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साहित्य-संस्कृति

असम के कवियों पर दर्ज मुक़दमा वापस लो !

 
जन संस्कृति मंच का बयान
31 जुलाई को असम में नागरिकता रजिस्टर जारी होने वाला है। असम में इस मुद्दे पर भेदभाव के ख़िलाफ़ कई आंदोलन चल रहे हैं, जिसकी एक कड़ी ‘ मिया कविता ‘ आंदोलन है। ये कविताएँ दरअसल असम में अल्पसंख्यक समुदाय को प्रताड़ित करने और उनकी मातृभूमि से उन्हें बेदख़ल करने की केंद्र व राज्य सरकार की साज़िश को बेनक़ाब करती हैं।
बांग्लादेशी के नाम पर सरकारें असम के बाशिंदों के एक तबके की नागरिकता को ख़ारिज करने और समाज को बाँट देने की जिस ख़तरनाक कोशिश में लगी हुई हैं, यह कविता आंदोलन उसके प्रतिवाद से जन्मा है। इन्हीं कवियाओं को लेकर असम में गुआहाटी पुलिस ने 10 तारीख़ को प्रणबजीत दोलोई की शिकायत के आधार पर चर-चापोरी साहित्य परिषद के अध्यक्ष हाफ़िज़ अहमद समेत असम के दस कवियों पर एफ़आईआर दर्ज की है।
एफ़आईआर के मुताबिक़ यह कविता असम के लोगों को जेनोफोबिक (अन्य को न पसंद करने वाला) बताती है, जिससे असम की छवि ख़राब होती है। साथ ही ये कविताएँ राष्ट्रीय सुरक्षा और समाज की समरसता के लिए भी ख़तरा हैं। आरोप यह भी है कि चूँकि कवि ने इसमें अपने एनआरसी नंबर का ज़िक्र किया है, इसलिए मामला अदालत की अवमानना का भी है और यह एनआरसी के अद्यतनीकरण की प्रक्रिया में बाधक हो सकती है।
उत्तर भारत में आमतौर पर सम्मान के साथ इस्तेमाल होने वाला ‘मिया’ शब्द असम के बांग्लाभाषी मुसलमानों के लिए गाली की तरह इस्तेमाल किया जाता है। इस पहचान को ‘मिया कविता’ के कवियों ने नए सिरे से बुलंद किया है। ये कवि असमिया के अलावा अपनी मादरी ज़ुबान में कविता लिखते हैं और सरकारों द्वारा अपने साथ होने वाले भेदभाव और दोयम दर्जे के व्यवहार को कविताओं के ज़रिए दर्ज करते हैं।
पूर्वी बंगाल (अब बांग्ला देश) से आए तक़रीबन पंद्रह लाख लोगों ने 1900 से 1910 के बीच ब्रह्मपुत्र के दोआबे को आबाद किया। यह इलाक़ा असम के सर्वाधिक विपन्न और अशिक्षित इलाक़ों में से एक है। बांग्लादेश के मैमनसिंह इलाक़े से आए हुए इन किसानों की ज़ुबान यहाँ आकर एक अलग ही बोली में ढल गयी जिसे इस समुदाय की तरह की दोयम दर्जे का माना जाता रहा। समुदाय और उसकी ज़ुबान को तिरस्कार भरी आवाज़ में ‘मिया’ कहकर पुकारा जाता रहा।
सौ से अधिक सालों से असम की धरती में रचे-पगे इस समुदाय की नागरिकता उतनी ही पुख़्ता है, जितनी असम में रहने वाले किसी और समुदाय की पर अब राजनीतिक कारणों से नागरिकता रजिस्टर के ज़रिए इस इलाक़े के लोगों को बेवजह परेशान किया जा रहा है। इस आंदोलन के कवि पहले कवि अहमद, जिनका नाम एफ़आईआर में है, ने अपनी कविता में इस पहचान के तिरस्कार को पलटकर पाठकों के सामने रख दिया और पूछा कि ‘एक लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष, गणतंत्र के नागरिक’ के साथ यह दोयम दर्जे का व्यवहार क्यों ?
प्रतिरोध के नामचीन कवि महमूद दरवेश की ‘ परिचय पत्र ‘ कविता से प्रभावित अहमद की कविता ‘ लिखो ‘ की धार ठीक दरवेश की कविता जैसी ही है जहाँ वे पश्चिम की आँखों देखी गयी अपनी मुस्लिम छवि को नए सिरे से एसर्ट करते हैं। यह कविता सत्ता संरचना की आँखों में आँखें डालकर सच कहने की हिम्मत से रची गयी है। कविताएँ हमेशा से सत्ता संरचनाओं का विरोध करती रही हैं और सचाई की बेख़ौफ़ आँखों से सत्ता को डराती रही हैं।
