बृद्धि दर्ज की गई.
भारत में कृषि की विकास दर
यूपीए एक के शासन में भारत की कृषि विकास दर 3.1 प्रतिशत और यूपीए दो के शासन में 4.3 प्रतिशत थी. भारत के किसानों की आय 2022 तक दोगुनी करने का दम्भ भरने वाले प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के शासन के अंतिम वर्ष भारत की कृषि विकास दर 2.7 प्रतिशत पर आ गई है. प्रधान मंत्री मोदी के वायदे को देखें तो अगले तीन वर्षों में भारत की कृषि विकार दर को 15 प्रतिशत रहना होगा जो मोदी सरकार के रिकार्ड से संभव ही नहीं है.
भारत का वर्तमान कृषि संकट- बढ़ती किसान आत्महत्याएं  
कामरेडों ! आज जब हम यहाँ मिल रहे हैं, भारतीय कृषि अपने अब तक के सबसे बड़े संकट के दौर से गुजर रही है. इस कृषि संकट ने हमारे पूरे ग्रामीण समाज को अपनी आगोश में ले लिया है. जिसके कारण भारत की ग्रामीण संरचना में भारी बदलाव आ गया है. पिछले 13 वर्षों में कर्ज में डूबे साढे तीन लाख से ज्यादा भारतीय किसानों ने आत्महत्या कर ली है. जबकि पिछले 2 वर्षों से भारत सरकार ने किसानों की आत्महत्या के आंकड़ों को जारी करने से राष्ट्रीय अपराध शाखा को रोक दिया है. राष्ट्रीय अपराध व्यूरो के आंकड़ों के अनुसार 1997 से 2012 के बीच भारत में 2,50,000 किसानों ने आत्महत्या की. मोदी राज में इन आंकड़ों को जारी करने पर रोक से पूर्व ही 48,000 किसान आत्महत्याएं कर चुके थे. भारत का पंजाब प्रान्त जो हरित क्रांति के बाद पूंजीवादी कृषि के विकास का माडल बना, वहाँ भी लगभग 16,000 किसान आत्महत्या कर चुके हैं. इस दौर में किसान आत्महत्याओं की घटनाएं और बढ़ी हैं तथा इस संकट ने अब तक अछूते राज्यों व क्षेत्रों में भी दस्तक दे दी है.
घाटे की खेती
कृषि क्षेत्र में नव उदारवादी सुधारों से भारत में खेती घाटे का सौदा हो गयी है जिससे भारत का किसान कर्ज के जाल में फंस गया है. इसके कारण नई पीढी खेती से पूरी तरह विमुख हो रही है और शहरों में पूंजीपतियों के लिए सस्ते श्रम के बाजार का निर्माण कर रही है. नेशनल सैंपल सर्वे आर्गनाइजेशन NSSO की 70 वीं राउंड रिपोर्ट के अनुसार 1 एकड़ से कम भूमि वाले किसान की मासिक आय 1308 और खर्च 5401 रुपया है. इसी तरह 5 एकड़ तक भूमि वाले किसान को आय और खर्च में 28.5 प्रतिशत का नुकसान है. भारत में उगाई जाने वाली 23 फसलों पर अध्ययन कर NSSO ने माना कि कुल लागत मूल्य में भारी बृद्धि किसानों की आय में गिरावट की जिम्मेदार है.
कर्ज में डूबा भारत का किसान 
एक अनुमान के अनुसार भारत के किसानों पर इस वक्त लगभग 11,00,000 करोड़ रुपए कर्ज है. भारत में 52 प्रतिशत किसान कर्ज में डूबा है. जिसमें से प्रति किसान पर औसत 47,000 रुपया कर्ज है. सर्वाधिक पंजाब में लगभग 3,00,000 रुपया, आंध्र प्रदेश में 1,23,400 रुपया और तेलंगाना में 93,000 रुपया प्रति खेतिहर किसान औसत कर्ज है.
बटाईदार किसानों को किसान का दर्जा नहीं
घाटे की खेती के कारण छोटा व मझोला किसान अपनी जमीन को बटाई या ठेके पर दे रहा है और खुद के लिए कोई और रोजगार तलास रहा है. गाँव में कल तक जो भूमिहीन व खेत मजदूर थे उनका बड़ा हिस्सा आज अपने पारिवारिक श्रम को लगाकर बटाई या ठेके पर खेती कर रहा है. आज भारत की 60 प्रतिशत खेती बटाई या ठेके पर हो रही है, पर इन बटाईदारों को किसान का दर्जा प्राप्त नहीं है. इसके कारण बैंक कर्ज, नुकसान का मुआवजा और एमएसपी पर फसल खरीद सहित किसानों को मिलने वाली सरकारी सुविधा से वास्तविक खेती करने वाला यह 60 प्रतिशत हिस्सा वंचित रह जाता है.
