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चार कविता संग्रह का लोकार्पण, कविता पाठ और परिचर्चा

लखनऊ। जन संस्कृति मंच (जसम) की ओर से 11 अक्टूबर को  ‘चार कवि – चार किताबें’ के अंतर्गत शैलेश पंडित, उमेश पंकज, विमल किशोर तथा कौशल किशोर के हाल में प्रकाशित कविता की किताबों का कैफ़ी आज़मी एकेडमी के सभागार में लोकार्पण हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता फैजाबाद से आए कवि, कथाकार व आलोचक स्वप्निल श्रीवास्तव ने की।

उन्होंने कहा कि ये चारो समकालीन कवि हैं तथा अपने समय की विसंगतियों को रचते हैं। इनमें हमारे समय का दुख दर्द, हंसी-खुशी की अभिव्यक्ति हुई है। वे समुदाय कविता में आते हैं जो विकास के दौर में आज भी हाशिए पर हैं। इनमें जहां प्रतिरोध का स्वर है, वहीं परिवर्तन की उम्मीद भी है। भले ही इनके विषय में भिन्नता ना हो और एक समय में होने के कारण ऐसा संभव है लेकिन इनके कहन की शैली, भाषा, बिम्ब-विधान, प्रतीक और अनुभव अपने हैं।

इस मौके पर कवियों ने अपने संग्रह से चुनिंदा कविताओं का पाठ भी किया। विमल किशोर अपनी कविता में कहती हैं ‘कविता! तुम जीवन की उष्मा हो /चांदनी की चमक हो /संवेदनाओं की अभिव्यक्त हो/ शब्दों को पिरोकर /उसी से बनती है तुम्हारी काया’। वहीं कौशल किशोर इसे विस्तार देते हैं ‘चाय बनाने की तरह कविता नहीं बनती/जीवन में कब, किस मोड़ पर /किससे प्रेम हो जाए, नहीं पता!/वैसे कविता हो जाती है /शब्दों से वह संवर जाती है।’

क्या है हमारे समय का सच ? शैलेश पंडित कहते हैं ”एक तरफ पूरा का पूरा निजाम है/ दूसरी ओर सच के रखवाले हैं’। ऐसे में कवि का यह कथन उसकी ओर से पहल है – ‘चुनौतियां हैं अथाह/ ऐसी आंधी में परचम उठाने/उसे लहराने/तराना गाने के लिए ….’। उमेश पंकज सच तक पहुंचना और उसे सामने ले आने को अपना नैतिक दायित्व मानते हैं। उनकी समझ है कि ‘सच सुनने वाले लोग कम जरूर हैं /मगर एक सिरे से गायब नहीं हैं ‘। और ‘सुनने के लिए सिर्फ नहीं जन्मा हूँ /बोलूंगा भी /जहाँ जितनी जरूररत होगी’।

दूसरे सत्र में कविताओं पर सघन चर्चा हुई। शुरूआत युवा आलोचक आशीष सिंह ने की। उमेश पंकज के संग्रह ‘ मिट्टी हैं हम’ की कविताओं पर विचार रखते हुए कहा कि इनकी कविता का कैनवास महारानी से लेकर महाराज तक फैला हुआ है। ये सामाजिक द्वंद को उकेरते हैं और सत्ता के दमनकारी स्वरूप को सामने लाते हैं। यहां प्रेम है तो प्रतिरोध और संघर्ष भी है। बहुत ऐसी चीजें हैं जो प्रत्यक्ष रूप से नहीं दिखती हैं, उसे भी उमेश पंकज अपनी कविता का विषय बनाते हैं।

आशीष सिंह ने समकालीन कविता पर भी टिप्पणी की।इस संदर्भ में कहा कि घटनाओं को दर्ज करना, सूचनाएं देना कविता का काम नहीं है। कविता में आज कहानी लिखी जा रही है। क्या यह उसकी सीमा है? इस संबंध में त्रिलोचन को उद्धृत करते हुए उन्होंने ध्वनि ग्राहक होने की बात कही। कविता का काम समय की ध्वनि को पकड़ना और व्यक्त करना है। क्या आज की कविता इस भूमिका में है?

विमल किशोर के संग्रह ‘फिर खिल उठेंगे’ पर बोलते हुए कवि -आलोचक डॉ उषा राय ने कहा कि यह जरूरी नहीं है कि कविता हमेशा महान ही काम करे, कभी -कभी कविता इंतजार भी करती है। इनकी कविताएँ इंतजार कर रही हैं, फिर से खिल उठने के लिए। इन कविताओं में तीन प्रकार के स्वर दिखाई देते हैं। एक स्त्री केंद्रित, दूसरी बगावती तथा तीसरी प्रकृति व करोना आपदा से सम्बन्धित। स्त्री केंद्रित कविताओं में वे ब्याहता लड़की, श्रमिक स्त्री तथा स्त्री हिंसा से सम्बन्धित समस्याएं उठाती हैं। वहीं बगावती कविताओं में राष्ट्रवाद, फासीवाद, बाजारवाद एवं लिंचिंग तन्त्र पर निशाना साधती हैं। भ्रष्टाचार की पोल खोलती हैं। कविताओं में एक तरफ मानवीय सम्बन्धों की गरमाहट है तो दूसरी तरफ प्रेम व भरोसे की कविताएँ हैं। इस प्रकार वे अपने समय को दर्ज करती हैं और हस्तक्षेप करती हैं।

