औपनिवेशिक शोषण, किसान और 1857

इतिहास

अंग्रेजों के उपनिवेशवादी शोषण का कहर भारतीय किसानों पर ही सबसे ज्यादा बरपा। औपनिवेशिक आर्थिक नीतियाँ, भू-राजस्व की नयी प्रणाली और उपनिवेशवादी प्रशासनिक एवं न्यायिक व्यवस्था ने किसानों की कमर तोड़ दी। फिर दस्तकारी उद्योगों के तबाह हो जाने से इन उद्योगों में लगे लोग भी खेती की तरफ वापस लौटने पर मजबूर हुए, जिससे खेती लायक जमीन पर दबाव भी काफी बढ़ गया और इस तरह कृषि का पूरा का पूरा ढाँचा ही बदलने लगा। बड़ी ज़मीदारी वाले इलाकों में किसानों पर अत्याचार बढ़ने लगे। ज़मीदार उससे मनमाने ढंग से अवैध लगान वसूलते और बेगार करवाते। नतीजा यह हुआ कि किसान धीरे-धीरे महाजनों के चंगुल में फँसते गये और इस तरह उनकी जमीन, फसलें और पशु उनके हाथ से निकलकर जमीदारों, व्यापारियों, महाजनों और धनी किसानों के हाथ में पहुँच गये। किसानों की हैसियत  बँटाईदारों और खेतिहर मजदूरों की ही रह गयी। जमीन से वंचित किये गये बहुत-से किसान भुखमरी से बचने के लिए मजबूरन डकैत और राहजन हो गये।

औपनिवेशिक शासन की इन नीतियों का समय-समय पर किसान विरोध करते रहे। और यह विद्रोह बंगाल में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासन से ही शुरू हुआ। इसमें सबसे प्रसिद्ध संन्यासी विद्रोह था। 1857 के बाद जब भारत का शासन कम्पनी से ब्रिटिश महारानी के हाथ में गया तब भी किसानों ने कई विद्रोह किये, जिसमें नील आन्दोलन, पाबना विद्रोह, दक्कन के दंगे, मोपला विद्रोह, वासुदेव बलवंत फड़के का उपद्रव, कूका आन्दोलन आदि प्रमुख हैं। साहित्य में भी इसकी अभिव्यक्ति होती है, जैसे संन्यासी विद्रोह की पृष्ठभूमि पर बंकिमचन्द्र का उपन्यास ‘आनन्द मठ’ एवं नील-किसान-उत्पीड़न पर दीनबन्धु मित्र का नाटक ‘नील दर्पण’ उल्लेखनीय है।

1857 की आजादी की पहली लड़ाई में भूमि या जमीन के मालिकाना हक की बात की गयी थी। जो जमीन को जोतेगा वही जमीन का मालिक होगा, यह बात सबसे पहले 1857 की लड़ाई में ही घोषित हुई थी। सैनिकों और किसानों तथा खेतिहर मजदूरों की व्यापक एकता इस आजादी के युद्ध में देखने को मिलती है और इसके कार्यक्रमों में ‘जमीन जोतने वाले की’ जैसी बात सिद्धान्त के रूप में शामिल थी। इस युद्ध में सैनिकों और किसानों की पराजय ने इस कार्यक्रम को पीछे धकेल दिया, लेकिन 20वीं सदी के संगठित किसान आन्दोलन में यह कार्यक्रम प्रमुखता से पुन: शामिल हो गया। इसके पीछे लोक की 1857 से जुड़ने की एक स्वभाविक इच्छा भी थी। अर्थात, जब सचेत किसान आन्दोलन उठे तो उन्होंने अपने को 1857 की लीगेसी से ही जोड़ा, कांग्रेस की लीगेसी से नहीं। यह गदर पार्टी, किरती, भगत सिंह से लगायत सहजानंद और अवध के किसान आन्दोलन तक में देखा/खोजा/पाया जा सकता है।