बीज, कीटनाशक के बाजार पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कब्जे से खेती में बढ़ी लागत
भारत में घाटे की खेती का मुख्य कारण खेती की लागत में लगातार हो रही बढोतरी है. भारत के बीज बाजार पर मोसांटो और करगिल जैसी देंत्याकार अमरीकी बीज कंपनियों का कब्जा होता जा रहा है. भारत दुनिया का 8वां बड़ा बीज बाजार है. बहुराष्ट्रीय कंपनियां यहां 1 अरब डॉलर से भी ज्यादा का कारोबार करती हैं. भारत के बीज उद्योग में कारपोरेट का दखल 15 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है. भारत के बीज बाजार के 75 प्रतिशत से ज्यादा पर इनका कब्जा हो चुका है. सन् 1967 में भारत में गेहूं की कीमत 76 रूपए प्रति क्विंटल और खेती के यंत्र में इस्तेमाल होने वाले लोहे की कीमत 65 रूपए प्रति क्विंटल थी. आज 53 वर्ष बाद भारत में गेहूँ की कीमत 1700 रुपए प्रति क्विंटल और लोहे की कीमत 5500 रुपए प्रति क्विंटल है. इन कंपनियों द्वारा उत्पादित टमाटर का बीज 40,000 रुपए किलो, गोभी का बीज 25 से 40 हजार रुपया किलो और शिमला मिर्च का बीज 1,00,000 रुपए किलो तक बेचा जा रहा है.
जहरीले खाद्य प्रदार्थ और जमीन का मरुस्थल में बदलने का खतरा 
भारत अमेरिका कृषि ज्ञान संबंधी समझौते के बाद हमारे कृषि शोध संस्थान और कृषि विश्वविद्यालय भी इन्हीं अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की अधीनता में जाते जा रहे हैं. अति उत्पादन के नाम पर जीएम बीजों, रासायानिक खादों व कीटनासकों के अत्यधिक प्रयोग ने न सिर्फ हमारे खाद्य प्रदार्थों को जहरीला बना दिया है, बल्कि हमारी खेती की प्राकृतिक उत्पादन क्षमता पर भी बड़ा प्रहार किया है. पंजाब जो इस प्रयोग की प्रमुख स्थली है, आज कैंसर के मरीजों की बहुतायत वाला राज्य बन गया है. वैज्ञानिक पंजाब की जमीन के आने वाले कुछ दशक बाद मरुस्थल में तब्दील होने की आशंका जताने लगे हैं.
भारत में हरित क्रांति- खेती किसानी की तबाही व गुलामी की नीव
भारत में खेती किसानी की इस दुर्दशा की कहानी 1967 से ही लिखनी शुरू हो गयी थी जब अपनी बिना लागत की खेती को हरित क्रांति के नाम पर अमरीकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर निर्भरता की ओर ढाला गया. हरित क्रान्ति से उत्पादन बढाने के नाम पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बीजों, रासायनिक खादों और कीटनाशकों का जमकर हमारी खेती में प्रयोग कराया गया. धीरे–धीरे हमारे परम्परागत बीज, जो हमारी जलवायु के अनुकूल थे, जिनके अन्दर रोग प्रतिरोधक क्षमता थी, बहुतायत में विलुप्त हो गए. हमारी खेती को अमरीकी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का गुलाम बना दिया. भारत के परम्परागत बीजों का संरक्षण नहीं
भारत में अपनी बिना लागत या कम लागत की खेती से भी हरित क्रांति को सफल कर देने के लिए गंभीर शोध में लगे तब के कृषि वैज्ञानिकों को किनारे कर दिया गया. इनमें से एक मशहूर कृषि वैज्ञानिक डॉ. रिछारिया भी थे, जिन्होंने भारत के किसानों द्वारा हजारों वर्षों से अलग-अलग जलवायु में संजोए गए परम्परागत धान के बीज की तीन हजार से ज्यादा प्रजातियों को विकसित व संरक्षित कर दिया था.
WTO में शामिल होकर हमने वर्तमान बड़े कृषि संकट को निमंत्रण दिया
भारत की खेती किसानी पर  दूसरे बड़े हमले की नीव 1995 में रखी गई, जब  भारत सरकार ने किसानों व देश के लोकतांत्रिक जनमत के व्यापक विरोध के बावजूद विश्व व्यापार संगठन (WTO) में शामिल होने का फैसला किया. बाद में भाजपा की अटल बिहारी बाजपेई सरकार ने 1999 की  जीत के बाद WTO की शर्तों को जोर-शोर से लागू करना शुरू किया.