प्रो सूरज बहादुर थापा ने कौशल किशोर के संग्रह ‘दुनिया की सबसे सुंदर कविता’ पर बोलते हुए कहा कि यह स्त्री जीवन के विविध पहलुओं पर केंद्रित है। तीन चार कविताएं सत्ता विमर्श की भी हैं। जूता, बेलन जैसी निर्जीव ‘चीजें’ हैं जिनमें मानव संसर्ग में सजीवता आती है। इनकी प्रतिरोध की भूमिका है। कौशल जी ने पत्नी को लेकर अनेक कविताएं लिखी हैं। ऐसी कविताएं लिखना दु:साहस का काम है।

थापा जी ने कहा कि कविताओं में एक्टिविस्ट की गहरी संवेदनशीलता है। इनमें काव्य-सृजन से अधिक कहने और रचने की चिंता है। यहां स्त्री को लेकर पुरुष प्रवृत्तियों के विरुद्ध लोकतांत्रिक संघर्ष है। संग्रह में ऐसी तीन तरह की कविताएं हैं । एक – प्रेम कविताएं हैं। युवा दोनों का प्रेम है जिसमें खिलंदड़पन है जो वयस्क होकर परिपक्वता पर पहुंचता है। यहां प्रेम जीवन की यात्रा है। दूसरे, मां जैसे चरित्र पर कविताएं हैं। कौशल जी के यहां मां का उपेक्षित जीवन, बलिदानी चरित्र तथा उसका संघर्ष है। तीसरे, सीमा आजाद और नगीना जैसे पर कविताएं हैं जिनके लोकतांत्रिक व्यक्तित्व व सामाजिक संघर्ष कविता में व्यक्त हुआ है।

शैलेश पंडित के कविता संग्रह ‘अकेले आदमी की लौ’ पर बोलते हुए आलोचक प्रो नलिन रंजन सिंह ने कहा कि शैलेश जी की कविताओं में कहन और कथा रस की गहरी अभिव्यक्ति है। संग्रह कविताएं आज के समय में जी रहे आम आदमी की कविताएं हैं जो आज के निजाम को चुनौती देती हैं, उससे टकराती हैं। पिछले 12 वर्षों में चुनाव के समय पैदा हो जाने वाले ‘घुसपैठिए’ पर उनकी धारदार रचना है। इसी तरह ‘दिल्ली में बैठकर’ शीर्षक से मणिपुर पर कविता है। हमारे प्रधानमंत्री मणिपुर नहीं गए लेकिन दिल्ली में बैठकर मणिपुर का नया रूप-रंग देने में लगे हैं । ‘प्यार के बहेलिये’ युद्धरत देश में उम्मीद की कविता है जो गजा पर लिखी हुई है। तानाशाह जितना भी कोशिश कर ले यह बताती है कि वहां आदमी उम्मीद का दामन नहीं छोड़ता।

प्रो नलिन रंजन सिंह ने कहा कि संग्रह में कविता के कई शेड्स हैं। ‘जलते हुए नेपाल’ को देखकर गांव में आग की उधारी के साथ एक ओर जहां लोकरंग है, वहीं दूसरी ओर उस आग का बहुत गहरे तक समकालीन देश कल से जुड़ाव है। शैलेश जी ने व्यक्ति केंद्रित कविताएं लिखी हैं, स्थान केंद्रित कविताएं हैं। लेकिन रचनाकार लिखते समय निर्वैयक्तिक रहा है। अपने गांव पर, इलाहाबाद, पोरबंदर, पूर्वोत्तर और झारखंड पर कविताएं हैं तो नागार्जुन, कबीर, मौलवी अली कदर, नेहा सिंह राठौर और कवि मित्र राकेश ओझा पर भी।

कार्यक्रम का संचालन जसम लखनऊ के सचिव फरजाना मेहंदी ने किया और धन्यवाद ज्ञापित किया सईदा सायरा जी ने। इस मौके पर विनोद दास (मुंबई), डॉक्टर फिदा हुसैन (बाराबंकी) भगवान स्वरूप कटियार, राजेंद्र वर्मा, वीरेंद्र सारंग, नैय्यर उमर, परवेज़ मल्लिक जादा, बंधु कुशवर्ती, के के शुक्ला, इरा श्रीवास्तव, शालिनी सिंह, शालिनी श्रीवास्तव, डॉ अवन्तिका सिंह, प्रो इशरत नाहिद, अलका पांडे, रेनू शुक्ला, शैला खन्ना, नगीना निशा, सीमा सिंह, डॉ कविता पंडित, शहजाद रिजवी, रिजवान अली, अनिल कुमार श्रीवास्तव, हाफिज किदवई, धर्मेंद्र कुमार, सुशील कनौजिया, शहंशाह हुसैन, भूपेंद्र कुमार अस्थाना, गिरीश कुमार वर्मा, अशोक कुमार वर्मा, सुहेल वहीद, राकेश ओझा, अखिलेश श्रीवास्तव चमन, प्रदीप श्रीवास्तव, डॉ बेअदब लखनवी, डॉ हेमंत कुमार, पार्थ पंडित, अली सागर, रत्नम शुक्ला, सूचित माथुर, शांतम निधि, संविधा, राकेश कुमार सैनी, प्रकाश गोधवानी, मनोरंजन द्विवेदी, अजय तोमर, डा अजीत प्रियदर्शी, डा सत्यवान, आदि सहित बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमी और कविता प्रेमी श्रोताओं की उपस्थित रही।

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