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जांच की संख्या बढ़ाइये, सिर्फ लाॅक डाउन से काम नहीं चलेगा

( बेंगलुरु के भारतीय विज्ञान संस्थान से सूक्ष्म विषाणु विज्ञान में पी0एच0डी0 प्रोफसर पार्थो सारोथी रे का रबी बनर्जी द्वारा लिया गया यह इंटरव्यू द वीक में प्रकाशित हुआ है. इस इंटरव्यू का हिंदी अनुवाद हम पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं. हिंदी अनुवाद दिनेश अस्थाना ने किया है. सं. )

बेंगलुरु के भारतीय विज्ञान संस्थान से सूक्ष्म विषाणु विज्ञान में पी0एच0डी0 प्रोफसर पार्थो सारोथी रे वैश्विक महामारी का सामना करने के लिये विश्व स्वास्थ्य संगठन की कोरोना विषाणु पर अध्ययन करनेवाली और नीतियां बनानेवाली टीम के सामुदायिक वैज्ञानिकों में से एक रहे हैं। ‘द वीक’ के साथ एक साक्षात्कार में भारतीय विज्ञान शिक्षण और शोध संस्थान कोलकाता के एसोशियेट प्रोफेसर रे कहते हैं कि इस विषाणु के लक्षणों की पहचान करने में भारत बहुत पीछे रह गया है, और इसीलिये कुछ भी नहीं सूझ रहा है कि कोविद-19 का सामना कैसे किया जाय।

वह कहते हैं कि 21 दिनों के लाॅक डाउन का उपयोग यदि हम जांच की गति बढ़ाने में नहीं कर पाये तो यह इसके प्रति हमारी अज्ञानता को बढ़ाने में ही सहायक होगा। 74 शोधपत्रों और 1,400 प्रशस्तिपत्रों का स्वामी यह वैज्ञानिक वर्तमान में कैंसर के जैविक नियंत्रण पर शोधकार्य कर रहा है।

वार्ता के मुख्य अंश

कोविद-19 का स्रोेत क्या है? क्या यह सुनिश्चित किया जा चुका है ?

यह चीन के वुहान में उत्पन्न एक पशुजन्य विषाणु है। वर्तमान संदर्भ में यह विषाणु मनुष्यों को संक्रमित कर सकता है क्योंकि इसमें ऐसा उत्परिवर्तन विकसित हो चुका है कि वह स्वयं को विशेष रूप से मानव कोशिकाओं की प्रोटीन से बांध सकता है। इसी वजह से यह किसी दूसरे जानवर से मनुष्यों में आ सकता है।

यह वायरस किन पशुओं को संक्रमित कर सकता है ?

शोधों से पता चला है कि इसी तरह का एक विषाणु चमगादड़ में पाये जाने विषाणु से 96 प्रतिशत मिलता-जुलता है और दूसरा जो 99 प्रतिशत मिलता-जुलता है वह पैंगोलिन में पाया जाता है। इसलिये यह कहना ज्यादा सही होगा कि यह चमगादड़ से पैंगोलिन में और वहाँ से मानव शरीर में आया है। आनुवंशिक अध्ययनों से यह सिद्ध हो चुका है। यह इससे आगे कैसे बढ़ता है, यह अभी अध्ययन का विषय है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे महामारी क्यों कह दिया ?

घातक होना और संक्रमणीय होना दोनों अलग-अलग चीजें हैं। आमतौर पर जो विषाणु घातक या वायरुलेंट  होते हैं वे ज्यादा संक्रमणीय नहीं होते और जो संक्रमणीय होते हैं वे प्रायः घातक नहीं होते। जैसे कि 2003 के सार्स विषाणु को लें। वह बहुत घातक था पर बहुत लोग इसकी चपेट में नहीं आये। लेकिन कोरोना विषाणु बहुत अधिक संक्रमणीय है, यह पूरी दुनिया के लोगों को संक्रमित कर सकता है।

तो आपके हिसाब से यह विषाणु घातक नहीं है ?

