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कोरस ने अपनी यात्रा के दस वर्ष पूरे होने पर पटना में किया कविता पाठ का आयोजन 

कोरस ने अपनी यात्रा के 10 वर्ष पूरे होने पर दिनांक 26/07/2026 को पटना में कविता पाठ का आयोजन किया। यह कविता पाठ पटना के आई एम ए हाल गांधी मैदान में हुआ। ‘कविता युग की नब्ज धरो’ शीर्षक से आयोजित इस कविता पाठ को दमनकारी संस्कृति के बरक्स युवा प्रतिरोधी स्वर की अभिव्यक्ति के रूप में देखा जा सकता है।

आयोजन की ख़ास बात यह थी की इसमें देश के विभिन्न हिस्सों से हाशिये की लगभग सभी आवाजों को स्वर देने वाले युवा कवि शामिल थे| ऐसे युवा कवि जिन्होंने देश-दुनिया को नए सिरे से देखने की अपनी दृष्टि पैदा की है | जब दुनिया भर की दमनकारी ताकतें हिंसा, बम, लाठी चार्ज जैसी साजिशों के साथ गड़गड़ाती दीखती हैं और हर रूप के इंसान विरोधी उपकरणों से ख़ुद का राज स्थापित करने की जबरन कोशिश में है| उस वक्त ही कुछ लोग उनके नफ़रती शोर को तंबूरे से धकियाते हैं, वीरान करवाए गए शहरों की बिल्लियों से भूख साझा करते हैं और लाठियाँ खाते हुए इनके बनाए डर पर हंसते हैं | ये युवा कवि उन्हीं लोगों में शामिल हैं|

पटना के उस छोटे से हाल में कविता-सुनने को लोग शहर भर से उमड़ पड़े,कुर्सियां कम पड गईं, खड़े रहने की भी जगह नहीं बची| यह पटना शहर की उस जीवटता और प्रतिरोध को दिखाता है, जो ऐसे बर्बर समय में उन्मुक्त प्रखर आवाज़ों को दर्ज करने, भूख साझा करने और मुक्ति के सपने को हक़ समझने की साझी चेतना में भरोसा रखने वाली है|

सबसे पहले युवा कवि अदनान कफील दरवेश ने गुलमोहर के फूल हैं ये बच्चे, लानत का प्याला, अच्छी कविता, जिक्र ए मीर, मेरे बच्चे जैसी कविताओं का पाठ किया। उनकी कवितायेँ हमारी दुनिया में फ़ासीवाद के अँधेरे के बरक्स रोशनी फैलाने का काम करती हैं| उनकी कविताओं में ऐसे बच्चों की कामनाएँ आती हैं जो इस समाज का आमूल-चूल परिवर्तन करने की कामना रखते हैं|

दूसरे कवि के रूप में दिल्ली से आई हुई अनुपम ने अपनी कविता मुझे इस बच्चे को जन्म देना ही होगा, भाषा कविता और सांवली  हंसोड़ औरत, कविता का रंग, अकेले की यात्रा, अंधेरे की भी होती है एक व्यवस्था जैसी कविताएं पढ़ीं। अनुपम की कविताएँ समाज द्वारा महिलाओं को स्वाभाविक सबऑरडिनेट माने जाने और उनके शरीर से मश्तिष्क तक बनाई सामाजिक रूढ़ियों की गहरी समीक्षा करते हुए उसके बरक्स सभ्यता समीक्षा लेकर आतीं हैं| अनुपम की कविता एक ऐसे समाज का स्वप्न है जहाँ महिला-पुरूष पृथ्वी, राजनीति और प्रेम के एक साथ भागीदार होंगे| जिसमें महिला को भी अपने ढंग का मनुष्य गढ़ने की स्वतंत्रता होगी, जिसकी पहली शर्त के बतौर पुरुष को गढ़ना है|

