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ख़बर ज़ेर-ए-बहस

उसका भाषण था कि मक्कारी का जादू…

सौरभ यादव, शोध छात्र, दिल्ली विश्वविद्यालय

15 अगस्त, नई दिल्ली ।आज देश के 72 वें स्वतंत्रता दिवस पर प्रचलित परम्परा के अनुसार प्रधानमंत्री ने डालमिया के गोद लिए लाल किले से देश को पहली बार संबोधित किया। यहां पहली बार शब्द का प्रयोग दो वजहों से किया जा रहा है ।
पहला तो ये कि मोदी जी को इस ‘पहली बार’ शब्द से विशेष प्रेम है, दूसरा इसलिए क्योंकि इससे पहले के प्रधानमन्त्रियों ने भारत सरकार के अधीन आने वाले लाल किले से देश को सम्बोधित किया था लेकिन हाल ही में मोदी जी ने एक योजना के तहत 25 करोड़ में लाल किले को देश के एक बड़े पूँजीपति डालमिया को गोद दे दिया। इसलिये लालकिले से देश को सम्बोधित करने वाले पहले प्रधानमंत्री भले ही पंडित जवाहर लाल नेहरू हों लेकिन किराए के लाल किले से देश को पहली बार सम्बोधित करने का गौरव नरेंद्र मोदी को प्राप्त हुआ है।
जिस तरह लाल किले का अपना एक इतिहास है, ठीक वैसे ही आज़ादी के बाद से देश के प्रधानमंत्रियों द्वारा आज़ादी के बाद से लालकिले से देश को सम्बोधित करने का भी अपना एक ऐतिहासिक महत्व रहा है, क्योंकि देश में प्रधानमंत्री को साल में केवल दो बार क्रमशः गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस पर ही लाल किले से देश को सम्बोधित करने का अवसर मिलता है।
लाल किले से आज़ादी के दिन किया जाने वाला यह सम्बोधन न सिर्फ इस मामले में महत्वपूर्ण है कि इसमें देश की स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए आज़ादी के नायकों द्वारा किए जाने वाले संघर्षों और बलिदान को याद किया जाता है, बल्कि उनके द्वारा चलाये गए आज़ादी के आंदोलनों, स्थापित किये गए मूल्यों और आदर्शों के आलोक में देश की वर्तमान स्थिति का मूल्यांकन भी किया जाता है। इसमें प्रधानमंत्री आज़ादी से अब तक के सफर में बतौर राष्ट्र भारत की उपलब्धियों और कमजोरियों के विश्लेषण के साथ-साथ भविष्य के भारत के बारे में भी एक विजन देश की जनता के सामने रखता है।
लेकिन पिछले कुछ वर्षों से लाल किले पर से प्रधानमंत्री द्वारा किया जा रहा सम्बोधन उनके चुनावी रैलियों में दिए गए भाषणों और उनके संसद में दिए जाने वाले वक्तव्यों की पुनरावृत्ति से आगे नही बढ़ पाया है। प्रधानमंत्री द्वारा लालकिले से दिया गया इस बार का भाषण भी विपक्ष की आलोचना, पिछली सरकारों से अपने सरकार को बेहतर बताते हुए दोनों की तुलना और पुरानी पड़ चुकी पिटी हुई योजनाओं के महिमा मंडन तक सीमित रहा। ऐसे में ये प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि हज़ारों करोड़ रुपये विज्ञापन में खर्च करने के बाद भी देश के प्रधानमंत्री को अगर लाल किले से जनता को बार-बार अपने कार्यकाल की पुरानी योजनाओं के नाम और उससे सम्बंधित आंकड़े गिनाने की जरूरत पड़ रही है तो यह स्पष्ट है कि आपके पास उपलब्धियों के नाम पर असल में कुछ नहीं है। प्रधानमंत्री के इस साल के पूरे भाषण में उनकी पिछले चार साल की पुरानी योजनाओं का घिसा पिटा राग ही छाया रहा।
मोदी जी ने अपने भाषण की शुरुआत में ही आज़ादी के वर्ष यानी 1947 से लेकर अपनी पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के कार्यकाल 2013 तक और 2014 से लेकर अपने अब तक के कार्यकाल के बीच मे एक स्पष्ट विभाजन रेखा खिंची और पूरे भाषण में आज़ादी के बाद से सन 2013 तक के 65 सालों से अपने शासन के चार सालों को बेहतर बताने की नाकाम कोशिश करते रहे।
अपने कार्यकाल के आखिरी साल में भी मंगलयान जैसे अंतरिक्ष अभियान, जिसका श्रेय पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार को जाता है, को गिनाना दिखाता है कि आपके पास जनता को बताने को कुछ भी ठोस नहीं है।
