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उत्सव के बहाने आदिवासी भाषा, समाज, संस्कृति और पर्यावरण पर आत्मचिंतन 

 

अंतर्राष्ट्रीय आदिवासी दिवस के रजत जयंती वर्ष में नई दिल्ली के इंदिरा गांधी कला केंद्र में दो दिवसीय (10 व 11 अगस्त) कार्यक्रमकी शुरुआत प्रकृति पूजा से हुई। गुरुवा लुकास टुटी ने मंच पर धरती मां के लिए मुंदरी प्रार्थना करवाई। इससे पहले गुमला झारखंड संस्कृति मंच के कलाकार मुख्य व विशिष्ट अतिथियों को परधाते हुए मंच तक लिवाकर आए। फिर आदिवासी परंपरा के अनुसार उनके हाथ पांव धोए गए।

इसके बाद दिल्ली के आदिवासी छात्रों द्वारा नगड़ा, मांदर, ढोल जैसे वाद्ययंत्रों को बजाकर कार्यक्रम का विधिवत उद्घाटन किया गया।

 

कार्यक्रम का उद्घाटन वक्तव्य देते हुए डॉ. अभय खाखा ने कहा- “आदिवासी भाषाएं अन्य भाषाओं से बुनियादी तौर पर अलग होती हैं, वे नदियों की तरह होती हैं, जो जंगल के भीतर निर्बाध रूप से बहती हैं और विविध पारिस्थितिकी तंत्रों व समुदायों का पोषण करती हैं। जैसे आधुनिक समाज बांध बनाकार नदियों में हेरफेर करने की कोशिश कर रहे हैं, वैसे ही आदिवासी भाषाओं पर भी वर्चस्व कायम करके खत्म किया जा रहा है। आदिवासियों को बचाने के लिए हमें सबसे पहले आदिवासी भाषाओं को बचाना होगा। आदिवासी भाषा के खत्म होने से पर्यावरण का विनाश होगा।”

मुख्य अतिथि के तौर पर कार्यक्रम में आए और चकमा समुदाय से तात्लुक़ रखने वाले राजा देबाशीष रॉय ने सभा को संबोधित करते हुए कहा- “आज हम इस तरह के कार्यक्रमों में शामिल होने के लिए ही आदिवासी कपड़े पहनते हैं। आदिवासी होने के लिए दिल आदिवासी होना चाहिए, स्पिरिट होनी चाहिए। हमारे यहां गर किसी आदिवासी परिवार में केवल स्त्री भर है, उसके घर में पुरुष नहीं हैं तो वो धान की फसल घर लाने के लिए मलया करती है। मलया एक प्रतीक है सहायता मांगने का। ओरांव आदिवासी समुदाय में इसे मदइत (मदद) कहते हैं। किसी स्त्री के मलया कहते ही गांव के स्त्री पुरुष उसकी मदद के लिए आ जाते हैं, जो नहीं आता उसे आदिवासी समाज से वहिष्कृत कर दिया जाता है। सामूहिकता ही आदिवासियत की आत्मा है। हमारे निजी अधिकार, सामूहिक अधिकार, सांस्कृतिक अधिकार, राजनीतिक अधिकार, समाजिक- आर्थिक अधिकार भी मानवाधिकार में होने चाहिए। हिंदू, मुस्लिम, ईसाई से अलग हमारा अपना धर्म और स्पिरिट है। हमें क्या कोडिफाई करना है इसका फैसला हम करेंगे, सरकार और न्यायपालिका नहीं।”

आस्ट्रेलियाई आदिवासियों को आर्थिक और सामाजिक रूप से सशक्त बनाने की दिशा में काम करने वाले आस्ट्रेलियाई नागरिक,पर्यावरणविद मार्क अनन्डेल ने प्रोजेक्टर की सहायता से दर्शाया कि आस्ट्रलिया में आदिवासी कैसे अपनी खुद की खनन कंपनी खोलते हैं, व्यापार करते हैं और आर्थिक रूप से संपन्न हैं और कैसे सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक रूप से सशक्त हो गए हैं।

