समकालीन जनमत
साहित्य-संस्कृति

जन संस्कृति मंच का 40वां स्थापना दिवस घुटूवा शहीद स्मारक में संपन्न

30 अक्टूबर, 2025 को रामगढ़ जिले के घुटूवा 1नंबर गेट स्थित शहीद स्मारक में घुटूवा गोलीकांड के शहीदों रिझनी देवी, बलकहिया देवी और रामप्रसाद महतो को याद करते हुए झारखंड जन संस्कृति मंच, रामगढ़ इकाई ने अपना 40वां स्थापना दिवस जनगीतों की प्रस्तुति कर उत्साहपूर्वक मनाया। यह आयोजन जसम की राष्ट्रीय कार्यकारिणी समिति के आह्वान पर चल रहे राष्ट्रीय सांस्कृतिक अभियान के तहत संपन्न हुआ, जिसका केंद्रीय थीम था — “उठाने ही होंगे अभिव्यक्ति के खतरे।”

कार्यक्रम का संचालन सुरेन्द्र कुमार बेदिया ने किया।

इस अवसर पर जसम के चार दशकों के संघर्षपूर्ण सांस्कृतिक सफर और जनपक्षीय रचनात्मक धारा पर चर्चा हुई।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए जन संस्कृति मंच की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य सुरेन्द्र कुमार बेदिया ने कहा कि जन संस्कृति मंच का उद्देश्य जनता की संस्कृति को आगे बढ़ाना और जनविरोधी संस्कृति से संघर्ष करना है। उन्होंने कहा कि जसम उस परंपरा का वाहक है जो जनता की पीड़ा, संघर्ष, उम्मीद और मुक्ति के गीत गाती है।

उन्होंने कहा कि यह मंच मनुष्य को मनुष्य से जोड़ता है और समाज में समानता, न्याय तथा स्वतंत्रता के सपनों को साकार करने की दिशा में कार्य करती है। जन संस्कृति मंच उन विचारों को पोषित करता है जो समतामूलक है, क्रांतिकारी है, धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील हैं। इसलिए, यह केवल एक सांस्कृतिक संस्था नहीं बल्कि सामाजिक परिवर्तन का एक सशक्त जनपक्षीय आंदोलन है।

उन्होंने आगे यह भी कहा कि पनघट का डगर इतना आसान नहीं है, क्योंकि इसके सामने ब्राह्मणवाद, मनुवाद, पितृसत्ता और सांप्रदायिकता की बड़ी-बड़ी ताकतें चट्टान की तरह खड़ी हैं। ये ताकतें समाज को बाँटती हैं, इंसान को इंसान से अलग करती हैं। सत्ता और पूंजी के बदौलत ये हमारी चेतना, हमारी भाषा, हमारे गीत और हमारी कला पर कब्ज़ा करना चाहती हैं । जन संस्कृति मंच की असल लडाई इसी से है। जहां एक ओर लुटेरों की संस्कृति है, जो शोषण, अन्याय और दमन पर टिकी है; तो दूसरी ओर कर्मठों-श्रमशील वर्ग की संस्कृति है, जो मेहनत, रचना और प्रतिरोध की संस्कृति है।

जन संस्कृति मंच इसी दूसरी संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है और यह उस परंपरा को आगे बढ़ाता है जिसमें कबीर की आवाज़, फूले का विद्रोह, अंबेडकर का विचार और भगत सिंह का सपना शामिल है, जो सत्ता के झूठ का पर्दाफाश करती है, कलाकार को आंदोलनकारी बनाती है और कविता को प्रतिरोध की धार देती है।”

उन्होंने कहा कि आज जब सत्ता की संस्कृति जनता की संस्कृति को कुचलने की कोशिश कर रही है, सवाल पूछने वालों को देशद्रोही कहा जा रहा है, कलाकारों, लेखकों, शिक्षकों और जन स्वरों को जेलों में ठूँसा जा रहा है तब हमें और भी संगठित और निर्भीक होकर कहना होगा हम जनता के सच्चे सांस्कृतिक सिपाही हैं। हमें डराया और खरीदा नहीं जा सकता, क्योंकि हम जनता के पक्ष में सृजन और संघर्ष की राह पर खड़े हैं।

अंत में उन्होंने कहा कि कला संस्कृति के हर उस विधा- गीत, कविता, कहानी, लेख,नाटक चित्रकला, साहित्य, पोस्टर प्रदर्शनी, प्रतिरोध के शेरों-शायरी, गजल, आदिवासी कला संस्कृति और संवाद के हर उस संस्कृति को मजबूत करेंगे जो मनुष्य की मुक्ति का रास्ता बनाती है। मानव मुक्ति की गीत गाती है।

वहीं इस कार्यक्रम में समसामयिक मुद्दों पर जसम के साथी जन्मजेय तिवारी ने “खत्म होती जिंदगानी” और “बदलता दौर” शीर्षक से बेहतरीन काव्य पाठ प्रस्तुत किया, जिससे उपस्थित जनसमूह आंदोलित हो उठा।

झारखंड ‌संस्कृति मंच की टीम की प्रस्तुति से शहीद स्थल लोकधुनों और प्रतिरोध के गीतों से उस समय गूंज उठा जब उभरता लोकगायक भरत बेदिया और दिनेश करमाली ने अपने सुरीले लेकिन क्रांतिकारी स्वरों में जनगीत प्रस्तुत किए। कोरस में शिवनारायण बेदिया, ढोलवादक मोतीलाल बेदिया, नगाड़ा वादक टुकू दास और ऑर्गन वादक बालेश्वर करमाली की शानदार जुगलबंदी ने माहौल को जोश और ऊर्जा से भर दिया।

जनगीतों की लड़ी में एक के बाद एक गीत प्रस्तुत किए गए

*शहीदेक सपनवा के याद रखिया भैया, याद रखिया बहिन उ काला दिनवा के………..

