Wednesday, May 18, 2022
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संविधान बचेगा, तभी देश भी बचेगा

25 नवम्बर 1949 को अम्बेडकर ने संविधान सभा में अन्तिम बार अपना भाषण, समापन भाषण दिया था जिसमें उन्होंने कई ऐसी बातें कही थीं, जो आज के भारत के लिए उस समय से कहीं अधिक उपयोगी, अर्थवान और मूल्यवान है। उस समय अम्बेडकर ने यह चिन्ता व्यक्त की थी ‘ क्या भारतीय देश को अपने मताग्रहों से ऊपर समझेंगे ? मैं नहीं जानता…..यदि पार्टियां अपने मताग्रहों को देश से ऊपर रखेंगी तो हमारी स्वतंत्रता संकट में पड़ जाएगी और संभवतः वह हमेशा के लिए खो जाए। हम सबको दृढ़ संकल्प के साथ इस संभावना से बचना है। हमें अपने खून की आखिरी बूंद तक स्वतंत्रता की रक्षा करनी है।’

अम्बेडकर के सामने प्राचीन भारत की ‘प्रजातांत्रिक प्रणाली’ थी, जिसे वह खो चुका था। क्या स्वतंत्र भारत में भी इसके खोने की कोई संभावना थी ? प्राचीन भारत की प्रजातांत्रिक प्रणाली और स्वतंत्र भारत की लोकतांत्रिक प्रणाली में समय का बड़ा अन्तर था। अम्बेडकर ने कहा ‘ भारत जैसे देश में यह बहुत संभव है – जहां लम्बे समय से उसका उपयोग न किये जाने को उसे एक बिल्कुल नयी चीज समझा जा सकता है – कि तानाशाही प्रजातंत्र का स्थान ले ले। इस नवजात प्रजातंत्र के लिए यह बिल्कुल संभव है कि वह आवरण प्रजातंत्र का बनाये रखे, परन्तु वास्तव में तानाशाही हो। चुनाव में महाविजय की स्थिति में इसी संभावना के यथार्थ बनाने का खतरा अधिक है।’

25 नवम्बर 1949 और 26 नवम्बर 2018 के किसी भाषण में क्या कोई साम्य है ? 26 नवम्बर 1949 को संविधान अंगीकार किया गया और इसी कारण यह ‘संविधान दिवस’ बना। अम्बेडकर ने संविधान-सभा के अध्यक्ष डाॅ राजेन्द्र प्रसाद को 26 नवम्बर 1949 को संविधान सुपुर्द किया। भारत सरकार ने 19 नवम्बर 2015 को राजपत्र अधिूसचना से 26 नवम्बर को ‘संविधान दिवस’ घोषित किया और पहली बार 2015 में 26 नवम्बर संविधान दिवस के रूप में मनाया गया।

इस वर्ष संविधान दिवस, 26 नवम्बर के अवसर पर भारत के प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई ने संविधान को ‘भारत की जनता के जीवन का अभिन्न अंग’ कहा और यह चेतावनी भी दी कि संविधान की बातों पर ध्यान न देने से हमारा घमंड अव्यवस्था में बदल जाएगा। व्यक्ति विशेष का घमंड चाहे वह सर्वोच्च पद पर ही क्यों न विराजमान हो, संविधान के हित में नहीं है। रंजन गोगोई ने संविधान दिवस को जश्न मनाने का दिन न कहकर भविष्य के लिए खाका तैयार करने को कहा। इस अवसर पर जिस ‘न्याय’ शब्द को राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द ने ‘ सबसे ज्यादा गतिशील शब्द ’ और संविधान एवं राष्ट्र निर्माण का साधन तथा लक्ष्य दोनों कहा है, क्या वह न्याय स्वयं आज संकट में नहीं है ? न्याय देने का कार्य न्यायपालिका का है। अगर न्यायपालिका स्वच्छ, दुग्ध धवल और पारदर्शी होती तो 12 जनवरी 2018 को सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठतम जज प्रेस कांफ्रेन्स क्यों करते ?

क्या न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका अपने उन दायित्वों का सही ढंग से निर्वाह कर रही हैं, जो उन्हें संविधान ने प्रदान की है ? संविधान को कमजोर करने वाली शक्तियां क्या न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका में नहीं हैं ? क्यों अम्बेडकर ने 25 नवम्बर 1949 और भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने 26 नवम्बर 2018 को अपने भाषणों में अंग्रेज राजनीतिक अर्थशास्त्री जाॅन स्टुअर्ट मल, 20.05.1806-08.05.1873, को याद किया ?