वायदा कारोबार और आयात पर मात्रात्मक प्रतिबन्ध का हटना भारत की खेती के लिए घातक  WTO के दबाव में कृषि उत्पादों के लिए वायदा कारोबार के दरवाजे खोल दिए गए. खुले व प्रतिस्पर्धात्मक व्यापार के नाम पर कृषि जिंसों के आयात पर लगे मात्रात्मक प्रतिबंधों को हटा दिया गया. महंगी उत्पादन लागत वाले हमारे किसानों को भारी सब्सिडी पा रहे अमेरिका और यूरोप के किसानों के साथ प्रतिस्पर्धा में डाल दिया गया. नतीजा सबके सामने है. इसके बाद ही भारत की खेती पर गंभीर संकट आ गया. बाजार में भाव न मिलने के कारण 2004 के बाद ही किसानों को अपना आलू, टमाटर, प्याज सड़क पर फेंकने और गन्ना जलाने को मजबूर होना पड़ा.
पहाड़ में कृषि की उपेक्षा- जंगली जानवरों व आवारा पशुओं के आतंक से बंजर होती खेती 
खेती में आधारभूत ढाँचे के विकास के लिए सार्वजनिक निवेश न करना, कृषि क्षेत्र के विस्तार पर कानूनी रोक, चकबंदी न होना, पर्वतीय कृषि उत्पादों का न्यूनतम समर्थन मूल्य और उनकी खरीद की गारंटी न होने के कारण पहाड़ में कृषि की पूर्ण उपेक्षा की गयी. महंगी ढुलाई के नाम पर पर्वतीय किसानों के आम, नाशपाती, रीठा जैसे कई उत्पादों की खरीद बंद हो गई. जंगली जानवरों से खेती की सुरक्षा न होने के कारण पहाड़ के किसान बड़े पैमाने पर खेती करना छोड़ रहे हैं. मैदानों में भी आवारा जानवरों के आतंक से किसानों को अपनी फसलों को बचाना मुश्किल हो रहा है. सिर्फ उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड में 2,75,000 तथा पंजाब में 3,00,000 आवारा पशु हैं.
भारत का गोरक्षा कानून-कृषि अर्थव्यवस्था पर एक और हमला
खेती की हमारी कुल आय में 27 प्रतिशत हिस्सा पशुपालन से आता है. भारत में उत्पादित कुल दूध का 70 प्रतिशत उत्पादन मध्यम किसान, गरीब किसान, भूमिहीन और खेत मजदूर करता है. गोरक्षा कानून के जरिए गायों की खरीद बिक्री पर लगी रोक से ग्रामीण ग़रीबों और छोटे मझोले किसानों के सहायक रोजगार दुग्ध उत्पादन पर भी हमला हुआ है. इससे घाटे की खेती से जूझ रहा किसान कर्ज में डूबता गया और किसानों की आत्महत्या भारत में एक आम परिघटना बन गयी.
भूमिहीनों के लिए आवास भूमि का आवंटन 
भूमिहीनों व खेत मजदूरों, जिनकी आबादी ग्रामीण समाज में 45 प्रतिशत है, के लिए आवास की भूमि की व्यवस्था करना एक महत्वपूर्ण मांग है. पर भारत में अभी उन्हें सामंतों और कारपोरेट के लिए जमीनें खाली कराने के उद्येश्य से अब तक बसे स्थानों से भी उजाड़ा जा रहा है. बिहार सरकार का लाखों भूमिहीन-खेत मजदूरों को उनकी बस्तियों से बेदखल करने का ताजा आदेश इसका जीता जागता सबूत है.
 कृषि संकट के खिलाफ किसानों का एकताबद्ध आन्दोलन 
इस कृषि संकट के कारण निरंतर होती किसान आत्महत्याओं और किसान आंदोलनों के चौतरफा दमन के दौर में भारत के किसान संगठन पहली बार देश व्यापी समन्वय बना कर साझा आन्दोलन की दिशा में एकताबद्ध हुए हैं. इसमें प्रमुख है 208 किसान संगठनों की अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति. इसमें वामपंथी किसान संगठनों के साथ ही सुधारवादी और कुलकों, पूंजीवादी फार्मरों के संगठन भी शामिल हैं. कर्ज मुक्ति और कृषि उपज की लागत में 50 प्रतिशत मुनाफ़ा सहित न्यूनतम समर्थन मूल्य इस साझा किसान आन्दोलन के प्रमुख दो एजेंडे हैं.
