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अंबेडकर चिन्तन के अनछुए पहलुओं की खोज

 

 लोकतंत्र ने जाति-उन्मूलन नहीं किया है. इसने जाति का आधुनिकीकरण करके इसकी जड़ों को और अधिक मजबूत किया है. इसीलिए यही समय है अंबेडकर को पढ़ने का- अरुंधति रॉय

इसमें कोई संदेह नहीं कि यही समय है अंबेडकर को पढ़ने का क्योंकि भारतीय सामाजिक परिवर्तन और लोकतंत्र  को मुकम्मल बनाने के लिए देश के हर तबके के बुद्धिजीवी और आम नागरिक अंबेडकर को पढ़े जाने की जरुरत को शिद्दत से महसूस कर रहे हैं. आज अंबेडकर अपने समय की तुलना में ज्यादा प्रासंगिक और जरुरी हो गए हैं. लेकिन विडम्बना यह है कि अंबेडकर अभी भी अपने मूल रूप में कम पढ़े जा रहे हैं. अंबेडकर का प्रचलित लोकप्रिय व्यक्तित्व के पीछे उनका वास्तविक क्रांतिकारी व्यक्तित्व छुपा हुआ है या यह भी कहा जा सकता है कि ऐतिहासिक विवरणों में उनको उपेक्षित रखा गया है. ऐसे में लोग अपने अपने हिस्से का अंबेडकर चुनकर लोगों के सामने रखते रहे हैं. पाठ आधारित अध्ययन की बजाय उनकी उक्तियों और कथनों के सहारे या उनके प्रतीक के सहारे ही लोग एक दूसरे को समृद्ध करते रहे हैं. उनके व्यक्तित्व का अभी बड़ा हिस्सा प्रकाश में आना बाकी है. ऐसा न हो पाने के अनेकों कारण हैं जिसमे एक प्रमुख कारण जातिवादी पूर्वाग्रह है. इसके चलते उनके व्यक्तित्व को एक दलित नेता तक ही महदूद कर दिया गया जिससे ज़्यादा के वे हक़दार थे.

इस सन्दर्भ में अरुंधति रॉय ने लिखा, “ इतिहास ने अंबेडकर के साथ बहुत ही निर्दयतापूर्ण व्यवहार किया. इतिहास ने अंबेडकर को पहले कालकोठरी में बंद कर दिया. इतिहास ने अंबेडकर को अछूतों का नायक बना दिया, घेटो-बंद बस्तियों का राजा. अंबेडकर की बौद्धिकता पर इतिहास ने डाका डाला और तेजधार जबान को भोथरी करने की कोशिश की.”[1]  लेकिन सुखद यह है कि उनकी यह छवि अब टूटकर विस्तृत फलक अख्तियार कर रही है. इसका श्रेय भारतीय सामाजिक व्यवस्था में निचले पायदान पर अवस्थित लोगों के शैक्षिक स्तर में आये बदलाव के कारण अंबेडकर के महत्व को नयी पीढ़ी द्वारा व्यापक स्वीकार को दिया जा सकता है. दूसरे गैरदलित सामाजिक पृष्ठभूमि के बुद्धिजीवी भी अंबेडकर के सामाजिक राजनीतिक दर्शन के महत्व को जरुरी मानने लगे हैं. ऐसे में उनका मूल्यांकन एक नए चरण में पहुँच गया है.

अभी हाल ही में विश्वप्रसिद्ध लेखिका अरुंधति रॉय ने ‘एक था डॉक्टर एक था संत’ शीर्षक किताब लिखी है. जिसमे गाँधी और अंबेडकर के बीच की बहसों को केंद्र में रखकर सामाजिक परिवर्तन में इनकी भूमिका का जिक्र किया है.

पाठ आधारित अध्ययन का अपना महत्व होता है. इससे भ्रामक निष्कर्षों से निज़ात पाने में सहूलियत रहती है. अंबेडकर के सन्दर्भ में यह इसलिए भी जरुरी हो जाता है क्योंकि लोकतंत्र में वोट बैंक की जरुरत ने विभिन्न विचारधाराओं वाले दलों के लिए अंबेडकर के ऊपर दावेदारी की आवश्यकता का अहसास करा दिया है. इसलिए अंबेडकर की मूल स्थापनाओं को अपने राजनीतिक हित के अनुसार तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करने की होड़ लग गयी है. इसलिए जरुरी है कि अंबेडकर का वास्तविक व्यक्तित्व लोगों के सामने आये ताकि भ्रम के बादल छटें और अंबेडकर की वास्तविक स्थापनाओं से लोग परिचित हो सकें.

