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वाराणसी में सम्पन्न हुआ 17 वां भारतीय विज्ञान कथा सम्मेलन

अभिषेक मिश्र


देश में विज्ञान कथा की एक लंबी परंपरा रही है। बच्चों और युवाओं में विज्ञान के सिद्धांतों के प्रति रुचि जगाने में विज्ञान कथा की प्रमुख भूमिका हो सकती है।

संयोग से वर्ष 2018 विश्व की प्रथम विज्ञान कथा ‘फ्रैंकेंस्टाईन’ की 200 वीं वर्षगांठ का वर्ष भी है। इसी की पृष्ठभूमि में 17 वीं भारतीय विज्ञान कथा सम्मेलन का आयोजन 15-16 दिसंबर 2018 को वाराणसी में हुआ।

Indian Association of Science Fiction Studies, Banglore; Indian Science Fiction Writers Association, Faizabad, UP तथा Malviya Center of Innovation Incubation and Enterpreneurship, IIT (BHU) के संयुक्त तत्वावधान में इस सम्मेलन का आयोजन आईआईटी बीएचयू के प्रोफेसर गोपाल त्रिपाठी सभागार में हुआ।

विज्ञान कथा सम्मेलन का उद्घाटन सूचना राष्ट्रीय विज्ञान संचार एवं सूचना स्रोत संस्थान (निस्केयर) के निदेशक डा. मनोज कुमार पटैरिया द्वारा दीप प्रज्ज्वलित कर किया गया।

आयोजन की विषयवस्तु तकनीक और विज्ञान कथा, भारतीय विज्ञान कथा, मेरी शेली की फ्रैंकेंस्टाईन, हिन्दी विज्ञान कथा आदि थे। यह आयोजन काफी सफल रहा।

सम्मेलन का उद्घाटन डॉ. मनोज कुमार पटैरिया, निदेशक CSIR- NISCAIR, नई दिल्ली ने किया। प्रोफेसर प्रमोद कुमार जैन, निदेशक, आईआईटी (बीएचयू) वाराणसी ने समारोह की अध्यक्षता की।

मुख्य अतिथि डॉ. पी के मिश्र, विभागाध्यक्ष, केमिकल इंजीनियरिंग और टेक्नोलॉजी विभाग; बीएचयू रहे। विज्ञान कथा संबंधी ऐसे किसी आयोजन का बनारस हिंदु विश्वविद्यालय में यह पहला अवसर था। उत्तर भारत, दक्षिण भारत, महाराष्ट्र आदि से कई विज्ञान कथाकारों ने इसमें अपनी भागीदारी निभाई।

कार्यक्रम को अंतराष्ट्रीय स्वरूप देते हुये इनमें दक्षिण कोरिया की प्रसिद्ध विज्ञान कथा लेखिका तथा सुश्री सुहेयान ली तथा सुश्री किम बो यंग भी विशेष अतिथि के रूप में शामिल थीं।

सम्मेलन के उद्घाटन भाषण में डॉ. पटैरिया ने इस साम्यता को इंगित किया कि 2018 प्रथम विज्ञान कथा उपन्यास ‘फ्रैंकेंस्टाईन’ के प्रकाशन का 200 वाँ वर्ष है और आज हम जिस शहर में इकट्ठे हुए हैं वह संत कबीर की मृत्यु की 500 वीं पुण्यतितिथि मना रहा है।

वह कबीर जो मिथकों के विरुद्ध कार्य करते थे और सदा वैज्ञानिक चेतना के लिए प्रयासरत रहे। उन्होंने यह भी कहा कि विज्ञान कथा का उद्येश्य लोगों को भविष्य के खतरों के प्रति आगाह करना है ताकि समय रहते उनसे निपटने के कारगर तरीके ढूंढे जा सकें।

निदेशक आईआईटी (बीएचयू) वाराणसी के प्रोफेसर प्रमोद कुमार जैन ने कहा कि साइंस फिक्शन में तकनीक को मिश्रित करने का यह सही समय है क्योंकि तकनीकी कार्यकुशलता और विज्ञान परिकल्पना विचारों को व्यावहारिक रूप दे सकती है ताकि हम भविष्य के लिए पुरी तरह तैयार हो आगे बढ़ सकें। उन्होंने इसरो में कार्यरत वैज्ञानिक श्री नेल्लई एस मुथू की ‘Trends in Science Fiction in Tamil’ नामक एक पुस्तक का अनावरण भी किया।

