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ज़ेर-ए-बहस

‘हम देखेंगे’: सृजन एवं विचार के हक़ में

लेखकों एवं कलाकारों का कन्वेन्शन

1 मार्च 2020, जंतर मंतर, दिल्ली

सुभाष गाताडे


दिल की बीरानी का क्या मज़कूर है
यह नगर सौ मर्तबा लूटा गया

अदब और आर्ट की दुनिया के नामचीनों और दोस्तों

दिल्ली को अलविदा कहते हुए कहा गया मीर का यह शेर पिछले दिनों बार बार होठों पर आता रहा।

उधर दिल्ली के दूसरे हिस्से में निरपराध लोग मारे जा रहे थे, घरों पर पेटोल बम फेंके जा रहे थे, उस जगह को अलविदा कर रहे थे, जहां वह कई सालों से रहते आए थे,  और शहर के लूटे जाने का वह दर्द फिर गोया हरा हो रहा था। ऐसा लग रहा था कि 1984 के वे उन काले दिनों में हम प्रवेश कर गए हैं ; 2002 को रिप्ले किया जा रहा है, जब निशाना लगा कर की जा रही कौमी हिंसा की वारदातें अपने अपने स्मार्ट फोन में ‘लाइव’ पहुंच रही थी और ‘पुलिस हमारे साथ है’ के नारे लग रहे थे।

दो दहाई साल होने को है, आप कह सकते हैं कि 2002 का वह ‘सफल प्रयोग’ हिन्दोस्तां का मुस्तक़बिल, भारत का भविष्य बनता दिख रहा है। हम याद कर सकते हैं कि 2002 की खूंरेजी को लेकर, रक्तांतिका के बारे में मुल्क की आला अदालत ने ‘नीरो’ को याद किया था, वही सम्राट नीरो – जो बांसुरी बजा रहा था, जब रोम जल रहा था और पिछले दिनों जब सदर ट्रम्प की अगवानी में वजीरे आज़म मुब्तिला थे, तो देश के एक अग्रणी अख़बार टेलिग्राफ ने भी फिर नीरो को याद किया ‘जब नीरो दावत करते हैं।’

बहुत कठिन वक्त़ है यह

ऐसा वक्त़ जिसका हममें से किसी ने तसव्वुर नहीं किया था, ऐसा वक्त़ जब लगने लगा है कि आज़ादी मिलने के बाद बीते सत्तर साल में यहां की अवाम ने अपनी मेहनत और जददोजहद के बलबूते जिस मुक़ाम को हासिल किया था, वहां से उल्टी यात्रा फिर शुरू हो गयी है।

किसे गुमान था कि मनुस्मृति – जिससे हमने सत्तर साल पहले तौबा किया – अब सम्मानित ग्रंथ के तौर पर पेश की जाती रहेगी,

किसे गुमान था कि बंटवारे के वक्त़ मजहब की बुनियाद पर मुल्क के जिस फलसफे को हम लोगों ने नकारा था, जिन्ना का वह सपना हमारे हुक्मरान पूरा करने की ठानेंगे

किसे गुमान था कि आज़ादी के वक्त़ इस पिछड़े मुल्क में जम्हूरियत की बुनियाद डाल कर अपने आप को अचम्भा साबित करनेवाले इस मुल्क में और उसके पड़ोसी मुल्कों में फरक मिट जाएगा, जनतंत्रा यहां बहुसंख्यकतंत्रा में तब्दील हो जाएगा।

बहुत कठिन दौर है यह

ऐसा वक्त़ जहां लड़ाई महज उससे नहीं है जो सामने से वार करता है बल्कि उससे भी है जो आप का पड़ोसी है, आप का भाई है, आप के आत्मीयों में से कोई है, हम और वे का वह फलसफा अब तमाम दिमाग़ों पर कब्जा कर चुका है ।

‘कुछ है जो बदल गया है’

तर्क की बातें, इन्सानदोस्ती की बातें, ऐसी बातें जिसकी घुटटी हम बचपन से पीते आए थे और उसे जज्ब किए थे, वही अब कुफ्र साबित कर दी गयी हैं

जिन इन्सानदुश्मन ताकतों से हम रूबरू हैं उन ताकतों का मकसद भारत का सांस्क्रतिक रूपांतरण करना है:

इसके जरिए हिंदू बहुसंख्यकवाद का दावा वह पेश कर रहे हैं तथा

हिन्दू धर्म का भी वह एक कन्सॉलिडेशन करना चाह रहे हैं अर्थात अलग अलग सम्प्रदायों, अलग अलग धार्मिक आचारों में मुब्तिला हिन्दुओं की एक ही एथनिक आइडेंटिटी वह गढ़ना चाह रहे हैं

गौरतलब है कि आज़ादी की लम्बी तहरीक के रहनुमा रहे हों या समाजी गुलामी की जददोजहद के कर्णधार रहे हों, हम यही पाते हैं कि उनमें इस बात का शिददत से एहसास था कि मुल्क की तस्वीर कैसी बन सकती है

आप गांधी को देखें – जिन्होंने फिरकापरस्ती से इस मुल्क की अवाम को बचाने के लिए अपनी शहादत दी थी और ऐलानिया कहा था कि ‘हिन्दुस्थान में मैं मुस्लिमपरस्त हूं और पाकिस्तान में हिन्दूपरस्त। आप हमारे पहले वजीरे आज़म नेहरू को देखें जो आज़ादी के बाद के सालों में लगातार इस बात पर फिक्रमंद रहे कि जैसे कि हालात हैं कि भारत ‘हिन्दू पाकिस्तान बन’ सकता है, आप अम्बेडकर को देखें जिन्होंने 1943 की अपनी किताब में कहा था कि

‘अगर संविधान के अन्दर इस बहुसंख्य हिंदू समुदाय के जहरीले दांत तोड़ने का इंतज़ाम नहीं किया गया तो भारत में लोकतंत्रा कभी भी बाधारहित नहीं रह सकता … हिन्दू बहुसंख्यकों का दमनतंत्रा अस्तित्व में आने से पहिले ही अस्प्रश्यों के लिए संविधान में उपाय जरूरी हैं’  

If Hindu Raj becomes a fact , it will no doubt, be the greatest calamity for this country. No matter what the Hindus say, Hinduism is a menace to liberty, equality and fraternity. On that account it is incompatible with democracy.  Hindu Raj must be prevented at any cost. “ ( Ambedkar, Pakistan or Partition of India, P 358)

इसमें कोई दोराय नहीं कि इस मुल्क के तुलबा ने, छात्रों ने युवाओं ने, महिलाओं ने, शाहीन बाग की दादियों ने इन ताकतों के नापाक इरादों के खिलाफ जो तहरीक खड़ी की है, उससे उन्हें जरूर परेशानी हुई है, यह जनता के इन आन्दोलनों का ही दबाव है कि खुद बिहार विधानसभा में उन्हें ऐसे प्रस्ताव पर अपनी मुहर लगानी पड़ी है, जो उनके अपने इरादों एवं संकल्पों के बिल्कुल खिलाफ पड़ता है।

लेकिन यह सोचना अपने आप को धोखा देना है कि जो चुनौती हमारे सामने खड़ी है वह कम हुई है।
मेरा मानना है कि बीती सदी में फासीवाद और नात्सीवाद की जिस चुनौती से इन्सानियत को जूझना पड़ा था, उससे बड़ी चुनौती है यह क्योंकि इसके पीछे नब्बे से अधिक सालों की मेहनत है, भारतीय समाज की दरारों को अपने हक़ में करने के लिए इन जमातों द्वारा की गयी लम्बी जददोजहद है और सबसे बड़ी बात हिन्दोस्तां की अवाम का वह मानस है जहां ‘अन्य’ के खिलाफ हिंसा के लिए बड़ी स्वीकार्यता है।

2015 में अवार्ड वापसी मुहिम के जरिए अदब की दुनिया के लोगों एव आर्ट कल्चर के इलाके में अपना दखल रखनेवाले नामचीनों ने इस हुकूमत के लिए थोड़ी बेचैनी तो जरूर पैदा की थी, लेकिन हालात उससे भी संगीन हो चले हैं,

हिन्दू राष्ट्र का अश्वमेध का घोड़ा सरपट आगे निकलता दिख रहा है और हमारे मुल्क के आईन को, देश के संविधान को अमली जामा पहनाने के लिए बनी संस्थाएं गोया गांधी के तीन बन्दरों में तब्दील होती दिख रही हैं।

‘बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो, बुरा मत कहो’

