कविता

श्रम संस्कृति में रचा पगा जीवन का काव्य

श्रम मनुष्य जीवन के उद्विकास की मूलाधार प्रक्रिया है। श्रम प्रक्रिया के तहत ही मनुष्य सामूहिक और समाजिक बना। श्रम की प्रक्रिया के तहत ही चेतना और दूसरे लोगों के साथ संसर्ग की अनिवार्यता से भाषा की आवश्यकता पैदा हुई और व्यावहारिक चेतना के रूप में भाषा जैसी सामाजिक उपज का उद्भव हुआ। श्रम और सामाजिकता के अंतर्द्वंद्व ने किस्म-किस्म के मानवीय भाव उपजाए। फिर मनुष्य ने अपनी ज्ञानेंन्द्रियों एवं सौंन्दर्य संबंधी भावनाओं का विकास किया और समाजिक श्रम के सामूहिक भावों को अपनी भाषा में अभिव्यंजित करने के लिए श्रमगीत रचे। इन श्रमगीतों में श्रम प्रक्रिया का बड़ा ही अर्थवान महत्व निहित होता है। खेत में श्रम करने वालों ने रोपनी, कटनी के गीत रचे, जुलाहों ने बुनाई गीत रचे, नौका खेने वालों ने नौका गीत रचे, तो धोबी गीत, कहरवा, जांत पिसाई गीत, थपाई गीत, छवाई गीत भी अलग अलग कामों की रचना प्रक्रिया के तहत रचे गए। इन गीतों में श्रम कार्य की आवृत्ति से उत्पन्न होने वाली लय निहित है। फिर जटिलतर होते यथार्थ के बरअक्श श्रमगीतों से कविता का विकास हुआ।
श्रम प्रक्रिया पर हिंदी में कम कविताएं लिखी गई हैं। कवि कुमार मुकुल की एक कविता है – ‘कटनी’। ‘कटनी’ श्रम प्रक्रिया पर हिंदी कविता में एक हस्तक्षेप सा है। श्रमगीतों की ही भाँति इस कविता में भी एक लय मौजूद है। ये कविता कटाई की श्रम प्रक्रिया की पुनर्रचना करती है-
“… दिशाओं का अँधेरा
कुत्तों की भूँक की रोशनी में
लाठियों से ठकठकाते
चले जाते हैं वे
खेत-बधारों की ओर
तब गोरयाबाबा की लाट के नीचे
नाचते भूत, डंडि़याते सांढ़, भैंसे
घुघुवाते वन-विलाव
या एकारी की नोंक की तरह तनीं
नहरों-सिवानों की ओट
उलझनें नहीं बनतीं उनकी
उन्हें लपटते चलते हैं वह
कथा की गठरियों में
जिसे बच्चों की नींद के सिरहाने से
सरकाकर लपेट रखा होता है मुरेठे की तरह …।”

हाड़तोड़ मेहनत करते श्रमिकवर्ग के संदर्भ में लि‍खी गयी उपरोक्‍त पंक्तियां कुमार मुकुल के कवि का समाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक सरोकारीय परिचय हैं। श्रम उनकी सर्जनात्मक चेतना का बीज है –
“मेरी अजानुभुजाएं सक्षम हैं इसे
सत्य की धरती पर
प्रतिस्थापित करने में …”

सौंदर्य श्रम प्रक्रिया का ही प्रतिफलन है, कुमार मुकुल की कविताओं से गुज़रते हुए बारहा महसूस होता है यह। श्रम उनकी सौन्दर्य दृष्टि का आधार है। वे कार्यरत हाथों और पांवों में लगी मिट्टी में सौन्दर्य देखते हैं। उनके यहाँ श्रम सौंन्दर्य ही सुख है, खुशी है। भले ही मनुष्य श्रम मूलतः आर्थिक क्रियाओं का अंग होता है किंतु उनमें अंतर्गुम्फित मनोरंजन व आनंद के तत्व उसे निजी स्वार्थ से ऊपर उठा देते हैं। समाजिक रूप से क्रिया करके भी आत्मोपलब्धि की ओर मनुष्य श्रम के सौंदर्य तत्व के कारण बढ़ता है। ये सौन्दर्य ही है जो उसे श्रमहारा से सृजनहारा बना देते हैं। श्रम के सौंदर्य से ही तमाम मानवीय मनोभाव उपजते हैं – सुख भी, दुःख भी, मिलन भी, विरह भी। इनका विकास श्रम और समाजिकता की संगति में होता है। कुमार मुकुल की लंबी कविता ‘खुशी का चेहरा’ में श्रम सौंदर्य और मानवीय मनोभाव की जुगलबंदी की बानगी देखें –
“खुशी को देखा है तुमने क्या कभी
श्रम की गांठें होती हैं उसके हाथों में
उसके चेहरे पर होता है
तनाव-जनित कसाव
बिवाईयाँ होती हैं खुशी के तलुओं में
शुद्ध मृदाजनित ”