थारु आदिवासी समुदाय से संबंध रखनेवाले नेपाल से आये मुख्य अतिथि फूलमन चौधरी ने कार्यक्रम में कहा- “प्राकृतिक संसाधनों पर हम आदिवासियों का हक़ होना चाहिए क्योंकि हम आदिवासी लोगों की जीवनचर्या प्रकृति से जुड़ी हुई है। हमें प्रकृति से अलग कर दिए जाने पर हमारी पहचान, हमारी अस्मिता, हमारा अस्तित्व खत्म हो जाएगा। हम आग्रह करते हैं कि भारत सरकार आदिवासी अधिकारों को प्रमोट करे। संयुक्त राष्ट्र ने आदिवासी दिवस पर जो आदिवासी एनुअल सेसन के लिए पर्यावरण, आदिवासियों के सांस्कृतिक,सामाजिक, आर्थिक राजनीतिक अधिकारों के जो रिकमेंडेशन किए हैं, भारत सरकार उसका पालन करे।”

सोनभद्र के विधायक हरिराम चेरु ने हाल ही में सोनभद्र जिले में जमीन को लेकर किए गए आदिवासी जनसंहार के मुद्दे को उठाते हुए इस जनसंहार को अंतर्रार्ष्ट्रीय मुद्दा बनाने की अपील की। उन्होंने कहा कि यूपी का सोनभद्र जिला बहुत पिछड़ा क्षेत्र है। योगी और मोदी सरकार ने सोनभद्र में विकास की कई योजनाओं की घोषणा की है लेकिन हमें और योजनाओं की ज़रूरत है।

इसके बाद बिहार के गोंड आदिवासी समुदाय के कलाकारों ने फाल्गुन गीत पेश करके दर्शकों को मंत्रमुग्घ कर दिया।

 

आदिवासी भाषा और अस्मिता का सवाल

पहले दिन ‘आदिवासी भाषा: मुद्दा और भविष्य’ पर तीन सत्रों का पैनल डिस्कसन था। पहले सत्र के विमर्श का विषय था- ‘आदिवासी भाषा और अस्मिता’। इस सत्र को अशोक बक्सला ने मॉडरेट किया। नागा जनजाति से संबंध रखने वाली मणिपुर की अंगेजी भाषा की लेखिका अशिंग्लियू कमेई ने पहले वक्ता के तौर पर कहा-“भाषा के महत्व को नकारा नहीं जा सकता । हम दूसरी भाषा में चाहे जितना अभिव्यक्ति की कोशिश कर लें पर मूल व गूढ़ बातें उसमें नहीं आ पाती। नागा भाषा में कृषि संबंधी विपुल शब्दावली है, इसे बचाकर रखने की ज़रूरत है।”

रांची के कुदुख जनजाति के लेखक डॉ. शांति खलखो ने कहा- “ सबसे पहले हमें हमारी मातृभाषा की जानकारी होनी चाहिए। ये हम जन्म के बाद ही सीखते हैं। कई बार भाषा जानते हुए भी हम शर्म वश नहीं बोलते। दरअसल मेनस्ट्रीम के समाज में कहा जाता है कि आदिवासी जंगली हैं और जंगल की भाषा बोलते हैं। अतः हम खुद को  जंगली न समझे जाएं, इसलिए अपनी भाषा छोड़ देते हैं। हमें अपनी भाषा से लेकर हर चीज में सशक्त होना चाहिए। आज कुड़ुख भाषा में पढ़ाई हो रही है। बच्चों ने दसवीं की परीक्षा कुड़ुख  भाषा में दी है और अच्छा नंबर भी पाया है। आज आदिवासी भाषाओं को लेकर कई समस्याएं हैं। इन पर काम करना है। झारखंड सरकार ने उन सभी आदिवासी भाषा, जिनकी लिपि है उनके संवर्धन और किताबें प्रकाशित करने के आदेश दिए हैं। हमारी भाषा के विद्वान राम दयाल मुंडा ने कहा था- ‘जे नाची से बाची’ आज मैं कहती हूँ ‘जे बाची से नाची’। इसलिए आज अपने को बचाने के लिए अपनी भाषा को बचाने की ज़रूरत है।”

