‘ हमरो बाबू असो चल गईल ’

देसवा

( पत्रकार मनोज कुमार के साप्ताहिक कॉलम ‘देसवा ‘ की  दूसरी क़िस्त  )

‘असो हमहूं चल जाइब

जब मैं संतकबीर नगर जिले के मेंहदावल ब्लाक के साड़े खुर्द गांव पहुंचा तो 19 वर्षीय दलित महेश आसमानी रंग की चेकदार शर्ट और जींस पहनकर घर से निकल रहा था. उसे दिल्ली जाना है जहां वह टाइल्स लगाने का काम करता है. इसके एवज में उसे 100-150 रूपए रोज की मजदूरी बनती है. वह नवम्बर 2008 में अपने एक रिश्तेदार की मदद से पहली बार मजदूरी करने पंजाब चला गया था. वहां उसने मुर्गी फार्म पर नौकरी की. फिर दिल्ली चला आया. वह हाईस्कूल की परीक्षा देने गांव लौटा था. परीक्षा खत्म होते ही फिर वापस जा रहा है. उसकी मां मुुटुरा चाहती है कि वह कुछ दिन और रूके लेकिन दिल्ली से संदेश आया है कि काम पर जल्दी लौट आए. महेश का बड़ा भाई गणेश भी गांव आया है. वह पूना में मजदूरी करता है और 110 रूपए रोज की दिहाड़ी कमाता है.

मैं महेश से पूछता हूँ कि उसने पांच महीने में कितनी कमाई घर भेजी ? वह सहजता से जवाब देता है कि अपने लिए जींस खरीदी और अम्मा-बाबूजी के लिए कुछ कपड़े। बस। इतना ही हो पाया। बाकी कमाई कमरे के किराए और खाने-पीने में खर्च हो गई.

हाईस्कूल की परीक्षा देने वाला इसी गांव का सोनू बड़े गौर से महेश को देखते हुए कहता- असो हमहू चल जाइब। मैं पूछता हूं काहे ? उसका जवाब है-गांव में कुछ काम त बा नाहीं ?

सोनू का बड़ा भाई राजू पहले से दिल्ली में मजदूरी करता है.

सांडेखुर्द गांव राप्ती नदी की बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित होने वाला गांव रहा है. इस गांव सहित कई अन्य गांवों को बाढ़ से बचाने के लिए करमैनी-गायघाट बांध बनाया गया था. बांध बनने से हर साल आने वाली बाढ़ गांव तक तो नहीं आ पाती है लेकिन जलजमाव की नयी समस्या जरूर सामने आ गयी है.
इस गांव के दलित टोला में बहुत से नौजवान काम काज की तलाश बड़े शहरों में चले गए है. महेश इन्हीं नौजवानों में से एक है. महेन्द्र, सुरेन्द्र, गणेश, राजू जैसे नाम कुछ और नौजवानों के हैं जो पलायन कर गए हैं. कुछ दिल्ली गए हैं तो कुछ मुम्बई. कुछ लड़के पूना गए हैं. कई लड़के महज 16-17 वर्ष की उम्र में कमाने के लिए दिल्ली, मुम्बई, पूना व अन्य स्थानों पर चले गए हैं. ये नौजवान पूर्व में गए लोगों के मार्फत बाहर जाते हैं. सभी मजदूरी करते हैं. कोई टाइल्स बिछाने का कार्य करता है तो कोई दूसरे तरह की दिहाड़ी करता है लेकिन किसी की आय 150 रुपए रोज से ज्यादा नहीं है.

