चार आयामों का एक कवि विष्णु खरे

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मंगलेश डबराल

 

यह बात आम तौर पर मुहावरे में कही जाती है कि अमुक व्यक्ति के न रहने से जो अभाव पैदा हुआ है उसे कभी भरा नहीं जा सकेगा. लेकिन विष्णु खरे के बारे में यह एक दुखद सच्चाई है की उनके निधन से जो जगह खाली हुई है, वह हमेशा खाली रहेगी. इसलिए की विष्णु खरे मनुष्य और कवि दोनों रूपों में सबसे अलग, असाधारण और नयी लीक पर चलने वाले व्यक्ति थे. वे कवि,आलोचक, अनुवादक, शास्त्रीय और फिल्म संगीत के गहरे जानकार, सिमेमा के मर्मज्ञ और पत्रकार थे और इस सभी क्षेत्रों में उनके काम ने न सिर्फ़ गहरी छाप छोड़ी बल्कि कई बदलाव भी संभव किये. यह सब उनकी अपार प्रतिभा, गहरे अध्ययन, अथक श्रम, और सबसे अधिक एक नयी संवेदना-दृष्टि की देन थी.
विष्णु खरे ने चार ऐसे महत्वपूर्ण काम किये जिसे हिंदी साहित्य और खासकर कविता का परिदृश्य विस्तृत हुआ और परिवर्तित भी. पहला तो यह था की उन्होंने सहत्तर के दशक में ‘टेबल’, ‘दोस्त’ और ‘चिड़ियों की मृत्यु’ जैसी कविताओं के माध्यम से हिंदी कविता में एक मौलिक और दूरगामी बदलाव को संभव किया, जिसका व्यापक असर हुआ और कविता वह नहीं रही जो पहले थी. विष्णु खरे की कविता ने नए कथ्यों के साथ एक नयी भाषा और संरचना की शुरुआत की, वह गद्यात्मक, निबंध जैसी और अलंकरण-विहीन हुई,उसने परवर्ती पीढ़ियों को बहुत आकर्षित किया और बहुत से कवि ने उनके गैर-पारंपरिक शिल्प में लिखने लगे. प्रसिद्ध कवि कुुँवर नारायण ने अपने एक लेख में कहा था की विष्णु खरे की कविता कविता के तमाम प्रचलित नियमों और शिल्पों को लांघ कर लिखी गयी है.’ उनके पांच संग्रहों में फ़ैली हुई कविता इस बात का दस्तावेज़ है कि एक समर्थ कवी कितनी बेचैनी के साथ समकालीन जीवन और यथार्थ की चीर-फाड़ करता है और किस एक शुष्क और ठोस गद्य में गहरे इंसानी जज्बे को पैदा कर देता है.
विश्व कविता के कई बड़े कवियों की रचनाओं के अनुवाद उनका दूसरा बड़ा काम था. गोइठे, ग्युन्टर ग्रास, अत्तिला योज़ेफ, मिक्लोश राद्नोती, बेर्टोल्ट ब्रेख्त आदि कवियों और एस्टोनिया और फ़िनलैंड के लोक-महाकाव्यों के उनके अनुवाद उल्लेखनीय हैं. दरअसल उन्होंने उन्नीस साल की उम्र में बीए में पढ़ते हुए ही अंग्रेजी कवि टी एस एलियट की प्रसिद्द कविता ‘वेस्टलैंड’ को हिंदी में ‘मरु प्रदेश और अन्य कवितायें’ नाम से अनूदित किया था जिसे अब भी उम्दा अनुवाद माना जाता है. हिंदी कविता को अनुवाद के ज़रिये अंग्रेज़ी और जर्मन, डच आदि भाषााओं में पहुँचाना उनका तीसरा उल्लेखनीय काम था और उन्होंने जर्मन विद्वान् प्रो. लोठार लुत्से के साथ हिंदी कविता के जर्मन अनुवादों का पहला संकलन संपादित किया. इसके अलावा हिंदी कविता के अंग्रेज़ी और डच अनुवाद भी उनके प्रयत्नों से संभव हुए. यह भी उल्लेखनीय है कि इन संकलनों में  प्रमुखता से जगह दी गयी.
एक और काम विष्णु खरे ने किया की आलोचक के रूप में कवि चंद्रकान्त देवताले का गहरा विश्लेषण करते हुए उन्हें एक प्रमुख कवि के रूप में पहचान की. हिंदी आलोचना आम तौर पर छिट-पुट ढंग से कविता की पड़ताल करती रही है, लेकिन खरे ने उसके धंधई स्वरुप को बदलते हुए उसे एक कवि पर केन्द्रित करते किया. कविता की ही तरह उनकी आलोचना भी बहुत साहसिक और चुनौती-भरी रही है और उसने आलोचना के आकादमिक प्रतिष्ठान को यह कहकर चुनौती भी दी की ‘रामचन्द्र शुक्ल नहीं, मुक्तिबोध हिंदी के सबसे बड़े आलोचक हैं’.
विष्णु खरे का जन्म 9 फरवरी 1940 को मध्यप्रदेश के छिंदवाडा में हुआ था. इंदौर से अंग्रेज़ी साहित्य में एमए करने के बाद उन्होंने कुछ समय पत्रकारिता की, फिर अध्यापन किया और साहित्य अकदेमी के उप-सचिव भी रहे. उन्नीस वर्ष की आयु में बीए में पढ़ते हुए उन्होंने टीएस इलियट की प्रसिद्द कविता ‘वेस्टलैंड’ का हिंदी अनुवाद ‘मरुप्रदेश और अन्य कवितायेँ’ के नाम से किया था जिसे आज भी उम्दा माना जाता है. साहित्य अकादेमी छोड़ने के बाद वे लगातार सवतंत्र लेखन करते रहे जिसमें ज़्यादातर अनुवाद कार्य शामिल था. उनके कुल सात संग्रह प्रकाशित हुए : पहचान सीरीज में विष्णु खरे की कविताये’‘खुद अपनी आँख से, सबकी आवाज़ के परदे में’, काल और अवधि के दौरान, लालटेन जलाना, पाठांतर और ‘और अन्य कवितायेँ. कविताओं के अलावा उन्होने बहुत से उपन्यासोंके अनुवाद भी किये.उनकी आलोचना की पहली पुस्तक ‘आलोचना की पहली किताब’ भी मील का पत्थर मानी जाती है.
अठत्तर वर्ष के जीवन में विष्णु खरे अपनी विवाद-प्रियता के लिए भी जाने गए. वे बेबाक, दो-टूक और कभी-कभी एक नाटकीय गुस्से के साथ अपनी बात कहते थे, लेकिन उसके पीछे हमेशा कोई सचाई होती टी और एक नेकनीयती सक्रीय रहती थी. वे जीवन भर साहित्यिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक सत्ताओं के मुखर विरोधी रहे और तथाकथित मुख्यधाराओं से अलग-थलग पड जाने का जोखिम उठाकर लगभग समझौता-विहीन जीवन जीते रहे.

