मौलाना मुमताज़ अली की किताब हुकूक़-उल-निस्वाँ उन्नीसवीं सदी के आख़िरी सालों में प्रकाशित हुईं उन महत्वपूर्ण किताबों में है, जिसने औरत के सवाल को महज़ घरेलू सुधार या नैतिकता की बहस तक सीमित रखने के बजाय उसके इंसानी और समाजी अधिकारों के सवाल के रूप में सामने रखा। 1898 में प्रकाशित यह किताब शिक्षा, निकाह, बहुविवाह, तलाक़, विरासत, पर्दा और स्त्री-पुरुष संबंधों जैसे कई सवालों पर उस दौर की प्रचलित धारणाओं से बहस करती है।
किताब के पहले भाग में मुमताज़ अली का मूल सवाल मर्दों की कथित श्रेष्ठता से जुड़ा है कि आख़िर किन आधारों पर मर्द को औरत से बेहतर, उसका हाकिम और उसके अधिकारों का स्वाभाविक मालिक मान लिया गया ? वे इस दावे के समाजी, बौद्धिक और धार्मिक आधारों की एक-एक करके पड़ताल करते हैं।
हुकूक़-उल-निस्वाँ का यह पहला भाग सिर्फ़ मर्दों की श्रेष्ठता के दावे का खंडन नहीं है, बल्कि उस पूरी मानसिकता की आलोचना है जो जैविक या समाजी फ़र्क़ को इंसानी दर्जे और अधिकारों की असमानता में बदल देती है। जब औरतों की शिक्षा, उनके वैवाहिक अधिकारों, आम ज़िन्दगी में उनकी भागीदारी और मर्दों के बराबर उनके इंसानी दर्जे पर बात करना ही समाजी प्रतिरोध को आमंत्रित करने के लिए काफी था, उस वक़्त मुमताज़ अली ने मर्दों की श्रेष्ठता के दावों को एक व्यापक वैचारिक चुनौती दी। वे उस पूरी मानसिकता को कटघरे में खड़ा करते हैं जिसके भीतर औरत को मर्द के मुकाबले कमतर इंसान मानने की धारणा पैदा होती है।
वे लिखते हैं: “मर्द और औरत, दोनों एक ही तरह के इंसान हैं। इंसान होने के नाते दोनों में से कोई भी दूसरे से बड़ा या बेहतर नहीं है। हाँ, मर्द और औरत के बीच कुदरत ने जो कुछ फर्क रखा है, उसकी वजह से उनकी ज़िम्मेदारियों और ज़िन्दगी जीने के तरीक़े में कुछ फर्क हो सकता है। लेकिन इसके अलावा मर्द और औरत के बीच जो भी फर्क किए जाते हैं या मर्द को औरत से बेहतर साबित करने के लिए जो दलीलें दी जाती हैं, वे असल में सिर्फ़ मर्द और औरत होने के फर्क पर टिकी होती हैं। ऐसे फर्क अपने आप में कोई पक्की या भरोसेमंद वजह नहीं हैं कि एक को दूसरे से बेहतर माना जाए।”
आज की स्त्रीवादी बहसों में भी जैविक फ़र्क़ और समाजी असमानता के बीच यह फर्क केंद्रीय महत्व रखता है। मुमताज़ अली इसी व्यवस्था के बारे में आगे लिखते हैं: ” हमारे समाज के बहुत से तौर-तरीके इस गलत सोच पर टिके हुए हैं कि मर्द मालिक और औरतें उनके अधीन हैं। जैसे औरतें मर्दों के आराम के लिए ही पैदा की गई हों। इसी सोच की वजह से मर्द औरतों पर लगभग, वैसे ही हक़ समझते हैं, जैसे अपनी दूसरी चीज़ों पर समझते हैं। उनके मुताबिक़ औरतों के हक़ मर्दों के हक़ के बराबर नहीं हो सकते। अगर मर्द अपनी इस गलत और बुरी सोच को सिर्फ़ अपना पक्षपात और स्वार्थ मानते और इसे सही साबित करने के लिए कोई दलील पेश न करते, तो भी हम किसी तरह इसे समझ सकते थे। लेकिन परेशानी की बात यह है कि वे अपनी इस गलत सोच को इंसाफ़ और अक़्ल की कसौटी पर भी सही साबित करने की कोशिश करते हैं। इतना ही नहीं, वे इसे अल्लाह की मर्ज़ी भी बताते हैं। इसलिए इस तहरीर का मक़सद सिर्फ़ इतना है कि इन ख़यालों की गलती सामने लाई जाए और बताया जाए कि ये बातें कितनी बेबुनियाद और बेतुकी हैं।”
