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जनमत सिनेमा

‘ताशकंद फाईल्स’: जैसे खुली वैसे ही बंद…

अभिषेक मिश्र


भारत में राजनीतिक विषयों पर फिल्म बनाना कठिन रहा है, शायद इसीलिए निर्माता-निर्देशकों ने प्रेम कहानी, पारिवारिक फिल्मों जैसे सामान्य और सुरक्षित विषयों पर ही फोकस रखा; जिसके कारण वैश्विक सिनेमा के मध्य मुख्यधारा की हिन्दी फिल्में या बॉलीवुड काफी पीछे रह गया।

यूंही नहीं था कि गांधीजी पर भी एक बेहतरीन फिल्म पहले हॉलीवुड से ही आई। इधर कुछ समय से ऐसे विषयों पर कुछ फिल्में बननी शुरू भी हुई हैं तो ज्यादातर के पीछे किसी विचारधारा के प्रति सकारात्मक या नकारात्मक रुझान का ही प्रभाव स्पष्ट दिखता है।

अब इस कारण भी इन फिल्मों की इन विषयों पर बनने वाली अन्य देशों की फिल्मों से तुलना नहीं की जा सकती।

‘ताशकंद फाईल्स’ भी इसी श्रृंखला की अगली फिल्म है। पूर्व प्रधानमंत्री स्व. लाल बहादुर के असामयिक निधन का रहस्य जानने को पूरा देश आज तक उत्सुक है।

शास्त्री जी ही नहीं, कई ऐसे राजनीतिक नाम हैं जिनके असामयिक निधन पर रहस्य का आवरण मढ़ा हुआ है। उनके 1-2 प्रत्यक्ष हत्यारों पर कार्रवाई हुई भी तो उसकी पृष्ठभूमि कभी सामने नहीं आ पाई।

हाँ, उनसे जुड़ी भावनाओं की आड़ में अपने तात्कालिक हित साधने के लिए उन्हें इस्तेमाल जरूर किया जाता रहा। जनता अपने नेताओं से जुड़े सच जानने की इच्छा और हक़ रखती है, पर उसे मात्र भ्रम मिलता है और इतनी भ्रामक खबरें कि सच उनमें कहीं खो सा जाता है।

फिल्म कहीं-कहीं इस प्रवृत्ति की ओर भी इशारा करती है और अंत में यह स्पष्ट भी कि शास्त्री जी की मृत्यु से जुड़ी जांच समिति की क़वायद एक पक्ष को कटघरे में दिखा अगले चुनावों में भावनात्मक मुद्दा बनाने का प्रयास ही है। फिल्म यह भी कटाक्ष करती है कि यह कैसा लोकतंत्र है जिसमें जनता सच को जानने से भी वंचित है!

जिस दल की ओर इशारा भी करते हैं, उसके संदर्भ में ये नहीं बताते कि उसके सत्ता से हटने के बाद गलतियों को सुधारने और सच को सामने लाने की पहल क्यों नहीं की गई! उनके परिवार से भी लोग राजनीति में रहे। इस सच्चाई को सामने लाने में उनकी क्या भूमिका रही!

फिल्म में सिर्फ एकतरफा सवाल उठाने और एक ओर शक की सुइयां घुमाते रहने की जगह एक संवेदनशील विषय पर तटस्थ नजरिए से इन सवालों की ओर भी ध्यान देना चाहिए था।

समय-समय पर देशी-विदेशी मीडिया की पुष्ट-अपुष्ट खबरें ऐसे विषयों पर आती रहती हैं। कई पुस्तकें भी लिखी गई हैं। फिल्म उनमें से कुछ सिलेक्टेड दस्तावेजों के रेफरेंस का नाट्य रूपान्तरण है।

फिल्म में काफी अच्छे कलाकार लिए गये हैं, मगर मुख्य भूमिका श्वेता बासु और मिथुन की ही है।
एक दृश्य में एक देश को अलग-अलग मुद्दों/विचारधारा पर बांटने की मानसिकता वालों को मिथुन ने कोई पॉलिटिकल टेररिस्ट, कोई जूडिशियल टेररिस्ट, कोई रेसिस्ट… बताते हुए कटाक्ष किया है, तो पात्रों की भीड़ उनके चयन के माध्यम से भी स्वयं से असहमति रखने वाले वर्गों का परिचय करवा मात्र उनपर उंगली उठाना ही लगता है।

इसलिए अन्य कलाकारों के हिस्से ज्यादा भूमिका आई भी नहीं है।
ज्यादातर फिल्म एक कमरे में फिल्मायी गई है, इससे यह ’12 एंगरी मैन’ या ‘एक रुका हुआ फैसला’ की याद दिलाती है पर बस इतना ही।

फ़िल्म में एक बात और उल्लेखनीय कही गई है कि यहां हर इंसान किसी-ना-किसी के लिए काम कर रहा है और उसे ये पता भी नहीं है कि वो किसके लिए काम कर रहा है, यहां सब का एक एजेंडा है … इस फिल्म का भी- फिल्म देखते खुद समझ लेंगे।
फिल्म देखने के बाद भी आप कुछ संदेहों के अलावा कुछ ठोस लेकर नहीं निकलते, हाँ अपनी गढ़ी जा रही धारणाओं के अनुकूल कुछ अनुमान जरूर लिए हो सकते हैं।

बहरहाल, ऐसी फिल्मों को देखने के बाद यदि संबंधित पक्ष पर आप कुछ प्रमाणिक तथ्य,पुस्तक, दस्तावेज़ आदि ढूँढने, पढ़ने आदि की इच्छा महसूस करें और इस दिशा में कोई तलाश आरम्भ करें तो यह भी ऐसी फिल्मों का एक सकारात्मक गुण ही माना जायेगा…

(अभिषेक कुमार मिश्र भूवैज्ञानिक और विज्ञान लेखक हैं. साहित्य, कला-संस्कृति, फ़िल्म, विरासत आदि में भी रुचि. विरासत पर आधारित ब्लॉग ‘ धरोहर ’ और गांधी जी के विचारों पर केंद्रित ब्लॉग ‘ गांधीजी ’  का संचालन. मुख्य रूप से हिंदी विज्ञान लेख, विज्ञान कथाएं और हमारी विरासत के बारे में लेखन. Email: [email protected] , ब्लॉग का पता – ourdharohar.blogspot.com)

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