कुड़ुख भाषा के लिए ‘तोलोंग सिकि ’ लिपि का विकास करनेवाले कुदुख भाषी लेखक डॉ. नारायण ओरांव ने कहा-“आज आदिवासी समाज दो सभ्यताओं की चपेट में है- वैदिक और रोमन। हम इन्हीं दो सभ्यताओं से खुद को आंकते हैं जबकि हमें इनसे बाहर आना होगा। जब भाषा बचेगी तभी संस्कृति बचेगी। वैश्वीकरण के चलते तमाम आदिवासी भाषाओं पर संकट है, हमें प्राथमिक स्कूलों में आदिवासी भाषा की पढ़ाई पर जोर देना होगा। त्रिभाषा कानून कई राज्यों में लागू है, हम आदिवासियों को विचार करना होगा कि तीसरी भाषा के रूप में हम अपनी आदिवासी भाषा चुनते कि नहीं। झारखंड सरकार द्वारा दसवीं की परीक्षा में कुड़ुख भाषा की तोलोंग सिकि लिखने की अनुमति दी गई है। जबकि पश्चिम बंगाल सरकार ने तोलोंग सिकि लिपि वाली कुड़ुख भाषा को सरकारी प्रयोग के लिए मान्यता दी है। इसके अलावा अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी के तोलोंग सिपि को यूनिकोड में बदलने के लिए चयनित किया है। जल्द ही कुड़ुख भाषा को स्मार्टफोन पर भी इस्तेमाल किया जा सकेगा। ”

कुकी जनजाति से आने वाले जेएनयू में भाषा के सहायक प्रोफेसर डॉ. पॉथांग हाउकिप ने कहा-“ भाषा कोर कंटेंट है। इसे खोकर हम अपनी पहचान खो देंगे। संयुक्त राष्ट्र संघ ने आदिवासी भाषाओं को बचाने और संरक्षित करने पर बल दिया है। हमारी शब्दावली बहुत समृद्ध है। बांस के लिए अंगेजी में केवल एक शब्द है ‘बंबू’ जबकि हमारी कुकी भाषा में बांस के लिए पचासों शब्द हैं। बांस की हर किस्म के लिए अलग शब्द है। यूनेस्को ने भी मातृभाषा में शिक्षा देने को कहा है क्योंकि मातृभाषा ही अपने समाज की सूचनाओं और ज्ञान को प्राप्त करने का एकमात्र जरिया है।”

नेपाल के कंचनपुर से आए आदिवासी दल ने विजयदशमी पर होने वाला ‘मुंगरवा’ लोकनृत्य पेश करके सबको मंत्रमुग्ध कर दिया। इसके बाद आंधप्रदेश के आदिवासी समुदाय द्वारा दिम्सा लोकनृत्य पेश किया गया। दिम्सा नृत्य के कलाकारों ने बताया कि हालांकि ये नृत्य हम खुशी और आनंद की अभिव्यक्ति लिए करते थे लेकिन अब इसे सरकारी नीतियों के खिलाफ़ सामूहिक प्रतिरोध के प्रतीक के तौर पर करते हैं। राजस्थान की लोक कलाकार ने राजस्थान के सपेरे जनजाति की स्त्रियों द्वारा किए जानेवाले कालबेलिया नृत्य से ऐसा समां बांधा कि दर्शक तरोताजा हो उठे।

भारत में आदिवासियों के समकालीन मुद्दे

विमर्श के दूसरे सत्र का विषय था- ‘भारत में आदिवासी लोगों के समकालीन मुद्दे’। इस सत्र को डॉ. टी. लेप्चा ने मॉडरेट किया। भील समुदाय से ताल्लुक़ रखने वाली वकील व एक्टिविस्ट सुमित्रा वासवा ने पहले वक्ता के तौर पर बोलते हुए कहा- “ स्वास्थ्य, शिक्षा औऱ जमीन आज आदिवासियों के लिए मुख्य मुद्दा है। संयुक्त राष्ट्र ने अपने स्थापना के 50वें वर्ष में कहा कि आज हर देश में आदिवासी अपने ही देश में बंधुआ मजदूरी, बाल मजदूरी,कुपोषण, अशिक्षा, गरीबी और पिछड़ेपन में जी रहे हैं। हमारे समाजों में भी महिलाएं पिछड़ी हैं। कन्या भ्रूण हत्या, और लैंगिक असमानता, गर्भवती स्त्री की मृत्युदर, बाल मुत्युदर बढ़ी है। पलायन, विस्थापन के अलावा हमे ऑर्गेनिक फूड से फास्टफूड की ओर ढकेल दिया गया है। इससे हमें तरह तरह की बीमारियां होने लगी हैं।”