उनकी नज़र में मर्दों की श्रेष्ठता का दावा जितना समाजी है, उतना ही धार्मिक व्याख्याओं के ज़रिये भी मजबूत किया गया है। इसलिए वे मर्दों की श्रेष्ठता के पक्ष में दिए जाने वाले तर्कों को क्रमबद्ध ढंग से सामने रखते हैं। शारीरिक शक्ति, बुद्धि, नबूवत, कुरान की आयतें, गवाही, विरासत, बहुविवाह, आदम की पैदाइश और जन्नत में हूरों का वादा, इन सबको वे एक व्यापक बहस के हिस्से के रूप में देखते हैं। इससे साफ़ होता है कि औरतों की अधीनता किसी एक मज़हबी आदेश या समाजी प्रथा का नतीजा नहीं, बल्कि परस्पर जुड़ी हुई मान्यताओं का एक पूरा ढाँचा है।
मर्दों की श्रेष्ठता के पक्ष में सबसे आम तर्क उनकी जिस्मानी ताकत का है। मुमताज़ अली इस तर्क की बुनियाद पर ही सवाल उठाते हैं। वे लिखते हैं: “हमने मान लिया कि मर्दों में औरतों के मुकाबले जिस्मानी ताक़त ज़्यादा होती है। लेकिन इससे यह कैसे साबित हो जाता है कि जिस्मानी ताक़त ऐसी कोई ख़ास चीज़ है, जिसकी वजह से मर्द इंसान होने के नाते औरतों से ऊँचे या बेहतर हो जाते हैं ? यह तो सीधी-सी बात है कि जिन लोगों के जिस्म में ज़्यादा ताक़त है, उन्हें ज़्यादा मेहनत और ताक़त वाले काम दिए जा सकते हैं और जिनकी जिस्मानी ताक़त कम है, उनके लिए आसान काम रखे जा सकते हैं। आख़िर किसने कहा है कि मेहनत-मशक़्क़त और मुश्किल काम मर्दों को नही करने चाहिए? मर्द ख़ुशी से मेहनत करें, पहाड़ काटें, पेड़ काटें, इंसानों के गले काटें या ऐसे दूसरे काम करें, जिनमें बहुत ताक़त और सख़्ती की ज़रूरत होती है। लेकिन असल सवाल यह है कि ऐसे काम करने की ताक़त होने से मर्दों को कौन-सी ऐसी ख़ूबी या बड़ाई मिल जाती है, जिसके आधार पर उन्हें औरतों से बेहतर माना जाए? जिस्मानी ताक़त के आधार पर मर्दों को औरतों से बेहतर साबित करने वाली दलील इस सवाल का कोई जवाब नहीं देती।”
वे इस तर्क की कमजोरी उजागर करने के लिए इंसान और चौपायों के बीच तुलना करते हैं। अगर ज़्यादा जिस्मानी ताक़त ही श्रेष्ठता का आधार है, तो फिर गधे और दूसरे ताकतवर जानवरों को मर्दों से श्रेष्ठ मानना पड़ेगा। मुमताज़ अली ने जिस्मानी अंतर को सत्ता और अधिकार का स्थायी आधार मानने से इनकार किया। वे यह समझने की कोशिश करते हैं कि समाज किस तरह कुछ क्षमताओं को विकसित करता है और कुछ को दबा देता है। वे सियासी सत्ता को भी इसी तर्क के दायरे में लाते हैं। शासन सिर्फ़ जिस्मानी बल का नतीजा नहीं होता। सत्ता के संचालन के लिए संगठन, प्रशासनिक समझ, सियासी सहयोग और समाजी परिस्थितियों की भूमिका होती है। तारीख़ में औरतों के शासन के उदाहरण देकर वे मर्दों के इस दावे को चुनौती देते हैं कि शासन करना सिर्फ़ मर्दों का अधिकार है। रज़िया सुल्तान और नूरजहाँ का उल्लेख करते हुए वे यह साफ़ करते हैं कि शासन करने की क्षमता मर्द होने की मोहताज नहीं है। यहाँ उनका मक़सद सिर्फ़ तारीखी उदाहरण पेश करना नहीं, बल्कि उस सियासी मानसिकता पर चोट करना है जो मर्दों की सत्ता को प्राकृतिक और औरतों की सियासी भागीदारी को अपवाद मानती है। इस चर्चा का सबसे ख़ास पहलू यह है कि मुमताज़ अली सत्ता के स्रोत को बदलकर देखने का आग्रह करते हैं।
मर्दों की श्रेष्ठता का दूसरा बड़ा आधार औरतों की कथित बौद्धिक कमजोरी को बनाया जाता रहा है। औरतों को भावुक, जल्दबाज, कम अक्ल, अविश्वसनीय और दूरदर्शिता से वंचित बताने वाली धारणाएँ सिर्फ़ समाजी टिप्पणियाँ नहीं हैं। इनके जरिए औरतों को शिक्षा, संपत्ति, निर्णय और आम ज़िन्दगी से दूर रखने को सही ठहराया जाता है। वे मर्दों और औरतों के मस्तिष्क की बनावट के बारे में प्रचलित दावों की चर्चा करते हुए लिखते हैं: “पहली दलील की तरह इस दलील में भी एक बड़ी गलती यह है कि ऐसे फर्क को, जो कुछ हालात और परिस्थितियों की वजह से पैदा हुआ है, कुदरती फर्क मान लिया जाता है। मान लीजिए, सिर्फ़ बहस के लिए, कि जिस्म की बनावट और दिमाग़ की जाँच के हिसाब से औरतों का दिमाग़ मर्दों के दिमाग़ से कुछ कम विकसित पाया जाए। तब भी यह क्यों नहीं माना जा सकता कि इसकी वजह औरतों की मौजूदा समाजी हालत है ? औरतों की सेहत का जिस तरह ख़याल नहीं रखा जाता और उनके जिस्म और दिमाग़ पर ऐसे असर पड़ते हैं, उनसे उनके सोचने-समझने की ताक़त पर बुरा असर पड़ना स्वाभाविक है। यही वजह है कि उनमें बेचैनी, जल्दबाज़ी, बदलता हुआ मिज़ाज, जल्दी नाराज़ हो जाना, बिना सोचे किसी बात पर भरोसा कर लेना और बिना पूरी समझ के राय बना लेना जैसी बातें पैदा हो सकती हैं।”
मुमताज़ अली इस सवाल को शिक्षा और अनुभव के अवसरों से जोड़ते हैं। मर्दों और औरतों की बौद्धिक क्षमताओं की तुलना तभी सार्थक हो सकती है जब दोनों को विकास के लिए समान अवसर हासिल हों। अगर मर्दों की शिक्षा पीढ़ियों से व्यवस्थित तौर से होती रही हो और औरतों को कुछ अक्षर सीखने तक सीमित रखा गया हो, तो मर्दों की शैक्षिक उपलब्धियों को उनकी प्राकृतिक श्रेष्ठता का प्रमाण मानना तर्कसंगत नहीं है। वे इसी बात को दूसरे उदाहरण से स्पष्ट करते हैं: ” जब मर्दों और औरतों को बराबरी की हालत में रखा ही नहीं गया और पढ़ाई-लिखाई और ज्ञान हासिल करने की दौड़ में दोनों ने एक ही जगह से शुरुआत नहीं की, तो फिर मर्दों की आगे बढ़त को असली बढ़त कैसे माना जा सकता है? क्या सिर्फ़ इस आधार पर कि ज़ुलू क़ौम के लोग पिछड़ेपन और अनपढ़ता में डूबे हुए हैं, जबकि इंग्लिस्तान के लोग ज्ञान-विज्ञान की तरक़्क़ी में यूनान के बड़े-बड़े विद्वानों से भी आगे निकल रहे हैं, यह नतीजा निकालना सही होगा कि इंग्लिस्तान के लोगों और ज़ुलू लोगों के दिमाग़ और सोचने-समझने की ताक़त में कोई कुदरती फर्क है ?”
मुमताज़ अली औरतों की बौद्धिक क्षमता को सिर्फ़ मर्दों के बराबर साबित करने पर संतुष्ट नहीं होते। वे यह संभावना भी ज़ाहिर करते हैं कि अवसर मिलने पर औरतें कुछ क्षेत्रों में मर्दों से आगे निकल सकती हैं। वे अपने अनुभव के आधार पर लड़कियों की सीखने की क्षमता और उनकी प्रतिभा का उल्लेख करते हैं। उनके लिए औरत की तालीम सिर्फ़ घरेलू ज़िन्दगी को बेहतर बनाने का ज़रिया नहीं, बल्कि उस समाजी अन्याय को खत्म करने का रास्ता है जिसमें आधी आबादी की बौद्धिक क्षमताओं को विकसित होने से रोका जाता है।
मर्दों की श्रेष्ठता के पक्ष में एक धार्मिक तर्क यह दिया जाता है कि सभी पैगंबर मर्द हुए हैं और किसी औरत को नबी बनाकर नहीं भेजा गया। इस आधार पर यह निष्कर्ष निकालने की कोशिश की जाती है कि ख़ुदा ने मर्दों को औरतों से ऊँचा दर्जा दिया है। मुमताज़ अली इस दलील को भी क़ुबूल नहीं करते। वे लिखते हैं: “मुसलमानों का मानना है कि अल्लाह ने लोगों को सही रास्ता दिखाने के लिए दुनिया में एक लाख चौबीस हज़ार पैग़म्बर भेजे। लेकिन हमारी किताबों में इनमें से सिर्फ़ दस-पंद्रह पैग़म्बरों के बारे में जानकारी मिलती है। इसका मतलब यह है कि बहुत बड़ी संख्या में पैग़म्बरों के बारे में हमें कुछ भी मालूम नहीं है। इसलिए यह कैसे कहा जा सकता है कि वे सब मर्द ही थे, या सब औरतें थीं, या उनमें कुछ मर्द और कुछ औरतें थीं? जब हमें सिर्फ़ कुछ पैग़म्बरों के बारे में मालूम है, तो उनके आधार पर इतने बड़ी संख्या में उन लोगों के बारे में कोई पक्की राय बना देना कहाँ तक सही है, जिनके बारे में हमें कुछ पता ही नहीं ?”