प्रधानमंत्री ने अपने भाषण की शुरुआत ‘तारिणी’ नामक जहाज के उन महिला सैन्य अधिकारियों की नारी शक्ति के रूप में प्रशंसा करते हुए की, जिन्होंने हाल ही में पूरे विश्व की परिक्रमा की है। लेकिन प्रधानमंत्री महिलाओं के जुड़े वास्तविक मुद्दों पर चुप रह गए। ऐसे समय मे जब महिला सुरक्षा और बलात्कार जैसी घटनाओं को लेकर पूरा देश आक्रोशित है और हाल ही में मुजफ्फरपुर से लेकर देवरिया, फैजाबाद, प्रतापगढ़ के शेल्टर होम में छोटी बच्चियों से लेकर महिलाओं के बलात्कार की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं, तब प्रधानमंत्री की चुप्पी से प्रश्न उठता है कि क्या ये बच्चियां और महिलाएं नारी शक्तियां नहीं हैं?
ऐसे दौर में जब देश भर में शेल्टर होम में संगठित रूप से प्रभावशाली और सत्ता संरक्षित व्यक्तियों के द्वारा महिलाओं और बच्चियों के बलात्कार की घटनाएं सामने आ रही हैं, तब देश की आधी आबादी मोदी जी से इस बात की उम्मीद लगाये बैठी थी कि वो उनकी सुरक्षा का भरोसा दिलाएंगे और इन घटनाओं पर रोक लगाने के लिए ठोस कार्यवाही करेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
मोदी जी ने भाषण के अंत में बहुत ही आदर्शवादी तरीके से रेप जैसी घटनाओं के लिए कुछ राक्षसी प्रवृत्ति के व्यक्तियों को जिम्मेदार ठहराया। तब सवाल उठता है कि छत्तीसगढ़ जैसे राज्य के भीतर एक व्यक्ति द्वारा नाले से गैस बनाने की बात आपको गैस बनाने की विधि सहित पता है, फिर ये कैसे सम्भव है कि अभी हाल में अपनी ही पार्टी के रेल राज्य मंत्री राजेन गोहेंन पर रेप केस में दर्ज कराई गई एफआईआर के बारे में आपको जानकारी न हो, और अगर आपको जानकारी है तो आपकी पार्टी द्वारा ऐसे ‘राक्षसीय प्रवृत्ति’ वाले मंत्री पर कोई कार्यवाही न करना भी बताता है कि आपकी महिलाओं और बच्चियों को लेकर जताई जा रही चिंता भी मात्र एक जुमला है।
इससे पहले उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा रेप के आरोपी BJP के विधायक को बचाना, कठुआ में मासूम बच्ची के साथ बलात्कार के दोषी आरोपियों के समर्थन में BJP के मंत्रियों का मार्च निकालना, और इन सभी मामलों पर आपका चुप रहना नारीशक्ति के लिए लालकिले से व्यक्त की गई चिंता को महज लफ़्फ़ाज़ी बताता है।
प्रधानमंत्री ने अपनी बात बढ़ाते हुए आदिवासी बच्चों द्वारा एवरेस्ट फतह करने पर गर्व व्यक्त किया, लेकिन देश के भीतर पूंजीपतियों के हितों के लिए आदिवासियों के खिलाफ सरकारों द्वारा चलाये जा रहे अभियानों, उन्हें अपने जमीन, जंगल और पहाड़ों से बेदखल किये जाने और उनकी हत्याओं पर चुप रह गए।
यही नहीं, प्रधानमंत्री ने इस बार भी लाल किले से WHO के हवाले से किये गए दावे में देश से झूठ बोला कि अब तक उनके द्वारा चलाये गए स्वच्छता अभियान से तीन लाख लोगों की जान बचाई गयी है।
प्रधानमंत्री जब GST पर बोलते हुए जब ये कह रहे थे कि GST सब चाहते थे, लेकिन निर्णय लेने की इच्छा शक्ति नहीं थी तो शायद गुजरात का मुख्यमंत्री रहने के दौरान अपना ही दिया बयान कि “GST भारत में कभी सफल नहीं हो सकता” भूल गए।
मोदी जी ने आज के भाषण में देश को बताया कि कुपोषण की वजह से वह बेचैन रहते हैं, लेकिन उन्होंने जनता को ये नहीं बताया कि कुपोषण और भुखमरी में देश की स्थिति उनके कार्यकाल में और बदतर होती गयी है। साल 2014 में जब मोदी जी ने पदभार सम्हाला तब भारत भुखमरी वाले राष्ट्रों की सूची में 55वें पायदान पर था, लेकिन आज भारत की रैंक नेपाल, म्यामार, बांग्लादेश और श्री लंका जैसे देशों से भी बदतर हो कर 100वें स्थान तक पहुंच गयी है।
योजनाओं के लाभ पर बात करते हुए प्रधानमन्त्री ने कहा कि मैंने 6 करोड़ फर्जी व्यक्तियों जिनका कोई पता-ठिकाना नहीं था और जो योजनाओं का लाभ ले रहे थे, को बाहर निकाला है, लेकिन देश जानना चाहता था कि विजय माल्या, ललित मोदी, मेहुल चौकसी और नीरव मोदी को किसने और कैसे बाहर निकाला?