पूँजीवादी समाज में जहाँ उत्पादन पर कब्जा और अधिकतम उपभोग के लिए मार-काट मची है, एक ऐसे समय, काल,  व्यवस्था में जहाँ उपभोग के अधिकतम उत्पाद एकत्र करना ही जीवन की उपलब्धि का पैमाना स्वीकार लिया गया हो वहां कुमार मुकुल का कवि गहरी नींद और विश्वास को अपनी रोजाना की उपलब्धि मानकर संतुष्ट होता है – ‘उपलब्धियां’ कविता के कुछ वाक्य मौजूं हैं –
“निजी उपलब्धि क्या होती है
पता नहीं मुझे
गहरी नींद को मैं
रोजाना की उपलब्धि मानता हूँ।
लोग मुझ पर विश्वास करते हैं
यह मेरी उपलब्धि है… ।”

उत्तरआधुनिकता ने मशीनीकरण के साथ साथ व्यक्तिवाद को बढ़ावा देकर व्यक्ति के भीतर सामाजिकता और सामूहिकता के भावबोध का विखंडन कर दिया है। श्रम के अवमूल्यन के साथ ही वर्तमान पूँजीवादी व्यवस्था में पूँजी ने श्रमिक के उत्पाद पर क़ब्ज़ा जमाकर उनके उत्पादक होने के दावे को ही ख़ारिज़ कर दिया है। उत्पाद पर क़ब्ज़ा करने के बाद पूँजीवादी तंत्र इतना व्यापक हो गया है कि पूँजी मालिक उत्पादक वर्ग पर अत्याचार करता है। इससे श्रमिक के मन से उत्पादक होने की संतुष्टि का हनन होता है और श्रम अपना रचनात्मक चरित्र खो देता है।
जबकि यौनिक क्रियाओं से शुरु हुआ श्रम विभाजन मनुष्य को समाजिक बनाने के उपक्रम में ही प्रेम जैसे भावों की व्यापक अनुभूति पैदा करता है। प्रेम मनुष्य को मनुष्य से जोड़कर सामूहिकता और समाजिकता की भावना को और प्रगाढ़ करता है। ‘प्यार’ कविता में कुमार मुकुल श्रम की रचनात्मकता, उसके मूल्यबोध का नाश करने वाली पूँजीवाद की इन दमनकारी प्रवृत्तियों के प्रभाव से मन में उपजी हताशा और दुःख का ट्रीटमेंट ‘प्यार’ में तलाशते हैं-
“ हाँ, हम अकेले हैं
पीड़ित हैं, क्षुधित हैं
पर हम ही भर सकते हैं
विश्व का अक्षय अनंत अन्न, रत्नकोश
कि हमारी असमाप्त क्षुधा का
तुम नहीं कर सकते व्योपार…
आदमी के अंतर और बाहर
दसों दिशाओं से आती है एक ही पुकार
प्यार प्यार प्यार”

श्रम और सौन्दर्य के बीच वही द्वंद्वात्मकता काम करती है जो उत्पादन और उपभोग के बीच करती है। मनुष्य श्रम तात्कालिक दैहिक ज़रूरतों से अलग भी सर्जनात्मक उत्पादन करता है और सौंदर्यपूर्ण श्रम को अपने जीवन से भलीभाँति जोड़ लेता है, फिर वह जीवन संस्कृति का हिस्सा हो जाता है। कवि कुमार मुकुल की श्रम चेतना श्रम की संस्कृति में रचे पगे जीवन से अर्जित है। श्रम उनके यहाँ जीवन संस्कृति के अभिन्न अंग की तरह दिखता है संभवतः यही कारण है कि श्रम उनके यहाँ ज़िंदगी के बेहद अंतरंग पलों में भी निखरकर आता है और प्रेम अनुभूतिक, ऐंद्रिक और रागात्मक अभिव्यक्ति पाता है। ‘संबंध’ कविता इसका बेहतरीन उदाहरण है-
“उफ कितनी गरमी है आजकल …
अच्छा होता कि हम
अलग बिस्तरों पर सोते आज
तब तुम मेरे सिर या छाती पर
छलक आया पसीना पोछतीं
फिर चूम लेतीं
नाराज़ होता मैं
कि कितनी गरमी है आज…।”

कुमार मुकुल की प्रेम कविताओं में ‘श्रमिक की भूख का सौंदर्य’ होता है। सामतंवादी उपभोग का सौंदर्य नहीं, सृजनहारा की भूख का सौंदर्य। कविता ‘दावा तो है मेरा’ से पक्तियाँ देखें, जिनमें प्रेम के उद्दाम भावबोध में उदर-क्षुधा उभर कर आती है-

“तुम्हारे पीने से बच रहे आधे ग्लास पानी पर
खाने से बची सूखी-सी आधी पावरोटी पर
दावा है मेरा”

