समकालीन जनमत
पुस्तक

अछरिया हमरा के भावेले

पुस्तकालय के बारे में हम उस समय बात कर रहे हैं जब दिल्ली के एक केंद्रीय विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में घुसकर विद्यार्थियों की पुलिस द्वारा निर्मम पिटाई के दृश्य प्रकट हुए हैं । पुस्तकालय के भीतर घेरकर होने वाले इस उत्पीड़न को शताब्दी वर्ष में जलियांवाला बाग की तर्ज पर विद्यार्थियों ने जामियावाला बाग कहा । अचरज की बात लाठी चार्ज नहीं था । अचरज की बात इसके बाद हुई जब जामिया के विद्यार्थियों ने परिसर के बाहर कुछ किताबों के साथ प्रतिरोध का पुस्तकालय खोल दिया । इस पुस्तकालय का नाम (फ़ातिमा शेख सावित्रीबाई फुले लाइब्रेरी) भी प्रतीकात्मक था ।

इस पहल ने प्रतिरोध के नितांत नए मुहावरे को जन्म दिया । सहसा नागरिकता संशोधन विधेयक के विरोध में आयोजित धरनों में इस किस्म के पुस्तकालय देश भर में चलने लगे । विद्यार्थियों ने इन्हें वैकल्पिक जानकारी की जगह के रूप में चलाने की कोशिश की । इन पुस्तकालयों ने किताबों के ऐसे पाठकों को जन्म दिया जिनकी शायद पहले कभी किताबों में रुचि न रही होगी ।

हाल के दिल्ली दंगों में मुस्तफ़ाबाद में इस तरह का एक पुस्तकालय भी जला दिया गया । कोरोना के चलते प्रतिरोध के प्रदर्शन तो सिमट गए लेकिन पुस्तकालय चलाने वाले इसे जारी रखने के नए तरीके सोच रहे हैं। इससे सचल पुस्तकालय का भी रूप दिया जा सकता है। संचालकों का सोचना है कि पाठक सामाजिक बदलाव के सक्रिय वाहक होंगे। असल में इन विरोध प्रदर्शनों ने भी उन औरतों को घर से पहली बार बाहर निकाला जो हमेशा घर के भीतर ही रही थीं। उनके हाथ में किताब का पहुंचना इससे आगे का कदम था । साथ में बच्चों के लिए अलग प्रभाग खोला गया। पुस्तक से उनके परिचय से कहानी आगे चली तो उनको सरकारी स्कूलों में दाखिला दिलाने की जरूरत महसूस हुई । इस परिघटना से शिक्षा, किताब और समाज तथा सरकार के आपसी रिश्तों के बारे में बहुत सी बातें करने की गुंजाइश पैदा होती है ।

हम सभी जानते हैं कि जहां सबसे कम आजादी होती है यानी जेल, वहां भी पुस्तकालय होता है । इस अकेले तथ्य से मनुष्य के जीवन में किताब का महत्व समझा जा सकता है । इसके साथ यह भी तथ्य है कि जब तानाशाही की आहट आती है तो उसके पहले शिकार किताब और पुस्तकालय होते हैं। जरूरी नहीं कि तानाशाही खुलेआम और हिंसक रूप में ही सामने आए। बहुधा वह एक व्यवस्थित विभेदकारी तंत्र के रूप में मौजूद रहती है । इस तंत्र में बहिष्करण और नियंत्रण के हथियार के रूप में ज्ञान का सुविधासम्पन्न वर्गों ने इस्तेमाल किया है लेकिन फिर उसी ज्ञान को जब लोगों ने अपने लिए इस्तेमाल करना शुरू किया तो वह ज्ञान खतरनाक समझा जाने लगता है ।

ज्ञान की यह यात्रा बहुत ही रोमांचक रही है । इस प्रक्रिया को गोरख पांडे के मशहूर गीत ‘अजदिया हमरा के भावेले’ के इस बंद से सबसे अच्छी तरह समझा जा सकता है- दिनवा खदनिया सोना निकललीं, रतिया लगवलीं अंगूठा । सगरी जिनिगिया करजे में डूबल, कईल हिसबवा झूठा । हिसबवा अइसन हम नाहिं मनबो, अछरिया हमरा के भावेले ।’ इस बंद में जिक्र ग्रामीण इलाके का नहीं खनिज के क्षेत्र का है । दुख है कि वहां भी कर्ज के लिए अंगूठा लगाना पड़ता है ।

प्रेमचंद के लेखन पर ध्यान दें तो कर्ज के चलते किसान को मजदूर होना पड़ता है और वहां भी कर्ज साथ चला आता है । सारी जिंदगी कर्ज में डूबने का तथ्य ही किसान और मजदूर के बीच साझा है । इस नियति से मुकाबले के लिए अक्षर को हथियार बनाना जरूरी लगता है । तभी एक अन्य गीत में गोरख लिखते हैं- अक्षर अक्षर पंक्ति पंक्ति को छापामार करो।

