Wednesday, May 18, 2022
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लेखकों-संस्कृतिकर्मियों को अपने युग के नायकों को पहचानना होगा : प्रो. प्रधान

जन संस्कृति मंच, बिहार का पांचवां राज्य सम्मेलन संपन्न

‘‘कोई शब्दों में नये अर्थ भरता है, तो कोई शब्दों के अर्थ को विकृत करता है। कभी ‘सेवा’ क्रांति जैसा शब्द था, पर आज उसका अर्थ शासकवर्ग ने बदल दिया है। जनता की ही संपत्ति के बल पर वे कभी ‘सौगात’ देते हैं, तो कभी ‘खैरात’ बांटते हैं। शताब्दियों के बलिदान के बाद जो मूल्य मिले थे, सबको कीचड़ में डूबा दिया गया है। मात्र चार घंटे की सूचना पर लॉक डाउन लगाकर जिस तरह जनता को शहरों से निकलने को विवश किया गया, उन मजदूरों को जिन्होंने अपने श्रम से विभिन्न राज्यों की संपदा में योगदान दिया, उन्हें ‘प्रवासी’ कहा गया, जो स्पष्ट रूप से उनके संवैधानिक अधिकारों का हनन था। ऐसी संवेदनहीनता का उदाहरण दूसरा नहीं मिलता।’’

आलोचक प्रो. अवधेश प्रधान ने जन संस्कृति मंच, बिहार के पांचवें राज्य सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए ये विचार व्यक्त किये। सम्मेलन बेगूसराय के पास गोदरगावाँ  स्थित विप्लवी पुस्तकालय के देवी वैदेही सभागार में आयोजित किया गया था। सम्मेलन के केन्द्रीय विषय  ‘दमन, नफरत और विभाजन के खिलाफ एका और प्रतिरोध के लिए’  पर बोलते हुए प्रो. प्रधान ने कहा कि आज ‘देशभक्ति’ और ‘रामभक्ति’ को भी ऐसे सांचे में ढाल दिया गया है कि अब वास्तविक देशभक्ति को देशद्रोह बताया जाना लगा है। किसी तरह कुर्सी बचाना ही देश बचाना हो गया है। प्रो. प्रधान ने रूस के एक महान वैज्ञानिक, जो बोल्शेविक पार्टी के विरोधी थे, का उदाहरण देते हुए कहा कि स्टालिन के पास जब उनकी शिकायत की गयी तो स्टालिन ने कहा कि वह देश का रत्न है। जबकि हमारे यहां वसव साहित्य के विद्वान प्रो. कलबुर्गी, गोविंद पानसरे, नरेंद्र दाभोलकर और गौरी लंकेश की हत्या की गई। महान कवि वरवर राव, आनंद तेलतुमड़े, सुधा भारद्वाज और गौतम नवलखा जैसे बुद्धिजीवियों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को जेल में डाल दिया गया है। यह तो लोकतंत्र और स्वतंत्रता का हनन है।

 

प्रो. प्रधान ने हाल में हुए राजभाषा सम्मेलन का उदाहरण देते हुए कहा कि उसमें कई वक्ता बता रहे थे कि 2014 में आजादी मिली। यदि 2014 में आजादी मिली, तो ये लोग अमृत महोत्सव किसका मना रहे हैं? उत्तर प्रदेश की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि इस प्रदेश को तथाकथित रामराज्य में स्त्रियों पर अत्याचार के लिए याद किया जाएगा।

कोरोना महामारी को विश्व पूंजीवाद की खास रणनीति से जोड़ते हुए प्रो. प्रधान ने कहा कि कोरोना वैक्सिन को लेकर बाजार और पैसा के खेल को ठीक से समझना चाहिए। उन्होंने कहा कि भले अमरीका में सरकार बदल गयी हो, पर वहां भी समाज में नफरत मौजूद है। भारतीय समाज में भी जो नफरत और विभाजन का राजनीतिक अभियान चल रहा है, उसने एक ऐसी संस्कृति को जन्म दिया है, जिसने अंधभक्तों की फौज को पैदा किया है। हमारे देश को बर्बर पूंजीवाद की बड़ी प्रयोगभूमि बना दिया गया है। आजादी के आंदोलन से जो भी हमने हासिल किया था, जो भी संरक्षित किया था, सबको नष्ट किया जा रहा है और बेचा जा रहा है। हमें ज्यादा से ज्यादा जनता के बीच जाना होगा और उन्हें बताना होगा कि यह कैसी स्वतंत्रता है, यह कैसा विकास है, जो समाज के भाईचारे को खत्म कर रहा है, देश की संपदा को बेच रहा है ?