भाषा में अर्थ संप्रेषण की प्रक्रिया प्रतीक चिन्हों पर निर्भर है और प्रतीक ही अर्थ का विनिमय करते हैं। उत्तरआधुनिक काल में विज्ञापन की भाषा ने संप्रेषण के आधार प्रतीकों से छेड़छाड़ करके उनमें नए अर्थ निर्मित कर दिए हैं। वस्तु और मनुष्य मन के बीच जो विनिमय घटित होता है विज्ञापन की भाषा उसी ‘स्पेस’ में नए अर्थ निर्मित करती है। विज्ञापन सिर्फ़ उत्पाद नहीं बेचते बल्कि उत्तरआधुनिकतावाद द्वारा विखंडित कर दी गई मनुष्य मन की आकांक्षाओं की प्रतिपूर्ति भी करते हैं, वैकल्पिक उत्पाद पेश करके। इस तरह विज्ञापनों ने तमाम मानवीय मनोभावों को उत्पादों से रिप्लेस कर दिया है। उत्तरआधुनिकता के दबाव में ‘इंडिविजुअलिटी’ बढ़ने के साथ ही ‘प्रेम’ जैसे मानवीय भावों की उम्र भी कम हुई है। जब ‘DeBeers’ कंपनी का विज्ञापन कहता है… ‘हीरा है सदा के लिए’ तब वह केवल हीरा भर नहीं बेच रहा होता बल्कि मनुष्य मन में ‘हीरे’ को ‘प्रेम’ का शाश्वत  प्रतीक बनाकर प्रतिरोपित भी कर रहा होता है। इस तरह बाज़ारवाद हीरे के उत्पाद को प्रेम की शास्वतता को रिप्लेस कर देता है।
कवि कुमार मुकुल बाज़ारवादी विज्ञापनों के इस फरेब को पकड़ते हैं और उनके द्वारा भाषा के प्रतीकों में रूढ़ कर दिए गए अर्थों को तोड़कर नए अर्थ निर्मित करते हैं। जिस हीरे को बाज़ारवाद ने प्यार की शाश्‍वतता के रूपक में बदल दिया था उस हीरे को ‘उदासी’ के रूपक में तब्दील करके कुमार मुकुल प्रेम भाव को हीरे के महँगे उत्पादों के चंगुल से मुक्त करवाते हैं। इस तरह हम देखते हैं कि कुमार मुकुल अपनी भाषा में बहुत सजग हैं और अपने समाजिक सरोकार के बरअक्श साहित्य में भाषा की ताक़त का समुचित इस्तेमाल करना जानते हैं। ‘उदासी’ कविता के अंश –

“ठिठोली करती
स्मृतियों के मध्य
कहाँ रखूँ
तुम्हारी उदासियों का
यह धारदार हीरा।”

नफ़रत जब सिर्फ भाव न होकर विचारधारा में तब्दील हो जाए तो प्रेम प्रतिरोध बनकर तन जाता है। प्रेम पुरुषत्व के उस बाने को तोड़ देता है जहां से अधिनायकवाद जन्म लेता है। प्रेम उस पाषाणपने में एक बैचैनी भर देता है जहाँ से उसमें एक गति उत्पन्न होती है, सृजन की। यही गति मन के उस गतिरोध को तोड़ती है जिससे प्रेम का सोता फूटता है तो मानवता लहलहाने लगती है। ‘वॉन गॉग की उर्सुला’ कविता में कुमार मुकुल प्रेम की रचना प्रक्रिया को अभिव्यक्ति देते हैं। वो योद्धा के प्रेमी और प्रेमी के तानाशाह बनने की प्रक्रिया को रचते हैं कि कैसे कोई जब प्रेम करने लगता है तो अहिंसक हो जाता है –
“इजाडोरा कहती है-
प्रेम शरीर की नहीं
आत्मा की बीमारी है
यह ज्वर जला डालता है सारे कलुष
प्रेमी बन जाते हैं
योद्धा पादरी शिक्षक… ।”

जब कोई प्रेम करना नहीं सीख पाता है तो क्रूर और हिंसक हो जाता है। तानाशाह, तानाशाह न होता ग़र उसके भीतर उसकी उर्सुला न बिखरती। इस तरह की रचना को रचने के लिए गांधी की जीवन दृष्टि चाहिए। कविता में कवि तानाशाह को नफ़रत से नहीं, सहानुभूति से देखता है। ये गांधी की ही दृष्टि है, जो मनुष्य को उसकी मनुष्यता में देखती है –
“दुनिया के क्रूरतम् तानाशाह भी
अपने भीतर समेटते रहते हैं
एक बिखरती उर्सुला… ..”

सभ्यताएं पुरुष निर्मित होती हैं इसीलिए दुनिया की हर सभ्यता प्रकृति विरोधी, स्त्री विरोधी बर्बर और अमानवीय होती है। तमाम सभ्यताओं में स्त्री भी प्रकृति की तरह दमन का शिकार है। स्त्री की आज़ादी सभ्यता के भीतर संभव ही नहीं है। स्त्री देह पर पुरुष की आकांक्षा का भार है। वहीं स्त्री मन पुरुष सभ्यता निर्मित सौंदर्याभिरुचि से आक्रांत है। स्त्री को नूतन रूप (आज़ादी) तभी मिल सकता है जब वो इस सभ्यता के दायरे को फांद जाए। कुमार मुकुल का कवि अपनी रचनाओं में सभ्यता की हदबंदियों को तोड़कर स्त्री और प्रकृति का भेद मिटा देता है। ‘ऐ अरी ओ एंजलीना-3’ कविता की पंक्तियां –
“कितनी सरलता से
चली जाती है तू
असभ्यता और सभ्यता के
मिलन बिंदु पर
निर्वस्त्र होती हुई
जैसे प्रसव पीड़ा की
बेचैनी को याद करती
तेरी आत्मा
इस मांसावरण को चीर
नूतन रूप
धारण करना चाहती हो।”

कुमार मुकुल की एक कविता ‘कि मैं मर जाऊँ एक बार’ में एक प्रेमरत स्त्री समाज और सभ्यता के पुरुषपने के मरने की कामना करती है। स्त्री जब किसी पुरुष को प्रेम करती है तो उसे नए सिरे से रचती है, फेमिनिज्म भी यही बात करता है, समाज को स्त्री के नज़रिए से पुनरसृजित करने की।
“वह
जो प्रेम करती है मुझे
कामना करती है अक्सर मेरी मुत्यु की
वह सोचती है
कि मैं मर जाऊँ एक बार
तो फिर से जिला लेगी वह
नए सिरे से..”