अर्थात्  1857 विद्रोह का एक प्रमुख कारण औपनिवेशिक भूमि-व्यवस्था थी।  किसान परिवारों के सिपाहियों एवं बड़ी संख्या में छोटे-मझोले किसानों की इसमें भागीदारी यही बयान करती है। प्रसन्न कुमार चौधरी और श्रीकान्त की पुस्तक ‘1857: बिहार-झाखण्ड में महायुद्ध’ में इस बात के ढेरों विवरण हैं। प्रस्तावना में वे लिखते हैं —इस जन विद्रोह में कुछेक प्रमुख जागीरदारों समेत अनेक छोटे-मँझोले जागीरदारों से लेकर खेत मजदूरों तक ने सक्रिय भूमिका निभाई थी। नवादा के रजवार खेत मजदूरों तथा गरीब किसानों का अविस्मरणीय जन-विद्रोह इस स्वतंत्रता संग्राम का अनिवार्य अंग था। रजवार विद्रोह के पहले दलित विद्रोह के बारे में कोई रिकार्ड नहीं मिलता है। रजवारों का जमीदारों और अंग्रेजी राज के खिलाफ एक साथ लड़ाई का उल्लेख बिहार के इतिहास में गुमनाम रहा।  सतवा रजवार, जवाहिर रजवार, भोक्ता रजवार, फागू रजवार इसके नायक रहे, जो लड़ाई के दौरान मारे गये। यह एक उदाहरण है, ऐसे हजारों उदाहरण सिर्फ अकेले आज के बिहार से मिल जायेंगे, जिसमें गाँवों के खेतिहर ग्रामीणों ने ब्रिटिश राज के खात्मे के लिए बहादुराना युद्ध लड़े और लड़ते हुए खेत रहे। गाँव-गाँव में की जाने वाली छापामार या इस जन भागीदारी की गवाह थी। गावों में की जाने वाली छापामारी से यह भी साफ होता है कि लड़ाई में सभी जाति और समुदाय के लोगों की भागीदारी रही।
इस विद्रोह में शामिल वर्गों और समुदायों की तस्वीर अब अध्ययनों से स्पष्ट हो चुकी है। इसमें दक्षिण हजारीबाग और मानमूम के संथाल तथा खेत मजदूर और गरीब रैयत थे जो भूख के खिलाफ, जागीरदारों के खिलाफ और आजादी के लिए अंग्रेजी शासन के खिलाफ लड़ रहे थे। इसमें पलामू के खरवार रैयत तथा छोटे-मँझोले जागीरदार थे जो जमीन और आजादी के लिए ठकुराई तथा अंग्रेजी शासन से लोहा ले रहे थे। इसमें कुछेक बड़े राजा और जागीर थे जो अपनी जागीर की रक्षा और आजादी के लिए संघर्ष में कूद पड़े थे।
इस जंग के फलस्वरूप आखिरकार, अंग्रेजी शासन को जमीन और जंगल पर इन समुदायों के अधिकार को कुछ हद तक मान्यता देनी पड़ी। इन्हें नियम बर्हिभूत क्षेत्र घोषित कर एजेण्ट अथवा आयुक्त की अनुमति के बगैर जमीन के हस्तान्तरण पर रोक लगी ओर इस तरह जमीन की अबाध खरीद-बिक्री पर अंकुश लगाने की कोशिश की गयी।  यह तस्वीर वर्तमान बिहार-झारखण्ड की है। आदिवासी इलाकों में जो कुछ राहत इस जंग ने हासिल की थी आज आजादी के 73वें वर्ष तक अपनी चुनी हुई सरकारों ने ही उसे भी छीन लिया है या ऐसी कोशिश की जा रही है, जो नये तनाव का कारण बन रही है। खैर,
