Sunday, August 7, 2022
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प्रयागराज : कृषि संकट, बेरोजगारी, महंगाई और निरंकुशता चुनाव के मुद्दे बन गए हैं

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के चार चरण बीत चुके हैं. सात चरणों में होने वाले चुनाव के पांचवें चरण में 27 फरवरी को भाजपा के ब्रांडिंग वाले जिलों में से एक इलाहाबाद (अब प्रयागराज) भी शामिल है.जिले और शहर का नाम बदलने और दिव्य भव्य अर्ध कुंभ के विशाल खर्चीले आयोजन के बाद 2019 में लोकसभा के चुनाव में सभी सीटें भाजपा ने जीती थीं. पिछले विधानसभा चुनाव में भी कभी समाजवादियों का गढ़ रहे इलाहाबाद से उसे कुल 12 में से 8 सीटों पर जीत मिली थी.

उनके प्रत्याशी सिर्फ जीते ही नहीं थे बल्कि भारी अंतर से जीते थे. आमतौर पर 20 से 30 हजार मतों के अंतर से.
इलाहाबाद के 12 सीटों में से 6 सीटों पर जिसमें शहर की दो उत्तरी और पश्चिमी ग्रामीण इलाकों की चार हंडिया, मेजा, करछना और कोरांव (सु) विधानसभा में हमने जानने की कोशिश कि चुनाव में लोगों के लिए प्रमुख मुद्दे क्या हैं. वह जाति समीकरण पर ही वोट करने जा रहे हैं या इसमें कुछ बदलाव हुआ है.

इलाहाबाद से एक साल से ज्यादा चले ऐतिहासिक किसान आंदोलन में भागीदारी नगण्य ही रही थी. कार्यकर्ताओं और नागरिक समाज ने जरूर कुछ धरने प्रदर्शन उसके समर्थन में किए थे लेकिन बावजूद इसके ग्रामीण इलाकों में यह बातचीत का मुद्दा बन गया है. छुट्टा पशु, डीजल की महंगाई, क्रय केंद्रों पर खरीद न होना, फसल के दाम ना मिलना और किसानी का संकट में होना. हंडिया के छीड़ी गांव के मोती लाल बिंद कहते हैं कि पहले एक बीघा खेत हम ₹800 में जोत लेते थे अब 13000-1500 रुपए देना पड़ता है और छोटे किसानों को धान बिचौलियों को ही कम दाम पर 1200 रुपए में बेचना पड़ा. आवारा पशुओं के कारण खेत की बाड़ बंदी का खर्चा और रात रात भर जागना अलग से.

अल्लापुर में छात्र

यह पूछने पर कि आपके विधायक ने यह मुद्दा विपक्ष में होने के बावजूद क्यों नहीं उठाया वो कहते हैं कि जरूर उन्हें उठाना चाहिए था. यहां से भाजपा की 2017 की लहर में ब्राम्हण, यादव, बिंद बहुल सीट बसपा से हाकिम लाल बिंद ने जीती थी और अब वह सपा से प्रत्याशी हैं.भाजपा गठबंधन में सीट निषाद पार्टी के खाते में आई है और उसने पहले सपा से विधायक रहे प्रशांत सिंह को मैदान में उतारा है. जबकि बसपा ने ब्लाक प्रमुख रहे मुन्ना त्रिपाठी को उतारकर मुकाबला त्रिकोणीय बनाने की कोशिश की है. चुनाव पर चर्चा होने पर आरक्षण, रोजगार के मुद्दे कोरोना काल की हालत और राशन की बात आ जाती है.

