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दिव्य कुंभ: प्रजातियों, पीढ़ियों की सीमा लाँघ नसों में बहता रहेगा जहर

विज्ञापन, बाजार, मेहनत की लूट, हिंदुत्व की राजनीति का अर्ध कुंभ ।अब तक का सर्वाधिक सरकार प्रायोजित यह मेला तो अब उठने वाला है लेकिन अपने पीछे ऐसा जहर छोड़ जाएगा जो इलाहाबाद के मनुष्यों में ही नहीं, नदी के भीतर और उसके आसपास रहने वाले जलचर, पक्षियों, वनस्पतियों और मिट्टी की नसों में पीढ़ियों तक बहता रहेगा ।हैरान न हों, यह मैं नहीं कह रहा हूं । वह तथ्य कह रहे हैं, जिन्हें जानकर लिखते हुए मेरे हाथ कांप रहे हैं और दिमाग रह रह कर सुन्न  हो जा रहा है।
ये जहर जिसका चर्चित नाम डीडीटी है, स्वाद और रंग से हीन इस रसायन की खोज ऑस्ट्रियन केमिस्ट  आथलर जेडिलर ने 1874में की और  1939 में स्विस केमिस्ट पाल हरमैन मुलर इसे कीटनाशक के बतौर उपयोग में ले आए ।पहली बार इसका उपयोग द्वितीय विश्व युद्ध में दूसरे चरण में नागरिकों और सैनिकों में फैल रहे मलेरिया और टायफस की रोकथाम के लिए किया गया। आज भी इसका सीमित उपयोग होता है मलेरिया नियंत्रण और खेती में पौधों को कीड़ों से बचाने के लिए, खासकर कपास की खेती में ।

केंद्र सरकार का नोटिफिकेशन

लेकिन 70 का दशक आते आते इस कीटनाशक डीडीटी का, दुनिया के पैमाने पर हुए विभिन्न शोधों में जो भयानक दुष्प्रभाव मनुष्यों, पक्षियों वन्य जीवन, जलचरों और जीवनदायी कीटों (एक्वेटिक लाइफ) पर पड़ा उसे देखते हुए यू एन ओ के 1972 के स्टॉकहोम सम्मेलन में इसको प्रतिबंधित करने की घोषणा की गई ।1972 में ही यूनाइटेड स्टेट्स यानी अमेरिका में इसे बैन कर दिया गया ।1962 में आई रेचल कार्सन की पुस्तक “साइलेंट स्प्रिंग” में इस खतरे को विस्तार से दिखाया और कहा कि यह कैंसर जैसी बीमारी को बढ़ाएगा ।अमेरिका का राष्ट्रीय पक्षी बाल्ड ईगल और पेरागेरियल फाल्कन इसके प्रभाव से काफी कम होने लगे थे । अब तक 128 देश इसे पूरी तरह प्रतिबंधित कर चुके हैं ।

हमारे देश में भी केंद्र सरकार के 26 मई 1989 के नोटिफिकेशन द्वारा यह पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया है ।

कीटनाशक ऐक्ट (insecticide act) 1968 के उप वर्ग 2 के सेक्शन 27 और 28 के तहत डीडीटी का इस्तेमाल बंद किया गया है । यह कहता है कि केंद्र और राज्य सरकारों की एक एक्सपर्ट कमेटी बनाई गई और उसकी अनुशंसा के आधार पर इसे बंद किया गया ।

सिर्फ दो ही स्थितियों में इसके उपयोग के लिए इसमें छूट का प्रावधान रखा गया है । एक-पब्लिक हेल्थ प्रोग्राम के लिए 1 साल में अधिकतम 10000 किलो डीडीटी का इस्तेमाल किया जा सकता है । दो- यदि कहीं महामारी फैल गई हो तो उस अवस्था में इसका इस्तेमाल एक्सपर्ट कमेटी की देखरेख में जरूरत के हिसाब से किया जा सकता है । इस कीटनाशक का उत्पादन करना सिर्फ एकमात्र कंपनी हिंदुस्तान इंसेक्टिसाइड लिमिटेड, जो केंद्र सरकार के अधीन है, करती है ।

