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हिजाब : तारीख़ के आइने में

हिजाब के सवाल पर लंबे वक़्त से दुनिया भर में बहस होती रही है। 11 सितंबर 2001 (9/11) के बाद यह बहस और तेज़ हुई। 9/11 के बाद हिजाब सिर्फ़ पहनावे का सवाल नहीं रहा, बल्कि इस्लाम, आधुनिकता, औरतों के अधिकार, मज़हबी आज़ादी और सांस्कृतिक पहचान से जुड़े बड़े सामाजी और सियासी सवालों का प्रतीक बन गया। इसलिए इसे समझने के लिए उसकी तारीख़ और सामाजी संदर्भ को देखना ज़रूरी है।

जब हिजाब की तारीख़ पर नज़र डाली जाती है तो सबसे पहली बात यह सामने आती है कि पर्दा या सिर ढकने की प्रथा का बुनयादी सम्बन्ध आस्था से नहीं बल्कि समाजी हैसियत और वर्गीय श्रेष्ठता से है। इसके प्रमाण बताते हैं कि औरतों के पहनावे और पर्दे से जुड़ी परंपराएँ इस्लाम से कई सदियों पहले पश्चिमी एशिया की कई तहज़ीबों में मौजूद थीं। खासतौर से प्राचीन मध्य असीरियाई साम्राज के कानूनों में ऐसे नियम मिलते हैं, जिनमें समाज के अलग-अलग वर्गों की औरतों के लिए पर्दा करने या न करने के हुक्म दिए गए थे।

प्राचीन असीरिया का उदय लगभग 2100 ईसा पूर्व के आसपास माना जाता है। लगभग 1400 ईसा पूर्व तक असीरिया एक संगठित और शक्तिशाली साम्राज बन चुका था। इसी दौर में उसने व्यापक प्रशासनिक ढाँचा और कई कानूनी-सामाजी नियम विकसित किए। जंगों और साम्राज के फैलाव के साथ गुलाम-प्रथा भी मजबूत हुई। पराजित समुदायों की औरतों और मर्दों को बड़ी तादाद में गुलाम बनाया जाता था और उनसे घरेलू, किसानी और दूसरे श्रम कार्य लिए जाते थे। ग़ुलाम औरतों को संपत्ति की तरह खरीदा-बेचा या तोहफ़े में दिया जा सकता था। इसी समाजी निज़ाम में आज़ाद और ग़ुलाम औरतों के बीच सार्वजनिक पहचान का सवाल पैदा हुआ।

लगभग 1400 से 1240 ईसा पूर्व के बीच बने मध्य असीरियाई कानूनों में आज़ाद और उच्चवर्गीय औरतों और ग़ुलाम औरतों के पहनावे में फ़र्क़ तय किया गया। मध्य असीरियाई कानून की धारा 40 में लिखा है : “किसी पुरुष की पत्नी, या विधवा, या असीरियाई औरतें जब मुख्य सड़क या सार्वजनिक मार्ग पर निकलें, तो उनके सिर खुले नहीं होने चाहिए (यानी उन्हें सिर ढकना होगा)। लेकिन एक वेश्या घूँघट या पर्दा नहीं करेगी; उसका सिर खुला रहेगा। जो कोई किसी पर्दा किए हुए वेश्या को देखे, वह उसे पकड़ ले, गवाहों को इकठ्ठा करे और उसे महल के दरवाज़े पर ले जाए। उसके आभूषण नहीं लिए जाएँगे, लेकिन जिसने उसे पकड़ा है वह उसके कपड़े ले सकता है। उसे कोड़ों से पचास प्रहार किए जाएँगे और उसके सिर पर गरम तारकोल डाला जाएगा।”

आगे लिखा है: “अगर कोई मर्द किसी घूंघट (पर्दा) पहने हुई वेश्या को देखे और उसे पकड़कर राजमहल के दरवाज़े पर पेश करने के बजाय छोड़ दे, तो उस मर्द को कोड़ों से 50 प्रहार किए जाएँगे। उसके ख़िलाफ सूचना देने वाला व्यक्ति उसके कपड़े ले लेगा। उसके कान छेदे जाएँगे, उनमें डोरी डाली जाएगी और उसे उसकी पीठ के पीछे बाँध दिया जाएगा। इसके अलावा वह एक पूरे महीने तक राजा की सेवा (अनिवार्य श्रम) करेगा।”

