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ज़ेर-ए-बहस

समझें जीवन बूझें भाषा

मैं भी मुँह में ज़बान रखता हूँ
काश पूछो कि मुद्दआ क्या है !!

एक थी हिन्दी, नीम के पेड़ो के नीचे झूमती गाती अपने में मगन कभी चैती तो कभी बिरहा गुनगुनाती | अपनी दूर की बहनों से भी उसकी आत्मीयता किसी से छिपी न थी | त्यौहार उत्सव की आन बान और शान थी | पुरवैय्या के झोकें जहाँ से आते हैं वहीं सकुचाई  शर्मायी सी अपनी अलसाई दोपहरों में हमारी हिन्दी खस की ठंडक और ठंडाई की तासीर में मस्त मगन थी, जैसे बहती हुई नदी नहीं जानती कि उसके अगले पड़ाव में उसे कैसे प्रभाव ग्रहण करने पड़ेंगे पर चूँकि बहना उसका स्वभाव है इसलिए उसकी धारा बिना किसी रुकावट या बिना विचारे चलती रहती है उसी तरह से भाषा की प्रकृति में तरह-तरह के बदलाव आना स्वाभाविक होता है, पर हमारी हिंदी की बात कुछ अलग लगती है | दूर प्राची में जहाँ से सूरज उगता है, वहाँ से स्वयं सूर्य भी पश्चिम को देखता होगा कि उसका अंतिम परिणाम वहीं है | उसे चिंता नहीं होती कि वह पश्चिम में क्यों चला जा रहा है ? उसे पता है बिना पश्चिम में अस्त हुए वह पूरब से उदित नहीं हो सकता है | उसके दिन की परिणति पश्चिम में ही होनी है | उसी पूरब की है हमारी हिंदी | बैठी अलसाई सी ताकती हुई पश्चिम की ओर | उसने अंग्रेजी का नाम सुना था |

महानगरों से जिसका गहरा ताल्लुक है | तकनीकी ज्ञान और नये तरह के विज्ञान की वाहिनी के रूप में उसे पूरा विश्व आदर से देखता है | यह उपलब्धि और सम्मान उसके भीतर एक स्वप्निल आकांक्षा को उत्पन्न करता | यह रुतबा जो अंग्रेजी हुकूमत के समय अंग्रेज़ी को प्राप्त था या मुगलों के दौर में फ़ारसी को मयस्सर हुआ करता था, वह हिंदी को अब तक नहीं मिला।

हिन्दी का जो रूप आज प्रयोग में लाया जाता है वह अमीर खुसरो से आरम्भ होता है और जब बहादुरशाह की जागीरदारी के नाम-ओ-निशां ख़त्म होने वाले थे तब ब्रिटिश हुकूमत ने अपने फ़ायदे के लिए खड़ी बोली के प्रचार और प्रसार को आरम्भ किया उसका कारण हिंदी की खड़ी बोली की संरचना का उर्दू की ध्वन्यात्मक और व्याकरणिक व्यवस्था लगभग एक जैसी थी और ज़फर के काल तक उर्दू राज-काज की भाषा के रूप में कार्य कर रही थी , इसलिए उस समय की भाषा खड़ी बोली और उर्दू का मिश्रित रूप थी.

ग़ौरतलब है कि आधुनिक काल के आरंभिक दौर में जितने भी कवि-लेखक हुए हैं वे सभी इसी भाषा में रचना कर रहे थे | ”सिज़दे से गर बिहिश्त मिले दूर कीजिये, दोज़ख ही सही सर का झुकाना अच्छा नही लगता |”(भारत-दुर्दशा, पृ.35) प्रेमचंद जैसे महान लेखक सबसे पहले उर्दू में भी लिख रहे थे | द्विवेदी युग में खड़ी बोली के परिमार्जन का कार्य हुआ और तमाम कोशिशों के बाद 1949 में हिंदी राजभाषा बन गयी |

14 सितंबर को हिंदी दिवस फ़िर से आ गया | अब शुरू हो जाएगा समारोहों और संगोष्ठियों का सिलसिला, पर हर साल इतनी धूमधाम से इस उत्सवनुमा प्रयासों से कोई ख़ासा व्यवहारिक लाभ होता हुआ नहीं दिखाई पड़ता | क्या हिंदी भाषा केवल एक वार्षिक त्यौहार बन कर रह गयी है या कुछ और ? हिन्दी के रहनुमाओं को अब आत्मविश्लेषण करने की बहुत आवश्यकता है | निज भाषा की उन्नति केवल निजपन के संकीर्ण दायरों में सिमट कर रह जाती तो भारतेंदु यह भी न कहते,