अब जरा गौर फरमाइए कि  इलाहाबाद में लगे इस दिव्य कुंभ में उपरोक्त में से कौन सी ऐसी स्थिति आन पड़ी थी कि डीडीटी का उपयोग भारी पैमाने पर करना पड़ रहा है । इस जहर का उपयोग किस एक्सपर्ट कमेटी की राय लेकर हुआ ।आप हैरान नहीं भयाक्रांत हो जाएंगे जब इस प्रतिबंधित जहर की मात्रा के बारे में आप जानेंगे ।याद रखिए देशभर में पब्लिक हेल्थ प्रोग्राम के लिए हमारी सरकार का ऐक्ट 10000 किलो सालाना अधिकतम उपयोग की छूट देता है और मात्र 32 एकड़ में बसे मेला क्षेत्र में उपयोग के लिए 100000 किलो जी हां एक लाख किलो डीडीटी मंगवाया गया है । दिनांक 16 नवंबर 2018 उपनिदेशक मलेरिया एवं वी बी डी उत्तर प्रदेश द्वारा अपर निदेशक कुंभ मेला चिकित्सा एवं स्वास्थ्य परिवार कल्याण, इलाहाबाद मंडल प्रयागराज को पत्र लिखकर जनपद सोनभद्र से 50 मीट्रिक टन (50000 किलो) प्राप्त करने को कहा गया है । ऐसे ही मुख्य चिकित्सा अधिकारी वाराणसी को 21/12/2018के लिखे पत्र से  दो मीट्रिक टन (2000 किलो) तथा 16/12/2018के पत्र से  51.75 मीट्रिक टन (51750 किलो) इलाहाबाद प्रयागराज की 5 सीएचसी शंकरगढ़, कोरांव, करछना, मेजा और जसरा से मंगाया गया है ।

50,000 किलो डी डी टी प्राप्त करने का ऑर्डर

जब इसका उपयोग कृषि कार्य में होता था तब भी प्रति हैक्टेयर 3 किलो डीडीटी ही खेतों में छिड़का जाता था ।

किसी रासायनिक हथियार से कम नहीं है इसकी मारक क्षमता

इस मेले में डीडीटी का उपयोग आपको हर जगह दिख जाएगा । खुले में, पानी में, शौचालयों, कैंपों, सड़कों, नालियों , नदी के किनारों अर्थात पूरे मेले के सारे हिस्सों में इसका उपयोग किया गया है ।

नाले का पानी और डी डी टी का छिड़काव

जैसा कि हम सभी जानते हैं डी डी टी  पानी में पूरी तरह नहीं घुलता । इसका छोटा हिस्सा ही घुलनशील होता है । इसके छोटे-छोटे कण मिट्टी के भीतर गहरे चले जाते हैं । यह रासायनिक प्रदूषण मिट्टी की क्षमता को विभिन्न तरीकों से नष्ट करता है और यह इतना घातक है कि 22 दिन से लेकर 30 साल तक इसकी प्रदूषित करने की क्षमता बनी रहती है और नदियों, जल स्रोतों के किनारे के जीवन/पर्यावरण (एक्वेटिक लाइफ) को नेशनल पेस्टिसाइड इंफॉर्मेशन सेंटर के अनुसार 150 वर्षों तक प्रभावित करता है । यहीं नहीं इसके कण गर्म इलाकों से अर्धचंद्राकार वृत्त (arcitic) में आगे के इलाकों तक यात्रा करते हैं अर्थात यह प्रदूषण पूरी दुनिया को प्रभावित करने की क्षमता रखता है ।

इसका सर्वाधिक असर जलचरों पर पड़ता है । उन पर और ज्यादा जो अन्य कीटों या नदी अथवा उसके किनारे के कीड़े मकोड़ों को खा कर अपना जीवन चलाते हैं । पक्षियों पर, खासकर गाने वाली चिड़ियों पर इसकी मार बहुत घातक होती है क्योंकि वह सामान्य वातावरण में भी ज्यादा रसायन ग्राही होती हैं ।