फिर आगे कहा गया: “गुलाम औरतें अपने ऊपर घूँघट/पर्दा नहीं डालेंगी। अगर कोई इंसान किसी ग़ुलाम औरत को घूँघट या पर्दा किए हुए देखे, तो वह उसे पकड़कर महल के दरवाज़े पर ले जाएगा। वहाँ उसके कान काट दिए जाएँगे, और जिसने उसे पकड़ा होगा, वह उसके कपड़े अपने पास रख लेगा।”

इन कानूनों से पता चलता है कि सिर ढकने या पर्दा करने की प्रथा इस्लाम के उदय से बहुत पहले पश्चिमी एशिया में मौजूद थी। उस वक़्त पर्दा मज़हबी पहचान से ज़्यादा सामाजी हैसियत और कानूनी दर्जे का संकेत था। आज़ाद और प्रतिष्ठित औरतों को पर्दा करने का अधिकार था, जबकि ग़ुलाम औरतों और वेश्याओं को इससे वंचित रखा गया था। वक़्त के साथ यह प्रथा असीरिया तक सीमित नहीं रही। असीरियाई, बाबुली, फारसी और बाद में यूनानी-रोमी प्रभावों के ज़रिये पश्चिमी एशिया के दूसरे हिस्सों में भी सिर ढकने और पर्दे की परंपराएँ फैलीं। अलग-अलग समाजों में यह स्त्री-सम्मान, शालीनता, वैवाहिक स्थिति या समाजी प्रतिष्ठा से जुड़ गई।

यहूदी परंपरा में भी शादीशुदा औरतों के सिर ढकने के उल्लेख मिलते हैं। इसी तरह ईसाई समाजों में सदियों तक औरतों का चर्च या सार्वजनिक जीवन में सिर ढकना सामान्य माना जाता रहा।आज भी कैथोलिक ननों का सिर ढकना इसी तारीखी रीवायत की एक मिसाल है।

अब दूसरा सवाल यह है कि क्या इस्लाम से पहले के अरब में औरतें हिजाब या नक़ाब लेती थीं या नहीं? यहाँ “हिजाब” से सिर्फ़ सिर ढकने की मुराद नहीं है। मक्का, मदीना और आसपास का इलाक़ा बेहद गर्म, रेतीला और शुष्क था। ऐसे माहौल में औरत हो या मर्द, लगभग सभी लोग सिर ढकते थे। इसलिए असल सवाल यह है कि क्या औरतें चेहरे को ढकने वाली नक़ाब या पर्दे का इस्तेमाल करती थीं। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि यहाँ “अरब” से मुराद मुख्य रूप से मक्का, मदीना और आज के सऊदी अरब का वह इलाक़ा है जहाँ इस्लाम का उदय हुआ। प्राचीन असीरियाई और दूसरी सभ्यताओं में पर्दे की परंपराएँ थीं, लेकिन अरब प्रायद्वीप का बड़ा हिस्सा लंबे वक़्त तक बड़े साम्राजों के सीधे नियंत्रण से बाहर रहा। इसलिए वहाँ अपनी ख़ास समाजी और सांस्कृतिक परंपराएँ बनी रहीं। कुरआन में इस्लाम-पूर्व अरब का वर्णन इस तरह किया गया है: “और जब वे कोई बेहयाई (फ़ाहिशा) का काम करते हैं (जैसे काबा का नंगे होकर तवाफ़ करना, हर प्रकार के अवैध यौन संबंध आदि) तो कहते हैं: ‘हमने अपने बाप-दादाओं को ऐसा करते पाया है और अल्लाह ने भी हमें इसका हुक्म दिया है।’

कह दो: ‘नहीं, अल्लाह कभी बेहयाई का हुक्म नहीं देता। क्या तुम अल्लाह के बारे में वह बात कहते हो जिसका तुम्हें ज्ञान नहीं?'”
(कुरआन 7:28)