इसके बाद वे नबूवत के सवाल को औरतों की समाजी ज़िम्मेदारी और उनकी गरिमा के संदर्भ में भी देखते हैं। वे यह संभावना पेश करते हैं कि पैगंबरों का विशेष काम और उनकी ज़िन्दगी जिस तरह की निरंतर सार्वजनिक सक्रियता और पारिवारिक ज़िन्दगी से दूरी की मांग करता था, वह औरतों के लिए निर्धारित समाजी परिस्थितियों से मेल नहीं खाता था।
इस अध्याय का सबसे महत्वपूर्ण और साहसिक हिस्सा वह है जिसमें मुमताज़ अली कुरान की उन आयतों की व्याख्या को चुनौती देते हैं जिनका इस्तेमाल मर्दों की श्रेष्ठता और औरतों पर उनके अधिकार को जायज़ ठहराने के लिए किया जाता रहा है। खासतौर से सूरह निसा की आयत अर्रिजालु क़व्वामूना अलन्निसा की प्रचलित व्याख्या उनके निशाने पर है। आम तौर पर इस आयत का अनुवाद मर्दों को औरतों पर हाकिम या शासक बताने की शक्ल में किया जाता रहा है। इस व्याख्या से परिवार के भीतर मर्द की सत्ता को मज़हबी आधार मिल जाता है। मुमताज़ अली इस अनुवाद को स्वीकार करने से इनकार करते हैं। वे लिखते हैं: “मर्दों की फ़ज़ीलत के पक्ष में क़ुरआन मजीद से जो सबसे बड़ी दलील पेश की जाती है, वह यह आयत है: ‘अर-रिजालु क़व्वामूना अलन-निसा बिमा फ़ज़्ज़लल्लाहु बअज़हुम अला बअज़िव-व-बिमा अनफ़क़ू मिन अमवालिहिम।’ इसका मतलब यह बताया जाता है कि मर्द औरतों पर हाकिम हैं, क्योंकि अल्लाह ने उनमें से कुछ को कुछ पर फ़ज़ीलत दी है और मर्द अपने माल में से औरतों पर ख़र्च करते हैं। इस आयत की तफ़सीर करते हुए कुछ मुफ़स्सिरों ने लिखा है कि मर्दों को दो तरह की फ़ज़ीलत हासिल है। पहली फ़ज़ीलत उन्हें इसलिए हासिल है कि उनकी सोचने-समझने और काम करने की ताक़त ज़्यादा है। दूसरी फ़ज़ीलत यह है कि मर्द औरतों की ज़रूरतों का ख़र्च उठाते हैं, जैसे उनके खाने-पीने, कपड़े और दूसरी ज़रूरतों का इंतज़ाम करते हैं। लेकिन हम इस तफ़सीर से सहमत नहीं हैं। सबसे पहली बात यह है कि ‘क़व्वाम’ का अनुवाद ‘हाकिम’ करना हमारे ख़याल में सही नहीं है।”
वे क़व्वाम शब्द के कई अनुवादों का उल्लेख करते हैं और बताते हैं कि कई अनुवादकों ने इसे हाकिम के बजाय देखभाल करने वाले, काम सँभालने वाले या प्रबंध करने वाले मानो में लिया है। इस आधार पर वे आयत की एक वैकल्पिक व्याख्या पेश करते हैं : “इस आयत के शब्द बिल्कुल साफ़ हैं। ‘क़व्वाम’ मुबालग़े का शब्द है। इसका मतलब ऐसे शख़्स से है जो किसी काम को संभालने और उसकी देखभाल करने में इतना लगा रहता है कि उसे बैठने की फुर्सत भी नहीं मिलती और उसका ज़्यादातर वक़्त काम करते हुए गुज़रता है। चूँकि मर्दों को रोज़ी कमाने के लिए दूर-दूर के इलाक़ों में जाना पड़ता है और औरतों के आराम और ज़रूरतों के लिए कमाना पड़ता है, इसलिए मर्द औरतों के ‘क़व्वाम’ यानी उनके काम संभालने वाले, उनकी सेवा करने वाले और उनकी ज़रूरतें पूरी करने वाले हैं। दुनिया में किसी के पास ज़्यादा दौलत है, किसी के पास कम; कोई दिल खोलकर ख़र्च करता है और कोई कंजूस होता है। इसलिए अल्लाह ने फ़रमाया कि उसने कुछ लोगों को कुछ दूसरों से ज़्यादा दिया है। इसका मतलब यह है कि आदमी के पास जितनी कमाने की ताक़त और जितनी आर्थिक हैसियत हो, उसे उसी के मुताबिक़ औरतों की ज़रूरतें पूरी करनी चाहिए और उनकी देखभाल करनी चाहिए। इस आयत में कहीं भी मर्द को हाकिम और औरत को उसके अधीन बताने की बात नहीं है। बल्कि अगर इसके आम और सीधे मतलब को देखा जाए, तो इससे औरतों का हक़ और मर्दों का उनकी सेवा और ज़रूरतें पूरी करने वाला होना ही साबित होता है।”