साम्प्रदायिक विभाजन की राजनीति के खिलाफ किसानों की एकजुटता 
गौ रक्षा के नाम पर पूरे देश में सत्ता के संरक्षण में संगठित गुंडा गिरोहों द्वारा गौ पालक पहलू खान सहित कई मुश्लिम किसानों की भीड़ हत्या कर दी गई। साम्प्रदायिक विभाजन की राजनीति को परवान चढाने के लिए इससे पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फर नगर में साम्प्रदायिक दंगों कराए गए. इन दंगों से साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण कर नरेंद्र मोदी 2014 का चुनाव जीते और प्रधानमंत्री बने। इस दंगे के बाद टूटी किसानों-ग्रामीण मजदूरों की एकता ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान आन्दोलन को भारी नुकसान पहुंचाया. पर अब वहाँ किसानों ने इस साम्प्रदायिक विभाजन की राजनीति के खिलाफ एकजुट होकर इसे विफल करना शुरू कर दिया है. पिछले साल कैराना में हुए लोकसभा के उपचुनाव को साम्प्रदायिक रंग देने के लिए भाजपा के जिन्ना नारे के खिलाफ किसानों ने गन्ना का नारा बुलंद किया और विपक्ष की मुश्लिम महिला प्रत्याशी को जीता कर भाजपा को करारा जवाब दिया. पिछले साल के अंत में गौकसी के नाम पर फिर बुलंद शहर में उपद्रव के बाद एक पुलिस अधिकारी की हत्या कर संघ परिवार द्वारा बड़े पैमाने पर साम्प्रदायिक दंगा कराने की साजिशों को किसान-मजदूरों ने अपनी एकता के बल पर विफल कर दिया.
भारत के किसान आंदोलन की दो धाराएं
भारत के किसान आन्दोलन की दो धाराएं आधुनिक पूंजीवादी फार्मर और गरीब व मध्यम किसान आज देश की खेती-किसानी को बचाने के लिए एक मंच पर आ गए हैं. एक दौर था जब भारत के कुलकों और आधुनिक पूंजीवादी फार्मरों का प्रतिनिधित्व करने वाले किसान नेता शरद जोशी, भूपेन्द्र सिंह मान और बलबीर सिंह राजोवाल ने भारत में खुली अर्थव्यवस्था और डव्ल्यूटीओ में शामिल होने को भारत के किसानों के लिए हितकारी बताया था. हमने तब इस कदम को भारत की खेती किसानी की तबाही और गुलामी का रास्ता बताया था. आज भी पूजीवादी फार्मरों के संगठन किसानों की कर्ज मुक्ति और फसलों की लागत का डेढ़ गुना दाम को ही इस संकट के समाधान के रूप में पेश कर रहे हैं. भारत के वर्तमान कृषि संकट का समाधान सिर्फ कर्ज मुक्ति और लागत का डेढ़ गुना दाम ही नहीं है. यह तो तात्कालिक राहत की मांगें हैं. भारत की खेती-किसानी से जुड़े इन वैचारक सवालों का अध्ययन करना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि आज भी भारत के ग्रामीण समाज की बहुसंख्या सीमांत किसानों, आदिवासियों, बटाईदारों, मछुवारों, भूमिहीनों, खेत मजदूरों और ग्रामीण दस्तकारों के सवालों को वर्तमान संयुक्त किसान आन्दोलन के एजेंडे में लाने के लिए हमें हर स्तर पर जूझना पड़ रहा है.