मनुष्यों पर इसके दो निश्चित असर शोधों से प्रमाणित हुए हैं ।पहला डीडीटी का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शरीर में जाना उनके समूचे आंत संबंधी सिस्टम को 6 से 10 साल तक प्रभावित कर सकता है ।दूसरा यह उनके नर्वस सिस्टम पर असर डालता है । कैंसर को लेकर जरूर मतभेद हैं लेकिन जिस इलाके में डीडीटी का उपयोग होता है वहां के लोग इसके लिए ज्यादा प्रोन होते हैं, खासकर महिलाओं में स्तन कैंसर की समस्या ज्यादा है ।  यह महिलाओं के रिप्रोडक्टिव सिस्टम को प्रभावित करता है और भ्रूण के विकास में बाधा पैदा करता है । पक्षियों के अंडों के सेल को पतला कर देता है । इन सारे तथ्यों की जांच आप विकिपीडिया पर जाकर डीडीटी संबंधी विभिन्न शोधों, केस स्टडीज, संस्थानों के शोध पत्रों, विभिन्न लोगों द्वारा लिखी गई किताबों से जान सकते हैं ।

यह ज़हर कहर बन टूटेगा

दिव्य, स्वच्छ, स्वस्थ, सुगम कुंभ के गगनभेदी जयकारे के पीछे हुए इस आपराधिक कृत्य का जो असर हमारे शहर, उसके लोगों, पशु-पक्षियों, जैविक दुनिया और नदियों और वातावरण पर होने जा रहा है, जरा उसकी कल्पना कीजिए ।

गंगा-जमुना के ये दोआब जो काफी उपजाऊ इलाका है और इसके कछारों में रेत पर हरियाली लहलहाती है, जहां भारी मात्रा में हरी सब्जियों, ककड़ी, खीरा, तरबूज और अन्न पैदा होता है, मेले के बाद जब यह पैदावार होगी तो वह अपने भीतर इस जहर को भी लेकर आएगी ।

यही नहीं, जमुना के कछार में अरैल की तरफ फूलों की भारी पैमाने पर खेती होती है, फूल भी आएंगे अपनी शानदार खुशबू के साथ पर उनके भीतर भी ये जहर छुपा होगा।

अरैल की तरफ का नाला

दोआब का यह इलाका पिछले 20 वर्षों में वैसे भी कैंसर के लिए काफी उर्वर इलाके के रूप में उभरा है । इस घातक रसायन की मार उसे और कितने गुना बढ़ाएगी  इसकी सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है ।

यह सब्जियां, अन्न जब लोगों की आंतो में पहुंचेगा तब ये क्या-क्या कहर ढाएंगे यह तो आने वाले वर्षों में ही पता चल पाएगा ।

नाला जो गंगा में मिलता है

सबसे ज्यादा इसका शिकार होंगी महिलाएं, पक्षी और मछलियां जो पहले से ही काफी असुरक्षित हैं। महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर वैसे ही काफी बढ़ चुका है । यह उन्हें इस महामारी के लिए और असुरक्षित बना देगा।मछलियों की कई प्रजातियां इसे सीधे ग्रहण करने या अप्रत्यक्ष रूप से कीटों को खाने के कारण मारी जायेंगी ।

शोधों ने  यह साबित किया है कि यह स्त्रियों से लेकर पक्षियों तक की प्रजनन क्षमता को बुरी तरह से प्रभावित करता है। पक्षियों के अंडों की सेल (परत) पतली हो जाती है  जिससे भ्रूण विकसित नहीं हो पाते ।महिलाओं में भी यह प्रक्रिया देखने में आई है ।