अब अगर संयुक्त प्रान्त में देखने की कोशिश करें तो यहाँ मुख्यत: छोटे-मँझोले लम्बरदारों (लम्बरदार का अर्थ गाँव का एक मुखिया है जिसके साथ मालगुजारी की वसूली के बारे में समझौता हुआ हो) ने वर्दी में लड़ रहे किसानों के साथ एकता कायम की। संयुक्त प्रान्त के  कई इलाकों में इन्हीं की संख्या ज्यादा थी। खासकर इसके पश्चिमोत्तर हिस्से में। इन लम्बरदारों की हैसियत जंगे-ए-आजादी के नायकों के व्यक्तिगत अध्ययन से अब सामने, काफी हद तक आया है। जैसे बड़ौत परगना के एक बड़े गाँव बिजरौल के निवासी और 1857 में अंग्रेजों की निगाह में बागी शाहमल जैसे जमीदार वास्तव में प्रमुख काश्तकार मात्र थे और उन्हें अपनी लगभग आधी जमीन खुद जोतनी पड़ती थी।  शाहमल और देवी सिंह जैसे लोगों के इस जंग में शामिल होने के पीछे भूमि या जमीन को लेकर औपनिवेशिक नीतियाँ ही जिम्मेदार थीं। एक निर्देश द्रष्टव्य है-‘अगर जमीदार या काश्तकार पट्टा लेने से इनकार करे और अपनी दखलदारी की जमीनों पर लगान की तयशुदा दरों की कुबूलियत न लिखे तो आप ऐसी जमीनें किसी भी ऐसे जमीदार या रैयत को दे दें जो उन पर काश्त करने की ख्वाहिश रखता हो, या उन्हें बंजर पड़ी रहने दें, दूसरी सूरत में बेदखल किये गये शख्स को यह बात समझा दी जाये कि पट्टा के बिना ऐसी जमीन पर काश्त की गयी तो पूरी उपज जब्त की जा सकती है और उसे सरकार की तरफ से बेचा जा सकता है।’’
यह हिन्दुस्तान में जमीनों को लेकर एकदम से नयी बात थी क्योंकि अभी तक कभी जमीनों को बेचने या खरीदने के लिए नहीं उपलब्ध किया गया था। 1840 और 1850 के दशकों में मेरठ जिले के बागपत और बड़ौत इलाकों में इस प्रक्रिया के दौरान उपजे तनावों और दबावों का दस्तावेजों में भी कुछ प्रमाण मिलता है। इस प्रक्रिया में पुराने मालिकान से जमीन के छिन जाने की और सदियों पुराने सामुदायिक बन्धनों पर आधारित परम्परागत एकजुटता वाली पट्टियों में नीलामी में जमीन लेने वाले ‘अजनबियों’ के आने की वास्तविक या यथार्थ धमकी भी पायी जाती थी और कभी-कभी तो सचमुच ऐसा हुआ भी।
ऐसे नियमों और नीतियों से जमीन या भूमि से जुड़े वर्गों के भीतर एक असमंजस की स्थिति उत्पन्न हुई जिसमें सिर्फ काश्तकार ही नहीं प्रभावित हुए बल्कि जमीन या भूमि पर आजीविका पाने वाले अन्य समुदाय भी उससे विचिलत हुए थे अर्थात कम सामाजिक रुतबे वाले लोग। शाहमल के साथ 1857 की जंग लड़ने वाले लोगों में इनकी संख्या भी कम नहीं थी।