एकदम नहीं। इसका असर केवल बूढ़ों और दूसरे रोगों से ग्रसित लोगों पर ही होता है।

विश्व बैंक ने कहा है कि हमें इस विषाणु के साथ जीना सीख लेना चाहिये

एकदम ठीक। क्या हम तपेदिक और इंफ्लुयेंजा के साथ नहीं जी रहे हैं ? यह छीजने की प्रक्रिया है। जैसे ही यह विषाणु किसी संक्रमित व्यक्ति को मार देता है, उसके साथ ही यह खुद भी मर जाता है यानी अब वह और अधिक लोगों को संक्रमित नहीं कर पाता। और इस प्रकार यह विषाणु उत्परिवर्तित होता रहता है और लोगों के बीच अपनी उपस्थिति बनाये रखता है। इसे क्षेत्र विशेष का (स्थानिक) कहा जाता है और समय-समय पर यह विस्फोट करता है। इससे केवल उन्हीं लोगों की मृत्यु होगी जिनकी प्रतिरोधक क्षमता कम है, किसी दूसरे रोग से ग्रस्त हैं या कुपोषित हैं। यह तात्कालिक या स्थानिक विषाणु घातक तो नहीं होता पर इसमें वापस दोबारा आ जाने की क्षमता होती है। मेरा सवाल हैः क्या लोग आज नहीं मर रहे हैं ? क्या सरकार ने कुपोषण पर रोक लगाने के लिये कुछ भी सार्थक किया है?

आपने विश्व स्वास्थ्य संगठन की मदद कैसे की ?

जब इसका विस्फोट वुहान में हुआ तो विश्व स्वास्थ्य संगठन पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों से इस बारे में चर्चा कर रहा था।

वे क्या जानना चाहते थे ?
वे इस रोग का प्रक्षेप-पथ जानना चाहते थे, और यह जानना चाहते थे कि यह विषाणु कितनी किस्में पैदा कर सकता है और यदि इसमें उत्परिवर्तन हों तो इसके कितने प्रतिरूप तैयार हो सकते हैं। इसे किसी विषाणु के जीनोटाइप का अध्ययन कहते हैं।

जीनोटाइप के अध्ययन के फायदे क्या हैं ?

पूरी दुनिया में कोविद-19 का सामना करने के लिये दवा और टीके का विकास करने की कोशिशें जारी हैं। कोई टीका या दवा किसी एक विशेष जीनोटाइप पर काम कर सकती है पर दूसरे पर नहीं।

अब तक कितने जीनोटाइप का पता चल पाया है?

पूरी दुनिया के अणु-जीववैज्ञानिक समुदाय 29 जीनोटाइप का पता लगा चुके हैं। दुर्भाग्यवश भारत में हम केवल दो ही ढूँढ पाये हैं। भारत में कोरोनाविषाणु के विभिन्न जीनोटाइप का पता लगाने के लिये कोई प्रयास नहीं किया गया है। यहाँ पर केवल लाॅकडाउन पर ही चर्चा चल रही है।

क्या आप उन दोनों जीनोटाइप पर कुछ रोशनी डाल सकते हैं ?

पूरी दुनिया के बड़े हिस्से के नमूने से विश्व स्वास्थ्य संगठन को विभिन्न प्रकार के 29 जीनोटाइप की जानकारी मिल चुकी है, पर भारत में हम केवल दो नमूने बना पाये हैं जहाँ इस विषाणु में दो प्रकार की जीनें पायी गयी हैं । इस विषाणु के चरित्र की जानकारी करने में भारत बहुत पीछे है और इसीलिये हम एकदम नहीं जानते कि इसका सामना कैसे किया जाय।

तो अणु-जीववैज्ञानिक लाॅकडाउन का समर्थन नहीं करते ?

मैं सिर्फ अपनी बात कर सकता हूँ। मैं समझता हूँ कि लाॅकडाउन का तबतक कोई मतलब है जबतक कि आप इस मौके का फायदा उठा कर सम्भावित लोगों की जाँच नहीं कर पाते। लाॅकडाउन से संक्रमित व्यक्ति घर में कैद हो जाता है। नतीजतन परिवार के लोग संक्रमित हो जाते हैं। यदि लक्षण दिखायी देते हैं तो वे डाॅक्टर के पास जाते हैं। लकिन 65 प्रतिशत मामलों में लक्षण दिखायी ही नहीं देते। जब लाॅकडाउन खत्म हो जाता है तो ऐसे लोग बाहर आ जाते हैं और संवेदनशील लोगों को संक्रमित कर देते हैं, और इस प्रकार एक बार फिर इस विषाणु का प्रकोप सामने आ जाता है।

1918 में स्पेनी इंफ्लूयंजा की बीमारी भयानक महामारी थी और वास्तविक एच01एन01 विषाणु से फैली थी। जब यह दुबारा लौट कर आयी तो मृत्यु दर चरम पर पायी गयी।

सरकार ने लाॅकडाउन क्यों घोषित किया ?