युवाओं की बात करते हुए उन्होंने कहा कि युवाओं ने देश को बदल दिया है लेकिन बेरोजगारी के मुद्दे पर जो देश में युवाओं के जीवन का सबसे बड़ा संकट बना हुआ है, चुप्पी साध गए। कुछ दिन पहले ही मोदी जी ने ये कहा कि देश में अब तक करोड़ो रोजगार दिए गए है, इसलिए बेरोजगारी को अब मुद्दा न बनाया जाए, लेकिन मोदी जी की ये बात अपने ही सरकार के दस्तावेजों से मेल नही खाती क्योंकि सरकार के आधिकारिक आंकड़ों में बेरोजगारी की दर पिछले पांच साल में अपने उच्चत्तम स्तर पर है। इसीलिये मराठा आरक्षण के लिए किए जा रहे आंदोलन पर प्रतिक्रिया देते हुए केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी द्वारा की गई यह स्वीकारोक्ति कि “जब नौकरियां है ही नही तो आरक्षण ले कर क्या करोगे”, रोजगार के क्षेत्र में मोदी जी के किये जा रहे दावे को झुठलाता है।
प्रधानमन्त्री ने इस दौरान नोटबन्दी का एक बार भी जिक्र नही किया, जिसको कुछ समय पहले तक केंद्र सरकार अपनी एक बड़ी सफलता के रूप में गिनाती रही है। यह नोटबन्दी ही थी जिसने देश की छोटे और मझोले व्यापारियों की कमर तोड़ दी और उनके व्यापार को खत्म कर दिया गया, रही सही कसर GST ने पूरी कर दी। आज भारत अपने निर्यात में निचले स्तर पर है, जिसका परिणाम हुआ है कि रुपया अब तक के इतिहास में डॉलर के मुक़ाबले सबसे निचले पायदान पर पहुच चुका है।
प्रधानमंत्री ने जिन योजनाओं का लालकिले से गुणगान किया, धरातल पर उनकी स्थित भी खराब है। 15 लाख एकाउंट में भेजने के नाम पर खुलवाए गये जनधन खातों में से अधिकतर खाते पैसों के आभाव में लेनदेन न किये जाने के कारण बन्द हो गए हैं। जिनमें थोड़े बहुत पैसे थे भी उन्हें बैंकों ने न्यूनतम बैलेंस न रखने की वजह से काट लिया। बैंकों द्वारा दिये गए आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2017-2018 में मिनिमम बैलेंस न रखने के दंड स्वरूप बैंकों ने गरीब जनता की गाढ़ी कमाई के 5 हज़ार करोड़ रुपये काट लिए है, जिससे माल्या द्वारा लेकर भागे गए कर्ज की थोड़ी बहुत भरपाई हो सकती है।
वहीं उज्ज्वला योजना के तहत सरकार ने जो आंकड़ा दिया है उसके अनुसार तो सरकार ने निर्धारित लक्ष्य पा लिया है लेकिन वास्तविकता में एलपीजी के लगातार महंगे होते जाने के कारण इस योजना के तहत गरीब परिवारों को जो सिलेंडर दिए गए उनके रिफिल कराए जाने का प्रतिशत बहुत कम है।
यही नहीं प्रधानमंत्री दिन प्रतिदिन बैंकों के खस्ता होते जा रहे हालत पर भी चुप ही रहे, जिससे एक तरफ तो देश की अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ा है, वहीं पहली बार देश की आम जनता का भरोसा बैंकों समेत LIC जैसे सरकारी उपक्रमो से उठना शुरू हुआ है।जो देश की अर्थव्यवस्था के लिए खतरनाक संकेत है।
अब जब देश में अगले वर्ष लोकसभा के चुनाव होने जा रहे हैं तब सम्भव है कि यह स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमन्त्री मोदी का लालकिले से दिया गया आखिरी भाषण हो, तब भी ऐसे अनेक ज्वलंत मुद्दे रह गए हैं जिनपर प्रधानमंत्री मोदी इस साल भी पिछले चार वर्षों की भांति शांत ही रहे ।
देशभर में गो-हत्या या बच्चाचोरी की अफवाह पर भीड़ द्वारा अल्पसंख्यकों की हत्याओं का जो सिलसिला मोदी सरकार के आने के साथ शुरू हुआ था, अब वह और उग्र रूप ले चुका है। सरकार के मंत्री अब खुलकर हत्यारोपियों का स्वागत कर रहे हैं । यही नहीं छात्रों, युवाओं, किसानों, मजदूरों, दलितों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं का जिस तरह से दमन लगातार बढ़ रहा है उससे यह साफ हो चुका है कि लाल किले से प्रधानमंत्री द्वारा चाहे जो भी जुमलेबाजी की जाए सरकार का धरातल पर चुनावी एजेंडा तय हो चुका है। बेरोजगारों की एक बड़ी फौज खड़ी की जा रही है, जिनके पास गर्व करने के लिए अपनी जाति और धर्म का अलावा कुछ नही है और यही तबका सरकार का आगामी चुनाव में बड़ा हथियार होने जा रहा है।

फीचर फोटो: साभार गूगल

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