“ विधवा-ब्याह निषेध कियो विभिचार प्रचारयो |
रोकी विलायत-गमन कूपमंडूक बनायो ||” (भारत दुर्दशा, पृ.31)

भाषा का सीधा सम्बन्ध संस्कृति से होता है | अब सोचना यह है कि क्या किसी भाषा से संस्कृति में सार्थक बदलाव लाये जा सकते हैं या किसी संस्कृति की सार्थक मूल्य व्यवस्था से भाषा की स्थिति और सुदृढ़ हो सकती है | हिंदी की जानिब से यह बात और भी महत्त्वपूर्ण इसलिए भी है कि हिंदी जिस ख़ास-ओ-आम संस्कृति की भाषा मानी और कही जाती है, वह क्या है ? उसकी पड़ताल मनोवैज्ञानिक धरातल पर होनी बहुत ज़रुरी है |

जिन्होंने हिंदी को उसकी संस्कृति विशेष के दायरों से बाहर केवल एक वैज्ञानिक भाषा के रूप में विश्लेषित किया वे हिंदी को कहते कहते थक गए कि अंग्रेजी और अन्य भाषाओं का सम्यक अध्ययन करके ही तुम अपने आप को पोषित कर सकती हो, लेकिन स्थिति यह है कि हिंदी के रहनुमा हिंदी की क्षेत्र विशेष की सीमा को लांघ ही नहीं पाए | जैसे किसी भाव और विचार का फ़लक  संकीर्ण सीमाओं में तब तक आबद्ध रहता है जब तक उसके सम्प्रेषण की सीमा सीमित रहती है। एक ऐसा प्रयोक्ता या शिक्षार्थी, जो हिंदी की (तथाकथित) संस्कृति से न केवल अनभिज्ञ होता है बल्कि वह उसे एक ऐसी भाषा के रूप में देखता है जो तमाम बंधनों से जकड़ी हुई भाषा है, वह उसमें खुद को रमता हुआ नहीं पा सकता |

एक बड़ा अन्तर्विरोध यह है कि इस वातावरण को लगातार कोसते रहने के बावजूद हिंदी के पोषक भी हिंदी को केवल महानगर में बसने और तमाम सुविधाओं को प्राप्त करने का ज़रिया मानते हैं. उनकी हिंदी को नीम के पेड़ के नीचे की ठंडी हवा नहीं, एयर कंडीशंड घर और गाड़ियों की दरकार है | वह अंचल, जिसका गुणगान महानगरों की सभ्यता को निम्न बताते हुए किया जाता है, वहां तो इस हिन्दी को रात में मच्छर सोने नहीं देते | वहां फाइव स्टार और फैब इंडिया के रौब कहाँ | तो यदि महानगर की शान-ओ-शौकत भी ज़रूरी है तो इस संस्कृति में केवल मीन-मेख निकालते रहने से हिंदी का कल्याण नहीं हो सकता | उस मानसिकता को समझने का प्रयास ज़रुरी है जो यहीं जन्म लेकर यही पोषित होती है और यही समाप्त भी हो जाती है या होने वाली है, उसे हिंदी अपने नीम के पेड़ों की अनुभूति नहीं करवा सकती |

अब हिंदी को आवश्यकता है इन संस्कृतियों को आत्मसात करने की, जो अन्य भाषाओं के साथ लिव-इन को अपने लिए बेहतर मानती है | स्त्री-पुरुष के संबंधों की सीमित परिभाषाएं अब महानगर की तेज़ी से बदलते हुए पेचीदा संबंधों को परिभाषित करने के काबिल नहीं | हिंदी में अक्सर ऐसे प्रयास प्रगतिशील, मनोविश्लेषणवादी और अस्तित्ववादी विचारधाराओं के रचनाकारों ने विभिन्न विमर्शों के माध्यम से प्रस्तुत होते रहे हैं | पर क्या उन्हें बिना नीम के पेड़ की हवा के सहारे उसी धरातल पर समझा या समझाया गया है जिस पर वे उपजे हैं ? क्या जातिगत भेदभाव गाँव-देहात से चल कर हिन्दी की बोलियों के संरक्षण के नाम पर महानगरों में नहीं फैला है ? ”विद्या की चर्चा फ़ैल चली, सबको सब कुछ कहने का अधिकार मिला, देश-विदेश से नयी–नयी विद्या और कारीगरी आई |तुमको उस पर भी वही सीधी बातें, भांग के गोले, ग्रामगीत, वही बालविवाह, भूत-प्रेत की पूजा, जन्मपत्री की विधि |”(भारत-दुर्दशा, पृ.48)