घुटूवा गोलीकांडवा के…………….

यह गीत शहीदों की याद में गाया गया है। इसमें भाई और बहन दोनों से आह्वान किया गया है कि वे उस काले दिन को याद रखें जब घुटूवा की धरती पर निर्दोष ग्रामीणों को गोली से भून दिया गया था। यह गीत केवल शोक नहीं, बल्कि संकल्प का प्रतीक है— शहीदों के अधूरे सपनों को पूरा करने का वादा। गीत यह कहता है कि समय बीत जाए, पर शहादत की याद, संघर्ष की लौ और न्याय का सपना कभी बुझना नहीं चाहिए।

*अब नाय सहब हम एतय अत्याचारी,

करेजा निकाइल देबय हम छाती फारी…”

यह पंक्ति विद्रोह की ज्वाला को अभिव्यक्त करती है। इसमें कहा गया है कि अब जनता किसी भी अत्याचार या अन्याय को बर्दाश्त नहीं करेगी। शोषण और दमन के खिलाफ जनाक्रोश फूट पड़ा है— इतना गहरा कि यदि कोई अत्याचारी जनता की गरिमा को रौंदने की कोशिश करेगा तो जनता अपने प्राण देकर भी प्रतिरोध करेगी।

“छाती फाड़कर कलेजा निकाल देना” यहाँ प्रतीकात्मक है — इसका अर्थ है कि अब आत्मसमर्पण नहीं, बल्कि प्रतिरोध और आत्मबलिदान का रास्ता अपनाया जाएगा। यह पंक्ति जनता की जागृत चेतना और संघर्षशील मनोबल की उद्घोषणा है।

*नागपूर कर सोनाsssssss

भरल खोंसा कांसी फूल डींडा समय झुला झूल रैलो…

यह गीत झारखंड की धरती, प्रकृति और जीवन के सौंदर्य का बिंब प्रस्तुत करता है। “नागपुर कर सोना” से आशय उस धरती से है जो सोने-सी उपजाऊ और समृद्ध है। “भरल खोंसा कांसी फूल” से जंगलों की हरियाली और प्राकृतिक शोभा का चित्रण है। “डींडा समय झुला झूल रैलो” में जीवन की लय, त्योहारों की उमंग और लोक संस्कृति की जीवंतता झलकती है।

इस गीत के माध्यम से यह संदेश दिया गया है कि झारखंड की मिट्टी केवल खनिजों की नहीं, बल्कि लोक सौंदर्य, परंपरा और प्रतिरोध की भूमि है — जो दुख में भी गीत गाती है और अन्याय के विरुद्ध झूमकर खड़ी होती है।

इन गीतों ने शहीदों की याद को फिर से जीवंत कर दिया।

कार्यक्रम के दौरान चित्रकार मोतीलाल बेदिया द्वारा जन प्रतिरोध और संघर्ष पर आधारित पोस्टर प्रदर्शनी ने लोगों को आकर्षित किया और चर्चा का केंद्र बनी।

कार्यक्रम के अंत में सुरेन्द्र कुमार बेदिया ने हाफीज मेराठी के प्रतिरोध का गाना-

आबाद रहेंगे विराने, शादाब रहेंगी जंजीरें,

जब तक दीवाने ज़िंदा हैं, फुलेंगी-फलेंगी जंजीरें।

की इन पंक्तियों ने कार्यक्रम को अपने शिखर पर पहुँचा दिया।

पूरे शहीद स्थल में जनसंस्कृति, प्रतिरोध और एकता का भाव गूंजता रहा।

कार्यक्रम के अंत में साथियों ने शहीदों को नमन करते हुए जन संस्कृति मंच के मूल उद्देश्य जनता की संस्कृति को सशक्त करने और जनविरोधी प्रवृत्तियों से संघर्ष को और अधिक व्यापकता देने का संकल्प लिया।

साथ ही झारखंड संस्कृति मंच की ओर से आगामी दिनों में “जन सांस्कृतिक अभियान के अंतर्गत कार्यक्रम आयोजित करने की घोषणा की गई।

इस मौके पर वरिष्ठ साथी और रामगढ़ भाकपा माले जिला कमेटी के सचिव हीरा गोप, आदिवासी संघर्ष मोर्चा के राष्ट्रीय सह संयोजक देवकीनन्दन बेदिया, पतरातू प्रखंड माले सचिव नरेश बडाईक, सोहराय किस्कू, तृतियाल बेदिया , भुनेश्वर बेदिया, देवानंद गोप, नीता बेदिया, सोनाराम मांझी, रस्का हेम्ब्रम राजेन्द्र राम, बृज नारायण मुंडा, धनीराम प्रजापति, डा शहनवाज खान, गोपी बेदिया, लाली बेदिया, भुनेश्वर राम,मनोज राम, सुशील कुमार, विक्रांत बेदिया, सरिता देवी, सीता देवी, उमेश गोप, मदन प्रजापति, फूलो देवी, सुरती देवी, हेंमती देवी, धनमती देवी, नुरसी देवी, किरण कुमारी, सावित्री कुमारी, पचमी देवी, मिला देवी, ठंडामनी देवी, बाटेश्वर मुंडा समेत रामगढ़ जिला के पतरातू, रामगढ़ और मांडू प्रखंड के सैकड़ों ग्रामीणों, महिलाओं और नौजवानों की भारी संख्या सांस्कृतिक कार्यक्रम में शामिल थी।

सुरेन्द्र कुमार बेदिया

राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य

झारखंड

Related posts

Fearlessly expressing peoples opinion