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मृणाल सेन: समानांतर सिनेमा के एक स्तंभ का अवसान

अभिषेक मिश्र


क्या होता है जब एक परिवार की अकेली कमाने वाली स्त्री, जिसपर उसके माता-पिता, भाई-बहन सभी आश्रित है एक रात घर नहीं लौटती! उसके परिवार, पड़ोसी, समाज की उसके प्रति कैसी धारणाएँ बनती हैं! सुबह के अख़बार में यदि किसी महिला का शव पाने की अलग-अलग खबरें छपी मिलती हैं तो चिंता अपनी बेटी की सुरक्षा को लेकर होती है या उसके सामाजिक प्रभाव को लेकर! और यह धारणा, यह चिंता बेटे और बेटी दोनों के लिए एक सी होती है या इसमें भी समाज के पुरुषसत्तात्मक चरित्र की झलक मिलती है!

इन प्रश्नों को आम लोगों के समक्ष उसके लोकप्रिय माध्यम से रखा गया था 1979 में ‘एक दिन प्रतिदिन’ फिल्म के द्वारा और जिसके निर्देशक थे भारतीय सिनेमा की प्रसिद्ध शख्सियत मृणाल सेन। उनकी इस फिल्म की कालजयिता और प्रासंगिकता इस संदर्भ में भी समझ सकते हैं कि क्या आज 40 वर्षों बाद भी मध्य वर्ग की इस मानसिकता में कोई बदलाव आया है!

सिनेमा के माध्यम से अपने समय के जटिल सवालों को आम जनता के समक्ष प्रभावशाली ढंग से रखने में सिद्धहस्त फिल्मकार मृणाल सेन का 30 दिसंबर 2018 को कोलकाता में निधन हो गया। वो 95 वर्ष के थे। उनका जन्म 14 मई, 1923 को फरीदपुर जो आज के बांग्लादेश में है, में हुआ था।

सत्यजित राय और ऋत्विक घटक के साथ मृणाल सेन ने भारतीय सिनेमा की एक ऐसी त्रयी की रचना की जिसने वैश्विक फ़लक पर भारतीय सिनेमा को एक नई पहचान और ऊँचाई दी।

कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित रहे मृणाल सेन भारतीय सिनेमा में ‘नया सिनेमा’ या ‘समानांतर सिनेमा’ के प्रणेता रहे। इसी मुहिम ने घिसी-पीटी मसाला फिल्मों के समक्ष एक अर्थपूर्ण और यथार्थ के नजदीक सिनेमा की जगह बनाई।

उनका फिल्मों में आना भी अकस्मात ही रहा। शायद नियति ने उन्हें स्वयं अपने किसी अन्य कार्य के लिए उनकी भूमिका तय कर रखी थी! हाईस्कूल के आगे की शिक्षा उन्होंने कोलकाता में स्कोटिश चर्च कॉलेज एवं कलकत्ता यूनिवर्सिटी से पूरी की।

इसी दौरान वो वामपंथी विचारधारा, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और समान विचारों वाले व्यक्तियों के संपर्क में आए; जिसने उनके मनोमस्तिष्क में सृजनात्मकता का अंकुरण तो कहीं-न-कहीं कर ही दिया था। परंतु उन्हें जीवन के आरंभिक दिनों में दवाओं के कारोबार से जुड़ना पड़ा, जिस कारण वो अपनी प्रेरणा के शहर कोलकाता से दूर हो गए। जाहिर है अंदर के इस खालीपन ने उनके अंदर बेचैनी, परेशानी पैदा की होगी।

साहित्य में उनकी रुचि थी ही। इसी दौरान लेखक रूडोल्फ अर्नहाइम की पुस्तक ‘फिल्म ऐज़ आर्ट’ उन्हें पढ़ने को मिली। इसने उनके अंदर सिनेमा के प्रति लगाव पैदा किया। इसके बाद उन्होंने इस विषय में और भी किताबें पढ़ीं। वो कोलकाता लौट आए और ध्वनि टेक्नीशीयन के कार्य से जुड़ कर सिनेमा की बारीकी को समझने की ओर अपने कदम बढ़ा दिये। उनके ये कदम ज्यों-ज्यों आगे बढ़ते गए भारतीय सिनेमा वहाँ-वहाँ से अपनी नई पहचान पाता गया।

उनकी पहली फीचर फिल्म ‘रातभोर’ 1955 में प्रदर्शित हुई, जिसका संगीत तब के प्रसिद्ध संगीतकार सलिल चौधरी ने दिया था और तब ज्यादा चर्चित न रहे पर बाद में बांग्ला फिल्मों के सुपरस्टार बने उत्तम कुमार नायक थे। 1959 में ‘नील आकाशेर नीचे’ आई, जिसने उन्हें एक पहचान दी। लेकिन 1969 में प्रदर्शित ‘भुवन शोम’ ने उन्हें विश्व सिनेमा में एक खास मुकाम पर ला दिया। कई मायनों के अलावा यह फिल्म इसलिए भी खास थी कि हिन्दी में बनी इस फिल्म के माध्यम से मृणाल सेन ने भाषा की दीवार को भी पार किया था।