आज एक परम्परागत संवाद के रूप में हिंदी के स्लोगन्स को बार बार दोहराया जाता है, जिसमें हम सोचते और कल्पना करते हैं, वो हमारी मातृभाषा होती है | अरे, ठहरिये, अब ऐसा ज़रुरी नहीं है | आज सोचने के लिए आर्टिफीशिअल इंटेलिजेंस है, जो उसी भाषा में सोच प्रदान करती है जिस भाषा में उसे कमांड दी जाती है और कल्पना शक्ति का तो ह्रास इस AI ने कर ही दिया है | भावों की अभिव्यक्ति की भाषा भी अब मातृभाषा नही रह गयी है | इसके बहुत से संजीदा कारण भी हैं |

अंग्रेजी का ‘हैप्पी हिंदी डे’ या ‘हिंदी दिवस की शुभकामनायें’ में किस भाव को आज का मस्तिष्क तेज़ी से ग्रहण कर रहा है ? आज की दौड़-भाग की ज़िंदगी में इंसान को ‘हैप्पीनेस’ की ज्यादा ज़रूरत है या ‘शुभकामनाओं’ की ? शुभकामनाओं के मह्त्त्व को समझाने के लिए मनोविज्ञान का सहारा लेते हुए जो कवायद होती है, हैप्पीनेस के स्टेटस को बताने के लिए क्यों नहीं होती ? शुभकामना में पात्रता का महत्त्व होता है जबकि हैप्पी में सिर्फ ख़ुशी का|

यदि इसे अनदेखा कर केवल हिंदी की तुरही बजाने की अवैज्ञानिक कोशिश ज़ारी रही तो बहुत संभव है कि इसे मात्र शोर समझ कर कानों में ईयर-प्लग लगा कर अपना पसंदीदा संगीत सुनना ज्यादा पसंद किया जाएगा | किसी से प्रेम करना तब तक संभव नहीं जब तक उसे स्वीकार न किया जाए उसी प्रकार हिंदी की स्थिति में सुधार तभी संभव है जब उसको प्रयोग करने वाले या जिन्हें प्रयोग सीखना है, उनके ज़ेहन को भली-भाँति न समझा जाए |

यदि भाषा व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा माना जाता है तो भाषा के सभी चार रूप नहीं तो कम-से-कम मध्यमा से बैखरी तक पहुँचाने का प्रयास तो किया ही जा सकता है | हिंदी की उपयोगिता के नाम पर शिक्षण, पत्रकारिता, फिल्म-सीरियल आदि में काम आने वाली एक व्यावसायिक भाषा के रूप में खूब प्रचलन हो रहा है लेकिन भाषा के लिए अस्मिता और पहचान जैसे विशेषणों का केवल स्लोगन के रूप में ही प्रत्यक्षीकरण क्या किसी को महसूस होता है ? तो इसके लिए कौन ज़िम्मेदार है ?

आज हिंदी विदेशों के लगभग 150 में पढ़ाई जा रही है | लेकिन केवल विदेश पर्यटन की महात्वाकांक्षा से हिंदी का तमगा लगा कर हिंदी का भारत की संस्कृति और गौरव के नाम पर अन्धप्रचार से हिंदी की स्थिति बेहतर नही हो सकती यदि वहाँ की संस्कृति को आत्मसात किये बिना हिंदी का प्रयोग और शिक्षण होता रहा |