पुस्तकालय में किताब सुरक्षित रखी रहती है । आप सोच सकते हैं कि एक बार पढ़ लिए जाने के बाद उसे रखने की जरूरत क्या है। इससे ही भाषा के जादू का पता चलता है । वह बार बार नया अर्थ संप्रेषित करने में सक्षम होती है क्योंकि पढ़ने का काम शून्य में नहीं होता । नए नए जीवन संदर्भ उसी पाठ का नया अर्थ खोलते हैं । जिस तरह एक ही मनुष्य सब समय साथ रहने के बावजूद उम्र के अलग अलग पड़ावों पर भिन्न भिन्न हो जाता है उसी तरह किताब भी हमारे साथ बार बार नया रिश्ता बनाती है।

किस्सों कहानियों का ही उदाहरण लें। उनको बार बार सुनने देखने से उनकी रोचकता घटती नहीं है। उनमें झूठ भी छिप जाता है। किताब की इसी क्षमता ने उसे वैचारिक लड़ाई का सबसे कारगर उपाय बनाए रखा है। वह भी समाज के शक्ति संबंधों से बाहर नहीं होती इसलिए अक्सर शासक ही उसकी क्षमता से लाभ उठाते हैं और बार बार छले जाने के बावजूद लोग एक बार फिर छले जाते हैं लेकिन जब उनका टाट उलटने पर जनता आमादा हो जाती है तो वह भी इस हथियार का बेहतरीन इस्तेमाल करती है । वही समय होता है जब राजकुमारी की मिथकीय कैद की तरह की बंदिश से किताब भी बाहर आ जाती है और उसके जरिए लोग अपनी ताकत का अनुभव करते हैं । ऐसे ही क्षणों का इंतजार प्रत्येक किताब को होता है जब सोती सुंदरी के राजकुमार की तरह कोई पाठक आकर उसका स्पर्श करे और उसके भीतर छिपे अर्थों के खजाने को मुक्त कर दे । इसे लेखक के संचित अनुभव से पाठक के जीवंत अनुभव का संवाद भी कहा जा सकता है ।

भाषा से किताब बनती है । इस भाषा के निर्माण के सिलसिले में प्रसन्न कुमार चौधरी ने अपनी किताब ‘अतिक्रमण की अंतर्यात्रा ’ में बताया है कि जब मनुष्य के हाथ स्वतंत्र हो गए और वह दोनों पैरों के सहारे खड़ा होकर चलने लगा तो उसने उपकरण बनाने शुरू कर दिए। उपकरण बनाना प्रकृति के साथ मनुष्य की ऐसी अंत:क्रिया थी जिसके जरिए उसने संसार में अपने रहने लायक वातावरण निर्मित करने की शुरुआत की। यह काम वस्तुओं को बदले बिना सम्भव नहीं था और जाने बिना बदलाव नहीं हो सकता । स्पष्ट है कि इस कठिन काम के साथ ही उसे वस्तुओं के स्वभाव का ज्ञान होने लगा तो फिर इसके आधार पर नामकरण होने से मनुष्य का शब्द भंडार भी बढ़ने लगा। इस विवरण से हम समझ सकते हैं कि खुद भाषा, संसार को बोधगम्य बनाने और बदलने की प्रक्रिया में पैदा हुई । चारों ओर फैली हुई जो दुनिया मनुष्य को पूरी तरह अराजक और बेकाबू महसूस होती थी उसमें तर्क नजर आने लगा और भाषा में उस तर्क का प्रतिबिम्ब प्रकट होने लगा । आश्चर्य नहीं कि भाषा समस्त ज्ञान के संग्रह का साधन बन गई । इसी तर्ज पर कहा जाता है कि किताबों में जानकारी का खजाना संचित रहता है । इस खजाने को रखने के अतिरिक्त आगामी पीढ़ियों तक उसे ले जाने का काम किताब और उसके संग्रहालय के जरिए आसान हो जाता है ।

लेकिन यह भी कोई रहस्य नहीं है कि इतिहास में आम तौर पर जनता के सामूहिक प्रयास से अर्जित समस्त ज्ञान को वर्गों में बंटे समाज में शासकों ने अपने लिए इस्तेमाल किया । इस तरह जिस ज्ञान का उत्पादन समाज के सामूहिक सहकार से हुआ था उसे ही कब्जे और बहिष्करण का साधन बना लिया गया ।