यह तो सरकार ही जाने। शायद यह भय के कारण और जाँच से बचने के लिये किया गया। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बारहा जाँच कराने पर जोर दिया है। भारत को सबसे पहले इस विषाणु को इस देश में लाने वालों को अलग-थलग कर देना चाहिये था।

इटली, स्पेन और अमेरिका के बारे में क्या कहना है ?

कृपया उन्हें हमारे साथ मत जोड़िये। इटली, अमेरिका और दूसरे यूरोपियन देशों में बुजुर्गों की संख्या अधिक है। इटली की 68 प्रतिशत आबादी 60 साल से ऊपर वालों की है। तो, इटली और स्पेन झेल रहे हैं। इटली भी अपनी पर्यटन से आकर्षक आय खोना नहीं चाहता था। इसलिये उसने विदेशियों के आने पर कोई पाबन्दी नहीं लगायी।

लेकिन अब तो उन्होंने लाॅकडाउन लगा दिया है

वह जाँच के लिये है। जाँच करने और इलाज की सुविधा मुहैया कराने के लिये उन्होंने अस्थायी तौर पर लाॅकडाउन लगाया है। वास्तव में लाॅक डाउन से आपको जाँच करने और अस्पतालों में बिस्तरों, स्वास्थ्यकर्मियों और दूसरी सम्बद्ध सेवाओं के लिये सुविधा जुटाने का मौका मिल जाता है।

क्या आपको लगता है कि भारत ऐसा नहीं कर पाया ?

बिल्कुल नहीं। इटली ने अपनी प्रति मिलियन आबादी पर 5,000 लोगों की जाँच की है, जबकि भारत ने अपनी प्रति मिलियन आबादी पर केवल 18 लोगों की जाँच की। यदि आप जाँच नहीं करते और अधिक सघन चिकित्सा कक्षों, बिस्तरों या स्वास्थ्यकर्मियों के लिये दूसरी जरूरी सुविधायें नहीं जुटा पाते तो लाॅकडाउन का मतलब क्या है ?

लेकिन हमारे पास पर्याप्त टेस्ट किट ही नहीं हैं।

यह कोई बहाना नहीं है। हमारे पास कम से कम 10,000 आणविक जाँच प्रयोगशालायें हैं और वहाँ ऐसी जाँचें की जा सकती हैं।

यह कैसे होगा ?

हमें खून का और एक ज्ञात केस का नमूना चाहिये होगा, जीन की तुलना करने के लिये। यह सिर्फ 1000 रुपये या इससे कम में किया जा सकता है। सच यह है कि दो हफ्ते पहले हमलोगों ने भारतीय विज्ञान शिक्षण और शोध संस्थान में इस जाँच की लागत की गणना की थी और पाया कि यह 700 रुपये के लगभग आता है।
लेकिन यह जाँच कितनी विश्वसनीय है ?

बाजार में उपलब्ध किसी भी संदेहास्पद जाँच किट से कहीं अधिक विश्वसनीय। मैं यह जानकर स्तब्ध हूँ कि सरकार ने प्रति जाँच की दर रु0 4,500 निर्धारित की है। कुछ खास कम्पनियों को आदेश दे भी दिये गये हैं। हम पूरी तरह स्तंभित हैं। इस संकट काल में भी कुछ कारपोरेट घराने मुनाफा कमाने से बाज नहीं आ रहे हैं।

क्या आपने सरकार से बात की है ?

यही सबसे बड़ा दुर्भाग्य है। दूसरे कई देशों की तुलना में हमारी वैज्ञानिक प्रयोगशालायें कहीं बेहतर हैं। हमारे शोध एवं विकास पर विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसे संगठन भी भरोसा करते हैं। पर न तो भारत सरकार ने हमसे बात की है और न किसी राज्य सरकार ने ही हमसे सम्पर्क किया है।

लेकिन भारत विश्व स्वास्थ्य संगठन के निर्देशों का पालन कर रहा है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पृथक करके जाँच करने को कहा है। उसने लाॅक डाउन करने को नहीं कहा। भारत ने लाॅक डाउन तो किया पर जाँच नहीं हो रही है। अगर आप जाँच नहीं करेंगे तो आपको विषाणु या उसके उत्परिवर्तन के बारे में कोई जानकारी कभी नहीं मिल पायेगी।

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