जीवन को समझे बिना भाषा की बूझ कैसे उत्पन्न हो सकती है | भाषा बहता नीर है, केवल उदाहरण के तौर पर नही व्यवहारिक तौर पर भी समझे जाने की आवश्यकता है | आज जब भी हिंदी के उत्थान की बात होती है तब एकमात्र कारण अंग्रेज़ी की गुलामी और पाश्चात्य संस्कृति का अन्धानुकरण का बिगुल तेज़ी से बजाया जाता है | अन्धानुकरण किसी भी चीज़ या संस्कृति का हो सकता है जो गलत है | क्या कभी-कभी यह नहीं लगता कि भारतीय संस्कृति की भी अंधाधुंध गलत परिभाषाएं बनायी जातीं हैं महज अपने स्वार्थ सिद्ध करने के लिए | दूसरे, अंग्रेज़ी की गुलामी से ज्यादा जो बात गौर करने लायक है, वह है ऎसी मानसिकता की, जो अत्याधुनिक पूंजीवादी सभ्यता में एक अत्यंत गंभीर रोग का शिकार हो चुकी है जिसे कहते हैं ऊंचा रूतबा पाने की होड़, जो आर्थिक सम्पन्नता का सूचक है |

हिन्दी भाषा की स्थिति भी आर्थिक आधारों पर निर्धारित कर दी गयी है और इसका ज़िम्मेदार कौन है इसे फिर से समझने की ज़रूरत है | आज हिंदी के अध्ययन-अध्यापन में इस पूंजीवादी सोच ने सेंध लगा ली है | हिंदी का महत्त्व तभी है यदि उसमें बटुआ भरने की क्षमता है | इस प्रकार हिंदी तो फिर केवल अपने स्वार्थ सिद्ध करने के काम ज्यादा कर रही है | आज के इस वैज्ञानिक युग में जिस धरातल पर उसे फलने फूलने का अवसर मिला, वहां तो वह उसी छद्म दुनिया का अभिन्न अंग बन गयी क्योंकि उसे मनचाहा भौतिक सुख मिल गया जिससे आकर्षित होकर वह महानगर में आई थी | अब अपना स्वभाव और प्रकृति को निरंतर सिद्ध करते रहने की चुनौतियों का उसे लगातार सामना करना पड़ता है जिसे वह अव्यवहारिक तरीकों से सुलझाना चाहती है | घर से चली हिंदी ने विद्वानों की नसीहते नहीं सुनी न अमल की | उसे अंग्रेजी का पूरा ज्ञान होना चाहिए साथ ही अन्य भारतीय भाषाओं का थोड़ा-बहुत परिचय कहीं से भी उसकी गरिमा को नष्ट नहीं करता बल्कि मान को बढ़ाता ही है |

किसी भी उत्कृष्ट रचना का दारोमदार उसकी संवेदना और उसे अभिव्यक्त करने वाली भाषा पर होता है | यदि टैगोर, जो तमाम उम्र यूरोप की यात्राएँ करते रहे और वहाँ की संस्कृति से न केवल परिचित हुए बल्कि उम्दा चीज़ो को आत्मसात भी किया, उन्हें अपने मनस का अभिन्न अंग न बनाते, तो चाहे अपनी मातृभाषा में ही सही, गीतांजलि जैसी उत्कृष्ट रचना नहीं कर पाते | “विलायत पहुँच कर रविन्द्रनाथ वहाँ के जीवन में आँखें मूंद कर कूद पड़े और उसी में मगन हो गए | वह वहाँ के नाच-गान, साहित्य आदि हरेक विषय की तह तक गए |”(रविन्द्र रचना संचयन,पृ.12) प्रसिद्ध कवि यीट्स और कलाकार विलियम रोथेनस्टाइन उनके बड़े प्रशंसक थे और उन्ही के प्रोत्साहन से इन्होंने अपने कुछ गीत और कविताओं का अंग्रेज़ी में अनुवाद कराया जो ‘गीतांजलि’ के नाम से प्रकाशित हुआ जिस पर उन्हें नोबेल प्राइज़ भी मिला जिससे प्राप्त पुरस्कार राशि उन्होंने शान्तिनिकेतन के कामों में लगा दी | टैगोर खुले विचारों वाले रचनाकार हैं जो विदेशों से तो बेहतरीन चुनते ही हैं और पद्मा नदी के किनारे बसने वाले गावों के किसानों के जीवन से भी संवेदना बटोरते हैं | वही हिंदी का दंभ भरने वाले ‘मदर इण्डिया’ और ‘लगान’ जैसी उम्दा फिल्मों को केवल इसलिए ऑस्कर नहीं दिलवा पाते हैं क्योंकि उनका अच्छा अनुवाद नहीं करवा सके |

