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शमशेर बहादुर सिंह जयंती समारोह : बात बोलेगी, हम नहीं, भेद खोलेगी बात ही

प्रगतिशील कविता के सबसे अनोखे और प्रयोगधर्मी कवि शमशेर बहादुर सिंह के पैतृक गाँव कस्बा एलम जिला शामली में 2023 से ‘शमशेर बहादुर कला मंच’ ‘जन संस्कृति मंच व चलचित्र अभियान’ के साझे प्रयास से शमशेर जयंती समारोह का आयोजन किया जा रहा है। इस बार यह आयोजन 25 जनवरी को ऐलम कस्बे के ऐलम ग्रीन मैरेज हॉल में संपन्न हुआ। शमशेर जी का जन्मदिवस 12 जनवरी को होता है, दिल्ली पुस्तक मेले की व्यस्तताओं के कारण यह आयोजन 25 जनवरी को रखा गया।

इस आयोजन में ऐलम के स्थानीय निवासियों के अतिरिक्त दिल्ली एन. सी. आर, इलाहबाद,देहरादून, मेरठ, मुजफ्फर नगर समेत पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा से आये लेखकों, संस्कृति कर्मियों, कवियों और छात्र – नौजवानों ने शिरकत की।

इस बार कार्यक्रम की थीम शमशेर की प्रसिद्ध कविता पंक्ति ‘बात बोलेगी हम नहीं, भेद खोलेगी बात ही’ को बनाया गया था। सुबह 10 से शाम 6 बजे तक चलने वाले इस कार्यक्रम को तीन सत्रों में विभाजित किया गया – विचार गोष्ठी, फ़िल्म स्क्रीनिंग और कविता पाठ।

पहले और दूसरे सत्र का मंच संचालन एक्टिविस्ट और संस्कृतिकर्मी प्रवेंद्र ने किया । पहले सत्र में ‘हकीकत का अमर सपना और शमशेर की कविता’ विषय पर विचार गोष्ठी का आयोजन हुआ, जिसकी अध्यक्षता वरिष्ठ कवि मदन कश्यप ने की।

डॉ प्रेम शंकर सिंह सी. एम. पी. डिग्री कॉलेज इलाहाबाद  में हिंदी के सहायक प्रोफेसर युवा आलोचक ने बेहद आत्मीयता के साथ ’आधार वक्तव्य’ प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि शमशेर परम्परा के पुनराविष्कार के कवि हैं। उनकी सौंदर्यदृष्टि के आधार पर आलोचकों ने उनकी विचारधारा और रचना दृष्टि में एक फांक तलाशने की कोशिश की , लेकिन सच्चाई यह है कि शमशेर की जिन कविताओं को शुद्ध प्रेम और सौंदर्य की कविताएं समझा जाता है, वे भी बुनियादी रूप से मानव प्रगति और सामाजिक समता के कम्युनिस्ट मूल्यों को ही प्रस्तावित करती हैं। उन्होने ‘एक आदमी दो पहाड़ों को कुहनियों से ठेलता’, ‘अमन का राग’ और ‘उषा’ जैसी कविताओं के उदाहरण से यह स्थापित किया कि शमशेर सौंदर्य दृष्टि ‘हकीकत को तखय्युल से बाहर’ लाकर रुमानी भावबोध को यथार्थ और प्रतिबद्धता के धरातल पर ले आती है.

वरिष्ठ आलोचक, ‘आलोचना’ पत्रिका के संपादक और दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर आशुतोष कुमार ने शमशेर बहादुर सिंह के व्यक्तित्व, उनकी किसानी पृष्ठभूमि और जीवन संघर्ष की चर्चा की और बताया कि इनकी रोशनी में शमशेर की कविताओं को समझना आसान है। उन्होंने कहा किशमशेर बहादुर सिंह के सामने अब तक की हिंदी आलोचना असहाय दिखाई देती है। उन्हें सौंदर्य का कवि कहा गया, लेकिन उनके सौंदर्य बोध की व्याख्या करना कठिन साबित हुआ है। यह कठिनाई इस कारण है कि हिंदी आलोचना का उस किसानी संवेदना और सौंदर्यबोध से प्रगाढ़ परिचय नहीं है, जो शमशेर की कविताओं की असली जमीन है।

शमशेर की कविता को ठस किताबी सिद्धांतों से समझने की कोशिश करने पर वह गूढ़, जटिल और अंतर्विभक्त दिखाई देगी, लेकिन किसान संवेदना और कम्युनिस्ट चेतना के सहारे सहज ही उसके साथ राब्ता कायम किया जा सकता है।

वरिष्ठ संस्कृति कर्मी अनुवादक और संगठनकर्ता दिगंबर ने शमशेर बहादुर सिंह की कविताओं का किसानों–मजदूरों के जीवन और सपने के साथ जोड़ते हुए बातचीत रखी। वह मेहनतकशों के सच्चे कवि थे। आज मुजफ्फरनगरी कवि शमशेर की कविताओं को आवाम के बीच ले जाने की जरूरत है।