इस तर्क की सीमा को भी ध्यान में रखना ज़रूरी है। मुमताज़ अली मर्दों को परिवार का कमाने वाला और औरतों को घरेलू ज़िन्दगी से जुड़ा मानते हुए चलते हैं। इसलिए उनकी व्याख्या आधुनिक मानो में पूरी तरह लैंगिक भूमिकाओं से आज़ाद नहीं है।
मुमताज़ अली औरतों की गवाही और विरासत के सवाल पर भी मर्दों की श्रेष्ठता के दावे को चुनौती देते हैं। परंपरागत मज़हबी व्याख्याओं में इन दोनों विषयों को अक्सर औरत की कमतर हैसियत के प्रमाण की शक्ल में पेश किया गया है।
वे इस तर्क की पड़ताल करते हुए सबसे पहले गवाही से संबंधित कुरानी आयत के संदर्भ पर ध्यान देते हैं। वे लिखते हैं: “जिस आयत में एक मर्द की गवाही को दो औरतों की गवाही के बराबर माना गया है, वह आयत क़र्ज़ के लेन-देन से जुड़ी हुई है। ज़ाहिर है कि क़र्ज़ की लिखत-पढ़त, काग़ज़ात तैयार करना, हिसाब-किताब रखना, अदालतों में जाना या कानूनी मामलों से जुड़े दूसरे काम आम तौर पर औरतों के लिए रोज़मर्रा के काम नहीं थे। इसकी वजह यह थी कि उस वक़्त औरतों को पढ़ाई का कम मौक़ा मिलता था, उन्हें ऐसे मामलों का कम तजुर्बा था और वे इन कामों से ज़्यादा वाक़िफ़ नहीं होती थीं। इसलिए ऐसे मामलों को लंबे वक़्त तक याद रखना उनके लिए आसान नहीं था। इसके उलट मर्दों को इस तरह के काम करने की ज़्यादा आदत होती थी, इसलिए वे ऐसे मामलों को अच्छी तरह याद रख सकते थे। इसी वजह से एक औरत के बजाय दो औरतों की गवाही रखी गई, ताकि अगर एक औरत मामले की कोई बात भूल जाए, तो दूसरी उसे वह बात याद दिला सके।”
वे इस बात पर जोर देते हैं कि आर्थिक मामलों का तजुर्बा समाजी भागीदारी से पैदा होता है। जिस समाज में मर्द तिजारत और लेन-देन के काम करते हों और औरतों को उनसे दूर रखा जाता हो, वहाँ दोनों के तजुर्बे में फ़र्क़ होना स्वाभाविक है। लेकिन इस फ़र्क़ को जन्मजात बौद्धिक कमजोरी का नतीजा मानना ग़लत है। वे इसी संदर्भ में लिखते हैं: ” जब क़ुरआन मजीद ने ख़ुद इस फर्क की वजह यह नहीं बताई कि औरत अपनी पैदाइश और कुदरती बनावट के लिहाज़ से मर्द से आधी है, तो फिर फ़ुक़हा को यह हक़ किसने दिया कि वे अपनी अधूरी समझ से ऐसी गलत वजहें निकालें और दुनिया की आधी आबादी का हक़ मारें ?”
विरासत के मसले पर वो एक अलग तरह का तर्क देते हैं. वे लिखते हैं: “औरत के पूरे ख़र्च और गुज़र-बसर की ज़िम्मेदारी मर्द के ऊपर रखी गई है, जबकि औरत के हिस्से में घर-गृहस्थी जैसे अपेक्षाकृत आसान काम दिए गए हैं। जब मर्द पर यह बड़ी ज़िम्मेदारी है कि वह अपने और अपनी बीवी के गुज़र-बसर का इंतज़ाम करे और आगे होने वाली औलाद की ज़रूरतों के लिए भी कमाई और बाकी सामान जुटाए, तो फिर यह कैसे ठीक हो सकता है कि बिना किसी ज़रूरत के औरत को विरासत में भी मर्द के बराबर हिस्सा दिया जाए ? औरत को शादी के वक़्त अपने मायके से दहेज भी मिलता है, उसे महर की रकम पर पूरा हक़ होता है और शौहर से गुज़ारे के ख़र्च का अलग हक़ भी मिलता है। फिर विरासत बाँटते वक़्त भी अगर औरत को मर्द के बराबर हिस्सा दिया जाए, तो क्या इससे उसके हिस्से को बहुत ज़्यादा बढ़ा देना नहीं होगा ? क्या इस बात का कोई साफ़ और पक्का सबूत है कि अल्लाह ने वास्तव में औरतों को ज़्यादा रियायत और ज़्यादा हक़ देने को पसंद किया है? वरना यह कैसे समझाया जाए कि औरत अपने शौहर के साथ रहते हुए घर के ख़र्च में शामिल रहे, फिर अपने पिता की विरासत में अलग से संपत्ति पाए और मर्द की तरह उसमें भी हक़दार हो ?”