35 वर्षीय महेन्द्र तीन वर्ष से मुम्बई में बेयरिंग बनाने के एक कारखाने में मजदूरी करते हैं. वह इस समय गांव आए हुए हैं. वह आठ-नौ माह बाद गांव लौटते हैं. अक्सर वह खेती-बारी के सीजन में गांव आते हैं और काम खत्म होने के बाद लौट जाते हैं. मुम्बई के कांदीवली में उन्होंने रहने के लिए एक कमरा ले रखा है. इस कमरे में दस लोग रहते हैं और सभी मिलजुल कर किराया देते हैं. इस खोली के लिए महेन्द्र और उनके साथियों को दस हजार रूपए एडवांस देना पड़ा है. वर्ष 2007 में जब उत्तर भारतीयों पर महाराष्ट्र नव निर्माण सेना के कार्यकर्ताओं ने हमले शुरू किए तो खोली के मालिक ने उन्हें दूसरी जगह जाने को कहा. उन्हें कई माह तक दूसरे स्थान पर रहना पड़ा.

सांडेखुर्द के दलित टोले में 27 घर हैं. अधिकतर दलितों के पास खेती के लिए बहुत मामूली जमीन है. दलितों को राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (नरेगा) के तहत दिसम्बर 07 में जॉब कार्ड बनाए गए हैं, लेकिन बहुत कम लोगों को काम मिला है. कई जॉब कार्ड धारकों को तो कोई काम ही नहीं मिला है.

जॉब कार्ड नम्बर 122 तपेसर और विन्दा देवी का है. यह जॉब कार्ड 24 दिसम्बर 08 को बना है लेकिन अभी तक दोनों को एक दिन का भी काम नहीं मिल सका है. जितई, राम लागर, निर्मला देवी को भी तीन महीने में कोई काम नहीं मिला है. पार्वती देवी इस मामले में थोड़ी भाग्यवान हैं. उन्हें सात माह में आठ दिन काम और उसकी मजदूरी मिली है.

 मजदूरों की मांओं के साथ

बनकसिया गांव भी मेंहदावल ब्लाक में आता है. इस गांव में लोग काम की तलाश में मुम्बई, अहमदाबाद, पंजाब गए हुए हैं. इनमें से अधिकतर पल्लेदारी का काम करते हैं. माधुरी पत्नी रामजनक का एक बेटा कृष्णा मुम्बई में रहता है तो दो बेटे रामनिवास व राधेश्याम अहमदाबाद में पल्लेदारी करते हैं. रामनिवास की पत्नी और बच्चे माधुरी के साथ रहते हैं. राधेश्याम हाईस्कूल में फेल होने के बाद ही गांव छोड़ गया. कृष्णा का परिवार उसके साथ ही रहता है. प्रभावती पत्नी महेश के दो बेटे बालकदास और लालमन दस वर्ष से पंजाब में मजदूरी करते हैं. एक बेटा गांव में रहता है. उन्हें फालिज मार गया है.

कोईली के दो बेटे उमेश और कमलेश पंजाब में पल्लेदारी करते हैं. कोईली कहती हैं कि पांच-छह माह में वे गांव आते हैं. इस बार उमेश उनके लिए मोबाइल लेकर आया ताकि वह और उसकी पत्नी से बातचीत में आसानी हो. कोईली के टोले में अभी तक बिजली नहीं आयी है लिहाजा उन्हें मोबाइल चार्ज कराने बाजार में जाना पड़ता है जहां मोबाइल चार्ज करने का पांच रूपए फीस लगती है. इन लोगों के पास खेत बहुत कम है.

यह पूछने पर कि खेती-बारी कितनी है, कोईली देवी का जवाब है कि –‘खेत बा कहे-सुने भर के. लहसुन गाड़े भर के.’ गांव के लड़के बाहर क्यों चले जाते हैं ? उनका साफ जवाब था-एक दिन करी दस दिन दौंड़ी (यानि की गांव में बहुत कम मजदूरी का काम है. वह भी नगद नहीं मिलता है. एक दिन काम करने पर मजदूरी के लिए दस दिन दौड़ना पड़ता है).

