समकालीन जनमत
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‘ हम किसान से भूमिहीन हो गए ’

विस्थापन का दर्द झेलते सलैया कला गाँव की कहानी 

प्रयागराज की कोरांव विधानसभा आदिवासी बहुल सीट सुरक्षित सीट है. 2012 के पहले यह मेजा विधानसभा में ही आती थी और यहां से सीपीएम के रामकृपाल कोल ने दो बार लगातार चुनाव जीता. 2012 में नई विधानसभा के रूप में गठित होने पर पहली बार बसपा के जैसल ने यहां से खाता खोला और 2017 के चुनाव में भाजपा के राजमणि ने जीत दर्ज की. इस बार यहां सपा ने अपने पुराने नेता रामदेव निडर कोल को तो पहले सीपीएम छोड़कर सपा में और फिर सपा छोड़कर कांग्रेस में आए रामकृपाल कोल लड़ रहे हैं. बसपा और भाजपा ने अपने पुराने प्रत्याशी ही उतारे हैं. सीपीएम ने यहां से चिरौंजीलाल को लड़ाया है. बांदा जिले से होते हुए इलाहाबाद के बारा, मेजा, कोरांव, मिर्जापुर, रॉबर्ट्सगंज तक कोल आदिवासियों की यह पूरी बेल्ट है.

यहां कृषि और गिट्टी पत्थर का काम प्रमुख रूप से था. कोल समुदाय का मुख्य पेशा गिट्टी पत्थर तोड़ने का था जिस पर रोक के बाद वे आमतौर पर वे दिहाड़ी मजदूरी या शहर और प्रदेश से बाहर जाकर मजदूरी करते हैं. मध्यवर्ती जातियों एवं सवर्णों के पास ज्यादातर कृषि भूमि है. इस विधानसभा का एक हिस्सा पठारी भू-भाग है तो दूसरा हिस्सा कृषि योग्य जमीनों का है. इलाके में स्वर्गीय हेमवती नंदन बहुगुणा के समय नहरें भी बनीं. जिससे एक हिस्सा सिंचित हुआ. अभी एक और नहर का निर्माण कार्य चल रहा है, फिर भी एक बड़ा हिस्सा अभी मौसम और भूजल पर ही निर्भर है.

इस इलाके में बड़ा संकट तब शुरू हुआ जब 2010 के बाद एक तरफ रेलवे एवं मेजा थर्मल पावर प्लांट के लिए जमीन का अधिग्रहण शुरू हुआ तो दूसरी तरफ पत्थर गिट्टी तोड़ने के काम पर रोक लगा दी गई. इन्हीं संकटों से प्रभावित गांव सलैया कला और सलैया खुर्द में जाना हुआ. यहां कई समुदायों के लोग रहते हैं जिनमें यादव, पाल, कोल, पटेल, पासी आदि ज्यादा हैं. सलैया कला में बसे सभी लोग थर्मल पावर प्लांट से विस्थापित लोग हैं. पहले इनका गांव पवार का पूरा था जहां आज पावर प्लांट है और वह गांव गायब हो चुका है. मैं पुराने गांव के बारे में ही पूछते पूछते इन लोगों तक पहुंचा. 2012-13 में अधिग्रहण के खिलाफ यहां जबरदस्त आंदोलन भी चला था. जिसमें वरिष्ठ मानवाधिकार कार्यकर्ता ओ. डी. सिंह के नेतृत्व में इलाहाबाद का वाम लोकतांत्रिक नागरिक समाज पूरी एकजुटता से खड़ा था. इस आंदोलन का भयानक दमन तत्कालीन सपा सरकार ने किया.

गांव में पहुंचते ही मालूम चला कि आज यहां से सपा की बाइक रैली गुजरेगी. गांव के एक नौजवान परिचय पूछते हैं तो ‘मीडिया से हूं’ यह बताते ही वह तुरंत कहते हैं गोदी मीडिया से तो नहीं है? और ऐसा है तो बाद में आइए. बाद में परिचय बातचीत होने पर वह स्वागत भी करते हैं. आंदोलन समाप्त होने के बाद अब तक 8 साल से ज्यादा समय बीत गया है. अभी भी काफी लोगों को जमीन का मुआवजा नहीं मिला है. यहां जिनको मिला भी है वह भी ₹90000 प्रति बीघा की दर से जबकि उस समय भी इसकी कीमत 5 गुना ज्यादा थी. मनमोहन यादव के परिवार की 20 बीघा जमीन गई है लेकिन मुआवजा अब तक नहीं मिला है.