मुमताज़ अली विरासत के असमान हिस्सों को मर्दों की श्रेष्ठता के प्रमाण की शक्ल में पढ़ने से इनकार करते हैं। वे आर्थिक अधिकारों को अलग-अलग पारिवारिक जिम्मेदारियों के संदर्भ में समझने की कोशिश करते हैं। वे विरासत के अनुपात को पूरी तरह बदलने की मांग नहीं करते, बल्कि मर्दों की श्रेष्ठता के प्रमाण की शक्ल में उसकी व्याख्या की मुख़ालिफत करते हैं। इसीलिए इस बहस को औरतों की आर्थिक समानता की आधुनिक मांग के बराबर नहीं रखा जा सकता।
इस अध्याय का सबसे ज़्यादा साहसिक और अपने वक़्त की रूढ़ियों को चुनौती देने वाला हिस्सा बहुविवाह के सवाल पर मुमताज़ अली की बहस है। वे उस प्रचलित धारणा को चुनौती देते हैं जिसके अनुसार कुरान मर्दों को चार शादी करने की खुली छूट देता है। वे उस आयत के संदर्भ और उसमें मौजूद न्याय की शर्त पर ख़ास जोर देते हैं। “बहुविवाह के समर्थक कहते हैं कि एक से ज़्यादा बीवियाँ होने की हालत में खाने-पीने और दूसरे ख़र्चों, रहने की जगह और रात गुज़ारने के मामले में सभी के साथ बराबरी का बर्ताव करना ज़रूरी है। हम इसमें दिल की मुहब्बत और हमदर्दी को भी शामिल मानते हैं, क्योंकि हमारे नज़दीक यही निकाह की असल बुनियाद है। हमारा कहना है कि इस तरह की पूरी बराबरी करना इंसान के लिए मुमकिन नहीं है।”
मुमताज़ अली बहुविवाह की बहस को आर्थिक समानता से आगे बढ़ाकर भावनात्मक न्याय के सवाल से जोड़ते हैं। वे शादी के मक़सद को स्पष्ट करने के लिए कुरान की दूसरी आयत का हवाला देते हैं: “निकाह का असली मक़सद यह है कि इंसान को पूरी ज़िंदगी के लिए एक ऐसा सच्चा साथी मिले, जो उसका हमदर्द हो, उसके सुख-दुख में उसके साथ रहे और दुनिया की परेशानियों से फ़ुर्सत मिलने पर उसके दिल को सुकून दे। इसीलिए जहाँ औरत को पैदा करने और निकाह का ज़िक्र किया गया है, वहाँ अल्लाह ने फ़रमाया है: ‘उसकी निशानियों में से एक यह है कि उसने तुम्हारे ही लिए तुम्हीं में से जीवन-साथी बनाए, ताकि तुम उनके पास सुकून पाओ, और तुम्हारे बीच प्यार और रहम-दिली पैदा की।”
यह नज़रिया उस मर्दवादी सोच से टकराती है जो शादी को मुख्यतः मर्द के अधिकार और औरत की ज़िम्मेदारी की शक्ल में समझती है। वे आगे लिखते हैं: “तफ़्सीर के उसूल के मुताबिक़, जहाँ तक हो सके, क़ुरआन की एक जगह की बात को समझने के लिए क़ुरआन की दूसरी जगह की आयत से मदद लेनी चाहिए। और ‘अद्ल’ यानी बराबरी या इंसाफ़ का जो मतलब एक आयत में लिया जाए, वही मतलब दूसरी आयत में भी रखा जाना चाहिए। अब अगर पहली आयत में ‘अद्ल’ से वही मतलब लिया जाए जो बहुविवाह के समर्थक लेते हैं और जिसे व्यवहार में करना मुमकिन भी मानते हैं, तो फिर दूसरी आयत में अल्लाह ने यह क्यों फ़रमाया कि तुम औरतों के बीच पूरा इंसाफ़ हरगिज़ नहीं कर सकोगे ? अल्लाह साफ़ कहता है कि तुम पूरी तरह बराबरी नहीं कर सकते, लेकिन बहुविवाह के समर्थक कहते हैं कि नहीं, हम बराबरी कर सकते हैं। इस दावे की हिम्मत और दुस्साहस पर ज़रा ग़ौर करना चाहिए।”