कुमार मुकुल के यहां प्रेम में मैत्रीभाव है, स्त्री-पुरुष के बीच। प्रेम में मैत्री-भाव का आग्रह प्रेमचंद और मुक्तिबोध के यहाँ भी है। कुमार मुकुल की कविता ‘मैं चाहता हूँ’ मुक्तिबोध की परंपरा से जुड़ती है, जहाँ कवि कहता है-
“मैं चाहता हूँ
कि इसी तरह वह
गोइयाँ-सी
मेरे कंधों से लगकर चले”

प्रेम और स्त्री सौंदर्यकामी लगभग हर कवि ने स्तनों को कविता में प्रमुखता से जगह दी है। कहीं विषय के रूप में, तो कहीं सौंदर्य के रूपकों और बिंबों के रूप में। स्तन कैंसर जैसे संवेदनशील विषयों पर लिखते हुए भी स्तनों के कट जाने पर पुरुष सौंदर्याभिरुचि का रोना प्रकट होता रहा है। लेकिन कुमार मुकुल स्त्री स्तन को एक सब्जेक्ट की तरह ट्रीट करते हुए उससे संवाद कायम करने की कामना करते हैं। उसका कहन सुनने की आंकाक्षा जताते हैं, ‘छातियों का कहन’ कविता की ये पंक्तियां देखें –
“क्या केवल आँखें कहती हैं मन की बातें
हाथ भी तो कहते हैं कुछ
पैर भी
और कभी कभी पीठ भी कहती है
कितने अनोखे ढंग से
तो छातियों का कहन ही
ऐसे क्यों अदेखा किया जाए।”

मानव समाज की विकास प्रक्रिया से किसी भी वस्तु में मूल्य और सौंन्दर्य का समावेश श्रम से होता है।  श्रम संबंधी कुशलता व दक्षता जब ऊँचे धरातल पर पहुँच जाती है तो उच्च कोटि के सौंन्दर्यात्मक आनंद की सृष्टि करती है। यह आनंद अत्यंत जटिल प्रक्रिया से उद्भूत होता है और रचना तथा रचयिता दोनो को प्रभावित करता है। आसान शब्दों में कहें तो सौंन्दर्य मनुष्य की श्रम प्रक्रिया का प्रतिफलन है। मनुष्य की सौन्दर्यानुभूति का विकास श्रम की संगति में हुआ है। श्रम से ही मनुष्य में सांगीतिक श्रवण तंत्र और सचेतन दृष्टि उत्पन्न हुई। श्रम के द्वारा ही व्यक्ति अपने अकेलेपन की संकीर्णता से बाहर निकल ठोस वास्तविक दुनिया में प्रवेश करता है। जहां अपने श्रम के द्वारा वो वस्तुओं को रुपाकार देकर अपनी सचेतनता का विकास करता है। यही कारण है कि सौंन्दर्य के अन्य रूपों की अपेक्षा श्रम का सौन्दर्यबोध अधिक सहज और अधिक तीव्र होता है। कुमार मुकुल की सौंदर्य दृष्टि का प्रमुख आधार श्रम प्रक्रिया से निर्मित उनकी श्रम चेतना है। उनकी कविताओं में श्रम का सौंदर्यबोध बहुत गाढ़ा, चटख रंग रूप लिए है। स्त्री सौंदर्य को भी कुमार मुकुल उसके श्रम सौंदर्य में समेकित करके देखते हैं।
“हालाँकि मजबूत थी
खींच लाती मरकहे बैल नाद तक
जी करता सानी भी गोंत दे
मैनिया गाय थी दुआर पर
सफेद पूँछ वाली
उसकी हिलती सींगो पर
तेल इंगोरती थी मनकी।” (कविता- मनकी मेरी माँ)