रितेश यादव के परिवार को भी मुकदमे में उलझने के कारण अभी तक मुआवजा नहीं मिल सका है. कोल समुदाय के अरुण कुमार और विनोद कुमार के घर वहां थे. वे भी विस्थापित होकर यहां आए हैं और दिहाड़ी मजदूरी करते हैं. विनोद पढ़ाई भी करते थे लेकिन कहते हैं कि पूरी शिक्षा इस सरकार ने नष्ट कर दी है. हमारा पुश्तैनी काम भी पत्थर गिट्टी तोड़ने का छिन गया. वह राशन की बोरी दिखाते हैं जो कोटेदार से लाए हैं और कहते हैं कि क्या इससे महीने भर पूरे परिवार का पेट भर जाएगा. संजय कुमार यादव की साढ़े तीन बीघा जमीन गई है. उनको नब्बे हजार प्रति बीघा की दर से मुआवजा भी मिला है लेकिन कहते हैं कि वह पैसा तो कब का खत्म हो गया. हम किसान से भूमिहीन हो गए. संजय बीएड करके बेरोजगार हैं. अपने गांव को याद करते हुए वह भावुक हो जाते हैं और कहते हैं कि हम वहां ज्यादा खुशहाल थे.

एनटीपीसी ने यहां पावर प्लांट लगाते हुए कई वादे किए थे. जमीन का बाजार दर से मुआवजा, हर घर से एक बच्चे को आईटीआई करवा कर टेक्निकल ट्रेड में नौकरी, आवास, विद्यालय, पीने के पानी की व्यवस्था, सामुदायिक भवन, शौचालय एवं स्वास्थ्य केंद्र की सुविधा. क्या उसने यह वादे पूरे किए यह पूछने पर लोग एक स्वर में ‘नहीं’ बोलते हैं. बताते हैं कि लड़कों को सरकारी संस्थान से आईटीआई तो करवाया लेकिन कुल 7-8 परिवार के लड़कों ही नौकरी मिली वह भी कॉन्ट्रैक्ट पर 7 से 8 हजार महीना. स्कूल और स्वास्थ्य केंद्र नहीं बनवाया. आवास न देकर डेढ़ बिस्वा खाली जमीन (लगभग 2000 स्क्वायर फीट का खाली प्लॉट) दिया है. अब हमने इसमें घर अपने खर्चे से बनाए लेकिन गाय गोरू इतनी कम जगह में कैसे पालें. पीने के पानी की कोई व्यवस्था नहीं है. एक टंकी बनी लेकिन कनेक्शन ही नहीं है. यहां 400 फीट नीचे पानी मिलता है और गर्मी में जल स्तर और नीचे चला जाता है. अब कौन कौन अपने खर्चे से समरसेबल लगवा सकता है.

सलैया कला गाँव में अरुण कुमार और विनोद कुमार

एक सामुदायिक भवन 6 साल पहले बना था लेकिन वह भी जर्जर हो चला है और कभी उसका कोई रखरखाव नहीं किया गया. शौचालय में आज भी बाहर से पानी लेकर जाना पड़ता है. महिलाओं के लिए कभी-कभी सिलाई आदि की ट्रेनिंग देते हैं, फोटो खिंचवाते हैं लेकिन इनके लिए यहां रोजगार कहां है? महिलाओं के लिए यहां स्वरोजगार का कोई प्रयास भी नहीं किया गया. किसी किसी ने सिलेंडर लिया है 1500 से 2000 देकर लेकिन अब मंहगाई और आय न होने के कारण भराने की स्थिति नहीं है. सरकार के बारे में पूछने पर लोगों का गुस्सा निकल पड़ता है, कहते हैं सबने वादा किया कि सरकार बनने पर आपका मुद्दा उठाएंगे लेकिन जीतने के बाद झांकने भी नहीं आए. कोल समुदाय ने पहले बसपा और पिछली बार काफी लोगों ने भाजपा को भी वोट दिया था. सलैया कला का पाल समुदाय अभी असमंजस की स्थिति में दिखा. उनका जमीन वाला मामला भी इस तरह का नहीं था. वहां लोगों की राय अभी बंटी हुई थी.

मनमोहन यादव और रितेश यादव

सलैया खुर्द में जब विस्थापन से प्रभावित लोगों से मैंने पूछा कि 2013 में तो सपा की सरकार थी, जिसने आपके आंदोलन पर भयानक पुलिस दमन किया था, आप लोगों को जेल – जुर्माना – घायल होकर अपना गांव जमीन सब छोड़ना पड़ा तो अबकी चुनाव में क्या करेंगे? नौजवान और महिलाएं तो साफ-साफ ही बोलीं कि हां उस समय यह सब हुआ लेकिन अब आगे का देखना है. इस सरकार में तो और कठिनाई बढ़ गई है. इनको तो जिता कर भी देख लिया, अब दूसरा ही सोचेंगे.
इस गांव की यह कैसी विडंबना है जिस सरकार के शासनकाल में उन्होंने सब कुछ गंवाया आज वह फिर उससे ज्यादा परेशान होकर उसी की तरफ मुड़ते नजर आ रहे हैं. शायद भारतीय लोकतंत्र को भी इसी गांव की तरह ऐसी ही विडंबना से गुजरना पड़ रहा है.

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