आप जरा सोचिए हमारे शहर में जो लाखों की संख्या में सीगल्स साइबेरियन पक्षी हमारे मेहमान, हर वर्ष आते हैं और संगम की रौनक होते हैं।  इस ‘अतिथि देवो भव’ वाले देश के महान कर्ताधर्ताओं ने उनको भी नहीं बख्शा । 22 देशों, 37 देशों जाने कितने-कितने देशों के लोगों को बुलाकर विज्ञापन करने वाली सरकार इन मेहमान पक्षियों की प्रजातियों ही कम कर देने का सारा इंतजाम कर चुकी है । क्या विडंबना है, ‘नमामि गंगे’ और गंगा मैया को माता-माता कहते जिनकी जीभ नहीं थकती उस माता और उसके गर्भ में पलने-निर्भर रहने वाली संतानों का ही हत्याकांड रचाया जा रहा है, उसी की स्वच्छता के नाम पर ।

संगम नोज पर डी डी टी का छिड़काव

मैं लगातार मेले में घूम रहा हूं, जगह-जगह नाले-नालियाँ अभी भी सीधे गंगा यमुना में जा रहे हैं ।जो गंगा प्रदूषण नियंत्रण इकाइयों के जल शोधन संयंत्र (एसटीपी) लगे हैं अभी भी उनकी क्षमता इतनी नहीं है कि वह पूरे शहर के नालों के पानी को साफ कर उसे नदियों में वापस भेज पाएं ।

मुझे अंदर को घुसने नहीं दिया जा सकता और तस्वीर उतार पाना तो बहुत दूर की बात है लेकिन एक कर्मचारी ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि जिन एसटीपी के नाले से पानी जाता है नदियों को उन्हीं में सीधे डीडीटी डंपर से भरकर उलट दिया जाता है ताकि नदी तक जाते-जाते पानी थोड़ा साफ दिखे । आमतौर पर एसटीपी के नाले से नदी के मुहाने तक आने की दूरी 2 किलोमीटर या उससे कुछ ज्यादा ही है ।ऐसे कुछ नालों की तस्वीरें आप देख सकते हैं।

यह आपराधिक कृत्य है 

इनके सब को लेकर शहर के समाजसेवियों, बौद्धिक हिस्सों में काफी बेचैनी दिखती है। लेकिन बड़े हिस्से की आंख पर तो फिलहाल विकास और पाकिस्तान से बदला लेने का नशा तारी है।  जिनको चिंता है उन्होंने शासन -प्रशासन से सवाल भी पूछे और कोई सुनवाई ना होने पर न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है ।दिलीप कुमार गौतम की ओर से इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका उनके अधिवक्ता श्री केके राय और चार्ली प्रकाश ने दायर की है जिसमें याची ने उत्तर प्रदेश राज्य सरकार के साथ केंद्र और राज्य के इस मामले से संबंधित 6अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया है । (PIl writ petition no 225 of 2019 Dilip kumar gautam Vs state of UP and 6 others.) ।  इस याचिका के माध्यम से उन्होंने न्यायालय में गुहार लगाई है कि इस जहर डीडीटी का उपयोग तुरंत बंद कराया जाए  ।  डीडीटी का यह उपयोग संविधान के बुनियादी सिद्धांत फंडामेंटल राइट के आर्टिकल 21, जिसमें स्वास्थ्य को प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार माना गया है, उसका उल्लंघन है । अतः इस आपराधिक कृत्य के लिए जो लोग जिम्मेदार हैं उन्हें दंडित किया जाए।

सरकारें और उनके अधिकारी गण आंख मूंदकर अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए पूरी प्रकृति, मानवता और जीव-जंतुओं के साथ जो मौत का भयानक खेल खेल रही है, देखें संविधान के हमारे रक्षक वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों के लिए क्या कदम उठाते हैं । फिलहाल इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य व केंद्र सरकार के अधिकारियों को 3 हफ्ते के भीतर अपना जवाब दाखिल करने के लिए कहा है ।

(फोटो क्रेडिट: युवा सिनेमेटोग्राफर अंकुर राय, रिट की कॉपी उपलब्ध कराने के लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट के चर्चित अधिवक्ता के के रॉय का आभार)

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