यह कविता भी अभिव्यक्ति की आज़ादी की उन श्रेष्ठ अभिव्यक्तियों में से एक है जहाँ दूसरी आज़ादियों के लिए संघर्ष कविता की शर्त बन कर आती है। यह कविता असम की आबादी के एक हिस्से के साथ किए जा रहे सौतेले व्यवहार को सीधे शब्दों में रेखांकित करती है, और लोगों को इस अन्याय के ख़िलाफ़ सम्वेदनशील बनाती है। सच कहने से ही समाज का भला हो सकता है, भले ही वह कड़वा हो। झूठ बोलती-बजाती-खाती सत्ता संरचना के लिए सत्य हमेशा असुविधाजनक होता है।
ये कविताएँ समाज की बेहतरी के लिए कड़वा सच हमारे सामने पेश करती हैं। समाज के हाशिए के तबक़ों, मसलन दलित, स्त्री या आदिवासी समुदाय की तरफ़ से रचे गए साहित्य पर भी समाज को तोड़ने वाला कहते हुए आरोप लगाए जाते रहे हैं क्योंकि ‘मिया कविता’ की तरह ही इन तबक़ों की कविताएँ भी यथास्थिति को तोड़कर सत्ताओं से लड़ते हुए समाज को बेहतर दिशा में ले जाने का संघर्ष करती हैं।
दूसरे अदालत के आदेश पर चल रही प्रक्रिया की आलोचना की अभिव्यक्ति की आज़ादी का अधिकार हमारा संविधान हमें मुहैया कराता है। कविता के इस जन-पक्षधर ताप से बचने के लिए सत्ता व उसके गुर्गे क़िस्म-क़िस्म की पाबंदियाँ ईजाद करते रहे हैं। यह एफ़आईआर भी उसी सिलसिले की एक कड़ी है।
जन संस्कृति मंच अभिव्यक्ति की आज़ादी और जन पक्षधर कविताओं के दमन की भर्त्सना करता है और जल्दी से जल्दी एफ़आईआर वापस लेने की माँग करता है। जन संस्कृति मंच सभी जन-पक्षधर रचनाकारों-संस्कृतिकर्मियों का आह्वान करता है कि इस दमन के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करें।
[कथाकार चंदन पांडेय द्वारा हाफ़िज़ अहमद की संदर्भित कविता का अनुवाद]
लिखो हाफ़िज़ अहमद दर्ज करो कि / मैं मिया हूँ / नाराज* रजिस्टर ने मुझे 200543 नाम की क्रमसंख्या बख्शी है / मेरी दो संतानें हैं / जो अगली गर्मियों तक / तीन हो जाएंगी, / क्या तुम उससे भी उसी शिद्दत से नफरत करोगे / जैसी मुझसे करते हो? / लिखो ना / मैं मिया हूँ / तुम्हारी भूख मिटे इसलिए / मैंने निर्जन और नशाबी इलाकों को / धान के लहलहाते खेतों में तब्दील किया, / मैं ईंट ढोता हूँ जिससे / तुम्हारी अटारियाँ खड़ी होती हैं, / तुम्हें आराम पहुँचे / इसलिए / तुम्हारी कार चलाता हूँ, / तुम्हारी सेहत सलामत रहे इसलिए / तुम्हारे नाले साफ करता हूँ, / हर पल तुम्हारी चाकरी में लगा हूँ / और तुम हो कि तुम्हें इत्मिनान ही नहीं! / लिख लो, / मैं एक मिया हूँ, / लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष, गणतंत्र का नागरिक / जिसके पास कोई अधिकार तक नहीं, / मेरी माँ को संदेहास्पद-मतदाता** का तमगा मिल गया है, / जबकि उसके माँ-बाप सम्मानित भारतीय हैं, / अपनी एक इच्छा-मात्र से तुम मेरी हत्या कर सकते हो, मुझे मेरे ही गाँव से निकाला दे सकते हो, / मेरी शस्य-स्यामला जमीन छीन सकते हो, / बिना किसी सजा के तुम्हारी गोलियाँ, / मेरा सीना छलनी कर सकती हैं. / यह भी दर्ज कर लो / मैं वही मिया हूँ / ब्रह्मपुत्र के किनारे बसा हुआ दरकिनार / तुम्हारी यातनाओं को जज्ब करने से / मेरा शरीर काला पड़ गया है, / मेरी आँखें अंगारों से लाल हो गई हैं. / सावधान! / गुस्से के अलावा मेरे पास कुछ भी नहीं / दूर रहो / वरना / भस्म हो जाओगे।
*नाराज रजिस्टर: नागरिकों की राष्ट्रीय जनगणना रजिस्टर
** संदेहास्पद मतदाता: डी वोटर

 

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