भारत के वर्तमान कृषि संकट के समाधान का रास्ता 
कृषि के साथ ग्रामीण समाज के लोकतंत्रीकरण का सवाल हमारे लिए महत्वपूर्ण है. क्योंकि भारत में ग्रामीण समाज में अब भी बची सामंती बेड़ियाँ बड़ी पूंजी के साथ गठजोड़ में बंधी हैं. खेती के कारपोरेटीकरण की राह को बदल कर छोटी व मझोली खेती को लाभप्रद बनाना होगा. अब तक किसानों पर लदे हर तरह के (बैंक, सहकारी समिति,साहूकारी) कर्ज से मुक्ति और स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुरूप फसलों की सम्पूर्ण लागत में 50 प्रतिशत मुनाफ़ा जोड़कर समर्थन मूल्य देना होगा. बाजार में किसान के मोलभाव की ताकत को बढाने के लिए इस मूल्य पर हर कृषि उत्पाद की सरकारी खरीद सुनिश्चित करने के लिए देश में सार्वजनिक वितरण प्रणाली को मजबूत तथा और भी विस्तारित करना होगा. खाद्य सुरक्षा की गारंटी के लिए कृषि भूमि के सरंक्षण का कानून बनाना होगा. बटाईदार किसानों को किसान का दर्जा देने के लिए कानून लाना होगा. कृषि में लागत कम करने के लिए बीज, कीटनाशक, उर्बरक और कृषि यंत्रों की कीमतों के जरिये किसानों की भारी कारपोरेट लूट को नियंत्रित करना होगा. वर्तमान कृषि संकट से बाहर निकलने के लिए देश की खेती किसानी की तबाही के लिए जिम्मेदार WTO की शर्तों से बाहर निकलना होगा, अपने परम्परागत बीजों को खोजने, संजोने और विकसित करने तथा अपनी परम्परागत जैविक खेती को पुनर्जीवित व परिस्कृत करने पर अपने वैज्ञानिकों व शोध संस्थानों को लगाना होगा. ताकि हम साम्राज्यवादी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मकड़जाल से अपनी खेती व किसानी को बाहर निकाल सकें. कृषि जिंसों के आयात पर मात्रात्मक प्रतिबन्ध लगाकर अपने किसानों को संरक्षण देना और कृषि उत्पादों को वायदा कारोबार से बाहर निकालना होगा.
भारतीय कृषि के सम्मुख चुनौतियां – (भाग–दो) 
आजाद भारत में भूमि सुधारों की शुरुआत 
आजादी की लड़ाई के अंतिम दौर में तेलंगाना किसान विद्रोह के जारिये देश में मुक्कम्मल भूमि सुधार की चुनौती कम्युनिस्टों ने पेश कर दी थी. आजादी के बाद भारत में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, मद्रास, असम एवं बाम्बे राज्य सबसे पहले अपने यहाँ 1949 में जमींदारी उन्मूलन बिल लाए. इन सब ने गोविन्द बल्लभ पन्त के नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन समिति की रिपोर्ट को अपने बिल का आधार बनाया. 1950 में भारत सरकार भी जमींदारी उन्मूलन कानून ले आई. पर जमींदार इसके खिलाफ अदालत में चले गए. क्योंकि संविधान में उस वक्त संपत्ति के अधिकार का आर्टिकल 19, 31 संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकार का दर्जा देता था. 1951 में केंद्र सरकार ने संविधान संशोधन कर संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकार का दर्जा देने वाले प्रावधान बदले. इससे देश में जमींदारी उन्मूलन कानूनों को लागू करने का रास्ता साफ़ हुआ.
जमीन के बदले जमींदारों को दिया मुआवजा और बांड
इसके बाद राज्य सरकारों ने 17,00 लाख हैक्टेयर जमीन का अधिग्रहण किया. इसकी एवज में जमींदारों को 670 करोड़ रुपए मुआवजा बांटा गया. कई राज्य सरकारों ने जमींदारों से फंड लेकर उन्हें जमीन के 10 से 30 साल के बांड जारी कर दिए, ताकि जमीनों पर उनका नियंत्रण बना रहे.
कश्मीर में भारत का पहला क्रांतिकारी भूमि सुधार  
नेशनल कांफ्रेंस के नेता शेख अब्दुल्ला जो कि वामपंथी विचारों से प्रभावित थे, ने सर्व प्रथम जम्मू कश्मीर में एक क्रांतिकारी भूमि सुधार कार्यक्रम लागू किया. 1950 में उनके द्वारा लाये गए “बिग लैंडेड एस्टेट्स अबोलिशन एक्ट” के तहत (1) भूमि की अधिकतम सीमा 182 कैनाल (22.75 हेक्टेयर) तय कर दी गई. इसमें बागानों, चारागाहों, जलाऊ और न जोतने योग्य बेकार भूमि को शामिल नहीं किया गया, (2) बंटाई पर खेती करने वाले किसानों को ज़मीन का मालिकाना दिया गया, (3) जिन किसानों को ज़मीन उपलब्ध कराई गई उनके लिए 160 कैनाल की सीमा निर्धारित की गई जिसमें पहले से मालिकाने की ज़मीन भी शामिल थी, (4) मुआवज़े के सवाल पर यह व्यवस्था दी गई कि राज्य की विधानसभा इसे बाद में तय करेगी. बाद में  विधानसभा में  फ़ैसला लिया गया कि किसी तरह का मुआवज़ा नहीं दिया जाएगा. इस तरह जम्मू और कश्मीर भारत का इकलौता राज्य बन गया जहाँ बड़े ज़मींदारों को ज़मीनों के बदले कोई मुआवज़ा नहीं दिया गया, (5) पुंछ क्षेत्र के सभी ग़ैर मौरूसी काश्तकारों को उनकी ज़मीनों का मालिकाना दे दिया गया, (6) ऊधमपुर में शिक़ार के लिए आरक्षित की गई ज़मीनों का आरक्षण समाप्त कर दिया गया और किसानों को इन ज़मीनों पर खेती करने की अनुमति दी गई, (7) शिक़ार के नियमों में बदलाव करके जंगलों के आसपास के गाँवों के किसानों को उन जंगली जानवरों पर गोली चलाने के अधिकार दिए गए जो उनकी खेती को नुकसान पहुँचाते थे और (8) 13 अप्रैल 1947 के बाद ज़मीन के अंतरण के सभी आदेश और डिक्रियों को अमान्य घोषित कर दिया गया ताकि इस क़ानून की मूलभावना से खिलवाड़ न हो सके. पर कुछ वर्ष बाद केंद्र सरकार ने शेख अब्दुल्ला की सरकार को बर्खास्त कर उन्हें जेल में डाल दिया गया.