हम सभी जानते हैं कि संपदा के उत्पादन के सबसे बड़े संसाधन श्रम और जमीन हैं । उनमें जमीन पर कब्जे के मामले में कागज की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। मेहनत करने वालों का ज्ञान से बहिष्करण तो  किया ही गया, इसके साथ संसाधनों से उनकी बेदखली में भी अक्षर की भारी भूमिका रही है । इसके चलते स्थिति यहां तक पहुंच गई कि जिस कानून की किताब और उसको लागू करने वालों के बारे में न्याय की पक्षधरता की धारणा बननी चाहिए थी उसके विपरीत उन्हें दमन उत्पीड़न के साथ जोड़कर देखा जाने लगा। हमारे देश में तो भौतिक और आध्यात्मिक संसाधनों पर स्वामित्व के इर्द गिर्द ऊंच नीच की एक अत्यंत कठोर व्यवस्था के रूप में जातिगत भेदभाव भी कायम हुआ । जब किताब इस व्यवस्था के पक्ष में नजर आने लगी तो साधारण जनता में शिक्षित समुदाय के प्रति अविश्वास पैदा हुआ ।

इस अविश्वास की अभिव्यक्ति लोक मानस में अनेक रूपों में हुई। इन रूपों की सृजनात्मकता के प्रभाव से कभी कभी शिष्ट साहित्य में भी ‘चत्वारि मूर्ख पंडिता:’ जैसा व्यंग्य प्रकट हुआ। किताब के प्रति इस संशय के चलते अनुभव की प्रामाणिकता को अधिक महत्व दिया गया । अनुभव की प्रामाणिकता पर यह जोर वैधता के वैकल्पिक स्रोत की खोज तो था ही, उसके सहारे ज्ञान पर विशेषाधिकार प्राप्त समूहों की इजारेदारी का प्रतिरोध भी खड़ा किया जा रहा था । ज्ञान पर प्रभु वर्गों के कब्जे का विरोध करने वालों को भी अनुभव जन्य ज्ञान की सीमा का अंदाजा रहा होगा तभी किताब की दुनिया को दूसरे के हाथ में पूरी तरह छोड़ देने की जगह उस क्षेत्र में भी दखल देने का प्रयास बीच बीच में होता रहा। इसी प्रयास की अभिव्यक्ति पुस्तकों की दुनिया से संघर्षरत जनता के लगाव में होती है। इसके चलते ही लगभग प्रत्येक बदलाव के आंदोलन के साथ किताब का गहरा संबंध रहा है।

रूसी बोल्शेविक क्रांति के बारे में लिखते हुए जान रीड ने बताया है कि युद्ध के मोर्चे पर रेल से भरकर किताबें भेजी जाती थीं और गरम तवे पर पानी की बूंद की तरह छन्न से समाप्त हो जाती थीं । राजनीतिक चेतना बढ़ने के साथ पढ़ने की भूख का रिश्ता राहुल सांकृत्यायन की आत्मकथा ‘मेरी जीवन यात्रा’ के पहले भाग में वर्णित है जिसमें उनका कहना है कि रौलट कानून का विरोध जब देश में शुरू हुआ तो बाहर खाना खाने वाले लोग उन होटलों में जाते जहां अखबार भी पढ़ने के लिए उपलब्ध होते । उस समय वे पंजाब में थे । उन्होंने यह भी बताया है कि जब पंजाब के अखबारों से सही खबरें नहीं मिलतीं तो बाहर से आने वाले अखबारों का सही सूचनाओं के लिए इंतजार होता था । इससे लगता है कि प्रतिबंध से कभी जानकारी की भूख को दबाया नहीं जा सकता । प्रतिबंध लगाने से वह भूख अपनी तुष्टि के लिए वैकल्पिक साधन खोज लेती है । बहुत सम्भव है इसी तरह के माहौल ने सार्वजनिक पुस्तकालयों को जन्म दिया हो !

शिक्षा संस्थानों के साथ जुड़े पुस्तकालय की मौजूदगी तो सहज ही समझ में आती है लेकिन हम जिस तरह के पुस्तकालय की शताब्दी मना रहे हैं वह एक सार्वजनिक पुस्तकालय है । इस तरह का कोई पुस्तकालय इस मान्यता के बिना चल नहीं सकता कि ज्ञान पर उनका भी अधिकार है जो किसी शिक्षा संस्थान तक नहीं पहुंच सकते । यह ज्ञान पर उत्पादकों के दावे की अघोषित अभिव्यक्ति है । शिक्षा संस्थानों के बाहर के ये पुस्तकालय साथ ही सार्वजनिक वाचनालय भी होते हैं।