वे इस विरोधाभास को और ज़्यादा तीखे ढंग से सामने लाते हैं। बहुविवाह के समर्थक न्याय की शर्त को सिर्फ़ आर्थिक और बाहरी बराबरी तक सीमित करके उस कठिनाई से बच निकलते हैं जो कुरान की दूसरी आयत में सामने आती है। मुमताज़ अली इस व्याख्या को नाकाफ़ी मानते हैं, क्योंकि उनके लिए शादी का असल आधार प्रेम और भावनात्मक साझेदारी है। वे बहुविवाह की अनुमति को एक विशेष समाजी परिस्थिति से जोड़ने की कोशिश भी करते हैं : “हमारी राय में इस आयत से बहुविवाह के बारे में कोई आम नियम निकालना ही बड़ी गलती है। बल्कि इस आयत में सिर्फ़ एक खास स्थिति के बारे में बात की गई है। अरब के लोगों में ज़माना-ए-जाहिलियत में एक बहुत आम और बुरी रस्म थी। वे अनाथ और बेसहारा लड़कियों को अपने घर में पाल लेते थे और जब वे बड़ी हो जाती थीं, तो उन्हीं से निकाह कर लेते थे। चूँकि उन लड़कियों का कोई अपना रखवाला या वारिस नहीं होता था, इसलिए वे उनके माल पर भी क़ब्ज़ा कर लेते थे। असल में उन बेसहारा लड़कियों से निकाह करने का मक़सद भी अक्सर उनका माल हड़प लेना ही होता था।”
यह व्याख्या उनके वक़्त के रूढ़िवादी मज़हबी विमर्श के ख़िलाफ एक गंभीर चुनौती थी। वे पहली पत्नी की इच्छा, उसकी भावनात्मक ज़िन्दगी और उसकी गरिमा को बहस के केंद्र में लाते हैं। वे इस विचार को चुनौती देते हैं कि मर्द की इच्छा ही शादी के फ़ैसले के लिए काफ़ी है। मर्द को सिर्फ़ मज़हबी इजाज़त का हवाला देकर बीवी के जज़्बातों को कुचलने का अधिकार नहीं दिया जा सकता।
वे तलाक के अधिकार को मर्दों की श्रेष्ठता का प्रमाण मानने से इनकार करते हैं। शादी का मक़सद मियां-बीवी के बीच स्थायी भावनात्मक रिश्ता स्थापित करना है। अगर यह रिश्ता पूरी तरह टूट जाए और दोनों के बीच साथ रहना नामुमकिन हो जाए, तो सिर्फ़ कानूनी अनुबंध के नाम पर उन्हें एक-दूसरे के साथ रहने के लिए मजबूर करना सही नहीं है।
वे लिखते हैं: “तलाक़ एक बहुत कड़वी दवा है, जो केवल ऐसे रोग के इलाज के लिए होती है जिसका कोई दूसरा इलाज संभव न हो। पति-पत्नी के आपसी संबंध इतने नाज़ुक, महत्वपूर्ण और निजी होते हैं कि उनके अलगाव के लिए अदालतों का सहारा लेना अक्सर उनके बीच की नाराज़गी को और बढ़ा देता है। यह सही है कि निकाह भी दूसरे समझौतों की तरह एक समझौता है और समझौते की शर्तें पूरी होने के बाद हर पक्ष को यह अधिकार है कि अगर दूसरा पक्ष अपना वादा पूरा न करे तो उसे समझौता पूरा करने के लिए मजबूर करे या करवाए। लेकिन पति-पत्नी के बीच वादा तोड़ना ऐसी मानसिक और भावनात्मक स्थिति का नतीजा होता है कि जब यह स्थिति पैदा हो जाए, तब ज़बरदस्ती समझौते को निभाना केवल ऊपर-ऊपर से उसका पालन करना होगा।”
वे तलाक के अधिकार को सिर्फ़ मर्द तक महदूद रखने के ख़िलाफ भी सवाल उठाते हैं। “हमारी राय में जहाँ तलाक़ की वजह ऐसा मतभेद हो जिसका कोई इलाज संभव न हो, वहाँ तलाक़ का अधिकार पति या पत्नी, दोनों में से किसी एक के हाथ में होना एक जैसा नतीजा पैदा करेगा। क्योंकि आम तौर पर यह संभव नहीं है कि पति अपनी पत्नी से कहे कि मैं अब तुम्हें अपनी पत्नी बनाकर नहीं रखना चाहता, लेकिन पत्नी के दिल में अपने पति के लिए इतनी गहरी मुहब्बत हो कि वह उससे अलग न होना चाहे। ऐसी हालत में अलगाव होना ही ज़रूरी है, चाहे उसका इज़हार पति की तरफ़ से हो या पत्नी की तरफ़ से।”
