समकालीन जनमत

Category : पुस्तक

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अंचित का काव्य संग्रह ‘आधी पंक्ति’: मनुष्य और शहर के बीच संवाद के एक सेतु की निर्मिति है

उमा राग
विधान गुंजन सहजता कवि का आभूषण है। जो बात जिस तरह से कही जानी चाहिए, उसे उसी तरह कहना ही कवि को विशिष्ट बनाता है।...
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शिव कुमार पराग की ग़ज़लगोई :आँधियों में जलते चिराग़

उमा राग
जितेंद्र कुमार शिव कुमार पराग की दस ग़ज़लें वरिष्ठ ग़ज़लकार डॉ. डी. एम. मिश्र द्वारा संपादित ‘ग़ज़ल एकादश ‘(हिंदी श्री पब्लिकेशन, प्रथम संस्करण, 2021) में...
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सत्ता में समाजवाद

गोपाल प्रधान
        2023 में स्प्रिंगेर से रोलैंड बोअर की किताब ‘ सोशलिज्म इन पावर: आन द हिस्ट्री ऐंड थियरी आफ़ सोशलिस्ट गवर्नेन्स ’...
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पहचान की लड़ाई और विमर्श की जमीन

समकालीन जनमत
अजय प्रताप तिवारी भारत की सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना में आदिवासी शब्द किसी विशेष समुदाय की संकेत सूचक ही नहीं है, बल्कि अपने समुदाय के संघर्ष, अस्तित्व...
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एक ऐसा उपन्यास जिसे पढ़ते हुए आँखें भीगती रहीं

समकालीन जनमत
अनिल प्रभा कुमार के हिन्दी उपन्यास ‘ सितारों में सूराख़ ’ के उर्दू तर्जुमे की भूमिका का हिन्दी अनुवाद आफ़ताब अहमद प्रिय पाठको, हिन्दी की...
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नारीवाद, पूंजीवाद और पारिस्थितिकी

गोपाल प्रधान
2023 में नार्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी प्रेस से जोहान्ना ओकसाला की किताब ‘ फ़ेमिनिज्म, कैपिटलिज्म, ऐंड इकोलाजी ’ का प्रकाशन हुआ । लेखिका को लगातार यह डर...
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पहाड़ों की ठंडी हवा सरीखी कविताएँ :अशोक कुमार के काव्य संग्रह ‘रिक्तियों में पहाड़’ की पुस्तक समीक्षा

समकालीन जनमत
आलोक कुमार मिश्रा हिन्द युग्म प्रकाशन से कवि अशोक कुमार का नया काव्य संग्रह प्रकाशित हुआ है- ‘रिक्तियों में पहाड़।’ संग्रह के नाम में ही...

‘काँस के फूलों ने कहा, जोहार !’: देशज सौंदर्य और स्त्री चेतना के विविध स्वर

समकालीन जनमत
डॉ. जिन्दर सिंह मुंडा ‘काँस के फूलों ने कहा, जोहार !’ डॉ प्रज्ञा गुप्ता का पहला काव्य- संग्रह है । सद्य: प्रकाशित इस काव्य- संग्रह...
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कीर्तिगान : भीड़ हत्या का दस्तावेज़ी यथार्थ

समकालीन जनमत
जितेन्द्र विसारिया यह कहा जाता है कि भीड़ का कोई मस्तिष्क नहीं होता, किंतु जब भीड़ किसी विचार या विचारधारा से संचालित होती है, तब...
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भारत के संविधान का निर्माण

गोपाल प्रधान
2025 में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस से रोहित डे और ओर्नित सानी की किताब ‘असेम्बलिंग इंडिया’ज कनस्टीच्यूशन: ए न्यू डेमोक्रेटिक हिस्ट्री’ का प्रकाशन हुआ । लेखकों...
जनमतपुस्तकसाहित्य-संस्कृति

उर्दू इसी देश की बोली-भाषा है

दुर्गा सिंह
  भाषा का सवाल मानव सभ्यता के इतिहास में हमेशा अहम रहा है। एक तो भाषा में ही कोई संस्कृति ज्यादा स्थायित्व पाती है, दूसरे...
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ज्योति कलश : इतिहास और साहित्य को एक सूत्र में पिरोने की कोशिश

समकालीन जनमत
सुजीत कुमार   ज्योति कलश : ज्योति बा फुले और सावित्रीबाई फुले की क्रांतिकारी जीवन गाथा (संजीव कृत उपन्यास ‘ज्योति कलश’ की पुस्तक समीक्षा) ‘ज्योति...
जनमतपुस्तकसाहित्य-संस्कृति

सामाजिक सरोकारों, संवेदनाओं और काव्य-रसों से सराबोर उपन्यासिका ‘माई रे’  

समकालीन जनमत
आलोक कुमार श्रीवास्तव   उपन्यास को जीवन का महाकाव्य कहा गया है। काव्यशास्त्र कहता है कि जीवन के रस ही कविता में आकर पाठक या...
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रूसी क्रांति का लाल तारा

गोपाल प्रधान
लेफ़्टवर्ड, विजय प्रसाद, रेड स्टार ओवर द थर्ड वर्ल्ड ,...
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स्मिता सिन्हा के कविता संग्रह ‘रूंधे कंठ की अभ्यर्थना’ की पुस्तक समीक्षा

समकालीन जनमत
जावेद आलम ख़ान छलकती पीड़ा को रोककर बेआवाज़ प्रार्थना है ‘रूंधे कंठ की अभ्यर्थना’। स्मिता सिन्हा का यह संग्रह अपने नाम को सार्थक करता है।...
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उषा राय के कविता संग्रह ‘भीमा कोरेगाँव तथा अन्य कविताएँ’ की पुस्तक समीक्षा

समकालीन जनमत
पवन करण ●यह कास का फूल है इसके पत्ते हाथ चीर देते हैं घाव भले ही भर जाये पर कसक रह जाती है बड़ा खुद्दार...
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हृषीकेश सुलभ के उपन्यास ‘दाता पीर’ की पुस्तक समीक्षा

समकालीन जनमत
पवन करण दाता पीर एक सुनार का बेटा था। चाँद के टुकड़े जैसा सुंदर। उसने आवाज़ लगाई कि कुछ गढ़वा लो, कुछ बनवा लो। उसने...
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‘गहन है यह अंधकारा’ की पुस्तक समीक्षा

समकालीन जनमत
पवन करण कोई भी भाषा हो वह दुर्जनों की ज़बान से बोले जाते समय कसमसाती होगी। जो ग़लत और झूठ बोला जा रहा है और...
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पवन करण के कविता संग्रह ‘स्त्री मुग़ल’ की पुस्तक समीक्षा

समकालीन जनमत
अलका बाजपेयी ‘स्त्री मुगल’ ( राधाकृष्ण प्रकाशन, 2023) पवन करण जी की 100 कविताओं का एक संग्रह है जो कि मुग़ल साम्राज्य के भीतर रहने...
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विमल कुमार के काव्य संग्रह ‘मृत्यु की परिभाषा बदल दो’ की पुस्तक समीक्षा

समकालीन जनमत
पवन करण इस दौर में कवि विमल कुमार की सक्रिय रचनात्मक निरंतरता उल्लेखनीय और आश्वस्तिकारी है। ‘सपने में एक औरत’ से बातचीत से बरास्ते ‘जंगल...
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