भानमती के तीनों बेटे बाहर चले गए हैं. बड़ा बेटा मोलहू 20 वर्ष से गोवा में है. जयहिन्द भी सात वर्ष से गोवा में ही है. दोनों वहां डेयरी का कार्य करते हैं. छोटा बेटा बलराम पंजाब में पल्लेदारी करता है. भानमती के मुताबिक उनके लड़के गांव में बहुत कम पैसा भेज पाते हैं. का खाईं का बचाई. उनका सारा पैसा खाने में खर्च हो जाता है वह क्या बचाएंगे जो हमारे पास भेजेंगे. भानमती को मजदूरी करनी पड़ती है. उनका जॉब कार्ड बना है लेकिन उस पर उन्हें सिर्फ 11 दिन का काम मिला है.

महराजगंज जिले के पनियरा ब्लाक का लक्ष्मीपुर गांव भी बाढ़ प्रभावित गांवों में से है. इस गांव के प्राथमिक स्कूल के पास एक गुमटी की बेंच पर रामसुभग बैठे हुए हैं. तभी एक जीप आती है और उससे एक नौजवान उतरता है. रामसुभग-बाबू आ गइल- कहते हुए इतनी तेजी से उठते हैं कि लड़खडा़ कर गिरने को हो आते हैं. उनका 18 वर्षीय बेटा विजय जीप से उतरने के बाद सीधे घर के अंदर चला जाता है. वह जालन्धर से लौटा है. वह वहां मजदूरी करता है और 120 रूपया रोज कमाता है. वह एक महीने बाद ही घर लौट आया है क्योंकि गांव में नवमी का बड़ा मेला लगता है और वह मेले का आनन्द उठाना चाहता है. मेला खत्म होने और गेहूं की कटाई-मड़ाई के बाद वह फिर मजदूरी करने लौट जाएगा.

इस गांव में लोग लुधियाना, जालन्धर और अमृतसर की ओर पलायन करते हैं. विन्दवासी पत्नी श्रीराम का बेटा कलन्दर 30 वर्ष का है और वह पांच वर्ष से पंजाब में काम करता हैै. इसी गांव के छेदी, शंभू, नारायण भी लुधियाना और जालन्धर में टाइल्स बिछाने का काम करते हैं. ये लोग आठ-आठ सौ रूपए के किराए के मकान में रहते हैं. लुधियाना में किराए का कमरा मुम्बई से महंगा नहीं है और वहां मुम्बई की तरह उत्तर भारतीयों के साथ दुर्व्यवहार भी नहीं होता है. इस गांव में तकरीबन 70-80 लोग आजीविका के सिलसिले में पलयान कर गए हैं.

केवला देवी के दो बेटे मुम्बई में हैं। गुजराती के दो बेटे सुरेश 25 और परशुराम 18 जालन्धर में मजदूरी करते हैं. गुजराती का कहना है कि बेटों के बाहर कमाने जाने से सिर्फ इतना फायदा है कि उन्हें घर से कुछ नहीं देना पड़ता है.

पानी के जहाज को तोड़ने में खटती जिंदगी

मनोहर चक गांव में 15 व्यक्ति गुजरात पलायन किए हैं जहां वे बंदरगाहों पर पुराने और निष्प्रयोज्य जहाजों को तोड़ने के खतरनाक काम में लगे हुए हैं. गौकरण चौहान इन्हीं में से एक है. एक अध्ययन के मुताबिक जहाज तोड़ने के काम में लगे मजदूरों के स्वास्थ्य पर बहुत ही बुरा असर पड़ता है और वहां दुर्घटना का शिकार होने की हमेशा संभावना रहती है.

गौकरण चौहान के मुताबिक बगल के गांव पड़हवा से भी 10-12 लोग गुजरात में जहाज तोड़ने का काम करते हैं. गौकरण वर्ष 2007 में गांव लौट आये थे. इसके बाद वह गुजरात नहीं गये क्योंकि घर पर उनके पिता अकेले थे. वे  खेती-बारी के काम में पिता का हाथ बंटाना चाहते थे. उसके मुताबिक जहाज तोड़ने के काम में लगे मजदूरों को पेचिस की बीमारी आम थी. वह भी इसके शिकार हुए.