मुमताज़ अली शादी को मर्द की संपत्ति या उसके एकतरफा अधिकार की शक्ल में देखने से इनकार करते हैं। वे इस बात को समझते हैं कि शादीशुदा रिश्ते में असमान अधिकार औरत को ऐसी हालत में डाल सकते हैं जहाँ वह न तो सम्मानजनक ज़िन्दगी जी सके और न ही अपनी मर्ज़ी से शादी से बाहर निकल सके। इसके बाद वे खुला के अधिकार का उल्लेख करते हैं। उनके मुताबिक, अगर मर्द तलाक देने से इनकार करे और औरत के लिए शादीशुदा ज़िन्दगी असहनीय हो जाए, तो उसे न्यायिक प्रक्रिया के ज़रिये से शादी से अलग होने का रास्ता मिलना चाहिए। वे इसे औरत की गरिमा और उसके अधिकारों की हिफाज़त की शक्ल में देखते हैं। शादी के भीतर औरत की हालत को सिर्फ़ शौहर की मर्ज़ी पर निर्भर रहने देने के बजाय वे उसके लिए अलग होने का अधिकार भी जरूरी मानते हैं। फिर भी उनकी बहस में तलाक और खुला के बीच मौजूद कानूनी असमानताओं का पूरा समाधान सामने नहीं आता।
वे उन मज़हबी कल्पनाओं को भी चुनौती देते हैं जिनका इस्तेमाल मर्दों की श्रेष्ठता के सबूत के तौर पर किया जाता है। जन्नत में मर्दों को हूरें मिलने और औरतों के लिए उसी तरह के किसी वादे का साफ़ उल्लेख न होने को भी मर्द की श्रेष्ठता की दलील बनाया जाता रहा है। मुमताज़ अली इस तर्क को मज़हबी भाषा और कुरान की व्याख्या के आधार पर चुनौती देते हैं : “क़ुरआन मजीद का एक ख़ास तरीक़ा यह है कि जब वह किसी ख़िताब में मर्दों और औरतों दोनों को शामिल करता है, तो अक्सर सिर्फ़ मर्दाना सीग़े का इस्तेमाल करता है। क़ुरआन मजीद की पहली ही आयत को देखिए, जहाँ फ़रमाया गया है : ” यह परहेज़गार लोगों के लिए राह दिखाने वाली किताब है, जो बिना देखे (ग़ैब पर) ईमान रखते हैं और नमाज़ क़ायम करते हैं, वग़ैरह।
इस आयत में मुत्तक़ीन और उसके बाद आने वाले तमाम फ़ेल के सीग़े मर्दाना हैं। लेकिन इसका मतलब हरगिज़ यह नहीं है कि क़ुरआन मजीद सिर्फ़ उन परहेज़गार मर्दों के लिए हिदायत है जो ग़ैब पर ईमान लाते हैं और नमाज़ पढ़ते हैं। बल्कि इसमें परहेज़गार औरतें भी शामिल हैं।”
वे आगे लिखते हैं: “इस आयत का मतलब यह है कि जिन लोगों के नेक अमल होंगे, वे जन्नत में जाएँगे और वहाँ उन्हें पाकीज़ा जीवनसाथी मिलेंगे, यानी मर्दों को औरतें और औरतों को मर्द।”
मुमताज़ अली की हुकूक़-उल-निस्वाँ के इस पहले भाग की सबसे बड़ी अहमियत यह है कि वे औरतों के अधिकारों की बहस को अलग-अलग मसलों की सूची के रूप में नहीं, बल्कि मर्दों की कथित श्रेष्ठता की बुनियाद को चुनौती देने वाली एक मुकम्मल बहस की शक्ल में सामने रखते हैं। वे अपने वक़्त की मज़हबी और समाजी धारणाओं के भीतर रहकर उन्हीं के तर्कों से उनके निष्कर्षों को चुनौती देते हैं और यह सवाल उठाते हैं कि क्या किसी जैविक अंतर, समाजी भूमिका या आम चलन में मौजूद व्याख्या से आधी आबादी की कमतर हैसियत साबित की जा सकती है। उनकी कई धारणाएँ आज की समानता की कसौटी पर अधूरी या अपने वक़्त की सीमाओं से बंधी दिखाई देती हैं, लेकिन इसके बावजूद यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि उन्नीसवीं सदी के आख़िरी सालों में उन्होंने औरत को किसी की अधीन प्रजा या संपत्ति मानने के बजाय एक आज़ाद इंसान के रूप में देखने की बुनियादी ज़रूरत पर ज़ोर दिया।
हुकूक़-उल-निस्वाँ इसी वजह से सिर्फ़ अपने दौर की किताब नहीं रह जाती; यह उस लंबी बहस का एक महत्वपूर्ण पड़ाव बन जाती है जिसमें औरत की इंसानियत, गरिमा और अधिकारों को मर्द की श्रेष्ठता से अलग करके देखने की कोशिश की गई।

