समकालीन जनमत
पुस्तक

दो सौ साल बाद मार्क्स का अर्थशास्त्र

2018 में लुलु.काम से माइकेल राबर्ट्स की किताब ‘ मार्क्स 200: -ए रिव्यू आफ़ मार्क्स इकोनामिक्स 200 ईयर्स आफ़्टर हिज बर्थ ’ का प्रकाशन हुआ । किताब में मार्क्स के अर्थशास्त्र का संक्षिप्त परिचय देने के बाद पूंजीवाद की गति के नियमों (मूल्य का नियम, पूंजी संचय का नियम और मुनाफ़े की घटती दर का नियम) का विवरण देने के बाद संकट के उनके सिद्धांत का विवेचन किया गया है । इसके बाद मार्क्स के आलोचकों के तर्कों का जायजा लिया गया है । इसके बाद पूंजीवाद के बारे में मार्क्स की उन बातों का उल्लेख है जो अब भी प्रासंगिक लगती हैं । इनमें विषमता और साम्राज्यवाद के साथ उसकी अभिन्नता, धरती के विनाश, मशीन के आगमन तथा वर्ग संघर्ष की निरंतरता पर जोर दिया गया है ।

किताब का मुख्य मकसद भी मार्क्स के आर्थिक चिंतन की व्याख्या और इस समय के लिए उनकी प्रासंगिकता का विवेचन है । पूंजीवाद की गति के को नियम उन्होंने खोजे उनसे समझा जा सकता है कि उसमें बार बार और नियमित रूप से गिरावट क्यों आती है, विभिन्न देशों के बीच युद्ध को जन्म देने वाली दुश्मनी क्यों बनी रहती है और प्राकृतिक संसाधनों का ऐसा बेलगाम तथा बरबादी भरा इस्तेमाल क्यों होता है जिससे धरती के ही विनाश का खतरा पैदा हो गया है । उनके विचारों को पढ़ने से यह भी पता चलता है कि यह पूंजीवाद हमेशा से मौजूद नहीं था इसलिए हमेशा नहीं बना रहेगा । सवाल यह है कि इस धरती पर पूंजीवाद की जगह पर कैसी उत्पादन पद्धति और कैसा सामाजिक संगठन स्थापित किया जाए ।

लेखक ने मार्क्स के आर्थिक चिंतन के चार चरण माने हैं- बचपन, युवावस्था, परिपक्व और वार्धक्य के । बचपन में उन पर पिता और भावी ससुर के विचारों का असर था । ये दोनों ही प्रबोधन और फ़्रांसिसी क्रांति के मूल्यों से गहरे  प्रभावित थे शायद इसीलिए जब मार्क्स युवावस्था में दाखिल हुए तो धार्मिक अंधविश्वास और तानाशाही के प्रचंड विरोधी तो बन ही गए थे ही उनके विचारों में मूलगामी लोकतांत्रिक तत्व भी प्रबलता से समाए हुए थे ।

युवावस्था का उनका समय वैचारिक विस्फोट और यूरोप व्यापी राजनीतिक सक्रियता का था । ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति के चलते मजदूरों का घनघोर शोषण और उसकी वजह से मशीनों और वस्तुओं का वैश्विक प्रसार हो रहा था। मध्य वर्ग को मताधिकार मिला था और चार्टिस्ट मजदूर आंदोलन इसके विस्तार की मांग कर रहा था । स्वदेश जर्मनी में भी शहरों में मजदूर संगठन बन रहे थे और देहात में विक्षोभ पैदा हो रहा था । उसके विभिन्न प्रांतों के बीच मौजूद व्यापारिक अवरोध खत्म होने से आर्थिक ताकत के बतौर उसका उभार हो रहा था । मार्क्स के विचारों में वर्ग संघर्ष की भौतिकवादी धारणा ने जड़ जमा ली और क्रांतिकारी पत्रकार के रूप में उनका विकास हुआ ।

इसी समय पूंजीवाद के गढ़ में रहने के कारण उसके समाजार्थिक प्रभावों के जानकार एंगेल्स के प्रभाव से मार्क्स में भी आर्थिक बदलावों की जानकारी में रुचि पैदा हुई । दोनों ने लगभग एक ही साथ पूंजीवाद की जगह पर सामूहिक नियंत्रण वाली उत्पादन पद्धति और सामाजिक संगठन की समर्थक विचारधारा साम्यवाद का झंडा पकड़ा । इस उत्पादन पद्धति और समाज का जन्मदाता पूंजीवाद की कब्र खोदनेवाले मजदूर वर्ग को होना था । मार्क्स और एंगेल्स दोनों ने मिलकर कम्यूनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र लिखा जिसमें पूंजीवाद की बुनियादी प्रकृति की पहचान तो थी लेकिन उसकी गति के नियमों को स्पष्ट नहीं किया गया था । यह किताब 1848 की क्रांतियों से ठीक पहले छपी लेकिन समूचे यूरोप में व्याप्त क्रांति कुचल दी गई ।

इसके बाद मार्क्स की बत्तीस से लेकर तिरेपन साल तक की उम्र के इक्कीस सालों को वे परिपक्व मार्क्स का समय मानते हैं । इस समय यूरोपीय अर्थतंत्र में उन्नति हो रही थी और ब्रिटेन ही प्रधान राजनीतिक आर्थिक शक्तिकेंद्र के रूप में सामने आया था  इसलिए पूंजीवाद के अध्ययन के लिए सर्वोत्तम स्थान था । दीर्घकालीन उन्नति के इस दौर से मार्क्स और एंगेल्स समझ सके कि क्रांति का कोई झटपट फ़ार्मूला नहीं होता और पूंजीवाद का वैश्विक प्रसार जारी रहेगा । 1857 के प्रथम अंतर्राष्ट्रीय संकट से भी न पूंजीवाद नष्ट हुआ न क्रांति हुई । मार्क्स ने पूरी ऊर्जा इंटरनेशनल के संचालन और पूंजी के नियमों को उद्घाटित करने वाले अपने ग्रंथ में लगाई । मार्क्स के जीवन का अंतिम दौर पेरिस कम्यून की पराजय से लेकर ब्रिटेन के गहरे आर्थिक संकट तक चला । पेरिस कम्यून की पराजय के तुरंत बाद अमेरिका में वित्तीय संकट आया जो जल्दी ही यूरोप भर में फैल गया । बाद में इसे पहली महामंदी की शुरुआत माना गया । इससे पूंजीवाद की गति के मार्क्स द्वारा खोजे गए नियमों की पुष्टि हुई ।

देहांत के बाद मार्क्स का नाम कुछेक यूरोपीय सामाजिक जनवादी पार्टियों के नेताओं में ही सुना जाता था, आर्थिक और राजनीतिक चिंतन की दुनिया में उनका नाम लेना गुनाह था । 1890 के बाद आर्थिक हालात में सुधार होने के बाद मजदूरों ने ट्रेड यूनियनें बनानी शुरू कर दीं और मजदूर वर्ग के इन संगठनों से उत्पन्न राजनीतिक पार्टियों को समर्थन भी मिलने लगा । मार्क्स के विचारों का प्रचार हुआ । इसके बाद तो 1917 की बोल्शेविक क्रांति ने उनके विचारों को बीसवीं सदी का संदर्भ विंदु बना दिया ।

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