सवाल उठता है कि ऐसी घड़ी में हमें क्या करना चाहिए,

मैं पहले ही कूबूल कर दूं कि अदीबों और आर्ट के नामचीनों के इस जलसे में अपने आप को मैं बहुत मिसफिट पा रहा हूं क्योंकि बुनियादी तौर पर मैं बायीं बाजू की तहरीक का, वामपंथी आन्दोलन का एक अदद कारकून, एक साधारण कार्यकर्ता हूं।

बहरहाल, मुझे लगता है

– सबसे जरूरी है कि सृजन के जिस इलाके में आप अपना दखल रखते हैं, उसमें कहीं कमी न आने दें, इस सृजन-विरोधी, विचारविरोधी वक्त़ में बिना रूके, बिना मायूस हुए अपनी कलम, अपनी कूची चलती रहे, अपनी हथौड़ी चलती रहे, बर्तोल्त ब्रेख्त ने क्या खूब बात कही थी:

“In the dark times
Will there also be singing?
Yes, there will also be singing.
About the dark times.”

और अच्छी बात है यह हमारे सामने हो रहा है, पिछले दो महीनों में यहां जितने नए कवि, गीतकार उभरे हैं, कितने चित्राकारों ने अपने कमरों से बाहर निकल कर शहर की दीवारों पर ‘इन्कलाब की पोएटरी’ बयां की है, वह नाकाबिले बयानात है।

जाहिर है इसे हम और करना चाहिए, हान्स एंडरसन की तर्ज पर बादशाह की, उसके दरबारियों की निर्वस्त्राता एवं हिंस्त्राता को बेपर्द करते रहना जरूरी है

लगा के आग शहर को

बादशाह ने ये कहा
उठा है आज दिल में तमाशे का शौक बहुत

झुका के सर सभी शाहपरस्त बोल उठे
हुज़ूर का शौक सलामत रहे 

शहर और बहुत है

– दूसरी अहम बात है कि हम सभी एक अहम चुनौती से बावस्ता है, जिसे हम भारतीय समाज को सही मायने में आधुनिक बनाने की चुनौती कह सकते हैंं: इन्सानी आज़ादी और बराबरी तथा तर्कशीलता जिसकी बुनियाद है। हमारे आईन में, हमारे संविधान में भले ही इसकी हिमायत जोरदार ढंग से की गयी हो, जाति, जेण्डरभेद, सम्प्रदायभेद जैसे तमाम भेदों में बंटे भारतीय समाज में उनकी समाप्ति की बात की गयी, मगर अभी वह साकार नहीं हो सका है।

हमें यह बात दिल में गांठ लेनी चाहिए:

हर इन्सान की आज़ादी और एक दूसरे से बराबरी तथा तर्कशीलता को मुकम्मल किए इन मानवद्रोही जमातों को शिकस्त देना नामुमकिन होगा।

हम चाहें ना चाहें आईन को बचाने की इस लड़ाई, वही संविधान जिसको साकार करने के इस संघर्ष में जिसका दूसरा सिरा हमारे समाज को सही मायने में आधुनिक बनाने की लम्बी जददोजहद से जुड़ता है, हमें मिल कर काम करना ही होगा।

आज के वक्त़ में भले ही इस बात पर यकीं करना लोगों के लिए मुश्किल हो, लेकिन हमें नहीं भूलना चाहिए कि तीस के दशक में जबकि फासीवाद एवं नात्सीवाद का खतरा दुनिया पर मंडरा रहा था, तमाम मुल्कों के साहित्यकारों ने, कलाकारों ने इसके खिलाफ मिल कर आवाज़ बुलन्द की थी, स्पेन में कायम गणतंत्र को बचाने और फासीवादियों द्वारा समर्थित फ्रैंको की हुकूमत को शिकस्त देने के लिए ‘इंटरनेशनल ब्रिगेड’ का गठन हुआ था, दुनिया के अग्रणी लेखक और कलाकार इस युद्ध में बाकायदा कूद पड़े थे और उन्होंने अपनी शहादत दी थी।

मैं पुरयकीं हूं कि अदब और आर्ट के तमाम नामचीन और फिलवक्त़ गुमनाम लोग इस मशाल को लेकर आगे बढ़ेंगे।

और अंततः जीत हमारी ही होगी।

लड़ेगे, जीतेंगे !!

फोटो क्रेडिट: संजय जोशी

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