इसी तरह देवी सिंह पर किया गया अध्ययन भी दिलचस्प है। देवी सिंह  जिस टप्पाराय से सम्बन्धित थे, गदर के समय वहाँ बनियों का वर्चस्व था। उनके हवेलियों जैसे मकान इस स्थान के सबसे शानदार भवन थे।  टप्पा राय और उसके गाँव जिस महाबन परगना में आते थे उसमें 1870 के दशक में 22 प्रतिशत सीर जमीन के काश्तकार जाट थे और 35 प्रतिशत पर दखली और दखली लगानदार खेती कर रहे थे। मालिक और लगानदार जाट कुल मिलाकर 58 प्रतिशत जमीन के काश्तकार थे।  जमीन का बन्दोबस्त पूर्णतया भैयाचारा का नमूना था। 1830 के दशक तक ये जागीरें अनेक छोटी-छोटी पट्टियों में बँट चुकी थीं और बन्दोबस्त अधिकारियों के लिए सबसे अधिक महत्त्व पट्टीदारों का था। 1830 के दशक तक भू-सम्पत्ति छोटी-छोटी पट्टियों में विभाजित हो चली थी, और ये पट्टीदार ही अब बन्दोबस्त अधिकारियों के लिए सबसे अहम थे। पट्टीदारों में स्वामित्व के आधार पर भेद पाये जाते थे। कुछ के पास 500 बीघा से ज्यादा जमीनें थीं तो दूसरों के पास 60 बीघा से ज्यादा नहीं थीं। लेकिन गदर से पहले के 20 वर्षों में पट्टीदारों और बिस्वादारों के सम्बन्ध तनावपूर्ण हो चुके थे।  स्टोक्स का कथन है, कि राज्य के मालगुजारी के तकाजों और बन्दोबस्त से जुड़ी प्रशासनिक व्यवस्थाओं ने ही इन तनावों को जन्म दिया था। मिसाल के लिए बन्दोबस्त का मकसद हर हिस्सेदार के स्वामित्व का ठीक-ठीक निर्धारण करना था।  बन्दोबस्त की प्रक्रिया के लोचहीन चरित्र को मालगुजारी के भारी तकाजों ने और भी बदतर बनाया। रेहन और हस्तान्तरण  सम्बन्धी बदले नियमों-कानूनों ने शहरी सूदखोरों और व्यापारियों को भूमि-सम्बन्धों में लाभकारी स्थिति में पहुँचा दिया था। इसका नतीजा यह हुआ कि जैसे ही बगावत और अंग्रेजी राज समाप्त हो जाने की अफवाह फैली यही सूदखोर, महाजन सबसे पहले निशाना बने। परगना माट के एक बड़े जमींदार कुँवर दिलदार अली खान को उसके गाँव वालों ने कत्ल कर दिया।  इसी तरह अनेक दूसरे कत्ल भी हुए।  लोगों में यह विश्वास उत्पन्न हुआ कि विदेशी राज को हटाकर जनता के राज की स्थापना होनी चाहिए, चाहे उसका केन्द्र दिल्ली में हो या और भी किसी ग्रामीण विद्रोह के गढ़ में।  कुल मिलाकर सूदखोरों के साथ हिसाब चुकाना शायद इस विद्रोह की सबसे खास विशेषता थी।  और ये सूदखोर खास औपनिवेशिक शासन की भू-सम्बन्धी नीतियों की देन थे।
1857 के विद्रोह में देवी सिंह  के नायकत्व और लोकप्रियता के पीछे सूदखोरों के खिलाफ उसकी गतिविधियाँ थीं। देवी सिंह ने राय के सूदखोरों को तबाह करने के लिए शारीरिक दण्ड का नहीं, लूटपाट का सहारा लिया। उनकी दुकानें और घर इस खास किस्म की हिंसा की भेंट कर दिये गये।  बगावत का आरम्भ इसी तरह की लूटपाट से हुआ था जब मुकामी थाने के एक बरकन्दाज के मुताबिक टप्पा राय में एक हजार  लोगों की भीड़ ने नमक और चने से लदी गाड़ियों को लूट लिया था। और देवी सिंह  के शासन के अन्तर्गत बगावत का बुनियादी पहलू अर्थात लूटपाट जनता की हिंसा  को उसके उग्रतम रूप में व्यक्त करती रही। किसी भी दूसरी चीज के मुकाबले इस सामूहिक कार्रवाई ने उनकी सत्ता के इर्द-गिर्द जनता को कहीं, ज्यादा कारगर ढंग से लामबन्द किया।
