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अंबेडकर पर रामायन की निगाह

हमारे देश के जिन महान मनुष्यों की दुनिया भर में ख्याति है उनमें अंबेडकर अन्यतम हैं । पेरी एंडरसन ने अपनी किताब ‘इंडियन आइडियोलाजी’ में उनके बौद्धिक विवेक की मुक्त कंठ से प्रशंसा की है । हमारे देश में उन्हें दलित पहचान के साथ अधिक जोड़ा जाता है लेकिन शेष विश्व में उन्हें लोकतंत्र के गम्भीर चिंतकों की श्रेणी में देखा परखा जाता है । डॉ रामायन राम बहुत दिनों से अंबेडकर के बारे में लिखते रहे हैं । समय समय पर लिखे इन लेखों से बनी उनकी इस किताब में वर्तमान राजनीतिक विमर्श के भीतर अंबेडकर की प्रासंगिकता की छानबीन की गई है ।

सबसे पहले उन्होंने ठीक ही अंबेडकर के उन प्रस्तावों का विवेचन किया है जिन्हें वे हमारे देश के संविधान में शामिल नहीं करवा सके । संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष होने के नाते उन्होंने अपने ठोस विचारों के मुकाबले सहमति को तरजीह दी लेकिन ‘राज्य और अल्पसंख्यक’ नामक दस्तावेज में वांछित प्रस्तावों को दर्ज किया और ज्ञापन के रूप में संविधान सभा के समक्ष पेश किया ।

इसके आधार पर लेखक ने दलित अस्मिता की राजनीति करने वालों की ओर से अंबेडकर को महज सत्ता में भागीदारी का पैरोकार बनाने की चेष्टा का विरोध भी किया है और उनकी सोच के क्रांतिकारी पहलुओं को उजागर किया है । इसमें वे बहुसंख्यक हिंदुओं के अत्याचार से अनुसूचित जातियों को बचाने के लिए अल्पसंख्यकों से भी अधिक सुरक्षा उपायों की मांग करते हैं । इसके लिए वे मजबूत सार्वजनिक क्षेत्र के अतिरिक्त खेती को भी राज्य के मातहत लाकर सामूहिक फ़ार्मिंग का प्रस्ताव करते हैं ।

उन्हें पता था कि खेती में ही सामंती उत्पीड़न सबसे अधिक होता है इसलिए उसकी रीढ़ तोड़ने के लिए जमीन के राष्ट्रीकरण की मांग उठाते हैं । जमींदारी का नाश उन्हें इसी तरह से होता सम्भव लग रहा था । अपनी इस प्रस्तावित योजना को उन्होंने ‘राजकीय समाजवाद’ कहा था । खूंखार निजी पूंजी पर लगाम लगाने के लिए समाजवाद की क्षमता को वे जानते थे । राजकीय नियंत्रण से अर्थतंत्र को आजाद करने को वे जमींदारों को लगान बढ़ाने और पूंजीपतियों को मजदूरी घटाने की आजादी मानते थे।

कामगारों के सभी तबकों की सामाजिक मुक्ति की उनकी चिंता स्त्री समुदाय की मुक्ति तक जाती है । उसकी पराधीनता को अंबेडकर जाति व्यवस्था से जोड़कर देखते हैं । जाति प्रथा के पुनरुत्पादन के लिए सजातीय विवाह सबसे अधिक जरूरी है और स्त्री की आजादी को खत्म किए बिना इस पोंगापंथी प्रथा को लागू करना असम्भव था । स्त्री को गुलाम बनाने की इस प्रक्रिया को इतिहास में खोजते हुए वे वैदिक काल में स्त्री के साथ ही शूद्र की स्वतंत्रता के सबूत पेश करते हैं । इसके बाद उनकी हालत में गिरावट के विरुद्ध विद्रोह बौद्ध धर्म में देखते हैं । यह विद्रोह पुन: शूद्र के साथ स्त्री के प्रसंग में भी नजर आता है ।

खास बात कि बौद्ध धर्म के चलते पशुबलि पर रोक लगने से ब्राह्मणवाद पर चोट लगी । इस पहलू से देखने पर गुलाम बनाने की एक और प्रक्रिया का उद्घाटन होता है । इसके विरोध में जो प्रतिक्रांति हुई उसका घोषणापत्र मनुस्मृति है । इस ग्रंथ में शूद्रों के साथ साथ युवा और विधवा स्त्री पर रोक लगाने के कठोर विधान रचे गए । इसके लिए सती प्रथा और बालविवाह जैसी कुप्रथाओं का सृजन हुआ । इसीलिए जाति प्रथा के विनाश के लिए अंबेडकर स्त्री की मुक्ति को अनिवार्य मानते थे । इसी मोर्चे पर अपनी कोशिशों को विफल होता देखकर उन्होंने कानून मंत्री के पद से इस्तीफ़ा दिया था ।

भारत को सच्चे अर्थों में समतामूलक आधुनिक लोकतांत्रिक देश बनाने के लिए वे जाति और लिंग आधारित विषमता के समाजार्थिक और सांस्कृतिक रूपों को समाप्त कर देना चाहते थे । इसके लिए संगठित होकर प्रयास करने की उन्होंने प्रेरणा दी । आमूलचूल सामाजिक बदलाव के भगत सिंह या प्रेमचंद जैसे समर्थकों की तरह अंबेडकर भी राष्ट्र निर्माण के लिए जाति और लिंग आधारित विषमता को समाप्त करने के काम में फ़्रांसिसी क्रांति जैसी मूलगामी क्रांतियों की उपयोगिता समझते थे ।

स्वाधीनता आंदोलन के इस वाम पक्ष को शासक समूह पूरी तरह से पहचानने से इनकार करता है । फिलहाल का वातावरण रामायन की इस पुस्तिका में लगातार मौजूद रहता है । मनुष्य की बराबरी के विराट लक्ष्य से संचालित अंबेडकर के सामाजिक चिंतन के हत्यारे आज सत्ता पर काबिज हैं । यही संदर्भ किताब को प्रासंगिक बनाता है । अंबेडकर की विचारधारा को वर्तमान को बदलने के लिए कारगर बनाने के लिए रामायन ने उचित ही क्रांतिकारी अंबेडकर को खोजा है । इस अंबेडकर ने तत्कालीन स्वराज में लोकतंत्र की चेतना का प्रवेश कराने की चेष्टा प्राणपण से की । लोकतंत्र को विस्तारित और साकार करने की बात तो दूर उसकी कब्र खोदने की जोरदार मुहिम के इस दौर में इस क्रांतिकारी अंबेडकर को अपने देश को पूरी तरह से आधुनिक लोकतांत्रिक राष्ट्र बनाने के लिए प्रकाश स्तम्भ के बतौर ग्रहण करना लाजिमी काम है ।

( पुस्तक के लेखक  युवा आलोचक, असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. रामायन राम ‘जन संस्कृति मंच’ उत्तर प्रदेश इकाई के राज्य सचिव हैं. समीक्षक गोपाल प्रधान वामपंथी छात्र राजनीति में सक्रिय रहने के बाद पिछले कुछ दिनों से लगातार इक्कीसवीं सदी में मार्क्सवाद के विकास पर काम कर रहे हैं . वे फिलहाल दिल्ली के अम्बेडकर विश्वविद्यालय में स्कूल ऑफ़ लेटर्स में अध्यापक हैं )

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