हिन्दी भाषी दर्शकों के लिए इस फिल्म से जुड़ी एक खास बात ये कि अमिताभ बच्चन ने पहली बार इसी फिल्म के लिए अपनी आवाज में नरेशन दिया था। उन्होंने बांग्ला के अलावा हिन्दी, ओड़िया और तमिल में भी फिल्में बनाईं। अपनी अभिव्यक्ति को उन्होंने भाषा की सरहदों में बांध कर नहीं रखा। ‘भुवन शोम’ से समानांतर सिनेमा का जो बीज उन्होंने रोपा उसे मणि कौल, बासु चटर्जी, एम एस सत्यू, अवतार कॉल, श्याम बेनेगल, सई परांजपे, सईद मिर्ज़ा, गोविन्द निहलानी आदि ने आगे सींचा और अभी भी कई नये फिल्मकार प्रेरणा पा रहे हैं।

उनकी कुछ प्रमुख फिल्मों में कोलकाता ट्रायोलौजी के रूप में चर्चित ‘इंटरव्यू’ (1971), ‘कलकत्ता 71’ (1972), और ‘पदातिक’ (1973) के अलावा ‘मृगया’ (1976), ‘एक दिन प्रतिदिन’ (1979), ‘अकालेर संधाने’ (1980), ‘खंडहर’ (1983), ‘एक दिन अचानक’ (1989) आदि प्रमुख हैं।

उनकी फिल्म यात्रा 27 फीचर फिल्मों और 18 लघु फिल्मों और वृत्त चित्रों की है, किन्तु एक कला फिल्म निर्देशक के संसाधनों और इसके प्रभाव क्षेत्र के दृष्टिकोण से यह संख्या भी काफी मायने रखती है। उनके द्वारा तराशे गए कुछ प्रमुख कलाकारों में मिथुन चक्रवर्ती, अंजन दत्त, माधबी मुखर्जी, ममता शंकर आदि शामिल हैं। उत्पल दत्त, स्मिता पाटिल, शबाना आज़मी, नसीरुद्दीन शाह, ओमपुरी आदि जैसे कलाकारों ने भी उनके साथ कई यादगार भूमिकाएँ निभाई हैं।

उनके संघर्षमय जीवन और फिल्मी सफर का जिक्र उनकी पत्नी गीता सेन के उल्लेख के बिना अधूरा ही रहेगा, जिनके साथ उनका अंतरजातीय विवाह हुआ था और जिन्होंने उनकी कई फिल्मों में अभिनय भी किया। गीता सेन का निधन 2017 में हो चुका था।

वर्ष 2004 में मृणाल सेन की आत्मकथा ‘Always Being Born’ प्रकाशित हो चुकी है। वर्ष 1998 से 2003 तक कम्युनिष्ट पार्टी की ओर से राज्यसभा के सदस्य निर्वाचित रहे मृणाल सेन को सिनेमा के प्रति उनके योगदान के लिए कई राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया, जिनमें प्रमुख हैं- पद्म विभूषण (2005), दादा साहब फाल्के पुरस्कार (2005), फ्रांस सरकार से 1985 में Commandeur de Ordre des Arts et des Lettres (Commander of the Order of Arts and Letters) तथा वर्ष 2000 में रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमिर पुतिन द्वारा उन्हें ‘ऑर्डर ऑफ फ्रैंडशिप’ सम्मान, जिसे पाने वाले वो एकमात्र भारतीय फिल्मकार हैं।

अपनी फिल्मों की तरह अपने जीवन को भी रस्मअदायगी से दूर रखने की चाह रखने वाले मृणाल सेन ने अपने परिजनों से इच्छा व्यक्त की थी कि उनकी मृत्यु के पश्चात लोग उनके शरीर पर फूल और माल्यार्पण न करें और न ही उनके पार्थिव शरीर को दर्शन के लिए रखा जाये। उनके पुत्र कुणाल सेन, जो शिकागो में रहते हैं, के कोलकाता आने पर उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा।

मृणाल सेन का व्यक्तित्व तथा उनका कृतित्व देश की वैश्विक फ़लक में एक पहचान तो हैं ही, वो वर्तमान तथा आने वाली पीढ़ियों को भी लंबे समय तक प्रेरित करती और राह दिखाती रहेंगीं। उनकी पुण्यस्मृति को सादर नमन।

(अभिषेक कुमार मिश्र भूवैज्ञानिक और विज्ञान लेखक हैं। साहित्य, कला-संस्कृति, विरासत आदि में भी रुचि। विरासत पर आधारित ब्लॉग ‘धरोहर’ और गांधी जी के विचारों पर केंद्रित ब्लॉग ‘गांधीजी’ का संचालन।
मुख्य रूप से हिंदी विज्ञान लेख, विज्ञान कथाएं और हमारी विरासत के बारे में लेखन। लेख और कहानियां ‘विज्ञान प्रगति’, ‘अहा जिंदगी!’, ‘विज्ञान कथा’ आदि में प्रकाशित। पत्रिका ‘पूरी दुनीया’ में भी नियमित विज्ञान स्तंभ लेखन। एक विज्ञान कहानी ‘सत्यमेव जयते’ अंतर्राष्ट्रीय ई-बुक -Around the world in more than 80 SF-stories’ में चयनित। फरीदाबाद में निवास।

Email:[email protected] 

ब्लॉग पता ourdharohar.blogspot.com)

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