हदीस में भी इस्लाम-पूर्व अरब का वर्णन मिलता है: “जाहिलियत (इस्लाम-पूर्व अज्ञानता के दौर) में लोग काबा का तवाफ़ नंगे होकर किया करते थे, सिवाय हुम्स के। (हुम्स से मुराद क़ुरैश और उनकी औलादें थीं।) हुम्स उन मर्दों को कपड़े दिया करते थे जो उन कपड़ों को पहनकर तवाफ़ करते थे। और हुम्स की औरतें उन औरतों को कपड़े दिया करती थीं जो उन कपड़ों को पहनकर तवाफ़ करती थीं। जिन लोगों को हुम्स कपड़े नहीं देते थे, वे काबा का तवाफ़ नंगे होकर करते थे।”
(सहीह अल-बुख़ारी, हदीस संख्या 1665)

सिरिल ग्लासे लिखते हैं: “जब मर्दों को जंग के लिए विदा किया जाता था, तो इस्लाम-पूर्व अरब की औरतें मर्दों को लड़ने के लिए उत्साहित करने के मक़सद से अपने स्तनों को अनावृत कर देती थीं। वे मैदाने जंग में भी ऐसा करती थीं। ओहद की लड़ाई में कहा जाता है कि हिंद बिन्त उत्बा के नेतृत्व में मक्के की औरतों ने भी ऐसा किया था। इस्लाम के आने के बाद यह स्थिति बदल गई, लेकिन चेहरे को ढकने के लिए घूँघट/नक़ाब का सामान्य प्रचलन अब्बासी काल तक दिखाई नहीं देता।”
(सिरिल ग्लासे, The Concise Encyclopedia of Islam, हार्पर एंड रो पब्लिशर्स, न्यूयॉर्क, 1989, पृष्ठ 413.)

इब्ने तैमियाह लिखते हैं : “सहाबा (पैग़म्बर के साथियों) के ज़माने में ग़ुलाम औरतें (ख़ादिमाएँ) अपने सिर खुले रखकर गलियों में चला करती थीं और उन मर्दों की सेवा भी करती थीं जिनके दिलों में कोई बुरी नीयत नहीं होती थी।”
(इब्ने तैमियाह, मजमूअ अल-फ़तावा, 15/418)

उमर बिन ख़त्ताब से रिवायत है कि कुछ सबी (युद्धबंदी औरतें और बच्चे) नबी के सामने लाए गए। उनमें एक औरत थी जो अपने बच्चे को दूध पिलाने के लिए अपने सीने से दूध निकाल रही थी। जब भी उसे क़ैदियों में कोई बच्चा मिलता, वह उसे उठा कर अपने सीने से लगा लेती और उसे दूध पिलाती। (उसका अपना बच्चा खो गया था, फिर बाद में उसे मिल गया।)

नबी ने हमसे फ़रमाया: “क्या तुम समझते हो कि यह औरत अपने बच्चे को आग में फेंक सकती है?”

हमने अर्ज़ किया: “नहीं, अल्लाह की क़सम! जब तक उसके बस में होगा, वह उसे आग में नहीं फेंकेगी।”

तब नबी ने फ़रमाया: “अल्लाह अपने बंदों पर इस औरत के अपने बच्चे पर रहम करने से भी ज़्यादा रहम करने वाला है।”
(सहीह अल बुखारी, हदीस संख्या 5999)

इन उदाहरणों से यह पता चलता है कि इस्लाम से पहले के अरब में आम औरतें, ख़ास तौर पर बदवी और क़बायली समाज की औरतें, चेहरा नहीं ढकती थीं। कुछ तारीखी विवरणों में कुछ  औरतों के सीना पूरी तरह न ढकने और बच्चों को सार्वजनिक रूप से दूध पिलाने का उल्लेख भी मिलता है। लेकिन पूरे अरब में पहनावे की एक जैसी व्यवस्था नहीं थी। शहरी और उच्च वर्ग की कुछ औरतें, जिनका संपर्क मिस्र, शाम और बीजान्टिन दुनिया जैसी बाहरी तहज़ीबों से था, पर्दा और चेहरा ढकने की परंपरा से परिचित थीं। उच्च वर्ग की औरतों के लिए घूँघट या नक़ाब समाजी सम्मान और ऊँची हैसियत की निशानी भी माना जाता था। इस्लाम-पूर्व कवि इमरू अल क़ैस के इस शेर का हिंदी अनुवाद देखिए: “कितनी ही सुंदर, पर्दानशीं औरतें थीं, जिनके ख़ेमों तक पहुँचने का कोई तसव्वुर भी नहीं कर सकता था। मैंने उनके साथ वक़्त बिताया और जल्दबाज़ी में भी नहीं था।
मैं पहरेदारों के झुंडों को चकमा देकर उनके पास पहुँचता था,
जबकि पूरा क़बीला मेरे ख़ून का प्यासा था, और हर आदमी मुझे मार डालने के लिए तैयार बैठा था।”