केरल में दूसरा बड़ा भूमि सुधार 
1957 में केरल प्रदेश में चुनाओं के जरिये दुनिया की पहली निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकार कामरेड नम्बूदरीपाद के नेतृत्व में सत्ता में आई. सत्ता में आते ही इस सरकार ने राज्य में भूमि सुधार और शिक्षा में सुधार की बड़ी मुहीम को चलाया. राज्य के भूमिहीनों को खेती लायक उपयुक्त जमीनें आवंटित की गयी. किसानों, खेत मजदूरों के कर्ज माफ़ किए गए और जमींदारों की ताकत को कमजोर किया गया. शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक सुधारशुरू हुए, स्कूलों में पढ़ाने का समय निर्धारित हुआ, निजी स्कूलों में अनिवार्य रूप से सरकारी पाठ्यक्रम चलाना व सरकार के नियमों की अवहेलना करने पर स्कूलों का अधिग्रहण इसके मुख्य कदम थे. इन दोनों क़दमों से परेशान राज्य के प्रभुत्व वर्ग ने बड़े पैमाने पर सरकार के खिलाफ आन्दोलन शुरू कर दिया. बाद में नेहरू सरकार ने 1959 में नम्बूदरीपाद सरकार को बर्खास्त कर दिया.
भूदान में मिली जमीनें और उनकी लूट
तेलंगाना आन्दोलन के बाद भी जमींदारी प्रथा के खात्मे और जमीनों के बटवारे के लिए देश भर में कम्युनिस्टों के नेतृत्व में आन्दोलन चलते रहे. किसान आन्दोलन की इस आग को कुछ ठंडा करने के लिए सर्वोदयी नेता विनोवा भावे ने 1951 में भूदान आन्दोलन की शुरुआत की. इसके तहत उन्होंने देश भर में जमींदारों, राजे-रजवाड़ों से 47,63,617 एकड़ जमीन दान में ली. इसमें सर्वाधिक 21 लाख एकड़ से ज्यादा जमीनें संयुक्त बिहार से मिली थी. बिहार के जमींदारों ने 6,48,593 एकड़ और झारखंड के जमींदारों ने 14,69,280 एकड़ जमीनें विनोबा जी को दी थी. इनमें से ज्यादातर जमीनें आज तक भूमिहीनों को नहीं दी गई है. बिहार में मात्र 2,78,320 एकड़ जमीनें ही आज तक बंट पायी हैं, जबकि झारखंड में मात्र 4,88,735 एकड़ जमीनें ही भूमिहीनों तक पहुंच पाई हैं. इनमें भी उसका मालिकाना पट्टा आज तक अधिकतर लोगों को नहीं मिला है. अधिकतर जमीनों को दलालों और भ्रष्ट नौकरशाहों से लेकर भूदान समिति से जुड़े लोग अनफिट और बेकार जमीन घोषित किए हुए हैं और नदी-नाला व पहाड़ी जमीन के नाम पर ये जमीनें लूट की शिकार हो रही हैं.