1857 में बड़ी संख्या में जन-भागीदारी खासकर उत्तर प्रदेश और बिहार में, यह दिखाती है कि अंग्रेजों की भू-सम्बन्धी नीति कितनी अवैज्ञानिक और अमानवीय थी। इसीलिए उसमें आर्थिक शोषण के प्रति आक्रोश के साथ-साथ सामाजिक उत्पीड़न के प्रति भी आक्रोश था जो इन पराये आकाओं की नीतियों के चलते और तीव्र हुआ था। इसमें सबसे प्रमुख था, 1793 का स्थाई बन्दोबस्त। इसके पीछे जो भी कारण रहा हो, तथ्य यह है कि पहली बार जमीदारों को भूमि का स्वामित्व सौंपा गया, और उन्हें जमीन का मालिक घोषित किया गया। सम्पत्ति सम्बन्धों के लिहाज से भारतीय इतिहास में यह एक नयी घटना थी। जमीन को निजी सम्पत्ति बनाकर और उसे जमीदारों के हवाले कर भारतीय समाज में भूपतियों का एक नया वर्ग तैयार किया गया। लेकिन सिर्फ इतना ही नहीं हुआ बल्कि उन्हें ऐसे अधिकार दिये गये जो इसके पहले कभी नहीं थे अर्थात् रैयतों को जमीन से बेदखल करने तथा उनकी सम्पत्ति जब्त करने का अधिकार।  औपनिवेशिक काल के पहले किसानों को जमीन से बेदखल नहीं किया जा सकता था। इसके चलते हजारों किसान जमीन से बेदखल होकर खेतिहर मजदूर बनने के लिए बाध्य होने लगे। इसके अलावा लगान न दे पाने की स्थिति में वे सूदखोरों और महाजनों के चंगुल में फँसने लगे और भूमिहीन होने लगे। शोषण, उत्पीड़न के अतिरिक्त इस नई औपनिवेशिक व्यवस्था ने पहले से कायम जटिल सामाजिक संरचना को और भी जटिल होने की सम्भावना को बढ़ा दिया।
ब्रिटिश शासकों ने भूमि सम्बन्धों में तीन प्रमुख परितर्वन किये। पहला, प्राचीन ग्राम समाज की सामूहिकता के जो भी अवशेष थे, उन्हें खत्म कर दिया गया तथा प्रत्यक्ष उत्पादकों ने बिना कुछ पाये हुए अपनी पुरानी सुरक्षा खो दी। दूसरा, अंग्रेजों ने जिस नये भूमि-सम्बन्धों को जन्म दिया उसका चरित्र, मुख्य रूप से सामन्ती था। तीसरा, भूमि एक उपभोक्ता वस्तु में तब्दील हो गयी।
अकारण नहीं था कि 1857 के विद्रोह ने खासकर उत्तर प्रदेश और बिहार में जनान्दोलन का रूप लिया और उसमें बड़े जमीदारों और सूदखोरों एवं महाजनों के ऊपर जानलेवा हमले और लूट की घटनाएँ हुईं।
सन् 1872-73 में पाबना-बागुड़ा के किसानों ने काश्तकारी अधिकारों के लिए दावे किये और सिराजगंज विद्रोह की शुरुआत हुई।  1872-73 की ‘‘बंगाल प्रशासन-रिपोर्ट’’ के शब्दों में यह ‘‘एक भयानक और हिंसापूर्ण विद्रोह था।’’  ‘भारत दर्पण’, ‘भारत मित्र’, ‘बंगाल पत्रिका’ और साप्ताहिक ‘हिन्द देशभक्त’ (जमीदारों का मुखपत्र) में इस विद्रोह की विस्तृत रिपोर्ट छपी थी।  हालांकि, जमीदारों और किसानों के झगड़े का तात्कालिक कारण ‘लगान का बढ़ाया जाना था।’ लेकिन इसमें जमीदारों के अन्य तरह के अत्याचारों की भी एक भूमिका थी।  नि:संदेह जमीदारों को शोषण और अत्याचार का साधन औपनिवेशिक भूमि-सम्बन्ध ही उपलब्ध करा रहे थे।