अल शांफार्रा की लैमिय्यत अल अरब में भी आता है:
“उमयमा के लिए मेरा दिल
कितना तड़पता है!
वह मेरी चाहत थी।
ख़ुदा उसे आराम और सुख-चैन की ज़िंदगी दे।
वह मुझसे दूर चली गई।
उसकी याद मेरे दिल में खुशी और आनंद जगा देती है।
वह ऐसी थी कि आनंद और उल्लास से भर उठती थी,
और अपना नक़ाब कभी नीचे नहीं करती थी।”

फ़तह-ए-मक्का के बाद हिंदा बिन्ते उत्बा के मोहम्मद के सामने आने का वाक़िआ भी इस सिलसिले में महत्वपूर्ण है। रिवायतों के मुताबिक़, उस वक़्त उसने अपना चेहरा ढका हुआ था और नक़ाब पहन रखा था। हिंदा वही थी जिसे हमज़ा इब्ने अब्दुल मुत्तलिब की शहादत के बाद उनके जिस्म के साथ की गई बेअदबी के लिए जाना जाता है। वो मक्का के उस असरदार और ऊँचे तबक़े से ताल्लुक़ रखती थी जहाँ चेहरा ढकना पहले से समाजी रिवाज और प्रतिष्ठा की निशानी माना जाता था। इसलिए इस्लाम से पहले अरब में औरतों के पहनावे और पर्दे की कोई एक जैसी स्थिति नहीं थी। अलग-अलग इलाक़ों, समाजी तबको और सांस्कृतिक प्रभावों के अनुसार अलग-अलग रिवाज मौजूद थे। शहरी अभिजात वर्ग में नक़ाब ऊँचे समाजी दर्जे और प्रतिष्ठा से जुड़ा हुआ था, जबकि मेहनतकश, कामकाजी और खानाबदोश औरतों में चेहरे को ढकने का रिवाज आम नहीं था।

अब सवाल यह है कि क्या हिजाब इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा है या फिर यह ऐसी परंपरा है जिसे मुसलमानों ने वक़्त के साथ अपने मज़हबी-समाजी ज़िन्दगी का हिस्सा बना लिया ? इस सवाल पर आज भी अलग-अलग राय मौजूद हैं। क़ुरआन में चार ऐसी आयतें हैं जिनका इस विषय से संबंध माना जाता है। इनमें दो में सीधे हिजाब का ज़िक्र है, जबकि दो में पर्दे और पहनावे के दूसरे पहलुओं पर बात की गई है। सूरह अल-अहज़ाब (33/53) में कहा गया है: “और जब तुम नबी की पत्नियों से किसी वस्तु की आवश्यकता रखो, तो उनसे पर्दे की ओट से माँगा करो।”

यहाँ हिजाब का मतलब पर्दा, विभाजक या ओट है। आयत का सीधा संबंध नबी की पत्नियों से है और संदर्भ घर के भीतर शिष्टाचार और निजता से जुड़ा है। सूरह अल-अहज़ाब (33/59) में कहा गया है: “ऐ नबी! अपनी पत्नियों और ईमान वाली औरतों से कह दीजिए कि वे अपनी चादरों (जिलबाब) का कुछ हिस्सा अपने ऊपर डाल लिया करें। यह इस बात के ज़्यादा क़रीब है कि उनकी पहचान हो जाए और उन्हें परेशान न किया जाए। और अल्लाह बड़ा बख़्शने वाला, रहम करने वाला है।”

इस आयत का संदर्भ नबी की पत्नियों की हिफ़ाज़त और उन्हें परेशान किए जाने से बचाने से है। इसमें चेहरे को ढकने का स्पष्ट आदेश नहीं है, बल्कि शरीर को ढकने की बात है। जिलबाब शब्द इथियोपियाई मूल का माना जाता है और अपने आप में इसका कोई ख़ास मज़हबी माना नहीं है।