रिखीपुर गांव के नौजवान उमेश गुप्ता कहते हैं कि इस सरकार ने वैकेंसी रोक दी है और जो आ रही है उसमें भी पहले से ज्यादा भ्रष्टाचार बढ़ गया है. विज्ञापन करके फार्म भरवाए जाते हैं लेकिन इम्तिहान नहीं हो रहे हैं इसलिए इस बार प्रदेश में बदलाव करना है. छात्र नौजवानों से जहाँ भी बात हुई चाहे शहर हो या गांव सभी जगह से यह मुखर और मजबूत आवाज है. चाहे अमित शाह के रोड शो के दौरान मिले अर्पित पांडेय हों जो सुपर टेट की कोचिंग कर रहे या कोरांव के उमेश सिंह हों या शहर उत्तरी में अल्लापुर में चाय की दुकान पर मिले आभाष जो अर्थशास्त्र से एम ए हैं या शोध छात्र सौरभ वर्मा, मृदुला और शिवानी हों. छात्र समुदाय जाति और धर्म के समीकरणों से अलग अपने मुद्दे पर संगठित और सरकार के मुखर विरोध में दिखा.

भटैती गाँव का साप्ताहिक बाजार

बड़ौत में मिले आर.सी.पटेल प्रतापपुर विधानसभा के हैं जहां से अपना दल (सोनेलाल) से हंडिया के पूर्व विधायक राकेश धर त्रिपाठी और सपा से विजमा यादव चुनाव लड़ रही हैं। आरसी पटेल कहते हैं कि किसान सम्मान निधि मिली है, फ्री राशन मिल रहा है, अब मजदूरों को भी पैसा मिलेगा इसलिए यह सरकार ठीक है. हंडिया बाजार में उमेश शुक्ला चुनाव को लेकर अपनी पार्टी भाजपा की रणनीति से खिन्न नजर आते हैं. कहते हैं मेरा पूरा परिवार पिता के समय से ही संघ में रहा है. लेकिन इस बार उत्तर प्रदेश के शीर्ष नेतृत्व ने चुनाव के लिए रणनीति तैयार करने में अकुशलता का परिचय दिया है जिससे आम कार्यकर्ताओं में उत्साह नहीं है. इसमें वह कई नेताओं के पार्टी छोड़ने और टिकट बंटवारे तक के मुद्दे के गिनाते हैं.

धोबहां, गौसिया, इमामगंज आदि जो मुस्लिम बहुल इलाके हैं वहां नौजवान से लेकर बुजुर्ग तक कहते हैं के सारे सवाल एक तरफ लेकिन हमारे लिए जीवन मरण का प्रश्न है यह चुनाव. बुलडोजर केवल माफियाओं पर नहीं चला है हम गरीबों के सीने पर भी चला है. शहर पश्चिम में लोगों ने कहा कि अतीक अहमद के घर पर दफ्तर पर बुलडोजर चला ठीक है मान लिया लेकिन प्रोफेसर अली अहमद फातमी जो विश्वविद्यालय के अध्यापक रहे हैं, वह कौन से माफिया थे जिनका घर गिरा दिया.स्टेट लैंड पर तो सोहबतिया बाग से लेकर बघाड़ा तक बड़े से बड़े मोहल्ले बसे हैं.

लीलावती कोल

करछना की सीट भाजपा गठबंधन में निषाद पार्टी को मिली है. यहां से सपा लगातार जीतती रही है. चौराहे पर चाय पीते लोगों में बहस मुबाहिसा तेज है.सब अपने-अपने प्रत्याशियों और पार्टी के प्रचार में खुल कर बोल रहे हैं. नतीजे तो 10 मार्च को आएंगे लेकिन चुनाव में किसानों का संकट, रोजगार, महंगाई, पुलिस की निरंकुशता दलितों और अल्पसंख्यकों का दमन मुद्दा जरूर बन गया है.

करछना विधानसभा के गाँव मुंगारी की कोल बस्ती में जाने पर गरीबी और उदासी पसरी मिली. बस एक छोटा बच्चा प्लास्टिक की बोतल से गाड़ी बनाकर खेलता खुश दिखा.यहाँ कॉल बस्ती के लोगों को न आवास मिला है, न खेती है और न ही पीने का पानी. यहां तक कि बस्ती से निकलने का रास्ता. दूसरे की जमीन से होकर सड़क पर आना पड़ता है. यहां लीलावती कोल कहती हैं कि हमलोगों की कोई सुनवाई नहीं. कोई-कोई सिलेंडर पाया है। राकेश को सिलेंडर पाने के लिए दो हजार देना पड़ा.