इसी उद्देश्य से डॉ रामायन राम ने ‘डॉ अंबेडकर : चिंतन के बुनियादी सरोकार’ शीर्षक के अंतर्गत नवारुण प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक में अंबेडकर का पाठ आधारित मूल्यांकन प्रस्तुत किया है. पुस्तक की मूल प्रेरणा को लेखक के शब्दों में ही देखिये, “ डॉ अंबेडकर की इस लोकप्रियता और चुनावी राजनीति की विवशता से निकली सर्वप्रियता ही उनके मूल विचारों तथा संदेशों पर पर्दा डाल देती है. वर्चस्व की राजनीति करने वालों के लिए यह ज्यादा सुविधाजनक है कि डॉ अंबेडकर की पहचान एक दलित नेता के रूप में हो. उनके चिंतन के व्यापक आयाम लोगों तक न पहुंचें, यह स्थिति तथाकथित अंबेडकरवादी व दलित बहुजन आधार पर राजनीति करने वालों के लिए भी अनुकूल है.

इनके लिए डॉ अंबेडकर के मूल विचारों से ज्यादा उनकी लोकप्रियता काम की चीज है. उनके लिए डॉ अंबेडकर दलित अस्मिता, दलितों के स्वाभिमान व राजनैतिक सत्ता के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल होते हैं. वर्तमान दौर की राजनीति में जातियों और समुदायों की सत्ता में हिस्सेदारी का पहलू ज्यादा महत्वपूर्ण है. इसलिए वास्तविक बदलाव, सामाजिक रूपांतरण, जाति उन्मूलन और समता-स्वतंत्रता के लिए संघर्ष उनके एजेंडे में नहीं है. लिहाजा डॉ अंबेडकर के मूल सरोकारों की उपेक्षा की गई और उनके विचारों के प्रति एक साजिशपूर्ण चुप्पी अख्तियार की गई. यही वजह है कि लम्बे समय तक डॉ अंबेडकर की प्रासंगिकता पर खुलकर चर्चा नहीं हुई.”[2]

इस किताब में छः लेख शामिल हैं जो डॉ अंबेडकर के मूल पाठों पर आधारित मूल्यांकन हैं.  पहला है – राज्य और अल्पसंख्यक : डॉ अंबेडकर के अधूरे सपनों का दस्तावेज, दूसरा है- भारत में स्त्री मुक्ति और डॉ अंबेडकर, तीसरा है- राष्ट्रवाद और डॉ अंबेडकर, चौथा है- हिन्दुत्व, हिन्दू राष्ट्र और डॉ अंबेडकर और पांचवां है- डॉ अंबेडकर का जाति सम्बन्धी चिंतन: जाति-प्रथा और अस्पृश्यता की समस्या का अध्ययन और छठा अध्याय है- संघ भाजपा का अंबेडकरी पाखण्ड. इस तरह आंबेडकर का पाठ आधारित परिचयात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है. इस लेख में सभी लेकों पर क्रमशः चर्चा की जाएगी.

देशभर में अंबेडकर की सबसे बड़ी पहचान संविधान निर्माता की है. किसी और के लिए यह गर्व की बात हो चाहे न हो लेकिन दलित समाज के लोगों के लिए यह सबसे अधिक गर्व की बात है. इसके माध्यम से वे अपने आप को भारतीय राष्ट्र का हिस्सा होने का दावा प्रस्तुत करते हैं. जबकि विडम्बना यह है कि अभी भी उनके साथ होने वाले भेदभाव उनको अलग-थलग महसूस करने को बाध्य करते रहते हैं. रामायन राम ने ‘राज्य और अल्पसंख्यक’ के अध्ययन के हवाले से यह स्थापित करने का प्रयास किया है कि दरअसल यही वह दस्तावेज़ है जो भारतीय संविधान की आधारशिला है. इसे ही बाबा साहब ने संविधान सभा के सामने प्रस्तुत किया लेकिन इसके बहुत सारे प्रावधानों को संविधान सभा द्वारा अपनाया नहीं गया. इस तरह यह अपने मूल स्वरुप में पूरी तरह लागू नहीं हो सका. इस सन्दर्भ में यह अंबेडकर के अधूरे सपनों का दस्तावेज़ है.