वे अपने परवर्ती कवियों की रचनाशीलता पर भी गहरी निगाह रखते थे और एकदम नए कवियों की जो भी कविता उन्हें सार्थक लगती, उसकी दिल खोल कर प्रशंसा करने से नहीं चूकते थे. कवि विष्णु खरे शास्त्रीय और फिल्म संगीत और सिनेमा के भी गहरे जानकार थे और उनकी कई किताबें हिंदी और विश्व सिनेमा को पढने-समझने की नयी राह खोलती हैं. उन्हें सिनेमा की बुनियादी पाठ्य-सामग्री की तरह पढ़ा जा सकता है. अनितं दिनों में विष्णु खरे गजानान माधव मुक्तिबोध की कविताओं के अंग्रेज़ी अनुवाद कर रहे थे. दरअसल, उनका पूरा काव्य व्यक्तित्व मुक्तिबोध से बहुत प्रभावित था और वे उनके आलोचनात्मक लेखों का अनुवाद करने की योजना भी बना रहे थे.

विष्णु खरे की कविताएँ –

मौत और उसके बाद
(विष्णु खरे की पहली कविता का एक अंश। यह कविता कवि द्वारा ” विष्णु कान्त खरे ‘ शैलेश ‘ नाम से लिखी गई थी)

मुझे शायद याद करें वे टिमटिमाते तारे
रातों में जिन्हें देखता था मैं
मुझे न पाकर रोएँगें मेरे पागल विचार
अनजाने ही जिन्हें था लेखता मैं
बरखा मुझे न देखकर कहे
” क्या चल दिया वह ? ”

और आवारा बादलों का टुकड़ा न रहे
पूछ बैठे ” नहीं रहा क्या वह
एक ही, बस एक ही पागल जो
हमें था देखता और मुस्कुराया ? ”

मेरी चिता पर नहीं होंगे किसी के
अश्रु, स्मृति में चढ़ाए फूल
बाद दो दिन के दिखावे के, रोने के,
सभी जाएँगे मुझको भूल
क्या हुआ जो सिरफिरा इक मर गया ?
जगत के आनन्द में कम क्या कर गया ।
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आग