श्रम अपनी प्रकिया में सृजनशील होता है, यूँ कहें कि श्रम अपने उद्देश्य में ही रचनात्मक होता है। अतः श्रम कुछ न कुछ उत्पादन करता ज़रूर है, और मनुष्य को उत्पादक के रूप में अपने उत्पाद से कुछ न कुछ भौतिक सुख भी ज़रूर मिलता है, साथ ही एक आत्मसंतुष्टि भी। फिर आत्मसंतुष्टि का भावबोध सामूहिक नैतिकता का विकास करता है। एक मेहनतकश मनुष्य जिस वस्तु का उत्पादन करने के लिए श्रम करता है वह मात्र उसके रूप को बदलकर संतोष प्राप्त करने के साथ ही अपने उद्देश्य को भी पूर्ण करता है। यही उद्देश्य उसकी उपलब्धि बन जाते हैं। इस तरह श्रम अपने प्रक्रिया के द्वारा श्रमिक को नियंत्रित भी करता है।
‘मुझे जीवन ऐसा ही चाहिए था’ कविता कुमार मुकुल का उपभोक्ता वर्ग से उत्पादक वर्ग यानि खुद का डिक्लास करने के बाद की प्रतिक्रिया है। जिसमें कुमार मुकुल ऐसे जीवन की सार्थकता को अभिव्यक्ति देते हैं जिसमें गलतियों और दुखों के चुनाव की भरपूर गुंजाइश हो। दुख क्या है, कष्ट क्या है। एक बाज़ारवादी काल में कम उपभोक्ता होना दुख है। एक पूंजीवादी समय में मौलिक ज़रूरतों की प्रतिपूर्ति के लिए हांडतोड़ श्रम करना कष्ट है।
“यह लिखते
कितनी शर्म आएगी
कि मैंने
कष्ट सहे हैं
मुझे जीवन
ऐसा ही चाहिए था
अपने मुताबिक
अपनी गलतियों से
सजा-धजा।”

काव्य सौन्दर्य जीवन की प्रक्रिया से जुड़ा होता है और मानव जीवन की क्रियाशीलता में निहित होता है। लोकजीवन का संघर्ष और उसकी क्रियाशीलता का सौंदर्य दिखता है। बारिश का श्रम और सृजन से नाभिनाल संबंध है। बावजूद इसके बारिश का नाम आते ही मन में एक रुमान सा छा जाता है तो इसका कारण यही है कि बारिश पर जो भी गीत कवितादि लिखे रचे गए वो जीवन के यथार्थ से उलट वायवीय रुमान को परवान चढ़ाते हैं। यूँ तो हिंदी भाषा साहित्य में ‘बारिश’ पर सैंकड़ो कविताएं लिखी रची गई हैं। बारिश जैसी प्राकृतिक प्रक्रिया में कुमार मुकुल मानवीय चेतना और उसकी क्रियाशीलता देखते हैं। बारिश में मानवीय, जैवीय श्रम सौंदर्य और श्रम प्रक्रिया का इतना जीवंत चित्रण हिंदी कविता में कहीं और नहीं दिखता। ‘बारिश’ कविता में एक साथ प्रकृति, जीव जंतु, पंछी, मनुष्य आदि के दर्जनों दृश्य बिंब हैं, जो एक स्थिर फ्रेम में गतिमान हैं-

“बूँदें गिर रही हैं एकतार …
काफी पानी गिरने पर काम बंद हो जाएगा
इसलिए शुरुआती बारिश में काम तेज है
सिरों पर बोरियाँ डाले मजदूर भाग रहे हैं
छाता लिए ठीकेदार ढलाई ढकवा रहा है
नीचे घास-मिट्टी की सड़क पर
मारुति में बैठा मालिक
टुकुर-टुकुर ताक रहा है
 
कभी शीशा जरा-सा खिसका कर
कुछ चिल्लाता है वह—
तो मजदूर धड़फड़ाने लगते हैं
पर आखिरकार बारिश
उसका शीशा बंद करा देती है
और मजूर हथेलियों से
पसीना मिला पानी पोछते
भागते रहते हैं।”

मनुष्य के अलावा चीटीं, मधुमक्खी, ततैया और दीमक ही ऐसे जंतु होते हैं जिनमें वास्तविक और पूर्ण विकसित सामाजिक जीवन अपने उच्च शिखर पर होता है। कुमार मुकुल की ‘बारिश’ कविता में अद्भुत बात ये है कि इस कविता में बारिश से मुठभेड़ करते मनुष्य की श्रम प्रक्रिया के साथ साथ चीटिंयों की श्रम प्रक्रिया का भी जीवंत चित्रण है। गांवों में एक लोकोक्ति है- ‘चिंउटीं के बिल में पानी’। कुमार मुकुल की कविता का आखिरी खंड उस लोकोक्ति ‘चिउंटी के बिल में पानी’ से ठीक आगे का कार्य व्योपार है-

“बूँदे गिर रही हैं…
पूरा दृश्य फ्रीज है
बस, चीटियाँ भाग रही हैं
अपना ठिकाना बदल रही हैं वो पंक्ति में…
बीच में कभी कोई कीड़ा आ जाता है
तो पंक्ति टूटती है
और उसे भी साथ लेकर
चल पड़ती हैं वे… ।”

कुमार मुकुल की कविताएं जब अपनी चेतना, सौंदर्य और संवेदना में किसी कवि की परंपरा से जुड़ती हैं तो उस परंपरा में कुछ नया जोड़ती, उस परंपरा को विस्तार देती हैं। जैसे केदारनाथ अग्रवाल बेरोजगारी को कविता का विषय बनाते हैं तो रोटी, कपड़ा और मकान तक सिमटकर रह जाते हैं-

“कल से आज अधिक कटु दिन है
कल रोटी थी
आज नहीं है
कल रोजी थी
आज नहीं है
रोजी रोटी
जन जीवन के लिए कठिन है
कल से आज अधिक कटु दिन है”

लेकिन जब कुमार मुकुल बेरोजगारी को कविता का विषय बनाते हैं तो उनके यहाँ रोज़गार विस्तार पाता हुआ व्यक्ति के अस्तित्वबोध से जुड़ जाता है-
“आती जाती नौकरियाँ
बहाना देती रहती हैं
जीने भर
और एक सितारा
एक कतरा चाँद
आधी अधूरी रातों में
बढ़ाता है अपनी उंगुलियाँ
जिनके तरल रौशन स्पर्श में
ढूँढ़ लेता हूँ
अँधेरी गली का अपना कमरा
जहाँ एक बिछावन
मेरी मुद्राओं की छाप लिए
इंतज़ार कर रहा होता है ..”