आल इण्डिया परमिट वाला मजदूर

सरैया गांव बहुत मशहूर गांव है। यहां 1906 की चीनी मिल और एक डिस्टलरी है. सरैया चीनी मिल अपनी स्थापना के समय एशिया की दूसरी सबसे बड़ी चीनी मिल थी. इस मिल की स्थापना प्रख्यात चित्रकार अमृता शेरगिल के परिजनों ने की थी. अमृता शेरगिल करीब चार वर्ष तक यहां रहीं थी. यहां रहते उन्होंने कई मशहूर चित्र बनाए जो उनकी चित्रकला में एक बदलाव की निशानी बने. अमृता शेरगिल के पति विक्टर ईगान चीनी मिल के अस्पताल में डाॅक्टर थे. अमृता शेरगिल की मृत्यु के बाद वह फिर इस अस्पताल में लौट आए और पूरी जिंदगी यहीं काम करते रहे.

अब यह चीनी मिल बंद है. इसी सरैया के पोखरा टोले में दर्जनों नौजवान काम के सिलसिले में चण्डीगढ़ और मुम्बई पलायित कर गए हैं. पोखरा टोले से सीधे सरैया चीनी मिल दिखती है. यह एक बड़ा विरोधाभास है कि जिस गांव में दो-दो बड़े कारखाने हों वहां के लोगों को काम करने के लिए पलायन करना पड़े लेकिन यह हकीकत है. जयप्रकाश निषाद और राममिलन मुम्बई में कारपेन्टर हैं. वह मुम्बई में वर्ष 91 से हैं. राजेश चण्डीगढ़ में मार्बल्स लगाने की मजदूरी करते हैं तो रामू चण्डीगढ़ में गैराज चलाते हैं.

इन लोगों को मजदूरी 150 से ज्यादा नहीं मिलती है। यह पूछे जाने पर कि अब तो नरेगा में गांव में ही 100 रूपए मजदूरी मिल जाएगी जयप्रकाश, राजेश का जवाब है कि यह तो ठीक कि 100 रूपए मजदूरी मिलेगी लेकिन कितने दिन ? वह तीन महीने से गांव पर हैं. उसने अपना जॉब कार्ड भी बनवाया है लेकिन उसे फरवरी में सिर्फ चार दिन का काम मिला. ऐसे में तो गुजर-बसर नहीं हो पाएगा .

प्रहलाद चौहान और पन्नेलाल चण्डीगढ़ में मजदूरी करते हैं। पन्नेलाल अपने आपको आल इण्डिया परमिट वाला मजदूर कहता है क्योंकि वह एक स्थान पर ज्यादा दिन तक टिकते नहीं हैं. उन्हें इस बात का भी फख्र है कि उन्होंने अपने टोले के 30 से अधिक लोगों को शहरों में ले जाकर काम दिलाया है.

सरदार नगर ब्लाक का ही एक गांव है अयोध्या चक. इस गांव के 35 वर्षीय अनिरूद्ध चौधरी और उनके भाई नरसिंह, नागेन्द्र मुम्बई के भिवंडी में करघा मजदूर हैं. तीनों भाइयों का संयुक्त परिवार है. उनके पास गांव में सिर्फ सात कट्ठा खेती की जमीन है. अनिरुद्ध का परिवार गांव में ही माता-पिता के साथ रहता है. तीनों भाई भिवंडी में पावरलूम पर काम कर रोज 150 रूपए से 200 रूपए कमा लेते हैं. अनिरूद्ध ने गांव छोड़ने के पहले गोरखपुर के एक पावरलूम पर काम किया था. उसने एक सप्ताह काम किया लेकिन काम कराने वाले ने उसकी 300 की मजदूरी मार दी. इससे वह क्षुब्ध हो गया और भिवंडी चला गया. उसके मुताबिक भिवंडी में मजदूरी हड़पा नहीं जाता है और जितना काम होता है उतनी मजदूरी मिल जाती है.