जब उन्होंने उसे पकड़ लिया होगा
जब उसके निकम्मे पति, आवारा देवर और लोलुप ससुर ने
उसे हरामज़ादी कुतिया छिनाल कहा होगा
और उसे मुक्कों, जूतों और लातों से मारा होगा
और सास दहकती हुई सलाखें लाई होगी
दाग दो निपूती रंडी को उसके नरक में

जब हर सजा उसके पाप के मुकाबले
कम होती गयी होगी
तब आख़िर में यह तय किया गया होगा
कि उसका खत्म होना ही बचाएगा खानदान को
उसका मुंह बाँध दिया गया होगा
और वह एक जानवर की तरह गुंगिया और छटपटा रही होगी

फिर उसे नहानघर में ले जाकर फेंक दिया गया होगा
चार बोतल मिट्टी का तेल डाल दिया गया होगा उस पर
सलाई उसके कांपते हुए पहली बार उत्तेजित पति ने ही दिखाई होगी
जिसकी इज्ज़त वह लेती रही थी

उस वक्त खौलते पानी में फेंकी गयी मछली की तरह
छटपटाते हुए
क्या उसे याद आया होगा पन्द्रह बरस पहले
अपने पेशेवर गुंडे भाइयों की निगाह
और अधेड़ जीजा की दिखाई गयी तस्वीरों से बच कर
एक तपती दोपहरी उसका अचानक
एक उन्नीस बरस के सन्न लड़के की कोठरीमें जाकर
लेट जाना
उसके मुंह में अपनी पूरी जुबान डाल देना
उतार देना अपने करीब-करीब सारे कपड़े
जैसे उनमें लपट हो
और कहना
देख मैं पहले ही जली जा रही हूँ
दूजे बहुत कम देरी के लिए आई हूँ
———-

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फ़ासला

(इस कविता में वर्णित मढ़ा-हुआ फ़ोटो मित्र-पत्रकार कुलदीप कुमार के ‘पायनियर’ कैबिन में लगा रहता था। यह उसके अज्ञात फ़ोटोग्राफ़र को समर्पित।)

थोड़ा झुका हुआ देहाती लगता एक पैदल आदमी
अपने बाएँ कंधे पर एक झूलती-सी हुई वैसी ही औरत को ढोता हुआ
जो एक हाथ से उसकी गर्दन का सहारा लिए हुए है
जिसके बाएँ पैर पर पंजे से लेकर घुटने तक पलस्तर
दोनों के बदन पर फ़क़त एकदम ज़रूरी कपड़े
अलबत्ता दोनों नंगे पाँव
उनकी दिखती हुई पीठों से अंदाज़ होता है
कि चेहरे भी अधेड़ और सादा रहे होंगे

दिल्ली के किसी चैंधियाते दिन में ली गई स्याह-सुफ़ैद तस्वीर थी वह
शायद 4.5 या सुपर 1200 एमएम टेलीलेंस वाले
किसी कैनन ए ई 1 या निकोर एफ़ 801 से खींची गई –
फोटोग्राफ़र ने खुद को मोहनसिंह प्लेस या खड़कसिंह मार्ग के
एम्पोरिअमों के सामने कहीं स्थित किया होगा

यह मान लेने में कोई हर्ज़ नहीं कि ले जाई जा रही औरत
ढोने वाले आदमी की ब्याहता ही रही होगी
लेकिन दूर-दूर तक दोनों के साथ और कोई (आखि़र क्यों) नहीं

सड़क के बाएँ से उन्हीं की दिशा में जाता हुआ
एक ख़ाली ऑटो वाला कुछ उम्मीद से यह मंज़र देखता है
दाईं ओर के एंबेसेडर और मारुति के ड्राइवर हैरत और कुतूहल से –
उन दोनों के अलावा सड़क पर और कोई पैदल नहीं है
जिससे धूप और वक़्त का अंदाज़ा होता है

यह लोग जंतर-मंतर नहीं जा रहे
आगे चल कर यह राह विलिंग्डन अस्पताल पहुँचेगी
जहाँ शायद इन्हें पलस्तर कटवाना है
या क्या मालूम पाँव और बिगड़ गया हो
ऐसे लोगों के साथ पचास रोने लगे रहते हैं
एक तो यही दिखता है कि इनके पास कोई सवारी करने तक के पैसे नहीं हैं
या आदमी इस तरह आठ-दस रुपये बचा रहा है
जिसमें दोनों की रज़ामंदी दिखती है
इनकी दुनिया में कहीं भी कैसा भी बोझ उठाने में शर्मिंदगी नहीं होती
यह तो आखि़र घरवाली रही होगी