श्रम के द्वारा ही मनुष्य अपने अस्तित्व को साबित करता है। रोज़गार सिर्फ़ रोजी रोटी कमाने भर का जरिया नहीं, अपितु अपने अस्तित्व को साबित करने का साधन संधान भी है। जब कोई सत्ता, व्यवस्था किसी मनुष्य को श्रम से वंचित कर देती है तो एक तरह से उसे उसके अस्तित्व से वंचित करने की साजिश कर रही होती है। रोजगार मनुष्य की आर्थिकी के साथ ही साथ उसकी समाजिकी, उसकी राजनीति और उसके मनोभावों को भी बुरी तरह प्रभावित करता है। कुमार मुकुल अपनी कविता में इन बातों के मर्म को बहुत बारीकी से पकड़ते हैं –

“कि रोजगार की कारगुजारियों ने मुझे
बना दिया होता है
कितना लाचार-अंधा-अपाहिज़
कि राजकमल की पंक्तियों के निहितार्थों से डरता
चला जाता हूँ मैं
ख़ुद की तलाश पूरी करने।”

कुमार मुकुल व्यापक जीवनदृष्टि के कवि हैं। उनकी दुनिया में कीड़े मकोड़े, कीट पतंगे, सांप, बिच्छू, खेत, मेड़, कुआं और अँधेरा सबका समान महत्व है। वे सबके अस्तित्व में जीवन देखते हैं। ‘एक शाम थी वह’ कविता से कुछ पंक्तियां –

“… फिर रह गया अँधेरा ही
रह गयी हवा
बतलाती कि वह भी है
अब निकलेंगे पतंगे अंधेरे कोटरों से
बिलों से सांप निकलेंगे
दरारों से ऊपर आएंगे बिच्छू
अब अपने बच्चों को खोजती टिटहरी
दौड़ेगी इधर उधर
चिचियाती खेतों में।”

इस पूँजीवादी मुनाफाख़ोर व्यवस्था में जब पर्यावरण, प्रकृति, जल, जंगल, ज़मीन का अंधाधुंध दोहन करके तमाम जीव जंतुओं के जीवन अस्त्तिव को ख़तरे में डाल दिया गया है। एक ऐसे समय में जहां कोई इनकी सुधि लेने के लिए खाली ही नहीं है कुमार मुकुल दुनिया के तमाम संकटग्रस्त जीव-जंतुओं को अपनी फिक्र में शामिल करते हैं। ‘जानवरखोर आदमी’ कविता यहाँ मौजूँ हैं-

“भेड़िए, शेर-बाघ, हाथी, मगरमच्छ
सारे जानवरों का अस्तित्व
संकट में है
एक ही जानवर अब शेष है
वह है आदमी..”

श्रम जीवन का फलीभूत यथार्थ है और जब यह यथार्थ विचार में ढलता है तो ‘साम्यवाद’ जैसी व्यवस्था व व्यावहारिक सैंद्धांतिकी का विकास होता है। साम्यवाद मानव समाज के विकास की वैज्ञानिक समझ है। एक भौतिकवादी दर्शन है जो नित नए अनुभवों को अर्जित करता हुआ विकासमान है। दुनिया के एक ध्रुवीय होने और पूँजीवादी व्यवस्था में तकनीकी और ऑटोमेशन के बढ़ते दबाव के बीच श्रम और श्रमिक निरंतर उपेक्षित, अवमूल्यित और दमित होता जा रहा है। दुनिया के तमाम देशों की संसदीय राजनीतिक के केंद्र से साम्यवाद के बेदख़ल होने पर इसे इतिहास (साम्यवाद) के खात्मे की तरह पेश किया जाने लगा। लेकिन साम्यवाद का उद्देश्य संसदीय सत्ता नहीं बल्कि सृजनहारा वर्ग की जनता को श्रम सचेतन बनाना है। कुमार मुकुल इसे अपनी कविता का विषय बनाते हैं और ‘वाम हैं दिशा हैं वे’ कविता में लिखते हैं-

“इस पर चिंतित मत होओ
कि वे केंद्र में नहीं रहे
वे हाशिए पर हैं
क्योंकि जनता हाशिए पर है
वे भीड़ को जनता बनाने की
कोशिश में लगे हैं..”