हिंदी की स्थिति को सुधारने की बात पर यह कहा जा रहा है कि इसमें ज्ञान-विज्ञान को ढाला जाए पर जीवन के प्रति संकुचित दृष्टिकोण इसमें इस क्षमता को उत्पन्न कर सकती है ? यह हिंदी उस समाज की अगुवाई करती है जो बात-बात पर नैतिकता के प्रश्न खड़े कर देता है | मनुष्य के नैसर्गिक संबंधो की मुखर-प्रखर अभिव्यक्ति को त्योरियां चढा कर देखता है | बलात्कार के मामलों में जो अक्सर महिला के पहनावे पर टिप्पणी करते हुए इस समाज की हिंदी क्या नए-नए ज्ञान-विज्ञान को सार्थक अभिव्यंजना प्रदान करने में सक्षम है ? यह हिंदी उस मानसिकता से पोषित है जो आज भी धर्म-जाति के नाम पर अपना बहुमूल्य जीवन नष्ट कर देती है, क्या वह अपने वैज्ञानिक संरचना के साथ-साथ वैज्ञानिक सोच को भी संप्रेषित कर सकती है ? पर हिन्दी का ढोल पीटने वाले वास्तव में जीवन से कितने जुड़े हुए हैं, उनके सरोकार केवल भाषा और बोली के ज्ञान को या तो जबरन ठूसते हैं या व्याख्यान देते हैं या अपनी कोई पुस्तक छपवा कर उसकी समीक्षा किसी और से करवा कर सोशल नेटवर्क में तितलियों से फड़फड़ातें हैं | जीवन और मानवीय संवेदनाएं इनके यहाँ खूबसूरत शब्दों का चित्राहार है |

इस हिंदी को उन हृदयों को समझाना बहुत आवश्यक है जो आजीविका की तलाश में बरसों से महानगर की जद्दोजहद में उलझ गए हैं | उनकी पीढ़ियाँ उनके पूर्वजों के गाँव की भाषा और संस्कृति से सहजता से कैसे परिचित हो सकती हैं जब उन्हें स्वयं रोज़ी-रोटी की तलाश शहर की आब-ओ-हवा में ले आती है और यहाँ दो-जून पेट भरने के लिए उन्हें इसी में रंग जाना होता है | इसलिए हिंदी को अपनी स्थिति को बेहतर केवल व्याख्यानों से नहीं बल्कि जीवन की धड़कनों को पहचानते हुए और उसे अभिव्यक्त कर पाने के प्रयास से करना होगा | मातृभाषा का सम्मान इन्हें कैसे समझ आएगा, इस पर विचार होना चाहिए | मीरा, सूर, तुलसी इनके जीवन का अंग हैं कि नहीं, इसकी समझ आज की हिंदी को करनी होगी |

अपनी संस्कृति तब तक ही महत्वपूर्ण होती है जब जीवन की तरलता और उष्मा दोनों को बनाए रखने में सार्थक हो | जैसे प्रेम के इज़हार के तरीके पशु-पक्षियों में अलग अलग होते हैं जिन्हें हम सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं वैसे ही भाषा के मानिंद हिंदी का सम्यक विस्तार अन्य संस्कृतियों को उचित सम्मान देने के उपरान्त हो पाएगा | कुछ वर्ष पहले आई फिल्म “कुछ-कुछ होता है” में शॉर्ट ड्रेस पहने हिन्दी में ‘रघुपति राघव राजा राम’ को विदेशी संस्कृति के परिवेश में गाकर जिस भारतीय संस्कृति का मानवर्धन करने की कोशिश की गयी थी, क्या वह सार्थक थी ? या भारत में क्रॉप टॉप युक्त किशोरी को हिंदी के काबिल नहीं समझा जाना, उसे श्लील-अश्लीलता की कसौटी पर कसा जाना सही है ?  इस प्रकार आज हिंदी के प्रकार्य और प्रयोक्ता के संदर्भ में उसकी स्थिति विचारणीय है | उसकी वैज्ञानिकता को महज़ हिंदी के सॉफ्टवेयर डेवलप करके छद्म स्वाभिमान और गौरव का नाम देने के बजाय यदि सच में ही इसमें जीवन की असली सूझ और बूझ आ जाये तो इसे विश्व की सर्वश्रेष्ठ भाषा बनने का अवसर अवश्य प्राप्त होगा |

 

(लेख में प्रयुक्त विचार लेखिका के अपने विचार हैं)

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