‘आदिवासी समन्वय मंच’ के संस्थापक, एक्टिविस्ट पोडवाल खत्री ने मध्यप्रदेश के आदिवासी मुद्दों को उठाते हुए बताया-“ मध्यप्रदेश में शिक्षा का पूरी तरह से निजीकरण कर दिया गया। निजी शिक्षा व्यवस्था में आदिवासियों के लिए शिक्षा के अवसर खत्म हो रहे हैं। हेल्थ विभाग भी निजी हाथों में कर दिया गया है। तमाम सरकारी विभागों में एसटी के 77 हजार पद खाली हैं और भरे नहीं जा रहे। इसमें हम एससी को भी मिला लें तो खाली पदों का आंकड़ा डेढ़ लाख पहुंच जाएगा। आदिवासी मूवमेंट की वजह से ही छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश औऱ राजस्थान में सत्ता परिवर्तन हुआ है। ”

स्टैनली ने असम के आदिवासी समाज के मुद्दों को उठाते हुए कहा- “आदिवासियों की भाषा पर वर्चस्ववादी भाषा का दबाव है। आदिवासी आज भाषाई खतरा झेल रहे हैं।”

संसद में पत्रकार असम के दिनेश कुमार चौहान ने कहा-“ असम के आदिवासियों को आज तक जनजाति का दर्जा नहीं मिला है, जो कि कुल आबादी का 18-20 प्रतिशत हैं । गोंड आदिवासी 5 लाख की संख्या में हैं। संथाल आदिवासियों को कोई सुविधा नहीं मिली है- न पानी की न बिजली की। जबकि बोडो आदिवासी को ये सारी सुविधा मिलती है। बोडो आदिवासी संथालों के खिलाफ़ राजनीति करते हैं, उनके साथ भेदभाव करते हैं, उन पर हमले करते हैं। हम कहते हैं आप संथाली मुद्दे पर हमारा साथ दो हम बोडोलैंड के मुद्दे पर आपका साथ देंगे।”

प्रकृति पूजा

इसके बाद विद्याज्योति कॉलेज के छात्रों की ओर से ‘अंतिम सवाल’ नामक नुक्क्ड़ नाटक के जरिए विकास के नाम पर सरकार और कार्पोरेट द्वारा आदिवासियों के जल जगंल जमीन को हड़पने और आपसी फूट के चलते आदिवासी समुदाय के कुछ लालची लोगों द्वारा अपने समुदाय के हितों के खिलाफ जाकर कार्पोरेट और सरकार की मदद करने के मुद्दे को बहुत बेहतरीन तरीके से दर्शाया गया।

भारत में आदिवासी लोगों का भविष्य

तीसरे सत्र का विषय था भारत में ‘आदिवासी जनों का भविष्य’। इस सत्र को एल. आर. मुर्मु ने मॉडरेट किया।

सत्र के पहले वक्ता के तौर पर लेखक, प्रोफेसर डॉ. सुरेश जगन्नाधम ने कहा-“ मैं एरुकला (कुर्रा) आदिवासी समाज से हूँ। हमें एरूकला नाम दूसरे समाज के लोगों ने दिया है। हमारे समाज की स्त्रियां सोधी (भविष्य देखना) काम करती हैं जबकि पुरुष बांस के सामान बनाकर बेचते हैं। जब डैम बनता है , खनन होता है तो हमें जंगलों से विस्थापित कर दिया जाता है। जबकि हम जंगलों पर ही निर्भर करते हैं। आज जंगलों को छोड़नेवालों की जीवन स्थिति कैसी है। सरकार को चाहिए कि क्रिकेट की ही तर्ज पर आदिवासी खेलों को बढ़ावा दे। ट्राइबल गेम्स एकैडमी खोले। आदिवासी का मतलब है सामूहिकता, हमें इसे बरकरार रखना होगा तभी हम बच पाएंगे।”

अगले वक्ता के तौर पर जामिया मिलिया में सहायक प्रोफेसर व मुंडा जनजाति से आनेवाली डॉ. गोमती बोदरा ने कहा- “ आज सरकार को कंज्युमर सिटिजन चाहिए। हमें खुद को इस स्थिति में लाना होगा। सिविल एक्टिविज्म करना होगा। हमारे समुदाय में आज लीडरशिप का संकट है। नेता आसमान से तो आएगा नहीं, हमें अपने बीच से ही नेतृत्वकर्ता पैदा करना होगा, इसके लिए भूमिका निभानी होगी। पोलिटिकल मोबिलाइजेशन की ओर जाना होगा ताकि जनजाति की आवाज हर अकदामी और एजेंसी तक पहुंचे। विजन पैदा करना होगा।”