‘11 सितंबर’ 2001 को अल कायदा आतंकियों द्वारा पूँजीवाद के गढ़ संयुक्त राज्य अमेरिका की आर्थिक इमारत वर्ल्ड ट्रेड सेंटर को एक हाईजैक की हुई अमेरिकी प्लेन से टक्कर मारकर ध्वस्त कर दिया गया था। जिस अल-कायदा को पैदा करके पूँजीवादी यूएसए ने सोवियत यूनियन को 15 टुकड़े करके इतिहास के खात्मे का ऐलान किया था। उस अल-कायदा द्वारा यूएसए के पूँजीवादी वर्चस्व के प्रतीक वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमले करके नस्त-ओ-नाबूत किए जाने की घटना को कुमार मुकुल जर्मन कम्युनिस्ट पार्टी की रोजा लक्जमबर्ग के उस कथन से जोड़कर देखते हैं जिसमें कहा गया है कि – “पूंजीवाद अपने ही अंतर्विरोधों का शिकार होकर खत्म हो जाएगा।”

“हिरोशिमा नागासाकी नहीं था वह
वियतनाम इराक भी नहीं
यह उनका अपना ही
सर्वग्रासी महाबलशाली हाथ था
जो अपना ही मुँह जाब रहा था”

श्रम भौतिक जीवन को समृद्ध करने के साथ ही साथ मनुष्य में सांस्कृतिक चेतना का भी विकास करता है। श्रम सांस्कृतिक उपकरणों के रूप में जहाँ भौतिक उत्पादन में सहायक होता है वहीं भौतिक उत्पादन के रूप में सांस्कृतिक उपकरणों को भी उत्पन्न करता है। लेकिन जैसे जैसे श्रम और श्रम प्रक्रिया का क्षरण हुआ है वैसे वैसे सांस्कृतिक उपकरणों का भी क्षरण होता गया। कुएं की भौतिक उपस्थिति की जगह पाइप-टैंक सिस्टम ने ले लिया है, लेकिन कुएं के निर्माण और उसके कार्य-व्यापार से जुड़ी श्रम की प्रक्रिया से विकसित होने वाली सांस्कृतिक उपकरण का स्थान रिक्त हो गया है। कुआं सिर्फ़ जल का स्त्रोत भर नहीं अपितु जल संसाधन की प्राप्ति के लिए किए जाने वाले कार्य व्यापार की संस्कृति का रूपक है। कुआं जल जैसे अमूल्य प्राकृतिक संसाधन को सिरजने और जतन से व्यय करने पर बल देता है। कुमार मुकुल की कविता ‘चबूतरा’ में विलुप्त होते कुएं के साथ श्रम संस्कृति की शून्यता की अनुगूँज सुनाई देती है-

“… कुछ लोग जिन्हें
इस लोकतंत्र में राय देने लायक
नहीं समझा जाता
वे कुएं के बारे में ऐसा नहीं सोचते
वह चाय की गुमटी वाला
ऐसा नहीं सोचता
जिसकी चाय के लिए पानी
इसी कुएं से जाता है
सुबह सुबह कुछ दूधिए
अपने गेरु वहीं धोते हैं…”

नफ़रत जब तमाम मानवीय व लोकतांत्रिक मूल्यों को ध्वस्त करके सत्तासीन हो जाती है तो वो सबसे पहले श्रम के सौंदर्यबोध को ध्वस्त करती है, फिर श्रम और श्रमिक को। दक्षिणपंथी फासीवाद का सबसे बड़ा शत्रु इसलिए श्रमिक वर्ग और श्रमिक वर्ग की बात करने वाले कम्युनिस्ट हैं। कोई ताज़्ज़ुब नहीं कि हिटलर और मुसोलिनी से लेकर दुनिया भर के वर्तमान फासीवादी शासक कम्युनिस्टों का अस्तित्व मिटाने के अभियान में लगे हुए हैं। दुनिया के सबसे विध्वंसक हथियारों का निर्माण तभी हुआ जब श्रम विरोधी फासीवादी ताक़तें सत्तासीन हुईं। ज़्यादा से ज़्यादा मुनाफ़ा बटोरने के क्रम में पूँजीवाद भी दक्षिणपंथी फासीवाद सी प्रवृत्ति अपना लेता है। यही कारण है कि क्रोनीकैपिटलिज्म के वर्तमान दौर में ‘रोबोट सोफिया’ को नागरिकता दिया जाता है वहीं रोहिंग्या मुसलमानों समेत शर्णार्थियों को दुनिया के हर मुल्क़ से बहिराया जा रहा है। कुमार मुकुल की कविता ‘रोहिंग्या और रोबोट सोफिया’ की कुछ पंक्तियाँ-
“अब सम्मेलनों में
सोफिया वक्तृता देगी, साक्षात्कार देगी
पत्रकार पूछेंगे, रोंहिग्या क्या बला हैं?
सोफिया बोलेगी- यह चिथड़े होती
मनुष्यता का आखिरी दृश्य है”

साम्प्रदायिकता के सूत्र वर्चस्ववादी समुदाय की मिथकीय चेतना में सन्निहित होते है। यही कारण है कि हिंदू मिथक राम को पहले लोगों के जेहन में जिंदा करने की कवायद की गई। लोगों की मिथकीय चेतना में राम के जिंदा होने के बाद से लगातार सांप्रदायिक हिंसा, अल्पसंख्यक समुदाय का जनसंहार की घटनाएं बढ़ती गईं। आज ‘जय श्री राम’  आतंक का पर्याय बन चुका है। कहीं किसी गली से ये नारा सुनाई पड़ता है तो दिल की धड़कनें तेज हो जाती हैं कि किस बेचारे की लिंचिंग हो रही है। कुमार मुकुल ब्राह्मणवादी संस्कृति से जुड़ी मिथकीय चेतना की पहचान करते हैं और अपने वर्तमान समय के साम्प्रदायिक वैमनस्य और हिंसक प्रवृत्ति को उस मिथकीय चेतना से जोड़कर उद्घाटित करते हैं-

“क्या
गोडसे रामायण (मानस) पढ़ता था
तभी तो वैसा सज्जन था
पहले पाँव छुए
फिर सीने पर गोली दागी
पांव छूकर मारने की तो पवित्र परंपरा है
पांडवों ने भी द्रोण के पांव छुए थे तीरों से
फिर युधिष्ठिर ने अश्वात्थामा हतो… किया था..”