अनिरूद्ध बताते हैं कि यदि तीनों भाई गांव छोड़कर नहीं गए होते तो वह अपनी बहन की ठीक से शादी नहीं कर पाते और न ही खपड़े के घर को टिन शेड में बदल पाते. उन्होंने भिवंडी की कमाई से पांच कट्ठा खेती की जमीन भी खरीद ली है. तीनों भाई बारी-बारी से खेती-बारी कराने गांव आते हैं और फिर लौट जाते हैं. अनिरूद्ध भिवंडी को उत्तर भारतीयों के लिए बहुत सुरक्षित जगह मानता है. वह थोड़े गर्व के साथ कहते हैं कि यदि भिवंडी में काम बंद हो जाए तो पूरे मुम्बई का चक्का रूक जाएगा.

‘हमरो बाबू असो चल गईल’

यह कहानी दस साल पुरानी है। तबसे और आज की स्थिति में क्या फर्क है ? महेश, महेन्द्र, सुरेन्द्र , गणेश, राजू के गांवों में क्या बदला है ? दस वर्ष में मनरेगा मजदूरी 100 से 202 रूपए हो गयी है। दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद में मजदूरी 150 -200 से बढ़ कर 500-600 हो गयी है. हो सकता है कि महेश, महेन्द्र, सुरेन्द्र , गणेश, राजू के गांव में बिजली आ गयी हो. उनके घर में सरकारी शौचालय बन गया हो. कुछ घरों की दीवारों पर प्रधानमंत्री आवास की चिप्पी भी दिखाई दे सकती है. महेश या सोनू के घर तक पहुंचने के लिए खड़ंजा बन गया हो लेकिन महेश, सोनू, गणेश का पलायन नहीं रुका। किशोर होते सोनू आज भी बोलते हैं कि असो हमहूं चल जाइब.

जब यह कहानी लिखी तब मनरेगा को लागू हुए पांच वर्ष हो गए थे. नेशनल मीडिया में यह खबरें चल रही थीं कि मनरेगा ने गांवों से मजदूरों का पलायन रोक दिया है. पंजाब के किसानों को मजदूर नहीं मिल रहे हैं. मैं इन गांवों में यह जानने के लिए पहुंचा था कि क्या वाकई मनरेगा ने मजदूरों का पलायन रोक दिया है ? जो हकीकत सामने आयी है, वह आपके सामने है.

दस साल बाद एक बार फिर इसी तरह की खबरें चल रही हैं कि कोरोना लाकडाउन के चलते यूपी और बिहार में घर वापस लौटे मजदूरों को उनके गांव में ही काम देने का काम हो रहा है. दावा है कि लाखों मजदूरों को काम दिया जा रहा है. यूपी में पीएम ‘आत्मनिर्भर यूपी रोजगार कार्यक्रम’ का शुभारंभ कर रहे हैं. सरकारी दफ्तर में अफसरों के बीच बैठे नागेन्द्र से वीडियो कान्फ्रेसिंग के जरिए प्रधानमंत्री मुखातिब हैं. वे कह रहे हैं कि नागेन्द्र ने कर दिखाया, आप भी सीखें। नागेन्द्र उनसे कहते हैं कि उन्हें डेयरी के लिए लोन मिल गया है. अब वह रोज 365 रूपए कमा रहे हैं और बहुत खुश हैं. हम गांव छोड़ कर नहीं जांएंगे. अखबारों में खबर का शीर्षक है-‘बातों-बातों में पीएम ने गुदगुदाया।’

जब पीएम और नागेन्द्र के बीच की यह बातचीत टीवी चैनलों पर चमक रही थी, उसके दस दिन पहले बिहार बॉर्डर पर स्थित यूपी के कुशीनगर जिले के मठिया माफी गांव में एक बस बाती है और गांव के नौ मुसहर नौजवान उस पर सवार होकर पंजाब में धान रोपने के लिए चले जाते हैं. इन्हीं नौजवानों में से एक रमेश की मां लक्ष्मीना हमसे कहती है- ‘हमरो बाबू असो चल गईल’.

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