सूरह अन-नूर (24/31) में कहा गया है: “और ईमान वाली औरतों से कह दीजिए कि वे अपनी निगाहें नीची रखें, अपनी पाकीज़गी की हिफाज़त करें, और अपनी ज़ीनत (श्रृंगार/सौंदर्य) को प्रकट न करें, सिवाय उसके जो स्वयं प्रकट हो जाता है। और वे अपने ख़िमार (ओढ़नी/सिर पर डाला जाने वाला कपड़ा) को अपने ज्यूब (सीने/गले के खुले हिस्से) पर डाल लिया करें। और अपनी ज़ीनत को ज़ाहिर न करें, सिवाय अपने पतियों, अपने पिता, अपने पतियों के पिता, अपने बेटों, अपने पतियों के बेटों, अपने भाइयों, अपने भाइयों के बेटों, अपनी बहनों के बेटों, अपनी औरतों, अपने अधीन लोगों, उन मर्द सेवकों जो औरतों की इच्छा नहीं रखते, या उन बच्चों के सामने जो अभी औरतों के गुप्त पहलुओं से परिचित नहीं हुए हैं। और वे अपने पैर इस तरह न पटकें कि उनकी छिपी हुई ज़ीनत लोगों को मालूम हो जाए। और ऐ ईमान वालो! तुम सब मिलकर अल्लाह से तौबा करो, ताकि तुम कामयाब हो सको।”

इस आयत में तीन शब्दों जुयूबिहिन्ना, ख़िमार और मा ज़हारा मिन्हा यानी जो स्वयं प्रकट है, की व्याख्या को लेकर लंबे वक़्त से मतभेद है। जयब शब्द सूरह अल-क़सस 28/32 में भी आता है: “अपना हाथ अपने जयब (कपड़े के गले/छाती के हिस्से में बने खोल या जेबनुमा भाग) में डालो।”

यहाँ जयब के मानी स्तन या वक्षस्थल नहीं, बल्कि कपड़े का खुला भाग, गला, चाक या जेबनुमा जगह है। किसी प्रमुख अनुवाद में इसके मानी चेहरा नहीं किया गया। अब सवाल है कि ख़िमार क्या है? अबू अब्दुल्लाह क़ुर्तुबी लिखते हैं: “उस वक़्त की औरतें अपने सिर को ख़िमार (ओढ़नी/सिर ढकने वाले कपड़े) से ढकती थीं और उसके किनारों को अपनी पीठ की तरफ़ डाल देती थीं। इस वजह से उनकी गर्दन, सीने का ऊपरी हिस्सा और कान खुले रह जाते थे, जैसा कि ईसाई औरतों का तरीका था। फिर अल्लाह ने उन्हें हुक्म दिया कि वे ख़िमार के ज़रिये इन हिस्सों को भी ढकें।”

जो स्वयं प्रकट है के मानी सभी मतों और विद्वानो के नज़दीक चेहरा और हाथ है। ज़्यादातर विद्वानो ने चेहरे और हाथों को छिपाना ज़रूरी न होने का मत ज़ाहिर किया है।

इन आयतों और हनबली, हनफी, शाफ़ई और जाफ़री फ़िक़्ही मतों से दो बातें सामने आती हैं। पहली, क़ुरआन की इन चार आयतों में चेहरे को ढकने यानी नक़ाब का कोई स्पष्ट और सीधा हुक्म नहीं मिलता। हिजाब, ख़िमार और जिलबाब जैसे शब्द आते हैं, लेकिन चेहरे को ज़रूरी तौर से, ढकने की बात प्रत्यक्ष रूप से नहीं कही गई। दूसरी, प्राचीन असीरियन समाज में पर्दा सामाजी और वर्गीय पहचान का हिस्सा था। आज़ाद और उच्चवर्गीय औरतों को पर्दा करने का हक़ था, जबकि ग़ुलाम और निम्न वर्ग की औरतों पर वही नियम लागू नहीं होते थे। क़ुरआन में ऐसा स्पष्ट वर्गीय विभाजन दिखाई नहीं देता। वहाँ ज़ोर शालीनता, मर्यादा, पहचान और समाजी आचरण पर दिखाई देता है, न कि वर्गीय श्रेष्ठता पर। बाद के विद्वानो और फ़ुक़हा ने इन आयतों की अलग-अलग व्याख्याएँ कीं, लेकिन उन्हें क़ुरआन के मूल पाठ से अलग करके देखना ज़रूरी है। हदीसों में भी दोनों तरह की रिवायतें मिलती हैं। कुछ रिवायतों में आयशा सहित कुछ औरतों के विशेष परिस्थितियों में चेहरे पर पर्दा या नक़ाब करने का उल्लेख है। दूसरी तरफ़ ऐसी रिवायतें भी हैं जिनसे पता चलता है कि सहाबियात सहित बहुत-सी औरतें आम सामाजी ज़िन्दगी में चेहरा खुला रखती थीं। वे मस्जिद जाती थीं, सार्वजनिक जगहों पर आती-जाती थीं और लोगों से व्यवहार करती थीं। इन रिवायतों में चेहरे के खुले होने के उल्लेख मिलते हैं, लेकिन हर स्थिति में चेहरे को ढकना ज़रूरी है, ऐसा कोई एक वाज़ेह हुक्म नहीं मिलता।