जमींदारी उन्मूलन कानून के बावजूद जमींदारी प्रथा जारी 
जमींदारी उन्मूलन और सीलिंग कानूनों के बावजूद भारत में सत्ता के संरक्षण में सामंतों और बड़े जमींदारों का न सिर्फ बड़े पैमाने पर जमीनों पर एकाधिकार बना रहा, बल्कि ग्रामीण समाज और राज्यों की राजनीति पर भी उनका प्रभुत्व बना रहा. उत्तराखंड की तराई, उत्तर प्रदेश के पीलीभीत से लेकर बिहार के चम्पारण तक जो नेपाल की सीमा से सटे क्षेत्र हैं, आज भी सैकड़ों व हजारों एकड़ के बड़े फ़ार्म व इस्टेट मौजूद हैं.
कारपोरेट के पक्ष में भूमि सुधार को पलटने की प्रक्रिया शुरू
इस वक्त भारत में भूमि सुधार कानूनों को पलटने और खेती की जमीनों, आदिवासियों के जंगल और नदियों को बड़े कारपोरेट के कब्जे में पहुँचाने का अभियान जोर-शोर से जारी है. तमाम राज्य सरकारों के माध्यम से भूमि हदबंदी कानूनों को बदला जा रहा है. कृषि भूमि के गैर कृषि उपयोग पर लगे प्रतिबंधों को ख़त्म किया जा रहा है. अनुसूचित जातियों और जन जातियों की जमीनों को गैर जातीय लोगों को हस्तान्तरण पर लगी कानूनी रोकों को हटाया जा रहा है. आदिवासियों-वनवासियों को उनके पुस्तेनी अधिकार की जमीनों पर मालिकाना हक़ देने वाला वनाधिकार कानून 2006 की अवहेलना कर बड़े पैमाने पर उन्हें उनकी जमीनों से बेदखल किया जा रहा है. भूमि अधिग्रहण के खिलाफ किसानों के भारी आन्दोलन के दबाव में 2013 में बने भूमि अधिग्रहण कानून को निष्क्रिय किया जा रहा है. वर्षों से जन आंदोलनों के बल पर सरकारी जमीनों या ग्राम समाज व सीलिंग की जमीनों पर बसे भूमिहीन और गरीब किसानों को जमीन का मालिकाना हक़ देने के बजाए फिर से उजाड़ा जा रहा है.
विकास के नाम पर खेती की जमीनों का बड़े पैमाने पर अधिग्रहण  
एक तरफ हमारी आबादी लगातार बढ़ रही है, दूसरी तरफ विकास के नाम पर बड़े पैमाने पर खेती की जमीन का अधिग्रहण हो रहा है. एसीजेड के नाम पर लाखों एकड़ कृषि भूमि बड़े कारपोरेट के हवाले की गयी. देश के अन्दर 6 से 8 लेन के 1,455.4 किलोमीटर लम्बे 21 एक्सप्रेस वे बन चुके हैं और 7,491.1 किलोमीटर लम्बे 27 एक्सप्रेस वे निर्माणाधीन हैं. इसी तरह 6,672 किलोमीटर लम्बे चार क्षेत्रीय रेल कारीडोर और 3,360 किलोमीटर लम्बे दो रेल फ्रेट कारीडोर बन रहे हैं. इनके दोनों ओर लाखों एकड़ कृषि भूमि को औद्योगिक गलियारों और व्यवसायिक गतिविधियों के लिए अधिसूचित कर दिया गया है. इसी तरह राष्ट्रीय राजमार्गों और राज्य राजमार्गों के दोनों ओर भी लाखों एकड़ जमीन को व्यवसायिक घोषित कर दिया गया है. हजारों किलोमीटर लम्बी गैस पाइप लाइनें बिछाई जा रही हैं. तमाम राज्य सरकारें कारपोरेट को सहजता से भूमि उपलब्ध कराने के लिए लाखों एकड़ भूमि के भूमि बैंक बना रही हैं. इन भूमि बैंकों में कृषि भूमि के अतिरिक्त ग्राम समाज, सीलिंग व सरकार की उन जमीनों को शामिल किया जा रहा है, जिन्हें देश के भूमिहीनों, ग़रीबों में बांटा जाना था.
पहाड़ व जंगल में रहने वालों की बेदखली 
आदिवासी-वनवासी क्षेत्रों में खनिज व वन संपदा से भरपूर आदिवासियों और वन विभाग की लाखों एकड़ जमीनें बड़े कारपोरेट को दी जा रही हैं. पर्वतीय क्षेत्रों में नदी घाटी की उपजाऊ जमीनों को विद्युत् परियोजनाओं के नाम पर कारपोरेट के हवाले किया जा रहा है. राष्ट्रीय पार्कों और वन
विहारों के साथ ही ईको संसिटिव जोन के नाम पर उन परम्परागत पर्वतीय लोगों, वन वासियों और आदिवासियों को जबरन उनके गावों व जमीनों से बेदखल किया जा रहा है, जो सदियों से इन वनों और ईको सिस्टम को बचाए रखने के मजबूत स्तम्भ रहे हैं. इन क्षेत्रों में सत्ता के संरक्षण में कारपोरेट की पहुँच ने हमारे पर्यावरण और ईको सिस्टम को भारी नुकसान पहुंचाना शुरू कर दिया है.