इसी दस्तावेज़ के माध्यम से अंबेडकर ने मांग की थी कि दलितों को अल्पसंख्यक का दर्जा दिया जाय जिससे दलित समुदाय के हितों की रक्षा की जा सके. चूंकि अंबेडकर को दलितों के नेता के रूप में ही महदूद करने की कोशिश की गयी इसलिए इस दस्तावेज़ को भी केवल दलित हितों की रक्षा करने वाले दस्तावेज़ के रूप में प्रचारित किया गया, अव्वल तो यह कि इसकी उपेक्षा ही की गयी. लेकिन पुस्तक में यह सिद्ध किया गया है कि यह दस्तावेज़ कृषि और उद्योगों के भीतर व्यापक सरंचनात्मक बदलावों को भी प्रस्तावित करता है.

इन प्रस्तावों को पढ़कर लगता है कि अगर अपनी सम्पूर्णता में यह लागू हो जाता तो राज्य सामाजिक और आर्थिक सुधार का बड़ा माध्यम बन जाता लेकिन ऐसा हुआ नहीं. इसीलिए रामायन राम कहते हैं, “ ये वो प्रस्ताव हैं जो उद्योग और कृषि जैसे उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व के बजाय सार्वजानिक मालिकाने और व सामूहिक श्रम के सिद्धांत पर आधारित हैं. निश्चित तौर पर अगर भारतीय राष्ट्र-राज्य खुद को इन सिद्धांतों को लागू करने में समर्थ पाता तो यह न सिर्फ भारत बल्कि समूची दुनिया के जनतांत्रिक इतिहास की सर्वाधिक क्रांतिकारी घटना होती, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया.”[3] इसी दस्तावेज़ के आधार पर रामायन राम यह कहते हैं कि यह दरअसल राजकीय समाजवाद की अवधारणा का दस्तावेज़ है. लेकिन अंबेडकर की इसी अवधारणा को ध्यान में रखकर अरुंधति रॉय ने निष्कर्ष निकाला कि, “अंबेडकर की न्याय की अपनी परिकल्पना के कारण, उनकी नजर गाँव से हटकर शहर की ओर गई, शहरीकरण की ओर, आधुनिकता और उद्योगीकरण- बड़े शहर, बड़े बांध, बड़ी सिंचाई परियोजनाएँ. विडम्बना यह है कि यही ‘विकास’ का वह एक आदर्श मॉडल है जिसे हजारों लोग अन्याय के साथ जोड़कर देखते हैं, एक ऐसा मॉडल जो पर्यावरण को बर्बाद करता है. एक ऐसा विकास मॉडल जो खनन, बांधों और अन्य बड़ी आधारभूत परियोजनाओं के लिए जबरन दसियों लाख लोगों को उनके गांवों और घरों से विस्थापित करता है.”[4] ऐसे ही निष्कर्षों से उत्पन्न भ्रम के निवारण हेतु यह पुस्तक कारगर है. क्योंकि अंबेडकर जब अपने राजकीय समाजवाद की अवधारणा में निजी स्वामित्व को खत्म करके सार्वजनिक मालिकाना और सामूहिक श्रम पर आधारित कृषि व्यवस्था की बात करते हैं तो यह कैसे संभव है कि वह निजीकरण की वकालत करते. हिन्दू धर्म के भीतर व्याप्त गैरबराबरी और भेदभाव की जड़ वह निजी स्वामित्व को भी मानते हैं. दरअसल इसी तरह के निष्कर्षों के चलते सरकारें भी श्रम सुधार और नयी आर्थिक नीतियों के वैधीकरण के लिए अंबेडकर का सहारा लेने लगती हैं. आश्चर्य है कि अरुंधति ‘राज्य और अल्पसंख्यक’ की मूल भावना को समझने से चूक जाती हैं. “जबकि इसके विपरीत ‘राज्य और अल्पसंख्यक’ में अभिव्यक्त डॉ अंबेडकर के विचार जनता के वास्तविक जनवादी अधिकारों का पक्षपोषण करते हैं.”[5]