इसलिए शुरुआती मुस्लिम समाज में चेहरे के पर्दे का व्यवहार एकरूप नहीं था। कुछ औरतें नक़ाब करती थीं, जबकि बहुत-सी औरतें सामान्य परिस्थितियों में चेहरा खुला रखती थीं। इसी विविधता की वजह से बाद के इस्लामी विद्वानों में भी मतभेद पैदा हुए, कुछ ने नक़ाब को वाजिब माना, जबकि दूसरों ने इसे मुस्तहब या वैकल्पिक माना।

अब सवाल यह है कि अगर लंबे वक़्त तक बड़ी तादाद में विद्वानों का मत चेहरे को खुला रखने की इजाज़त देता रहा, तो वक़्त के साथ नक़ाब का विचार ज़्यादा व्यापक और प्रभावशाली कैसे हुआ? इसे समझने के लिए मज़हबी व्याख्याओं के साथ समाजी , सियासी और वर्गीय संरचना को देखना ज़रूरी है।इस्लाम से पहले अरब एक कमजोर सियासी इलाक़ा था, जिसके आसपास सासानी और बैज़न्टीन जैसी बड़ी साम्राजी ताक़तें मौजूद थीं। इन दोनों तहज़ीबों में अभिजात वर्ग की औरतों के लिए पर्दा और सामाजी अलगाव की रवायतें आम थीं। उच्च वर्ग की औरतों को आम निगाहों से दूर रखना समाजी प्रतिष्ठा और वर्गीय हैसियत से जुड़ा हुआ था।

इस्लाम के उदय के बाद लगभग चालीस-पचास सालों में अरबों की सियासी हालत तेजी से बदली। सासानी साम्राज का खात्मा हुआ और बैज़न्टीन साम्राज के बड़े हिस्से अरब शासन के अधीन आए। उमय्यद और फिर अब्बासी दौर में अरब सत्ता एक विशाल साम्राज में बदल गई। ये तो सच है कि फ़ौज के बल पर एक नई सत्ता पुरानी सत्ता को हरा सकती है और उसे अपने अधीन कर सकती है। लेकिन संस्कृति और तहज़ीब के मामले में ऐसा नहीं होता। अब अरब शासक और अभिजात वर्ग उन इलाक़ो की पुरानी प्रशासनिक और सांस्कृतिक रवायतों के संपर्क में आया जिन पर उसने जीत हासिल की थी। धीरे-धीरे कई ऐसी प्रथाएँ, जो पहले सासानी और बैज़न्टीन अभिजात वर्ग की पहचान थीं, नए शासक वर्ग की समाजी संस्कृति का हिस्सा बनने लगीं। पर्दा और औरत का समाजी अलगाव भी इसी प्रक्रिया में नई शक्ल में विकसित हुआ। इस तारीखी बदलाओ को समझने में गुलाम औरतों और आज़ाद औरतों के बीच बना समाजी अंतर खासतौर से महत्वपूर्ण है।