मेजा विधानसभा

इस विधानसभा से पिछली बार भाजपा के बाहुबली करवरिया बंधु के खानदान की बहू नीलम करवरिया ने अपने पति के जेल जाने के बाद चुनाव लड़ा था और जीत दर्ज की थी. उनके मुकाबले में इस बार सपा ने संदीप पटेल को उतारा है. जातीय समीकरण के लिहाज से यहां ब्राह्मण पटेल और निषाद आबादी का बड़ा हिस्सा बनाते हैं उसके अलावा यादव और दलित जातियां हैं.

अर्पित पांडेय

ब्राह्मण- निषाद बहुल गांव भटैती में पहुंचने पर बाहर ही कुछ लोग भाजपा के प्रचारक मिले जो बारा विधानसभा से यहां किसी के घर पर मिलने आए थे. बारा और मेजा से अपनी जीत पक्की बताते हैं और कहते हैं कि करछना में लड़ाई में हैं. अंदर जाने पर कई लोग बैठे हुए मिलते हैं। परिचय देकर बातचीत शुरू हो जाती है। आवारा पशु और कृषि का संकट यहां भी बड़ा मुद्दा है बातचीत में लव कुश पांडे कहते हैं कि आवारा पशु तो हमारे आपके घर के ही हैं लेकिन सरकार की व्यवस्था कम है. ट्रैक्टर के कारण आवारा पशु ज्यादा हो गए हैं. लेकिन उनकी बात काटते हुए रमेश दुबे बोल पड़ते हैं जानवर तो पहले भी ऐसे ही थे और हम लोग उन्हें खिला पिला लेते थे. अब जो महंगाई और कानून की मार पड़ी है उससे मुश्किल हो गई है.

बहस तेज हो जाती है.अब तो खेती करना ही मुश्किल हो गया है. मेरे पूछने पर कि सरकार राशन तो दे ही रही है रमेश दुबे कहते हैं कि मैं पहले 20 क्विंटल गेहूं पैदा करता था, सरकार 50 किलो महीना देती है तो साल का 6 क्विंटल ही हुआ. 14 क्विंटल तो गया ना. यह मेरा भी नुकसान है और देश का भी नुकसान है. कहते हैं खेत परती पड़ा है.लाखों रुपया लाएं तब तो तार खंभा लगाएं.

करछना विधान सभा क्षेत्र की कोल बस्ती मुंगारी

सरसों की बढ़ती खेती की बाबत पूछने पर लोग कहते हैं गाय गोरू से जब तक ये छोटे हैं तब तक ज्यादा रखवाली करनी पड़ती है, बड़े होने पर इन्हें जानवर कम खाते हैं इसीलिए ज्यादा लगा रहे हैं लेकिन पैदावार कम है और कीटों का खतरा भी ज्यादा है.सपा के समय के गुंडाराज पर बात करने पर लोग कहते हैं कि हां ऐसे तो गुंडागर्दी कम हुई है लेकिन पुलिस की गुंडई बहुत ज्यादा बढ़ गई है, और भ्रष्टाचार ही बढ़ा है. फिलहाल चुनाव में भाजपा के साथ ही जाएंगे.

गांव से निकलकर चौराहे पर लगने वाले बाजार में आता हूं. यहां हर तीसरे दिन बाजार लगता है और मोड़ पर कुछ दुकानें हैं. चाय मिठाई की दुकान के मालिक पटेल है और वह कहते हैं कि बिक्री घटी है.चुनाव में सपा के साथ हैं. बाजार में निषाद लोग मछली बेच रहे थे. आसपास के तमाम गांव के लोग भी यहां मिलते हैं. मेजा के राजू निषाद कहते हैं हमारे समुदाय का वोट यहां बट रहा है, एकमुश्त कहीं नहीं जाएगा.वहीं करछना के गांव बलुहा के मोनू निषाद कहते हैं उनकी तरफ निषाद पार्टी को जाएगा.

के के पांडेय
के. के. पाण्डेय समकालीन जनमत (प्रिंट) के संपादक हैं । Email: kkjanmat@gmail.com
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