रामायन राम ने अपनी पुस्तक के दूसरे अध्याय में ‘भारत में स्त्री मुक्ति और डॉ अंबेडकर’ के अंतर्गत यह दिखाने का प्रयास किया है कि डॉ अंबेडकर ने स्त्री पराधीनता और जाति बंधन के आपसी अंतर्संबंध को खोजा और यह स्थापित किया कि स्त्री पराधीनता का एक बड़ा कारण जाति बंधन है. जैसे जैसे वर्णव्यवस्था मजबूत होती गयी स्त्रियाँ दास बनती चली गयीं. नहीं तो वैदिक धर्म में वर्णव्यवस्था लचीली थी और वर्णअंतरण संभव था. यहाँ तक कि शूद्रों को वेदाध्यन की छूट प्राप्त थी और वे ऋषि पद भी प्राप्त कर सकते थे. बाबा साहब के द्वारा अथर्ववेद के अध्ययन के हवाले से यह भी बताया गया है कि स्त्रियाँ भी वेदों का अध्ययन कर सकती थीं और बहस इत्यादि में भाग ले सकती थीं. इस स्थिति में परिवर्तन मनु के बाद आता है जब वैदिक धर्म में ब्राह्मण वर्चस्व बढ़ जाता है. लेकिन बौद्ध धर्म के उदय के साथ ही शूद्रों और स्त्रियों की स्थितियों में सुधार होता है. क्योंकि यह समावेशी सामाजिक संबंधों को स्थापित करने में सफल होता है.

इस तरह बौद्ध धर्म सनातन धर्म के लिए चुनौती बनकर सामने आता है. वैदिक काल में शूद्रों को वेद अध्ययन करने और ऋषि पद प्राप्त करने के सिद्धांत से एक बात तो स्पष्ट है कि वैदिक काल में शूद्र नामक सामाजिक श्रेणी मौजूद थी. इसका अर्थ यह हुआ कि शूद्रों को वेद अध्ययन की छूट का कोई शर्तिया आधार रहा होगा. लेकिन यह व्यापक और सहज बात नहीं रही होगी. मौर्य साम्राज्य में बौद्ध धर्म का बोलबाला था इसलिए ब्राहमण धर्म नेपथ्य में था लेकिन पुष्यमित्र शुंग के शासन काल में उसके नेतृत्व में बौद्ध धर्म का नाश किया गया और नयी संहिता के रूप में ‘मनुस्मृति’ को लागू किया गया. यही वह बिंदु है जब शूद्रों को पराधीनता का दूसरा चरण देखना पड़ता है. इसी काल में स्त्रियों के लिए पराधीनता के नए कानून बने. जिसका उद्देश्य जातिव्यवस्था को मजबूत बनाये रखना था. इस अध्याय में यह भी अंबेडकर के अध्ययन के हवाले से दिखाया गया है कि बौद्धपूर्व काल में हिन्दू स्त्रियों को बहुत सारी आजादी हासिल थी. लेकिन सजातीय विवाह पद्धति की अनिवार्यता ने वर्ण/वर्ग को जाति में रूपांतरित कर दिया. इस तरह स्त्री की कुछ हासिल आजादी भी जाती रही और वह गुलाम हो गयी. स्त्री पराधीनता के इस इतिहास की सीमा यह है कि इससे पोंगापंथियों और दक्षिणपंथियों द्वारा वैदिक काल के ‘स्वर्णिम’ सामाजिक व्यवस्था के दावे को वैधता मिलती जान पड़ती है. इस गुत्थी को कैसे सुलझाया जा सकता है. ऐसे में व्याख्या के सूत्रों की प्रमाणिकता का सवाल उठना स्वाभाविक है.

कुछ भी हो लेकिन यह तो तय है कि जाति व्यवस्था की उत्पत्ति की जड़ तलाशने की प्रक्रिया में ही ये सभी निष्कर्ष प्राप्त हुए हैं. यही कारण है कि अंबेडकर इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि हिन्दू महिलाओं को आजाद कराये बिना जाति व्यवस्था की अमानवीय संरचना टूटने वाली नहीं है. इसीलिए वे हिन्दू कोड बिल तैयार करते हैं और हिन्दू महिलाओं को आधुनिक नागरिक की श्रेणी में रखने के लिए संघर्ष करते हैं. अंततः वे अपने इस मकसद में कामयाब नहीं होते और उनको मंत्री पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा. पुस्तक में रामायन इस बात पर जोर देते हैं कि स्त्री मुक्ति के प्रयासों के लिए बाबा साहब को वह श्रेय नहीं दिया जाता है जिसके वे हक़दार थे. साथ ही यह भी कहते हैं कि, “पितृसत्ता से मुकम्मल मुक्ति के लिए जरुरी है मनुवादी व्यवस्था का उन्मूलन.”