वह सती शव नहीं थी अपंग थी
यह एकाकी शिव जिसे उठाए हुए अच्छी करने ले जा रहा था
किसी का यज्ञ-विध्वंस करने नहीं

किस तरह की बातें करते हुए यह रास्ता काट रहे थे
या एकदम चुप्पी में क्या-क्या सोचते हुए
शायद किसी पेड़ का सहारा लेकर सुस्ताए हों
क्या रास्ते के इक्का-दुक्का लोगों ने इसे माँगने का एक नया तरीक़ा समझा
फिर भी अगर किसी ने कुछ दिया तो इनने लिया या नहीं
अस्पताल पहुँचे या नहीं
पहुँचे तो वहाँ क्या बीती

शायद उसने कहा हो
कब तक ले जाते रहोगे
यहीं कहीं पटक दो मेरे को और लौट जाओ
उसने जवाब दिया हो
चबर चबर मत कर लटकी रह

खड़कसिंह से विलिंग्डन बहुत दूर नहीं
लेकिन एक आदमी एक औरत को उठाए हुए
कितनी देर में वहाँ पहुँच सकता है
यह कहीं दर्ज नहीं है

मुझे अभी तक दिख रहा है
कि वह दोनों अब भी कहीं रास्ते में ही हैं
गाड़ियों में जाते हुए लोग उन्हें देख तो रहे हैं
लेकिन कोई उनसे रुक कर पूछता तक नहीं
बैठाल कर पहुँचाने की बात तो युगों दूर है
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नींद में

कैसे मालूम कि जो नहीं रहा
उसकी मौत नींद में हुई ?

कह दिया जाता है
कि वह सोते हुए शांति से चला गया

क्या सबूत है ?
क्या कोई था उसके पास उस वक़्त
जो उसकी हर सांस पर नजर रखे हुए था
कौन कह सकता है कि अपने जाने के उस क्षण
वह जगा हुआ नहीं था
फिर भी उसने
आँखें बंद रखना ही बेहतर समझा
अब वह और क्या देखना चाहता था?
उसने सोचा होगा कि किसी को आवाज़ देकर
या कुछ कहकर भी अब क्या होगा ?

या उसके आसपास कोई नहीं था
शायद उसने उठने की फिर कोशिश की
या वह कुछ बोला
उसने कोई नाम लिया

मुझे कभी कभी ऐसा लगा है
कि जिन्हें नींद में गुजर जाने वाला बताया जाता है
उसके बाद भी एक कोशिश करते होंगे
उठने की
एक बार और तैयार होने की
लेकिन उसे कोई देख नहीं पाता है

पता नहीं मुझे ऐसा शक़ क्यों है
कि कम से कम यदि मेरे साथ ऐसा हुआ
तो मैंने वैसे एक आख़िरी कोशिश जरूर की होगी
जब सांस रुक जाने के बाद भी
नाखून कुछ देर तक बढ़ते रहते हैं
तो वैसा भी क्यों मुमकिन नहीं होता होगा
क्या जो चीजें देखी नहीं जातीं
वे होती ही नहीं?
लिहाजा मैं सुझाव देना चाहता हूँ
कि अगली बार अगर ऐसा कुछ हो
कि कहना पड़े कोई सोते सोते नहीं रहा
तो यह कहा जाए
कि पता नहीं चला वह कैसे गुजरा
जब वह नहीं रहा होगा
तब हम सब नींद में थे

क्या मालूम शायद वह ज़्यादा सही हो ?

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तभी

सृष्टि के सारे प्राणियों का
अब तक का सारा दुःख
कितना होता होगा यह मैं
अपने वास्तविक और काल्पनिक दुखों से
थोड़ा-बहुत जानता लगता हूँ
और उन पर हुआ सारा अन्याय?
उसका निहायत नाकाफ़ी पैमाना
वे अन्याय हैं जो
मुझे लगता है मेरे साथ हुए
या कहा जाता है मैंने किए
कितने करोड़ों गुना वे दुःख और अन्याय
हर पल बढ़ते ही हुए
उन्हें महसूस करने का भरम
और ख़ुशफ़हमी पाले हुए
यह मस्तिष्क
आख़िर कितना ज़िन्दा रहता है
कोशिश करता हूँ कि
अन्त तक उन्हें भूल न पाऊँ
मेरे बाद उन्हें महसूस करने का
गुमान करनेवाला एक कम तो हो जाएगा
फिर भी वे मिटेंगे नहीं
इसीलिए अपने से कहता हूँ
तब तक भी कुछ करता तो रह

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दिल्ली में अपना फ़्लैट बनवा लेने के बाद एक आदमी सोचता है

