आलोक कुमार श्रीवास्तव
महात्मा गांधी उन चुनिंदा शख़्सियतों में से एक हैं जिनके उल्लेख के बिना आधुनिक विश्व का इतिहास अधूरा लगता है। उन्होंने बीसवीं सदी के विश्व को इतनी गहराई से प्रभावित किया कि उसका असर आज इक्कीसवीं सदी में भी बना हुआ है। लम्बे समय तक भारत की आजादी के आंदोलन का नेतृत्व करने वाले गांधी जी, आजादी की बेला में जिस तरह नेपथ्य में चले गए, वह हमारे देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण रहा। जिन सिद्धांतों और मूल्यों के बल पर वे आजादी को प्राप्त करना और दीर्घजीवी बनाना चाहते थे, उन्हें किनारे करके वह लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सका जिसका सपना गांधी जी ने देखा था।
किसी विशेष कालखंड की घटनाओं को दर्ज करके उस समय का इतिहास लिखा जाता है। इतिहास का बहुत बड़ा हिस्सा संस्थागत अभिलेखों और जनमानस की स्मृतियों और अनुभवों में भी संचित होता है। बाद में, इतिहास के इन संचित रूपों का अध्ययन करके अध्येतागण उस पूर्वसृजित इतिहास की पुनर्व्याख्या करते हैं। अप्रैल 2026 में प्रकाशित पत्रकार पुष्यमित्र की किताब ‘गांधी का सैंतालीस’ भारत की आज़ादी और विभाजन के लगभग आठ दशक बाद उस समय के इतिहास की ऐसी ही पुनर्व्याख्या का प्रयास करती है। पुस्तक का ज्यादातर हिस्सा भारत की आज़ादी और इसके विभाजन की घटना की पृष्ठभूमि में गांधी जी के साम्प्रदायिक सद्भाव के प्रयासों पर केंद्रित है। जिस एक वर्ष की अवधि का इतिहास इस किताब में दर्ज़ किया गया है, गांधी उस समय के तीन प्रमुख राजनीतिक संगठनों – कांग्रेस, मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा के बीच समन्वय स्थापित कराने की कोशिश करते रहे। इसी अवधि में वे साम्प्रदायिक हिंसा को रोकने के लिए नोआखली, बिहार, दिल्ली और कलकत्ता के बीच भाग-दौड़ भी करते रहे। साम्प्रदायिक दंगों को रोकने के लिए अपने जीवन की इस आखिरी लड़ाई में गांधी ने संवाद, साहस, प्रेम आदि औजारों का प्रयोग किया और अपने जीवन का बलिदान इस लड़ाई में उनका आखिरी औजार बना।
किताब की शुरुआत किसी औपचारिक भूमिका के बदले ‘यह किताब क्यों’ शीर्षक लेख से हुई है जिसमें लेखक ने किताब के इस ख़ास प्रारूप में लिखे जाने की वजह स्पष्ट की है। लेखक का मानना है कि वर्ष 1947 (और उसके थोड़ा आगे-पीछे) का समय गांधी के जीवन का सर्वश्रेष्ठ काल है। इसीलिए किताब अक्तूबर 1946 से जनवरी 1948 के बीच के कालखंड पर केन्द्रित है। इस समय के गांधी की चिंता के केंद्र में अपने देश की नष्ट होती आत्मा है, जहाँ लोग नफ़रत में डूबकर एक दूसरे के ख़ून के प्यासे हो रहे हैं। साम्प्रदायिक दंगों के इस समय में गांधी दोस्ती, प्रेम और भाईचारे के भाव को फिर से ज़िंदा करने की कोशिश करते हुए दिखते हैं। लेखक ने भारत के आखिरी वायसराय लार्ड माउंटबेटन के 26 अगस्त 1947 के एक पत्र का तीन पंक्तियों का यह अंश शुरू में ही उद्धृत किया है, जिसने लेखक के जीवन को और सोचने के तरीके को बदल दिया : “पंजाब में हमारे पास 55 हजार सैनिक हैं, फिर भी वहाँ बड़े पैमाने पर दंगे हुए हैं। बंगाल में हमारी सेना एक व्यक्ति की है मगर वहाँ कोई दंगा-फ़साद नहीं हो रहा है। एक अधिकारी और प्रशासक, दोनों के रूप में मैं उस एक आदमी वाली सीमा-सेना को अपनी अंजलि देना चाहता हूँ।