प्रो. प्रधान ने कहा कि भारत में शिक्षा, स्वास्थ्य और संस्कृति तीनों संकट से गुजर रहे है। शिक्षा सामाजिक-आर्थिक विषमता का संस्कार पैदा करने वाला क्षेत्र बनता जा रहा है। देश के वैज्ञानिक पूरी तरह निराश हैं। विज्ञान खतरे में है। वैज्ञानिक कोई बड़ा रिसर्च नहीं कर पा रहे हैं। इस देश में ज्ञान-विज्ञान की अनेक शाखाओं का विकास बिना विचारों की स्वाधीनता के नहीं हुआ था। लेकिन आज विचारों की स्वाधीनता सत्ता को बर्दाश्त नहीं है। प्रो. जयंत विष्णु नार्लिकर कहते हैं कि इस देश में साइंस से भी ज्यादा साइंटिफिक टेंपर की जरूरत है, लेकिन यहां तो वैज्ञानिक चेतना को ही नष्ट करने का अभियान चलाया जा रहा है। खुदगर्जी, सामाजिक दूरी, अकेलापन को बढ़ाया जा रहा है और आपसदारी के मानवीय मूल्य को नष्ट किया जा रहा है।

प्रो. अवधेश प्रधान ने आलोचक रामविलास शर्मा के हवाले से कहा कि 1946-48 का जो जनउभार था, यदि वह सफल हो गया होता, तो आज देश की तस्वीर दूसरी होती। आज आजादी के अमृत महोत्सव पर सांप्रदायिक जहर और विभाजनकारी राजनीति की चुनौती न होती। उन्होंने कहा कि यह राजनीति इतनी निर्मम है कि इसने कोरोना त्रासदी के दौरान भी कुछ खास तरह के प्रयोग किये हैं। नागरिक स्वाधीनता और आजादी के उसके मौलिक संवैधानिक अधिकार को छीनने वाला कानून बनाया। उसी दौरान तीन कृषि कानून लाये किये जिन कृषि बिलों के खिलाफ संविधान दिवस से एकताबद्ध संघर्ष की शुरुआत की।

उन्होंने कहा कि किसान लोकतंत्र के सच्चे प्रतिनिधि और आधार हैं। वे हमारी संस्कृति और राजनीतिक संस्कृति के भी नायक हैं। प्रेमचंद ने किसानों के बीच अपना नायक ढूंढा था। हमें भी अपने युग के नायकों को पहचानना होगा। बिहार किसान आंदोलन की धरती है। हम जिस आंदोलन को जानते हैं, उसे जुड़े लेखक बहुत छपे नहीं, पर दूर-दूर तक गाये गये। हमें अपने उन्हीं लेखकों और संस्कृतिकर्मियों की तरह जनता की बाहु में शक्ति बनकर उतरना होगा। श्रमशील जनसाधारण, किसान-मजदूर और स्त्रियों की आवाज बनना होगा।

पुनः सांगठनिक सत्र में बोलते हुए प्रो. प्रधान ने 1992 का उदाहरण देते हुए बताया कि जिन इलाकों में क्रांतिकारी किसान आंदोलन था, उन्होंने आरएसएस के सांप्रदायिक हमलों और विचारों का सफलता से मुकाबला किया। उस वक्त जसम के पास जनगायकों और जनगीतकारों की बड़ी तादाद थी, जैसा प्रलेस और इप्टा के आरंभिक दिनों में था। जैसे इंदिरा निरंकुशता का सामना किया गया था, वैसे ही जनता आज की फासिस्ट तानाशाही से भी लड़ सकती है। उन्होंने कहा कि क्रांतिकारी विचार भी है और व्यापक आंदोलन की संभावनाएं भी मौजूद हैं। बिहार के पास अनुभव भी है और आधार है। जरूरत यह है कि संस्कृतिकर्मी जनता के बीच जाएं और जो जनकलाकार, जनकवि और जनगायक हैं, उन्हें संगठित करते हुए एकताबद्ध प्रतिरोध को मजबूत किया जाए।

 

उद्घाटन सत्र को जन संस्कृति मंच, उत्तर प्रदेश के कार्यकारी अध्यक्ष कौशल किशोर, हिरावल के पूर्व संस्कृतिकर्मी भाकपा-माले विधायक महानंद, जसम के राष्ट्रीय महासचिव मनोज कुमार सिंह, प्रगतिशील लेखक संघ के राज्य कार्यकारिणी सदस्य राम कुमार, जनवादी लेखक संघ के राज्य सचिव विनीताभ और डॉ. स्नेहलता ने अपने विचार व्यक्त किये।

समकालीन जनमत के प्रधान संपादक रामजी राय ने कहा कि वामपंथी लेखक-सांस्कृतिक संगठनों के साथ-साथ अन्य जनतांत्रिक लेखक संगठनों को भी परस्पर एकताबद्ध होकर काम करना होगा। एकता के सूत्रों की तलाश करनी होगी। लेखक का काम मूल्य की स्थापना करना है। राजनीतिक पार्टियों की कार्यनीति के पीछे चलना उनका काम नहीं है।

उन्होंने सुरक्षा सलाहकार अजीत दोभाल के बयान की चर्चा करते हुए उसे नागरिक अधिकारों के लिए लड़ने वालों के खिलाफ कार्रवाई का आधार तैयार करने वाला बताया । उन्होंने कहा कि उनके पास हत्या के हथियार और विचार दोनों हैं।  रामजी राय ने कहा कि नफरत और विभाजन के खिलाफ एका के विचार को अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाने के लिए हमें नए रूप में आना पड़ेगा, अपने को पुनर्नवीकरण करना होगा। इसके लिए किसान आंदोलन से सीख लेनी होगी।