इन दिनों राष्ट्रवाद का विमर्श चरम पर है ऐसे में रामायन राम ने ‘राष्ट्रवाद और डॉ अंबेडकर’ शीर्षक अध्याय में बाबा साहब की राष्ट्र की अवधारणा पर विस्तार से चर्चा की है. इसमें यह दिखाया गया है कि अंबेडकर के लिए राष्ट्र का अर्थ वही नहीं था जो उस समय के तमाम दूसरे नेताओं के लिए था. उनके लिए राष्ट्र का मतलब जाति व्यवस्था का समूल नाश से प्राप्त देश था. पुस्तक में दिखाया गया है कि अंबेडकर के राष्ट्र की अवधारणा भगत सिंह के राष्ट्र की अवधारणा से काफी मेल खाती है. इस प्रकार अंबेडकर और भगत सिंह के राष्ट्रवाद का सरोकार एक ही है. ‘दोनों ही भारत की सामाजिक, आर्थिक, सांप्रदायिक, क्षेत्रीय, नस्लगत, और जेंडर आधारित असमानताओं और विषमताओं को हल करने की सचेत और सोद्देश्य परियोजना के रूप में ही राष्ट्र निर्माण को परिभाषित कर रहे थे.’[6]

अंबेडकर सावरकर और जिन्ना दोनों के राष्ट्रवाद की परिकल्पना की हकीकत समझ रहे थे और उसके उद्देश्यों को उजागर किया. अंबेडकर ने इस बात की पहचान कर ली कि सावरकर के राष्ट्रवाद में ‘मुसलमानों, ईसाईयों और कम्युनिष्टों’ को दुश्मन के रूप में चिन्हित किया. इसी को आगे चिन्हित करते हुए रामायन राम ने कहा कि इस सूची में दलितों और आदिवासियों को भी शामिल कर दिया गया है. इस तरह सावरकर की राष्ट्र की विस्तृत अवधारणा मुसलमानों, ईसाईयों, कम्युनिस्टों, दलितों और आदिवासियों के ख़िलाफ़ है. इसी आलोक में आज के दौर के राष्ट्रवाद के विमर्श की हकीकत को समझा जा सकता है. विडम्बना यह है कि पोंगापंथी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के विमर्श के अगुआ प्रतीक के रूप में अंबेडकर को आगे किया जा रहा है और संविधान की बजाय मनुस्मृति को हिन्दू राष्ट्र की आधार संहिता ग्रन्थ घोषित करने का प्रयास किया जा रहा है. जीवन भर जिस संहिता के ख़िलाफ़ अम्बेडकर संघर्ष करते रहे उसको बदलकर आधुनिक राष्ट्र की नींव संविधान को बनाने का संघर्ष किया उसके विपरीत भाजपा जैसे मनुवादी दल पहले तो उनको राष्ट्रविरोधी साबित करते हैं और बाद में दलित मत हासिल कर लेने के उद्देश्य से उनकी पूरी विचारधारा को भोथरा बनाकर उनका ‘अपहरण’ कर लेना चाहते हैं. हिन्दू राष्ट्र के समर्थक के रूप में उनकी छवि को गढ़ना चाहते हैं.

रामायन राम अपनी पुस्तक के ‘हिंदुत्व, हिन्दू राष्ट्र और डॉ अंबेडकर’ शीर्षक अध्याय में सबको आगाह करते हैं कि संघ डॉ अंबेडकर का पुनर्पाठ करके अनर्गल तथ्यों को लोगों के सामने पेश करके दलितों और आदिवासियों में पैठ करने की कोशिश कर रहा है और उनको हिन्दू आईकन बनाना चाहता है. जबकि अंबेडकर ने अपने अध्ययनों में यह सिद्ध किया कि दलितों और आदिवासियों की गुलामी का कारण हिन्दू धर्म के वर्चस्ववादी दर्शन में निहित है. वह हिंदुत्व की राजनीति और हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा के ख़िलाफ़ थे बल्कि वे तो हिन्दू धर्म को ‘धर्म’ मानने को तैयार ही नहीं थे. वह मानते थे कि असमानता और भेदभाव हिन्दू धर्म की आत्मा है.