इस सत्र के आखिरी वक्ता के तौर पर चौधरी जनजाति के एक्टिविस्ट अशोक चौधरी ने भी संबोधित किया।

शाम 6 बजे के बाद झारखंड, राजस्थान, ओड़ीसा, तेलांगाना, महाराष्ट्र, असम, आदि राज्यों के आदिवासी सांस्कृतिक समूहों द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम पेश किए गए। इसके बाद आदिवासी बच्चों द्वारा फैशन शो प्रस्तुत किया गया।

आदिवासी समाज की भारत सरकार से मांग

इससे पहले 9 अगस्त को अंतर्राष्ट्रीय दिवस के मौके पर नई दिल्ली में 50 से अधिक आदिवासी संगठनों द्वारा अपनी मांगों को लेकर संयुक्त रूप से प्रेस कांफ्रेंस किया गया।

उनकी प्रमुख मांगें हैं-पेसा और वन अधिकार अधिनियम जैसे आदिवासिंयों संरक्षण देने वाले कानून का प्रभावी कार्यान्वयन सुनिश्चित करें।

 

आदिवासी भाषा, संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण का अधिकार, और पहचान को होने वाले नुकसान के खिलाफ खुद को बचाने के लिए, उनकी पहचान, संरक्षण, और दस्तावेजीकरण करके उन्हें एक गतिशील जीवित संस्कृति के रूप में मान्यता और अनुमति दी जानी चाहिए। भूमि का अधिग्रहण लोगों और ग्राम सभा की सहमति से होना चाहिए जैसा कि अनुसूचित क्षेत्रों (पीईएसए) के लिए पंचायत राज विस्तार (PESA)1996, वन अधिकार अधिनियम (FRA) 2006,  भूमि अधिग्रहण में उचित मुआवजे और पारदर्शिता (LARR) 2013,  रिहैबिटेशन और रिसेटलमेंट 2013, समता जजमेंट 1997 और ओडिशा के नियामगिरी हिल्स पर 18 अप्रैल, 2013 को सुप्रीम कोर्ट के निर्देश में अधिकार निर्धारित है।

जनजातियों में विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (PVTGs) को वर्तमान स्थिति में उनकी अरक्षितता के कारण विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। भूमि, जंगल और आजीविका के स्रोतों का उनका प्रथागत अधिकार सम्मान और संरक्षित होना चाहिए.

झूठे और मनगढ़ंत आरोपों पर जेलों में बंद सभी निर्दोष आदिवासियों की तत्काल रिहाई की जाए। तत्काल उनके खिलाफ लगे सभी आरोपों को खत्म किया जाए।

आदिवासी लड़कियों की शहरों में तस्करी करनेवाले तस्करों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करें। तस्करी की गई सभी आदिवासी लड़कियों को वापस लाने के लिए तत्काल कार्रवाई करें, गंतव्य तक पहुंचाने के लिए उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करें और उन्हें उनके मूल निवास पर रोजगार देने का रोडमैप बनाएं ताकि वे और उनके माता-पिता शहरों में जाकर जल्दी पैसा कमाने के लालच में न पड़ें।

मिट्टी के नीचे के खनिजों पर भूमि मालिक के अधिकार पर 2013 के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को पत्रों और कागज और जमीनी स्तर पर में लागू किया जाना चाहिए।

भारत सरकार को आदिवासी लोगों पर ILO कन्वेंशन नंबर 169 को मंजूर करना चाहिए।

आदिवासी लोगों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र की घोषणा 2007 को प्रभावी ढंग से लागू किया जाना चाहिए।

भारत के आदिवासी लोगों के सामाजिक, आर्थिक, स्वास्थ्य और शैक्षिक स्थिति पर, आदिवासी समुदायों, जनजातीय मामलों के मंत्रालय, भारत सरकार, मई 2014 उच्च स्तरीय समिति की रिपोर्ट और सिफारिशों को बिना किसी देरी के लागू करें।

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