जाॅन स्टुआर्ट मिल का चिन्तन-दर्शन आज भी हमारे लिए उपयोगी है। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘आॅन लिबर्टी’ अपने प्रकाशन, 1859 के पहले एक लेख के रूप में था। बाद में अपनी पत्नी हैरिएट टेलर के साथ मिलकर उन्होंने पुस्तक लिखी, जिसे उन्होंने संयुक्त रचना कहा है। ‘आॅन लिबर्टी ’ के बाद मिल की दूसरी प्रमुख पुस्तक ‘यूटिलिटेअरनिज्म’ यानी उपयोगितावाद 1863 में आयी। इसे पहले उन्होंने 1861 में तीन लेख के रूप में लिखा था। मिल ने ‘आॅन लिबर्टी’ के आरम्भ में ही सत्ता और स्वतंत्रता के बात कही है। उन्होंने सरकार की निरंकुशता और तानाशाही को नागरिक अधिकारों द्वारा नियंत्रित करने की आवश्यकता बताई। मिल ने बहुमत की निरंकुशता पर भी विचार किया है और सरकार की निरंकुशता और तानाशाही की तुलना में उसे कहीं अधिक खराब माना है।

अम्बेडकर ने संविधान सभा के अपने अन्तिम भाषण में जाॅन स्टुआर्ट मिल की चेतावनी को ध्यान में रखने को कहा था ‘अपनी स्वतंत्रता को एक महानायक के चरणों में भी समर्पित न करें या उस पर विश्वास करके उसे इतनी शक्तियां प्रदान न कर दें कि वह संस्थाओं को नष्ट करने में समर्थ हो जाए।’ भारत के मुख्य न्यायाधीश को भी आशंका है। अम्बेडकर ने उस समय आयरिश देशभक्त डेनियल ओ काॅमेल का कथन भी उद्धृत किया था ‘कोई पुरुष अपने सम्मान की कीमत पर कृतज्ञ नहीं हो सकता, कोई महिला अपने सतीत्व की कीमत पर कृतज्ञ नहीं हो सकती और कोई राष्ट्र अपनी स्वतंत्रता की कीमत पर कृतज्ञ नहीं हो सकता।’

अम्बेडकर ने इस सावधानी को किसी भी अन्य देश के मुकाबले भारत के मामले में अधिक आवश्यक माना था क्योंकि ‘भारत में भक्ति या नायक-पूजा उसकी राजनीति में जो भूमिका अदा करती है, उस भूमिका के परिणाम के मामले में कोई देश भारत की बराबरी नहीं कर सकता। धर्म के क्षेत्र में भक्ति आत्मा की मुक्ति का मार्ग हो सकता है, परन्तु राजनीति में भक्ति या नायक पूजा पतन और अन्ततः तानाशाही का सीधा रास्ता है।’

हमने अम्बेडकर की प्रतिमा पर केवल माला चढ़ाई है। उनकी दी गयी चेतावनियों और आशंकाओं पर ध्यान नहीं दिया। संविधान को महत्व न देकर व्यक्ति-विशेष को महत्व दिया। भारतीय संविधान तुरन्त नहीं बना था। 2 वर्ष 11 महीने, 18 दिन की कुल 114 दिनों की बैठक में भारत गणराज्य का संविधान तैयार हुआ था। 1944 में चर्चिल के चुनाव हारने के बाद क्लेमेट एटली ब्रिटेन के नये प्रधानमंत्री बने थे। फरवरी 1946 में एटली ने भारत में तीन सदस्यीय उच्चस्तरीय शिष्ट मंडल भेजने की घोषणा की जिसमें ब्रिटिश मंत्रीमंडल के तीन सदस्य थे – भारत सचिव लार्ड पैथिक लारेन्स, व्यापार बोर्ड के अध्यक्ष सर स्टेफर्ड क्रिप्स तथा नौ सेना मंत्री ए बी अलेक्जेण्डर। स्टेफर्ड क्रिप्स के नाम पर इसे क्रिप्स मिशन कहा गया।

इस मिशन के पहले ब्रिटिश सरकार केवल सीमित समझौते की नीति अपनाती रही थी। पूर्ण स्वतंत्रता की बात पहली बार क्रिप्स मिशन के समय की गयी। इस मिशन को ब्रिटिश सरकार और भारत के विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधि से मिलकर भारतीय संविधान के ढ़ांचे का मसौदा तैयार करने और संविधान सभा के गठन की संभावना पर बात करनी थी।

संविधान सभा का गठन 1946 में कैबिनेट मिशन योजना के तहत हुआ। कैबिनेट मिशन 24 मार्च 1946 को दिल्ली आया था। इसने जिन कई मुद्दों पर अनेक दलों के नेताओं से बात की, उनमें अंतरिम सरकार का मुद्दा और भाारत को स्वतंत्रता देने एवं नये संविधान के निर्माण हेतु आवश्यक सिद्धान्तों पर विचार प्रमुख था। 9 दिसम्बर 1946 को संविधान सभा की पहली बैठक हुई। आरम्भ में संविधान सभा में कुल 389 सदस्य थे जिनमें प्रोविन्सेज के 292, राज्यों के 93, चीफ कमिश्नर प्रोविनसेज के 3 और बलुचिस्तान के 1 प्रतिनिधि थे। मुस्लिम लीग ने संविधान सभा से अपने को अलग किया जिससे संविधान सभा की सदस्य संख्या घटकर 299 हो गयी। संविधान सभा की पहली बैठक के पहले 2 सितम्बर 1946 को नेहरू और उनके सहकर्मियों ने वायसराय की कांउसल के सदस्यों के रूप में शपथ ली थी।