“ गांधी के लिए माउंटबेटन के ये शब्द गांधी की अहिंसा और प्रेम की ताकत के प्रति माउंटबेटन की स्वाभाविक श्रद्धा का प्रतीक थे क्योंकि देश के विभाजन के समय गांधी की कलकत्ता में उपस्थिति मात्र से ही शांति स्थापित हो गई थी, जिसे इतिहास में ‘कलकत्ते का चमत्कार’ कहा जाता है।
इतिहास की किताब होने के बावजूद ‘गांधी का सैंतालीस’ कथा-साहित्य की किसी कृति जैसा आस्वाद देती है। आठ अध्यायों में विभाजित लगभग 300 पृष्ठों की यह किताब इतिहास के स्रोतों के माध्यम से वर्ष 1947 में गांधी की गतिविधियों की रचनात्मक, विवेकसम्मत किंतु भावपूर्ण रिपोर्टिंग करती है। किताब के पहले अध्याय ‘वह अकेला यात्री’ में 2 जनवरी 1947 को 77 वर्षीय महात्मा गांधी द्वारा शुरू की गई पूर्वी बंगाल के नोआखली के 47 गांवों की 57 दिवसीय यात्रा का हृदयस्पर्शी ब्योरा है, जहां यूं तो गांधी के साथ उनकी पोती मनुबेन, उनके दुभाषिया और सहयोगी निर्मल कुमार बोस और आज़ाद हिंद फ़ौज़ के कुछ सिपाही, पुलिस अफसर और पत्रकार भी चल रहे थे लेकिन इस यात्रा में गांधी सचमुच अकेले ही थे। अपने अन्य नियमित भजनों के साथ रवींद्रनाथ का गीत ‘एकला चलो रे’ गाते हुए गांधी उदास तो थे लेकिन नाउम्मीद नहीं थे। उनकी यह एकल यात्रा बंगाल से लेकर बिहार और फिर दिल्ली तक उनकी शहादत की तारीख 30 जनवरी 1948 तक जारी रही। ‘फ्लैशबैक’ शीर्षक से लिखा गया किताब का दूसरा अध्याय हमें इस यात्रा के फ्लैशबैक में ले जाता है, जो मुख्यत: कैबिनेट मिशन के दिल्ली पहुँचने के साथ शुरू हुई भारत की आजादी की योजना की हलचलों और इस दरम्यान कैबिनेट मिशन, कांग्रेस, मुस्लिम लीग, हिंदू महासभा की विभिन्न कार्रवाइयों के बीच साम्प्रदायिक दंगों की आग भड़कने का जीवंत रिपोर्ताज है। तीसरा अध्याय ‘नोआखली’, शांति की स्थापना के लिए गांधी की नोआखली यात्रा का वैचारिक रोज़नामचा है, जिसमें कई रोचक घटनाएं भी हैं। इसके बाद बिहार में दंगे भड़कने पर गांधी पटना का रुख करते हैं, तो लेखक ने ‘बिहार’ शीर्षक से चौथे अध्याय में 5 मार्च 1947 से 24 मई 1947 के बीच उनके बिहार प्रवास की रिपोर्टिंग की है। खुद गांधी को अपनी बिहार यात्रा नोआखली के मुकाबले कठिन प्रतीत हो रही थी। इस अध्याय में गांधी की बिहार यात्रा के दौरान घटी कई छोटी-छोटी रोचक घटनाओं के ब्योरे हैं, जिन्हें पढ़कर मन रोमांचित हो जाता है। देश की आज़ादी की औपचारिकताओं से जुड़े काम के लिए गांधी को बिहार से दिल्ली बुलाया जाता है। अप्रैल से जुलाई 1947 की अवधि के उनके जीवन को किताब के पाँचवें अध्याय ‘आज़ादी, बँटवारा और सत्ता के सवाल’ में दर्ज़ किया गया है। ‘कलकत्ता’ शीर्षक से छठे अध्याय में 9 अगस्त 1947 से 7 सितम्बर 1947 की अवधि का विवरण है। देश को आज़ादी मिलने के समय गांधी कलकत्ता में ही थे, और वहां शांति स्थापना के प्रयासों में उनका साथ शहीद सुहरावर्दी दे रहे थे। ‘दिल्ली’ शीर्षक से किताब के सातवें अध्याय में सितम्बर 1947 से जनवरी 1948 की अवधि के दौरान गांधी की गतिविधियों का ब्योरा रखा गया है। गांधी के जीवन के अंतिम दिन और उसके बाद की कहानी किताब के आठवें और अंतिम अध्याय ‘शहादत’ में दर्ज़ है। इस अध्याय की कथा का अधिकांश प्यारेलाल नैयर की किताब और मनुबेन की डायरी पर आधारित है, जो गांधी जी की हत्या के समय वहां मौजूद थे। इन दोनों के वर्णनों के बीच, लेखक के अपने मन की विचार-यात्रा भी है जो इस किताब और गांधी के विचार से लेखक की गहरी संलग्नता को दर्शाती है।
लेखक ने किताब में विवादित प्रसंगों और घटनाओं का उल्लेख मात्र किया है और उनके विस्तार में जाने से परहेज़ किया है। ऐसे प्रसंगों में गांधी जी के जीवन के ब्रह्मचर्य के प्रयोग, उनके साथियों के साथ उनके वैचारिक मतभेद, कांग्रेस के बड़े नेताओं के बीच के मतभेद, साम्प्रदायिक दंगों के संदर्भ में राजनीतिक संगठनों और सरकारों की संदिग्ध भूमिका आदि शामिल हैं। लेखक का ध्यान गांधी जी के शांति स्थापना के प्रयासों पर अधिक रहा है। ऐसा लगता है कि लेखक गांधी जी के साथ रहकर उनके कार्यों की रिपोर्टिंग कर रहे हों। ऐसा होना स्वाभाविक भी है क्योंकि लेखक पेशे से पत्रकार हैं, लेकिन सनसनीखेज पत्रकारिता या विवादास्पद इतिहास-लेखन उनका उद्देश्य नहीं है। गांधी के करिश्माई व्यक्तित्व के प्रति एक ख़ास सम्मान से भरे लेखक ने किताब के विवरणों के जरिए एक कोशिश यह भी की है कि पाठक इस बात पर भी विचार करने की स्थिति में आ सकें कि गांधी जी के कामकाज के तौर-तरीकों में से क्या कुछ आज के भारत में प्रयोग किया जा सकता है।
किताब के अंत में लेखक ने संदर्भ स्रोतों का व्यवस्थित और प्रवाहपूर्ण उल्लेख करने के साथ ही, किताब में आये तत्कालीन इतिहास के उन व्यक्तियों का संक्षिप्त परिचय दिया है, जिन्हें हम इतिहास के माध्यम से कम जानते हैं लेकिन जिनकी भूमिका गांधी जी जीवन और इस किताब की विषयवस्तु के लिहाज से महत्वपूर्ण रही है। ये विशिष्ट व्यक्तित्व हैं – निर्मल कुमार बोस, शहीद सुहरावर्दी, मनुबेन, प्यारेलाल नैयर, ग़ुलाम सरवर, ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ान, सरदार जीवन सिंह, मेजर जनरल शाहनवाज़, सतीशचंद्र दासगुप्ता, शरत् चंद्र बोस, बीबी अम्तुस्सलाम, डॉ. सैयद महमूद, आभा गांधी और ब्रजकृष्ण चाँदीवाला।
शांत चित्त से पढ़े जाने की माँग करने वाली इस पुस्तक का सादगी भरा किंतु काफी अर्थपूर्ण आवरण शीतल वर्मा की कलाकृति है, जो महात्मा गांधी के जीवन के उस कालखंड की सटीक अभिव्यक्ति करती है जिसका विवरण किताब में है। पुस्तक के अंतिम आवरण पर दी गई पंक्ति ‘यह किताब गांधी के आख़िरी साल का रोज़नामचा नहीं, उनकी आख़िरी लड़ाई की कहानी है’ तो इस किताब को ठीक से व्याख्यायित करती ही है, मेरी दृष्टि में यह किताब आज के भारत को बचाने की (लेखक की) गांधीवादी कोशिश का दस्तावेज़ भी है।
| पुस्तक : गांधी का सैंतालीस, लेखक : पुष्यमित्र, प्रकाशक : राजकमल पेपरबैक्स, मूल्य : 450 रुपये |