डा. नेल्लई मुथू की पुस्तक, ‘ट्रेंड्स आफ साईंस फिक्शन इन तमिल’ का विमोचन

विज्ञान कथा लेखक संघ, फैजाबाद के प्रेसीडेंट और हिंदी साइंस फिक्शन पत्रिका ‘विज्ञान कथा’ के संपादक डॉ. राजीव रंजन उपाध्याय जी ने देश में हिंदी साइंस फिक्शन लेखन की विकास यात्रा पर विस्तृत प्रकाश डाला। उन्होंने आशा व्यक्त की कि आने वाले वर्षों में अधिक-से-अधिक वैज्ञानिक समुदाय हिंदी साइंस फिक्शन से जुड़ेंगे।

सम्मेलन के संयोजक डॉ अरविंद मिश्र ने सभी प्रतिष्ठित व्यक्तियों और प्रतिनिधियों को धन्यवाद दिया जो देश के विभिन्न भागों से आए थे और यह कामना की कि दो दिन की यह वार्ता निश्चित रूप से उपयोगी और सारगर्भित होगी। उन्होंने ने यह भी रेखांकित किया कि साइंस फिक्शन और प्रौद्योगिकी के बीच घनिष्ठ संबंध विकसित किया जा सकता है।

आयोजित विभिन्न सत्रों में देश के विविध क्षेत्रों से आए विज्ञान कथा लेखकों ने विज्ञान कथा से जुड़े विभिन्न पक्षों पर अपने विचार साझा किए। श्री अभिषेक कुमार मिश्र ने विज्ञान कथाओं पर आधारित हिंदी फिल्मों पर प्रेजेंटेशन के माध्यम से चर्चा की जिसमें हिन्दी फिल्मों में विज्ञान कथा के प्रति दर्शकों की अपेक्षा पर ध्यानाकर्षण किया गया। श्रीमती कल्पना कुलश्रेष्ठ ने अपने प्रेजेंटेशन के माध्यम से बच्चों के लिए विज्ञान कथाएं कैसे लिखी जानी चाहिए इसके उल्लेखनीय बिन्दु सुझाते हुये नए लेखकों को उपयोगी दिशा निर्देश उपलब्ध करवाए।

तमिलनाडु से पधारे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिक रहे डॉ. नेल्लई एस. मुथू ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी के पारस्परिक सम्बन्धो और संभावनाओं पर चर्चा की, और जामिया मिलिया विश्वविद्यालय दिल्ली की शोध छात्रा इन्द्राणी दास गुप्ता ने मिथकों में सीता के चरित्र चित्रण के विज्ञान कथात्मक स्वरुप को प्रदर्शित किया।

सम्मलेन के एक अन्य सत्र में डॉ. अरविन्द मिश्रा द्वारा सुश्री रीमा सारवाल और उनके संयुक्त शोधपत्र ‘विज्ञान कथाओं में अवतार की अवधारणा’ का प्रस्तुतीकरण किया गया, जिसमें भारतीय मिथकों और आधुनिक विज्ञान कथा की दुनिया में अवतार की अवधारणा की तुलनात्मक चर्चा की गयी। महाराष्ट्र से पधारीं सुश्री मीनल काले ने सुप्रसिद्ध विज्ञान कथाकार डॉ. जयंत विष्णु नार्लीकर के मशहूर उपन्यास ‘वामन की वापसी’ के कथानक में दिक्काल के अन्तर्सम्बन्धों का जिक्र किया। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग की शोध छात्रा सुश्री कस्तूरी सिन्हा ने नोबेल पुरस्कार विजेता काजुओ इशिगुरो के उपन्यासों की चर्चा की।

इस अवसर पर वरिष्ठ लेखक और कई विज्ञान कथाओं तथा पुस्तकों के रचयिता हरीश गोयल जी ने विज्ञान लेखकों से अपने अनुभव बांटे और बताया कि विज्ञान कथाएँ भविष्य की झलक दिखा सकती हैं और कई परिवर्तनों की वैज्ञानिक प्रेरणा भी बन सकती हैं।