इसके पहले क्रिप्स मिशन ने 16 मई 1946 को कांग्रेस और मुस्लिम लीग से आरम्भिक बातचीत के बाद नयी सरकार के गठन का प्रस्ताव पेश किया था। 9 दिसम्बर 1946 को मुस्लिम लीग के सदस्यों की अनुपस्थिति में डाॅ राजेन्द्र प्रसाद की अध्यक्षता में संविधान सभा गठित की गयी।

स्ंविधान सभा में कुल 22 समितियां थीं जिनमें प्रारूप समिति, ड्राफ्टिंग कमेटी, सर्वाधिक महत्वपूर्ण थी। इसका कार्य संविधान निर्माण था। अम्बेडकर संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे। भारतीय संविधान में कुल 448 अनुच्छेद और 12 अनुसूचियां हैं, जो 25 भागों में विभक्त हैं।

संविधान सभा की बैठक उस दौर में हुई थीं जब देश राजनीतिक रूप से उग्र और अशान्त वातावरण से गुजर रहा था। 3 जून 1947 को लार्ड माउण्टबेटन ने भारत विभाजन की घोषणा की थी। अम्बेडकर ने हिन्दू राष्ट्र के विचार को खारिज किया था। उन्होंने मजहबी राज्य को अस्वीकार किया था और सरकार के राष्ट्रपति फार्म को भी खारिज किया था। अगर यह सब न होता तो आज संविधान कुछ और होता और संसदीय प्रणाली भी न होती। भारतीय संविधान में कई चीजें कई देशों से ली गयी हैं। आजादी, समानता और बंधुत्व का सिद्धान्त फ्रांस से, पंचवर्षीय योजना का विचार सोवियत रूस से, सामाजिक आर्थिक अधिकार का सिद्धान्त आयरलैण्ड से और जिस कानून पर सुप्रीम कोर्ट कार्य करता है, वह जापान से लिया गया है।

ब्रिटिश वकील और अकादमिक सर इवर जेनिंग्स ने भारत के संविधान को ‘वकीलों का स्वर्ग’ कहा है, कुछ अस्पष्ट पदों/शब्दों के कारण कुछ ने इसकी तुलना ऐसी महिला से की है, जो अपने प्रेमियों के मनोभाव के अनुसार प्रशंसा या निन्दा करती है। संविधान में कई शब्द अनेकार्थक हैं, जिसकी व्याख्या वकील करते हैं। इसी कारण इसे ‘वकीलों का स्वर्ग’ कहा गया है। वकीलों द्वारा संविधान के प्रावधानों की की गयी व्याख्या के आधार पर ही न्यायालय अपना निर्णय देता है।

दिल्लीवासी प्रेमबिहारी नारायण रायजादा ने अपने हाथ से 254 दावात और 303 पेन के इस्तेमाल से काॅन्स्ट्टियूशन हाउस में आवंटित एक कमरे में लिखा। इन्होंने संविधान की मूल प्रति हिन्दी और अंग्रेजी में लिखी। छः महीने में यह लेखन-कार्य पूरा हुआ। रायजादा के परिवार का पेशा कैलिग्राफी था। नेहरू से इन्होंने मात्र एक शर्त रखी थी – संविधान के प्रत्येक पृष्ठ पर अपना नाम लिखने की और अन्तिम पृष्ठ पर अपने नाम के साथ अपने दादा का नाम लिखने की। नेहरू ने शर्त मानी। नन्दलाल बोस ने संविधान को अपने चित्रों से सजाया और उनके शिष्य व्यौहार राम मनोहर सिन्हा ने संविधान की प्रस्तावना को अपनी कला सें सजाया। संविधान की मूल प्रति संसद के केन्द्रीय पुस्तकालय के स्ट्रांग रूम में हीलियम से भरे केस में रखी हुई है।

संसदीय लोकतंत्र पर आधारित संविधान आज खतरे में है। ‘संविधान बचाओ, देश बचाओ’ के नारे गूंज रहे हैं। यह संविधान ‘क्षमता का नहीं, स्वतंत्रता का जीवन्त दस्तावेज’ है। संविधान भारतीय नागरिकों को समानता का अधिकार देता है। यह लोक कल्याणकारी राज्य के प्रति कृत संकल्प है। आज संविधान की चिन्ता संविधान का शपथ लेने वालों को भी नहीं है। जब संविधान बचेगा, तभी देश बचेगा अन्यथा………

रवि भूषण
लेखक वरिष्ठ आलोचक हैं.
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