इसके पहले स्वागताध्यक्ष प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष मंडल सदस्य और सीपीआई के पूर्व विधायक राजेंद्र राजन ने कहा कि भारत गांवों का देश है, जब तक गांव नहीं जगेगा, देश नहीं जग सकता। सांप्रदायिक राजनीति की धारा शहरों से होकर गांवों तक पहुंच चुकी है, बहुसंख्यक आबादी में हिंदुत्ववादी राजनीति के नशे ने हिंसक और आक्रामक प्रवृत्ति को पैदा कर दिया है। यह प्रवृत्ति फासीवादी राजनीति को ताकत प्रदान कर रही है। आज की परिस्थिति में संयुक्त सांस्कृतिक मोर्चा बनाकर सत्ता संरक्षण में पल रहे प्रतिगामी शक्तियों से लोहा लेना होगा।

उद्घाटन सत्र का संचालन सुधीर सुमन ने किया।

जितेंद्र कुमार अध्यक्ष और दीपक सिन्हा सचिव चुने गए 

सम्मेलन के दूसरे दिन निवर्तमान सचिव सुधीर सुमन द्वारा प्रस्तुत आधार पत्र और सांगठनिक विचार-विमर्श के बिंदुओं पर प्रतिनिधियों ने बहस की, जिसका संचालन रंगकर्मी दीपक सिन्हा ने किया। निर्मल नयन, समता राय, सुरेंद्र प्रसाद सुमन, प्रमोद यादव, अमलेंदु, सुमन कुमार सिंह, कृष्ण कुमार निर्मोही, राजू रंजन, राकेश दिवाकर, मो. गालिब आदि ने बहस में हिस्सा लिया। उत्तर प्रदेश से आए रामनरेश राम ने कहा कि साहित्य-संस्कृति मूल्य का निर्माण करता है, जो अस्मितवादी लेखन या संस्कृतिकर्म है, यदि वह प्रतिक्रियावादी नहीं है, तो उसके साथ जन संस्कृति मंच का दोस्ताना रिश्ता ही होना चाहिए। पुस्तकालय आंदोलन विकसित करने और शिक्षकों को सांस्कृतिक आंदोलन से जोड़ने का सुझाव भी उन्होंने दिया। डॉ. स्नेहलता ने महिलाओं की भागीदारी की जरूरत पर जोर दिया। महासचिव मनोज कुमार सिंह ने संगठन की आंतरिक गतिशीलता और नियमितता को आवश्यक बताया। सांगठनिक सत्र को पूर्व महासचिव रामजी राय ने भी संबोधित किया।

सम्मेलन ने 21 सदस्यों की राज्य कार्यकारिणी और 101 सदस्यों की राज्य परिषद बनायी तथा सर्वसम्मति से रंगकर्मी दीपक सिन्हा को नया राज्य सचिव और कवि-कहानीकार-आलोचक जितेंद्र कुमार को नया राज्य अध्यक्ष चुना। सुरेंद्र प्रसाद ‘सुमन’, कृष्ण कुमार निर्मोही, कल्याण भारती, प्रमोद यादव, विजय कुमार सिन्हा और रामबाबू आर्य को उपाध्यक्ष, संतोष झा, सुमन कुमार सिंह, समता राय और डॉ स्नेहलता को सहसचिव चुना गया। सुरेश कांटक, राजू रंजन और अभिनव कार्यकारिणी सदस्य चुने गए।

नाटक ‘ सत्य ‘ का दृश्य

इस मौके पर पहले दिन बेगूसराय की रंगनायक ने रंगकर्मी मोहित मोहन के निर्देशन में नागार्जुन की कविताओं पर आधारित ‘सत्य’ नामक नाट्य प्रस्तुति की। इस नाटक में कोरोना काल में मजदूरों की त्रासदी के प्रसंग को भी जोड़ा गया था। दूसरी प्रस्तुति आरा की नाट्य संस्था ‘युवानीति’ की थी। राजेश कुमार द्वारा ‘मुगलों ने सल्तनत बख्श दी’ कहानी के नाट्य रूपांतर पूंजीवाद और साम्राज्यवाद के प्रसंग में प्रस्तुत किया गया। निर्देशन सूर्य प्रकाश ने किया था। तीसरी नाट्य प्रस्तुति रंगनायक ने सचिन के निर्देशन में ‘एक था गधा उर्फ अलादाद खां’ की हुई। सम्मेलन के दोनों दिन हिरावल के राजन, कोरस से समता राय व रिया, निर्मल नयन, जन गायक कृष्ण कुमार निर्मोही, प्रमोद यादव, राजू रंजन ने जनगीतों की प्रस्तुति की।

 

प्रस्तुति -सुमन कुमार सिंह

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