रामायन आगे इस सन्दर्भ में लिखते हैं, “ आज के राजनैतिक –सांस्कृतिक परिदृश्य में जब हिदुत्व को जीवनशैली और भारत में रहने वाले सभी समुदायों व नागरिकों को हिन्दू कहने का प्रपंच हिंदुत्व के नेताओं की ओर से फैलाया जा रहा है, तब बाबा साहब अंबेडकर के इस विश्लेषण के आगे हिंदुत्व की ‘तत्व मीमांसा’ कहीं नहीं ठहरती. उन्होंने हिन्दू धर्म को मानवता की कसौटी पर कसा और हिन्दू धर्म को लोकतान्त्रिक मानवतावादी जीवन के लिए हर तरह से अनुपयुक्त सिद्ध किया.”[7] इस तरह यह पुस्तक हिंदुत्व की राजनीति द्वारा अंबेडकर की पूरी विचार प्रक्रिया को उलटा देने और उनको हिन्दू धर्म की विचारधारा के अनुकूल बदल डालने की साजिश का भंडाफोड़ करती है.

डॉ भीमराव अंबेडकर अपने द्वारा स्थापित स्थापनाओं को अकाट्य नहीं मानते बल्कि एक शोधार्थी की सीमा को स्वीकार करते हुए उसपर पुनर्विचार की गुंजाईश को नकारते नहीं हैं. इस तरह वह हठधर्मी नहीं हैं. बल्कि यहाँ तक भी घोषित करते हैं कि जाति-प्रथा के सन्दर्भ में प्रतिपादित उनके सिद्धांत अगर आधारहीन साबित होते हैं तो वे उसको तिलांजलि भी दे देंगे. यह उनके खुले ह्रदय होने का प्रमाण है. इसी स्वाभाव के साथ उन्होंने जाति-व्यवस्था की उत्पत्ति का सिद्धांत प्रतिपादित किया और यह जानने का प्रयास किया कि आखिर भारत में जाति-प्रथा का उदय कैसे हुआ. जाति-प्रथा के रहस्य के उद्घाटन की प्रक्रिया में डॉ अंबेडकर ने यह पाया कि भारत में सती प्रथा और बाल विवाह जैसी सामाजिक समस्याओं की जड़ में भी यही जाति की संरचना ही विद्यमान है.

रामायन राम की पुस्तक जिस बहुत जरुरी मुद्दे को बहसतलब ढंग से सामने रखती है वह है आर्य-अनार्य का बहुप्रचलित विमर्श जिसके तहत प्रायः यह माना जाता है कि आर्य बाहरी और अनार्य मूल भारतीय हैं. सबसे पहले तो लेखक के द्वारा यह आरोप लगाया जाता है कि “ विडम्बना यह है कि उस समय भी भारत में जाति-प्रथा के सम्बन्ध में अध्ययन करने वाले इतिहासकारों ने डॉ अंबेडकर के इन विचारों का संज्ञान नहीं लिया और आज भी अंबेडकर की थीसिस का परीक्षण तथा सन्दर्भ ग्रहण करने की कोई कोशिश नहीं हो रही है.

अस्मितावादी विचार प्रणाली ने मूल निवासीवाद और आर्य आक्रमणकारी सिद्धांत के शोर-शराबे में इन विचारों पर धूल की परत बिछा दी है.” ‘शूद्र कौन थे’ के अंबेडकर के अध्ययन के हवाले से रामायन ने यह सिद्ध किया है कि “अंबेडकर ने शूद्र जातियों को अनार्य तथा मूलनिवासी मानने से इंकार किया है. उनका साफ मानना है कि शूद्र कोई और नहीं बल्कि आर्य संस्कृति का हिस्सा हैं. जिनका आर्यों से कोई बड़ा संघर्ष नहीं हुआ, बल्कि वे प्रारंभिक आर्य संस्कृति में महत्वपूर्ण स्थान पर थे. अपने इस तथ्य को प्रमाणित करने के लिए उन्होंने अत्यंत साहसपूर्ण तर्क प्रणाली अपनाई और हिन्दू धर्म ग्रन्थों के बीच के विरोधाभासों को सामने रखते हुए अपनी बात को प्रमाणित किया.