साम्राज के फैलाओ के साथ गुलामी एक बड़ी समाजी संस्था बनी रही। गुलाम औरतें शाही घरानों, अभिजात खानदानो और शहरी समाज में घरेलू काम, सेवा, संगीत, गायन और मनोरंजन जैसी अलग-अलग भूमिकाओं में मौजूद थीं। इनमें से कुछ औरतें अदब और संगीत के मैदान में भी मशहूर हुईं। इसके उलट, आज़ाद औरतों के लिए समाजी प्रतिष्ठा और खानदानी मर्यादा से जुड़े नियम ज़्यादा सख्त होते गए। आठवीं शताब्दी के आसपास यह समाजी फ़र्क़ और साफ़ दिखाई देने लगता है। शासक और अभिजात वर्ग के कुछ मर्दों के लिए गुलाम औरतों के साथ संबंध बनाना आज़ाद औरतों से शादी की तुलना में कम जटिल माना जाता था। आज़ाद औरत से शादी खानदान, संपत्ति, उत्तराधिकार और समाजी अधिकारों से जुड़ी जिम्मेदारियाँ लेकर आता था, जबकि गुलाम औरत की स्थिति उस वक़्त की कानूनी-समाजी निज़ाम में अलग थी। अगर गुलाम औरत से औलाद पैदा होती थी, तो उसे कई परिस्थितियों में उम्म-ए-वलद का दर्जा मिलता था और मालिक की मौत के बाद उसकी आज़ादी का प्रावधान भी माना जाता था। इस तरह गुलाम औरत और उसकी औलाद को कभी-कभी परिवार की संरचना में शामिल किए जाने के मौके भी पैदा होते थे। कुछ तारीखी समाजों में आज़ाद औरत की इज़्ज़त, खानदान की प्रतिष्ठा और समाजी हैसियत को उसके बदन, पहनावे और सार्वजनिक उपस्थिति पर नियंत्रण से जोड़ा जाने लगा। इसके उलट, गुलाम औरतों से वैसी ही समाजी मर्यादा की उम्मीद नहीं की जाती थी। वे घरेलू श्रम, सेवा और दूसरी आर्थिक-समाजी गतिविधियों में ज़्यादा प्रत्यक्ष रूप से मौजूद रहती थीं। इसलिए उनके पहनावे और सार्वजनिक व्यवहार के क़ानून भी आज़ाद औरतों से अलग होते थे।

इस फ़र्क़ का मतलब यह नहीं कि गुलाम औरतें ज़्यादा आज़ाद थीं। उनकी हालत मूलतः गुलामी की असमान समाजी निज़ाम से निर्धारित होती थी। वक़्त के साथ अरब और उससे प्रभावित समाजों में पर्दा और नक़ाब अभिजात वर्ग की पहचान का हिस्सा बनते गए। उच्च वर्ग की औरतों के लिए चेहरे को ढकना और सार्वजनिक ज़िन्दगी से दूरी समाजी प्रतिष्ठा और सम्मान से जुड़ने लगा। इसके उलट, मेहनतकश और निचले समाजी-आर्थिक वर्गों की औरतें अपने काम की वजह से घर से बाहर निकलती थीं, इसलिए उनके लिए अभिजात वर्ग जैसी कठोर पर्दा-व्यवस्था व्यावहारिक नहीं थी।

बर्रे सगीर में भी उन्नीसवीं और बीसवीं सदी तक ऐसी प्रवृत्तियाँ दिखाई देती हैं। अशराफ और उच्च वर्ग की मुस्लिम औरतों में पर्दे की प्रथा ज़्यादा आम रही, जबकि मेहनतकश और पसमांदा औरतों की ज़िन्दगी उन्हें घरेलू सीमाओं से बाहर काम करने के लिए मजबूर करती थीं। इस तरह पर्दा और नक़ाब सिर्फ़ मज़हबी आस्था का सवाल नहीं रहे, बल्कि वर्ग, आर्थिक स्थिति, समाजी प्रतिष्ठा और औरतों की सार्वजनिक भूमिका से भी जुड़े रहे। इस तारीखी प्रक्रिया में मज़हबी व्याख्याएँ भी समाजी परिस्थितियों से अलग नहीं रहीं। अलग-अलग दौर में विद्वानों ने औरतों के पहनावे, सार्वजनिक उपस्थिति और पर्दे को लेकर अलग अलग व्याख्याएँ कीं। इसलिए नक़ाब को इस्लाम की एक स्थिर और हर दौर में एक तरह से लागू होने वाली पहचान मानने के बजाय यह देखना ज़्यादा सही होगा कि मज़हबी नज़रिया, समाजी वर्ग, सत्ता और संस्कृति ने मिलकर उसकी आधुनिक छवि को किस तरह आकार दिया।

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