अनुपम के पश्चात इलाहाबाद से आई युवा कवि शिवांगी गोयल ने जीवनसाथी के लिए, बच्चियों की इज्जत,मेरे मामा की हत्या पर और अनचाहे निशान जैसी कविताओं का पाठ किया। शिवांगी की कविता कोमल संवेदना, कामनाओं को छिपाये बिना, अपने रोष को भी उतनी ही निर्ममता के साथ अभिव्यक्त करती है|

इसके बाद विहाग वैभव ने इस मोड़ से जो लौटना चाहते हैं वह लौट जाए, सभ्यता संवाद, वह कौन नदी थी जिसके पानी में पत्थरों की छाया नहीं बहती थी, खुदाई, बहुत मामूली सी चीज चाहिए थी उन्हें जैसी कविताएं पढ़ी। अस्मिता की लड़ाई पूरी दुनिया को बदलने की लड़ाई है, विहाग इस बात को अपनी कविताओं में दर्ज करते हैं और डिफरेंट आइडेंटिटीज़ के यूनीफ़िकेशन की बात को आक्रामक भाषा में दर्ज करते हैं| वह कहते हैं कि जिस फासीवादी खतरनाक दुनिया में हम हैं, वहाँ नकली प्रतिरोध रचने वालों की जगह नहीं है|

रूपम मिश्रा ने कुछ लोग आते हैं, हक और न्याय की कितनी लड़ाइयां, मैं तुम्हारी लड़ाई लड़ना चाहता हूं, उस एक मखायी आवाज में, लाल मोहम्मद जोगी कविता पढ़ी। रूपम मिश्र की कविता में ग्रामीण परिवेश का यथार्थ चित्र दिखाई पड़ता है| उनकी कविता प्रेम की उस ताकत को दर्ज करती है जो नफरतों के इस दौर को चुनौती देने वाली है| चिंता में डूबी माँ जिस कदर अपने बच्चे को ताकती है, रूपम जी अपनी कविताओं में दुनिया को उसी नज़र से देखती हैं|

आयोजन की अध्यक्षता कर रहे कवि व आलोचक मृत्युंजय ने कहा कि वर्तमान दौर जितना खतरनाक है उसमें सभी अस्मिताओं को एक साथ आना होगा तभी एक साझा रास्ता बन सकता है| यही रास्ता कविता की नई पीढ़ी तैयार कर रही है। अध्यक्षीय वक्तव्य के साथ ही मृत्युंजय ने कीमोथेरेपी, गाजा जैसी कविताएँ पढ़ीं।

कविता पाठ के साथ कोरस के साथियों द्वारा निराला की गहन है यह अंधकारा, रघुवीर सहाय की पढ़िए सीता, वीरेन डंगवाल की हमारा समाज जैसी  कविताओं की सांगीतिक प्रस्तुति भी हुई।

आयोजन की स्वागत समिति के द्वारा सभी कवियों को कविता के सुंदर पोस्टर द्वारा सम्मानित किया गया।

कोरस की साथी रुनझुन ने साहित्यिक और लयात्मक अंदाज में कार्यक्रम का  सुन्दर संचालन किया। धन्यवाद ज्ञापन करते हुए कोरस की राष्ट्रीय सचिव समता राय ने सभी कवियों सहित सभागार में मौजूद सभी श्रोताओं और  आयोजन समिति के सभी साथियों के प्रति आभार व्यक्त किया।

आयोजन में आलोक धन्वा, मदन कश्यप, रामजी राय, निवेदिता झा, सियाराम शर्मा, जसम महासचिव मनोज सिंह, रंजीत वर्मा, संजय कुमार कुंदन, कुमार मुकुल, संतोष दीक्षित, सुशील, मधुबाला, प्रत्यूष चंद मिश्रा, प्रणय कृष्ण,जहूर आलम,राजकुमार सोनी आदि बुद्धिजीवी सहित बड़ी संख्या में श्रोता उपस्थित रहे।

तस्वीरें अंकुर राय ने ली है.

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