इसके कुछ ही समय बाद दक्कन में मोपला लोगों का विद्रोह हुआ। दरअसल यह 1873 में ही शुरू हुआ था और 1921 तक चलता रहा। मोपला लोगों ने जो धर्म से मुसलमान थे—दमन की तीनों शक्तियों अर्थात् अंग्रेजों, जमीदारों और सूदखोर महाजनों के खिलाफ हथियार उठाया।  उन्नीसवीं सदी के छठे दशक के अन्तिम और सातवें दशक के आरम्भिक वर्षों में खेती की हर उपज का मूल्य बहुत नीचे गिर गया। कपास की कीमत, जो अमेरिकी गृहयुद्ध के समय बहुत ऊपर चढ़ गयी थी, सबसे पहले गिरी। इसके बाद खेती की हर पैदावार की कीमत घटने लगी। इस मंदी ने मोपला किसानों को एक गम्भीर संकट की स्थिति में डाल दिया। इस परिस्थिति में उनके लिए सरकारी मालगुजारी की लम्बी-चौड़ी मांगों को पूरा करना असम्भव था। दूसरी ओर महाजन किसानों पर असल और सूदखोर की अदायगी के लिए बेतरह दबाव डाल रहे थे। दीवानी अदालतों में किसानों के ऊपर धड़ाधड़ नालिशें हो रही थीं, और उन पर महाजनों का कब्जा कायम होता जा रहा था। जमीन से बेदखल किये गये मोपला किसानों का असन्तोष बढ़ रहा था। 1873 में किसानों ने एकदम आजिज आकर बगावत कर दी।  मोपला किसानों के बार-बार के विद्रोह से परेशान होकर ब्रिटिश हुकूमत ने जाँच और छानबीन के लिए मि० लोगन को नियुक्त किया।  मि० लोगन ने जो रिपोर्ट दी उसका एक अंश यह था—‘‘मालाबार में भूमि पर स्वतन्त्र और निरपेक्ष मालिक थे, काश्तकार और खेतिहर मजदूर। इन दोनों किसान वर्गों का भी जमीन पर हक समझा जाता था। जमीन पर जेनमी का इतना ही अधिकार था कि वह जेन्मी-भोगम के रूप में जमीन की उपज का एक तिहाई भाग ले ले। यह जेन्मी-भोगम अंग्रेजी माने में लगान न था। जेन्मी उसे बढ़ा नहीं सकता था और न वह काश्तकार को जमीन से बेदखल कर सकता था।  पहली मोपला बगावत 1836 में हुई थी, लेकिन उन्नीसवीं सदी के अंत तक भी यह आग बुझाई न जा सकी थी। 1921 में एक बार यह शोला फिर भड़का। 1921 के बाद, पूरे देश में जो महान किसान आन्दोलन उठ और जोर पकड़ रहा था, यह मोपला-आन्दोलन भी उसके विशाल प्रवाह में मिल गया।
1921 की जनवरी में अवध के किसान भारत के राष्ट्रीय मंच पर कूद पड़े। भू-स्वामियों पर हमले और पुलिस से लड़ाई के रूप में किसानों की हिंसा फूट पड़ी। कुछ हफ्तों के लिए तो कई एक भू-स्वामी डर के मारे अपनी रियासतों में दिखाई तक न पड़ते थे।  यहाँ भी किसान विद्रोह के घटित होने के मूल कारण पिछले लम्बे समय से उभरे खेतिहर सम्बन्धों के ढाँचे में निहित थे। 