देश की खाद्य सुरक्षा खतरे में 
हमारी सरकार कारपोरेट परस्त नीति पर चल रही है. खेती करने वाले किसानों, आदिवासियों, वनवासियों के हाथ से जमीनें निकलती जा रही हैं. यह हमारी बढ़ती आबादी के सामने खाद्य सुरक्षा का बड़ा ख़तरा खड़ा कर देगा. खेती में बढ़ते मशीनीकरण के प्रयोग से और पशुपालन व ग्रामीण दस्तकारी पर हुए हमले से गांवों में बड़े पैमाने पर रोजगार घटा है. इतनी बड़ी आबादी को खेती और उनके आजीविका के परम्परागत साधनों से बेदखल करने के बाद उन्हें आजीविका का दूसरा साधन देने के लिए हमारी सरकारों के पास कुछ भी नहीं बचा है.
सामन्ती अवशेषों के साथ सामंजस्य बिठाते हुए कारपोरेट पूंजी का बढ़ता नियंत्रण
भारत के आर्थिक जीवन में सामन्ती अवशेषों के साथ सामंजस्य बिठाते हुए कारपोरेट पूंजी का नियंत्रण बढ़ रहा है. कारपोरेट पूंजी का यह नियंत्रण आर्थिक क्षेत्र के साथ ही राज्य की संस्थाओं और संसदीय लोकतंत्र में भी बढ़ा है. भारत की खेती और कृषि में बड़ी और कारपोरेट पूंजी की पहुँच बड़े पैमाने पर बढ़ी है. पर बड़ी पूंजी की यह पहुँच ग्रामीण समाज में मौजूद सामन्ती अवशेषों को ख़त्म किए बिना और वहाँ उत्पादन संबंधों को बदले बिना हुई है. यह स्थितियां बड़ी पूंजी और साम्राज्यवाद को सस्ते श्रम और कच्चे माल का आसान बाजार उपलब्ध कराती हैं. यही नहीं यह भारतीय समाज में जातियों और सामंती संबंधों को भी टिकाए रखने का आधार देती हैं. यह उत्पादक शक्तियों के विकास में बाधक है और भारतीय सामाज व राजनीति के व्यापक लोकतन्त्रीकरण की प्रक्रिया को रोके है.
जनता का जनवाद व समाजवाद ही विकल्प है 
भारत का वर्तमान कृषि संकट इतना गहरा गया है कि वर्तमान शासक वर्ग के पास उसके समाधान का कोई रास्ता नहीं बचा है. इस कृषि संकट के
समाधान के लिए खेती के कारपोरेटीकरण के जिस रास्ते पर भारत आज बढ़ रहा है, वह हमारी खेती किसानी की तबाही का रास्ता है. हमारी आधी से ज्यादा आबादी कृषि पर निर्भर है. अपनी बढ़ती आबादी की खाद्य व आजीविका की जरूरतों को पूरा करने, देश में उपलब्ध प्राकृतिक व मानवीय संशाधनों के जनपक्षीय उपयोग और मुकम्मल भूमि सुधार के लिए इन साम्राज्यवाद परस्त, कारपोरेट परस्त नीतियों को उलटना जरूरी है. हम समझते हैं कि खेती किसानी के इस संकट से बाहर निकलना व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव के बिना संभव नहीं है. यह एक सच्चे जनता के  जनवादी भारत के निर्माण और फिर समाजवाद के रास्ते ही संभव है.
कामरेडों! मुझे लगता है कि हम सब दुनिया भर में कृषि क्षेत्र में लगभग एक से संकट का सामना कर रहे हैं. नव उदारीकरण की नीतियों के कारण हमारी खेती पर साम्राज्यवाद और कारपोरेट के हमले के खिलाफ लड़ाई के लिए हमें एकजुट होना होगा. हर देश में चल रहे प्रगतिशील किसान आंदोलनों के बीच एक साझा समझ को विकसित करना होगा. नेपाल के कामरेडों और यहाँ के राष्ट्रीय किसान आयोग ने हम सब को मिलाकर इस दिशा में जो पहल की है, मैं उसके लिए उनको एक बार फिर धन्यवाद देता हूँ.
लाल सलाम

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