वरिष्ठ कवि मदन कश्यप ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि शमशेर को समझने के लिए उनकी ’शमशेरियत’ को समझना जरूरी है। किसी फ्रेम में कस कर उनको समझने का प्रयास भ्रामक है।

उनकी कविताएं प्रेम, सौंदर्य, संवेदना और बदलाव आदि को खुद में समाहित किए हुए हैं, जिन्हें आज जानने समझने की बेहद जरूरत है। उन्होंने कहा कि शमशेर और मुक्तिबोध दो ऐसे कवि हैं जिनकी कविताओं में मनुष्य की मुक्ति और समाज की मुक्ति के स्वप्न के बीच गहरा अंतरसम्बन्ध है। शमशेर की कविता को व्यक्ति और समाज के द्वैत के आधार पर नहीं समझा जा सकता, वे व्यक्ति और समाज के यथार्थ के बीच वैसा विरोध नहीं देखते जैसा उस दौर के मार्क्सवादी आलोचकों ने समझा था। यही कारण है कि वाम और दक्षिण दोनों ही ध्रुवों पर उनको ठीक से समझा नहीं गया। आज के दौर की आलोचना को शमशेर को सही सन्दर्भ में समझने का काम करना होगा।

दूसरे सत्र में ‘चलचित्र अभियान’ के विशाल, शाकिब और शावेज़ ने शमशेर बहादुर सिंह की कविता के वास्तविक वीडियो प्रस्तुत की, जिसे संजय जोशी ने उपलब्ध कराया। इससे श्रोताओं में ऐसा माहौल बन गया जैसे शमशेर हम सब के बीच मौजूद होकर कविता पढ़ रहे हों। आगे चलचित्र अभियान के कार्यकर्ताओं ने कई छोटी – छोटी डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का प्रदर्शन किया, जिसमें पश्चिमी यूपी के शामली, मुजफ्फरनगर और आस पास के इलाकों के मेहनतकशों की जिंदगी और उनके ज्वलंत सवालों को दर्शाया गया।

तीसरे सत्र में कवि सम्मेलन का आयोजन हुआ। इसका संचालन संस्कृतिकर्मी, लेखक, प्राध्यापक रामायन राम ने और अध्यक्षता वरिष्ठ कवि बल्ली सिंह चीमा ने की। कवि गोष्ठी में सर्वश्री मदन कश्यप, पराग पावन, राजेश सकलानी, रूपम मिश्र, जुबेर सैफी, राजेश पाल, मृत्युंजय, दिगम्बर, पूजा कुमारी, पायल भारद्वाज, अनुपम सिंह, प्रिंस मिश्र, परविंदर, अजीत, सुनीता शर्मा, मोहित एलम, मोनू पटियाला ने कविताओं का पाठ किया, जिसे श्रोताओं ने सराहा। कवि सम्मेलन की खास बात यह रही कि इसमें बल्ली सिंह चीमा, मदन कश्यप जैसे वरिष्ठ कवियों के साथ साथ पराग पावन, मृत्युंजय, अनुपम सिंह, पूजा कुमारी, पायल भारद्वाज,रूपम मिश्र, राजेश सकलानी, राजेश पाल जैसे युवा और वर्तमान समय के प्रमुख हस्ताक्षर कवियों के अतिरिक्त युवतम पीढ़ी के तमाम कवियों ने अपनी कविताओं का पाठ किया।

कार्यक्रम में प्रवाह सांस्कृतिक टीम ने शमशेर और मुक्तिबोध की कविताओं पर आधारित गीतों का गायन किया। सभागार और कार्यक्रम स्थल पर साज – सज्जा और अन्य प्रबंधन का काम अग्रगामी छात्र संगठन के साथियों ने संभाला। सभागार के बाहर खुले लॉन में गार्गी प्रकाशन और नावारुण प्रकाशन द्वारा पुस्तक प्रदर्शनी लगायी गई। चाय – नाश्ते और भोजन व्यवस्था का काम किसान नेता, ऐलम निवासी सुबोध पंवार और साथियों ने संभाला।

शमशेर जयंती समारोह का यह आयोजन अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हर साल नियमित रुप से होने वाला एक आयोजन बन गया है, जिसमें एक साहित्यिक – सांस्कृतिक उत्सव में तब्दील हो जाने की सम्भावना है। ऐलम कस्बे के किसान, महिलाएं और छात्र – युवा बेहद आत्मीय तरीके से इस आयोजन में शामिल होते हैं, शमशेर जी के परिवार के सदस्य रिश्ते में उनके भतीजे बलराज और अन्य ग्रामवासी इस आयोजन में खुल कर सहयोग करते हैं। शहरों के अकादमिक केंद्रों से दूर एक गाँव में होने वाला यह आयोजन हमारे पुरखे कवि को न सिर्फ याद करने का एक कार्यक्रम है बल्कि एक सांस्कृतिक जागरण का अभियान है। यहाँ आने वाले कई लेखकों, संस्कृतिकर्मियों ने यह सुझाव दिया कि इस आयोजन को कम से कम दो दिन का किया जाना चाहिए। आने वाले दिनों में इस दिशा में प्रयास करने की जरुरत है।

 

रिपोर्ट – रामायन राम / प्रवेन्द्र

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