आर्यों के बाह्य आक्रमणकारी होने तथा एक श्रेष्ठ नस्ल व जाति के होने के सिद्धांत को अंबेडकर एक साम्राज्यवादी परियोजना मानते हैं.’ यहाँ की उच्च जातियों ने अब्राह्मणों के ऊपर अपना प्रभुत्व बनाये रखने के लिए स्वीकार कर लिया. रामायन का कहना है कि जानबूझकर इस तथ्य पर चुप्पी साध ली गयी है. जाहिर है कि वर्चस्ववादियों और अस्मिता की राजनीति करने वालों को यह प्रसंग असहज कर सकता है. इसी मायने में यह पुस्तक बहुतेरे ऐसे प्रसंगों और विश्लेषणों को सामने रखती है जिसके आत्मसात करने से भारतीय राजनीति और सामाजिक संरचना की व्याख्या की दिशा बदल सकती है. यही इस समाज के हित में होगा कि ऐसे प्रसंगों को सामने लाकर खुलकर उनपर बातें हों तभी हम अंबेडकर के सपनों के साथ न्याय कर सकते हैं जैसा कि इस पुस्तक में किया गया है.

अंबेडकर के सच्चे व्यक्तित्व की खोज की प्रक्रिया में यह एक गंभीर लेकिन छोटा प्रयास है. अभी अंबेडकर को और खोजा जाना बाकी है. अभी तो अर्थशास्त्री अंबेडकर से लेकर मानववैज्ञानिक अंबेडकर को जनता के सामने लाना बाकी है. यह पुस्तक अंबेडकर के अनछुए पहलुओं को सामने रखती है और उनपर संवाद की मांग करती है. यह किताब शुरुआती पाठकों के लिए प्रवेशिका का काम कर सकती है.

सन्दर्भ :

  1. अरुंधति रॉय : एक था डाक्टर एक था संत (अनुवाद : अनिल यादव और रतन लाल), वाणी प्रकाशन , दिल्ली , 2019, पृष्ठ 39
  2. डॉ. रामायन राम: डॉ. अंबेडकर: चिन्तन के बुनियादी सरोकार, नवारुण, ग़ाज़ियाबाद, 2019, भूमिका
  3. डॉ. रामायन राम: डॉ. अंबेडकर: चिन्तन के बुनियादी सरोकार, नवारुण, ग़ाज़ियाबाद, 2019, पृष्ठ 16
  4. अरुंधति रॉय : एक था डाक्टर एक था संत (अनुवाद : अनिल यादव और रतन लाल), वाणी प्रकाशन , दिल्ली , 2019, पृष्ठ 45
  5. डॉ. रामायन राम: डॉ. अंबेडकर: चिन्तन के बुनियादी सरोकार, नवारुण, ग़ाज़ियाबाद, 2019, पृष्ठ 21
  6. डॉ. रामायन राम: डॉ. अंबेडकर: चिन्तन के बुनियादी सरोकार, नवारुण, ग़ाज़ियाबाद, 2019, पृष्ठ 31
  7. डॉ. रामायन राम: डॉ. अंबेडकर: चिन्तन के बुनियादी सरोकार, नवारुण, ग़ाज़ियाबाद, 2019, पृष्ठ 50

( युवा आलोचक और संस्कृतिकर्मी राम नरेश राम की पढ़ाई इलाहाबाद , वर्धा और दिल्ली विश्वविद्यालय से हुई. इनकी अबतक तीन किताबें प्रकाशित हैं जिनके नाम इस तरह हैं – दलित स्त्रीवाद की आत्मकथात्मक अभिव्यक्ति, सत्ता विमर्श और आत्मकथा (संपादित) और दलित राजनीति का समकालीन विमर्श (संपादित). दिल्ली विश्वविद्यालय के जर्मनिक और रोमांस विभाग में अध्यापन करने के साथ –साथ राम नरेश राम जन संस्कृति मंच की दिल्ली-एनसीआर इकाई के सचिव भी हैं )

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