कुमार मुकुल साम्प्रदायिकता के कारणों की तलाश करते हुए इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि समाज से उसकी यथार्थवादी अनुभूतिक स्मृतियां और इतिहासबोध छीन लिया गया है। जब कोई व्यक्ति, समूह या समाज अपनी श्रम चेतना और सामूहिक स्मृतियों का लोप कर देता है, अपनी श्रम की सांस्कृतिक ज़मीन और श्रम की सामूहिक चेतना से कट जाता है तो उसे श्रम विरोधी, सृजन विरोधी मनुष्य विरोधी विचारों के हवाले कर दिया जाता है। और हर बार श्रम चेतना की हत्या की सुपाड़ी धर्म को दी जाती है।  ‘अंतरिक्ष में विचार’ कविता में वो वर्तमान समय की सांप्रदायिक राजनीति पर टिप्पणी करते हैं-

“अन्नदाताओं को ओढ़ा दी गई है रामनामी
या तो भरपेटा भजन कर रहे वे
या राम जी सीता जी की राह पकड़
अपना राम नाम सत कर रहे …”

उत्तर-आधुनिकता ने पहले समाज को तोड़ करके व्यक्ति के भीतर से सामूहिक भावना को विखंडित किया और फिर उसकी प्रतिपूर्ति के लिए सोशल मीडिया के ज़रिए आभासी समाज का छद्म रचा। इस आभासीपने में भी व्यक्ति के सेल्फ को डोमिनेटिव बनाने के लिए फ्रंट कैमरे को बैक कैमरे से ज़्यादा पॉवरफुल बनाया गया। जहां चेहरा आगे हो गया, विचार पीछे। इस तरह दृष्टि को मारा गया, दृश्य को उभारा गया। ‘फेसबुक एक आत्मालोचना’ कविता में कुमार मुकुल उत्तरआधुनिकता के इस सोशल मीडिया नामक घातक हथियार के फरेब का भंडाफोड़ करते हैं-
“अब आँखे हैं
पर दृष्टि नहीं है
मन है
पर उसकी उड़ान
की बोर्ड से कंप्युटर स्क्रीन तक है …”

आज जब दुनिया के हर आदमी के पांव में पहिया फिट है। हर ओर भागम-भाग मची है। पैदल सिर्फ़ वो चल रहा है जो संसाधन विहीन है या फिर जिन्हें डॉक्टर ने मॉर्निंग वॉक के लिए कहा है। इस भाग-दौड़ की ज़िन्दग़ी में स्थिरता के लिए, धीमेपन के लिए, स्थायित्व के लिए कहीं कोई जगह ही नहीं बची है। चीजों को नजदीक से देखने, उन्हें अनुभूत करने और फिर उन्हें चेतना में बदलने की प्रक्रिया खत्म हो चुकी है।

कुमार मुकुल ‘मेरे पांव’ कविता में बताते हैं कि दरअसल सिर्फ़ हाथ ही नहीं, पांव भी मजदूर के औजार होते हैं। कवि इन पांवों को चेतना का गुंजलक बताता है।

“चेतना की गुंजलकों को
तलुओं में छुपाए
ये मेरे पाँव हैं
अँधेरी राहों में जब
मेरी सहमी आत्मा
पीछे छूट जाती है
सबसे पहले
ये ही उठाते हैं कदम।”

कुमार मुकुल जीवन की उम्मीद के कवि हैं। ये उम्मीद उन्हें श्रम की साधना से मिली है। श्रम साधक कभी नाउम्मीद नहीं होते। कुमार मुकुल भी कभी उम्मीद नहीं छोड़ते। श्रम जगत में ‘सुबह’ का अभिप्राय जागने से होता है। कुमार मुकुल अपने समय के मनुष्य को जगाने के लिए ‘सुबह’ रचते हैं। और कहते हैं कि उत्तरआधुनिकता की चादंनी के रहस्यमयी परतों को हटाकर ही सुबह होगी। और इस सुबह के लिए हमें पहले अपने पांवों में धूल मिट्टी ओस पहनना होगा। यानि अपनी श्रम चेतना को जगाना होगा। और इसके साथ ही अपनी स्मृतियों को तलाशकर उसे अपने जीवन से जोड़ना होगा।

“चांदनी की
रहस्यमयी परतों को दरकाती
सुबह हो रही है
 
जगो
और पाँवों में पहन लो
धूल मिट्टी ओस
और दौड़ो
देखो- स्मृतियों में
कोई हरसिंगार अब भी हरा होगा..”।

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