1857-59 का गदर और आम विद्रोह (पहला स्वाधीनता संघर्ष) जिसमें उस शताब्दी की सबसे तीखी लड़ाई और कड़ी प्रतिहिंसा हुई थी, एक दुर्भाग्यपूर्ण अन्तराल था। उसके बाद ब्रिटिश राज भारत के कुछ लोगों पर मेहरबान हुआ। जिन पर वह खासतौर पर मेहरबान हुआ, उनमें मुख्यत: करीब 280 तालुकेदार थे जो हाल के विद्रोह में भाग लेने के कारण अब जनता के ‘स्वाभाविक नेता’ बतलाये जाने लगे थे।  इस बहुरंगी तालुकेदार-समूह को नये शासकों ने कानूनी तौर पर बहुत-से ऐसे अधिकार थमा दिये जो ब्रिटेन के भू-स्वामी वर्ग को हासिल थे।  तालुकेदारी प्रथा के लागू हो जाने से अवध की आबादी (1881 में 1 करोड़ 15 लाख और 1921 में 1 करोड़ 20 लाख) के अधिकांश ने जमीन पर अपने अधिकार खो दिये। किसानों का बहुसंख्य भाग छोटे-छोटे खेतों के गैर-दाखिलकार असामियों में बदल गया अथवा भूमिहीन खेत मजदूरों में। 1880 के आसपास लखनऊ जिले में खेतिहर आबादी का साढ़े सत्ताईस प्रतिशत भाग भूमिहीन खेत मजदूरों के रूप में दर्ज था।
जनवरी 1921 में आन्दोलन अपने उत्कर्ष पर पहुँच गया। सरकार ने कड़ाई के साथ इसका दमन किया। फिर भी यह खत्म नहीं हुआ बल्कि कुछ ही महीनों के बाद एका आन्दोलन के रूप में उत्तरी अवध के इलाके में उठ खड़ा हुआ। यहाँ भी संघर्ष में वही शक्तियाँ शामिल थीं। जल्दी ही यह चारों ओर फैल गया और काफी लड़ाकू शक्ल में ढल गया।  इन आन्दोलन के दौरान किसानों द्वारा ली गयी शपथों में मुख्य था—गैर-कानूनी बेदखली होने पर अपना खेत नहीं छोड़ना, जमीदार के जुल्मों का विरोध करना। ऐसे सभी किसान आन्दोलन के भीतर 1857 कई तरह से मौजूद मिलता है। और दूसरी महत्वपूर्ण बात कि 1857 को किसान समाज और उससे निकले आजादी के लड़़ाके कभी नहीं भूूूूले।

इस तरह 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम को औपनिवेशिक भूमि-सम्बन्धों के सन्दर्भ से देखने पर स्पष्ट हो जाता है कि वह किसानों और खेती आधारित समाजों और समुदायों, ग्रामीण जनता द्वारा अपना राज कायम करने के लिए लड़ा गया ऐसा बहादुराना युद्ध था, जिसकी अमिट छाप जनांदोलनों, किसान संघर्षों से लेकर गीतों में, कलाओं में आज तक कायम है।
(यह आलेख भूमि सम्बन्धों पर केन्द्रित शोध पत्र का हिस्सा है। मुख्य स्रोत के रूप में निम्न वर्गीय प्रसंग भाग- 1,2- शाहिद अमीन, ज्ञानेन्द्र पाण्डेय, राजकमल प्रकाशन। बिरसा मुंडा और उनका आन्दोलन- कुमार सुरेश सिंह, वाणी प्रकाशन। भारत के किसान विद्रोह(1850-1900)- एल नटराजन, स्वर्णजयंती, दिल्ली। 1857:बिहार-झारखंड में महायुद्ध- प्रसन्न कुमार चौधरी, श्रीकांत, राजकमल प्रकाशन। भारत में बँधुआ मजदूर- महाश्वेता देवी, निर्मल घोष, राधाकृष्ण प्रकाशन का उपयोग किया गया है)

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