वेतन कटौती के खिलाफ काली पट्टी बाँध कर डीटीसी के हज़ारों कर्मचारियों ने मनाया विरोध दिवस

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 दिल्ली. डीटीसी में काम करनेवाले हज़ारों कर्मचारियों ने वेतन कम करने के डीटीसी प्रबंधन के फैसले का काली पट्टी बांधकर ड्यूटी करते हुए विरोध जताया. डीटीसी के सभी बस डिपो के कर्मचारियों ने 5 सितम्बर को डीटीसी वर्कर्स यूनिटी सेंटर (सम्बद्ध ऐक्टू) के आह्वान पर ‘विरोध दिवस’ कार्यक्रम में जोरदार भागीदारी की.

डीटीसी वर्कर्स यूनिटी सेंटर (सम्बद्ध ऐक्टू) के महासचिव कामरेड राजेश ने कार्यक्रम के विषय में बताते हुए कहा कि, “ दिल्ली सरकार और डीटीसी प्रबंधन को दिल्ली की जनता का ख्याल रखते हुए, जन परिवहन को मज़बूत बनाना चाहिए. पर सरकार और प्रबंधन लगातार कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों के पेट पर लात मारकर डीटीसी के संचालन को बाधित करना चाहते हैं. एक झटके में डीटीसी के कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों के वेतन में 5000 से लेकर 10,000 रूपए तक की कटौती कर दी गई है. डीटीसी वर्कर्स यूनिटी सेंटर इसके खिलाफ हर तरह की लड़ाई में जाने के लिए तैयार है.”

गौरतलब है कि हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय ने लम्बी लड़ाई के बाद जारी हुए न्यूनतम वेतन के नोटीफिकेशन को रद्द कर दिया था. इस अफ़सोसजनक फैसले के कारण दिल्ली में काम करने वाले लाखों मजदूरों के जीवन पर अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे हैं. मालिकों की मनमानी और सरकार की अनदेखी से पहले से ही परेशान मजदूरों को कोर्ट के फैसले ने ज़बरदस्त धक्का पहुँचाया है.

वेतन कम करना सरासर गलत व गैरकानूनी

दिल्ली सरकार के नीचे आनेवाले दिल्ली परिवहन निगम (डीटीसी) ने कोर्ट के फैसले से भी कई कदम आगे जाते हुए सभी ठेका कर्मचारियों के वेतन को कम करने का सर्कुलर जारी कर दिया है. कानूनी रूप से न्यूनतम वेतन से एक रूपया भी कम न देने का प्रावधान है, न्यूनतम वेतन से ज्यादा न दिया जाए ऐसा कहीं नहीं लिखा. डीटीसी प्रबंधन पिछले महीने तक भुगतान किये गए वेतन को कम कर रही है, जबकि उच्च न्यायालय ने किसी कार्यस्थल पर पहले से जारी वेतन कम करने का कोई आदेश नहीं दिया.

वेतन को कम करने का सर्कुलर कानून के बाहर जाकर, मजदूरों के अधिकारों पर हमले का मामला है. जहाँ एक ओर  दिल्ली सरकार के श्रम मंत्री दिल्ली के मजदूरों को ये कह रहे हैं कि केंद्र सरकार द्वारा लागू न्यूनतम वेतन दिल्ली में लागू कर मजदूरों को राहत दी जाएगी, वहीं दूसरी ओर दिल्ली सरकार के परिवहन मंत्री डीटीसी में वेतन कटौती का आदेश दे रहे हैं.

उच्चतम न्यायालय ने पंजाब सरकार बनाम जगजीत सिंह (2017) मामले में ये साफ़ तौर पर कहा है कि ‘समान काम का समान वेतन’ सभी कर्मचारियों का अधिकार है, परन्तु इस फैसले के इतने दिनों बाद भी डीटीसी जैसे सरकारी विभागों/संस्थानों में ‘समान काम का समान वेतन’ लागू नहीं किया गया है. आलम तो ये है कि दिल्ली के सरकारी विभागों में कार्यरत ठेका कर्मचारी भी श्रम कानूनों के लाभ से वंचित हैं ! डीटीसी के अंदर लगातार पक्के किए जाने को लेकर व समान काम के समान वेतन के लिए ठेका कर्मचारी आन्दोलनरत हैं, पर सरकार कुछ भी सुनने को तैयार नहीं है. यूनियनों द्वारा उठाए गए इन मांगों की अपेक्षा वेतन कम करने के सर्कुलर को 21 अगस्त 2018 के दिन जारी गया – ठीक उस दिन जब दिल्ली के श्रम मंत्री न्यूनतम वेतन पर आंच न आने देने का आश्वासन दे रहे थे.

हर दिन बढ़ता प्रतिरोध

सरकार और प्रबंधन के इस तानाशाही-पूर्ण रवैये के खिलाफ ऐक्टू से सम्बद्ध ‘डीटीसी वर्कर्स यूनिटी सेंटर’ ने डीटीसी के कई डिपो के बाहर प्रदर्शन करते हुए सर्कुलर को जलाया. कई डिपो में हुए इस कार्यक्रम में भारी संख्या में ठेका कर्मचारियों की भागीदारी रही. लड़ाई को आगे बढाते हुए दिनांक 26.08.2018 के दिन करीब दस हज़ार कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारी छुट्टी पर चले गए. डीटीसी प्रबंधन को स्थाई कर्मचारियों के दोनों शिफ्ट को एक साथ सुबह की पाली में बुलाना पड़ा – जिसके बावजूद भी दिल्ली की सडकों पर डीटीसी बसों का आवागमन सुगम नहीं हो सका.

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