आल इंडिया रेडिओ, बरेली की निदेशक डॉ. मीनू खरे और डॉ. राजलक्ष्मी बनर्जी ने रेडिओ के लिए विज्ञान कथा लेखन के एक कार्यशिविर का संचालन किया जिसमे सनबीम वरुणा से आये विद्यार्थियों ने भाग लिया।

तदनन्तर आयोजित सत्र में ऋषभ दुबे ने मानव के भविष्य को बेहतर बनाने में विज्ञान कथाओं की भूमिका की चर्चा की और डॉ. देवराज मौलिक ने उत्तर साम्राज्यवादी दुनिया में विज्ञान कथा के स्वरूपों का वर्णन किया और इसी विषय पर राजस्थान से आयीं डॉ. अल्पना गुप्ता ने भी प्रकाश डाला, सत्र के अंत में डॉ. जीशान ज़ैदी ने हिंदी विज्ञान कथाओं के ब्लॉग पर अपने विचार रखे।

पैनल-चर्चा में कोरियाई विज्ञान कथाकार सुश्री सुहेयान ली और सुश्री बो यंग किम, डॉ. अरविन्द मिश्रा, डॉ. राम किशन भीषे, सुश्री अर्चना मिराजकर और अनुपम कुमार ने भागीदारी की, जिसका संचालन डॉ. श्रीनरहरि ने किया। इस चर्चा में भारत में आगामी 2021 में आयोजित होने वाले एशियाई विज्ञान कथा सम्मलेन के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गयी.

विज्ञान कथा पुस्तकों की प्रदर्शनी

सम्मेलन का एक महत्वपूर्ण सत्र जादूगर हरीश यादव के नाम रहा जिन्होंने लोगों के मन को पढ़ने से संम्बन्धित अनेक जादू के आईटमों का प्रदर्शन कर दर्शकों को चकित कर दिया, उनकी प्रस्तुतियों को उपस्थित दर्शकों ने काफी सराहा।

कार्यक्रम में स्थानीय सनबीम वरुणा विद्यालय की छात्राओं ने ‘फ्रैंकेंस्टाईन’ विषय पर पेन्टिंग प्रतियोगिता में भी भाग लिया जिसमें स्मृति रघुवंशी को विजेता चुना गया। सम्मेलन में विभिन्न विज्ञान कथाकारों की पुस्तक प्रदर्शनी भी लगाई गई थी।

विज्ञान कथा सम्मलेन के तकनिकी सत्रों में तमिल फिल्म ‘मैट्रीमियन्जिन’ भी दिखाई गई, जिसकी विषयवस्तु एक ऐसे नायक पर केंद्रित है जिसके मष्तिष्क के ऑपरेशन के उपरांत उसकी याददाश्त चली जाती है, जबकि वैज्ञानिकों को यह आशा थी कि उसकी स्मृति और माइंड-पावर काफी बढ़ जाएगी। यह फिल्म इस ओर इंगित करती है कि किसी भी अनुसंधान के नकारात्मक पहलुओं को भी नज़रअन्दाज नहीं किया जाना चाहिए।

इस प्रकार यह आयोजन देश के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े विज्ञान लेखकों को एक-दूसरे से जुड़ने के माध्यम के रूप में सफल होता हुआ यहाँ से भविष्य की ओर एक राह बनाने के संकल्प का भी माध्यम बना। अगला आयोजन महाराष्ट्र के औरंगाबाद में आयोजित होना भी तय किया गया।

एक सत्र को संबोधित करते प्रतिभागी अभिषेक मिश्र

विज्ञान कथा कल्पनाओं और वैज्ञानिक सोच का एक संगम है जो आने वाले कल की एक बुनियाद रख सकती हैं। जो आज हमारी कल्पना में है वह कल की वास्तविकता हो सकता है। यह बुनियाद विज्ञान और तर्कों की मजबूत कसौटी से होकर गुजरे यह समाज और सभ्यता के दीर्घ हित में है। ऐसे आयोजन ऐसी ही मानसिकता के विकास में अपनी प्रासंगिकता रखते हैं।

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