पिता होते तो उन्हें कौन सा कमरा देता?
उन्हें देता वह छोटा कमरा
जिसके साथ गुसलखाना भी लगा हुआ है
वे आज इकहत्तर बरस के होते
और हमेशा की तरह अब भी उन्हें
अपना निर्लिप्त अकेलापन चाहिए होता
लगातार सिगरेट पीना और स्वयं को
हिन्दुस्तानी गेय तथा वाद्य शास्त्रीय संगीत का अभ्यासी व्याख्याकार समझना
उन्होंने अंत तक नहीं छोड़ा था सो अब क्या छोड़ते
इसलिए उनके लिए यही कमरा ठीक रहता
सिर्फ़ रेडियो और टेलीविज़न उनसे दूर रखने पड़ते
माँ होतीं तो उन्हें कौन सा कमरा देता?
माँ भी क़रीब सत्तर की होतीं
और दिनभर तो वे रसोई में या छत पर होतीं बहू के साथ
या एक कमरे से दूसरे कमरे में बच्चों के बीच
जो अगर उन्हें अकेला छोड़ते
तो रात में वे पिता के कमरे में
या उससे स्थाई लगी हुई बालकनी में उनके पैताने कहीं लेट जातीं
अपनी वही स्थाई जगह तय कर रखी थी उन्होंने
बड़ी बुआ होतीं तो उन्हें कौन सा कमरा देता?
क्या वो होतीं तो अभी भी कुँआरी होतीं
और उसके साथ रहतीं?
हाँ कुँआरी ही होतीं – जब वे मरीं तो ब्याहता होने की
उनकी आस कभी की चली गयी थी
और अब अपने भाई के आसरे न रहतीं तो कहाँ रहतीं –
सो उन्हें देता वह वो वाला बैडरूम
जिसमें वह ख़ुद अपनी पत्नी के साथ रहना चाहता है
वैसे माँ के साथ वे भी दिनभर इधर से उधर होती रहतीं
घर की बड़ी औरतें मजबूरन ही
कुछ घंटों का आराम चाहती हैं
क्या छोटी बुआ होतीं तो वे भी अब तक कुँआरी होतीं?
हाँ कुँआरी ही होतीं – जब बड़ी बहन अनब्याही चली गयी
तो उन्हें ही कौन-सी साध रह गयी थी सुहागिन होने की –
सो छोटी बुआ भी रह लेतीं बड़ी बुआ के साथ
जैसे मौत तक उनके साथ रहीं
जब जवानी में दोनों के बीच कोई कहा-सुनी नहीं हुई
तो अब क्या होती भाई-भौजाई बहू और नाती-नातिनों के बीच
इस तरह माता-पिता और बुआओं से और भर जाता घर
इस घर में और जीवित हो जाता एक घर बयालीस साल पुराना
वह और उसकी पत्नी और बच्चे तब रहते
बचे हुए एक कमरे में
जिसमें बेटियों के लिए थोड़ी आड़ कर दी जाती
कितने प्राण आ जाते इन कमरों में चार और प्राणियों से
लेकिन वह जानता है कि हर आदमी का घर
अक्सर सिर्फ़ एक बार ही होता है जीवन में
और उसका जो घर था
वह चालीस बरसों और चार मौतों के पहले था
कई मजबूरियों और मेहरबानियों से बना है यह घर
और शायद बसा भी है
बहरहाल अब यह उसकी घरवाली और बच्चों का ज्यादा है
अब इसका क्या कि वह इसमें अपने उस पुराने घर को बसा नहीं सकता
जिसके अलावा उसका न तो कोई घर था और न लग पाएगा

इसलिए वह सिर्फ़ बुला सकता है
पिता को माँ को छोटी बुआ बड़ी बुआ को
सिर्फ़ आवाज़ दे सकता है उस सारे बीते हुए को
पितृमोक्ष अमावस्या की तरह सिर्फ़ पुकार सकता है आओ आओ
यहाँ रहो इसे बसाओ
अभी यह सिर्फ़ एक मकान है एक शहर की चीज़ एक फ़्लैट
जिसमें ड्राइंग रूम डाइनिंग स्पेस बैडरूम किचन
जैसी अनबरती बेपहचानी ग़ैर चीज़ें हैं
आओ और इन्हें उस घर में बदलो जिसमें यह नहीं थीं
फिर भी सब था और तुम्हारे पास मैं रहता था
जिसके सपने अब भी मुझे आते हैं
कुछ ऐसा करो कि इस नए घर के सपने पुराने होकर दिखें
और उनमें मुझे दिखो बाबू, भौजी, बड़ी बुआ, छोटी बुआ तुम.


 

 

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