निजी परिक्षेत्र से बाहर सार्वजनिक संसार के निर्माण में इन जगहों का योगदान अभूतपूर्व रहा है । आधुनिक लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था की स्थापना और संचालन के लिए जिस तरह के जानकार मतदाता की जरूरत पड़ती है उसके लिए भी इन जगहों ने ऐसी भूमिका निभाई जिसके चलते भागीदारीपरक लोकतंत्र को सामाजिक आधार मिला । अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचने के लिए पुस्तकालयों ने अपने रूप भी बदले हैं । जिस जमाने में उनकी महिमा के साथ धार्मिक पवित्रता जुड़ी होती थी उस समय किताब भी देवालयों में सुरक्षित रखी जाती थी । उसके बाद आधुनिक शिक्षा के साथ नए किस्म के पुस्तकालय आए।

पहले शिक्षा तक जनता की पहुंच को सीमित करने के लिए विभिन्न समुदाय उससे जुड़े संस्थानों से बाहर रखे जाते थे । इन बहिष्कृत समुदायों में स्त्री और निचले तबकों के लोग होते थे । बाद में जब शिक्षा को धार्मिक संस्थानों की जकड़ से बाहर लाया गया तो उसके धर्मनिरपेक्षीकरण के साथ ही पुस्तकालयों का निर्माण शुरू हुआ । इसके बावजूद बहिष्करण की पुरानी आदतें बहुत समय तक जारी रहीं । वर्जीनिया वुल्फ़ ने बताया है कि एक समय शिक्षा संस्थानों के साथ ही पुस्तकालयों तक भी स्त्रियों की रसाई नहीं होती थी । ऐसी स्थिति में खासकर स्त्रियों ने शेक्सपियर आदि अंग्रेजी लेखकों के नाम पर क्लब स्थापित करके ज्ञान की अपनी प्यास बुझाई और उच्च शिक्षा से बाहर रह जाने की कुछ हद तक क्षतिपूर्ति की ।

मार्क्स की पुत्री एलीनोर के बारे में सभी जानते हैं कि इसी प्रक्रिया में उन्होंने तमाम साहित्यिक हलकों तक अपनी जानकारी विस्तारित की । नवोदित राज्य पर ज्ञान के सार्वभौमिक प्रसार का इतना जोरदार दबाव था कि सरकारी कर्मचारियों के लिए एक समय दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी जैसे पुस्तकालय खोले गए।

कार्यालयों के केंद्र शहरी इलाकों में बच्चों ने अपने लिए बाल पुस्तक क्लब बनाए । जिला पुस्तकालय भी कई जिलों में मौजूद हैं । इन सबके साथ विकसित पुस्तक संस्कृति ने जाति आधारित छुआछूत को रेल की तरह ही कुछ हद तक दूर किया । स्कूल कालेज जाने वाले विद्यार्थियों को जब पाठ्यक्रम से बाहर की किताबें पढ़नी होतीं तो वे खासकर उपन्यास आदि अपनी पाठ्य पुस्तकों के साथ छिपाकर ले जाते। स्कूली अनुशासन के पक्षधर लोग इन रोचक किताबों को विध्वंसक समझकर उनके बस्तों की जांच करते थे ।

पाठ्यक्रम के बाहर की इस पढ़ाई ने एक समय विद्यार्थियों में साहित्यिक संवेदना पैदा करने में जबर्दस्त भूमिका निभाई । स्कूल के बाहर के वृहत्तर समाज में कवि सम्मेलन और मुशायरों ने भी किताब और उससे जुड़ी सांस्कृतिक चेतना को लोकप्रिय बनाने में बहुत मदद की है ।

हमारे देश में स्वाधीनता आंदोलन के समय ही आज की अधिकांश भाषाओं का सर्वोत्तम लेखन और प्रकाशन हुआ । कारण वह चेतना थी जिसे भारतेंदु ने ‘निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल’ कहकर वाणी दी थी । औपनिवेशिक उत्पीड़न का एक रूप अंग्रेजी भाषा का प्रभुत्व भी माना जाता था । इसके विरोध का प्रभावी तरीका देशी भाषाओं की उन्नति समझा जाता था । इस उन्नति में केवल लिखना या छपाई ही नहीं था बल्कि उस लिखे और छपे को लोगों तक ले जाना और उनके द्वारा इसे पढ़ा जाना भी इसमें शामिल था । इसके लिए शिक्षा और साक्षरता के प्रसार के साथ पुस्तकालय और वाचनालय की व्यवस्था भी आवश्यक थी । इस पुस्तकालय का भी उस आंदोलन के साथ गहरा नाता रहा है ।

इस वैचारिक हलचल का ताप स्वाधीनता के बाद तक बना रहा था । इसके चलते उत्तर प्रदेश और बिहार में हिंदी भाषा में ज्ञान के प्रचार के लिए अनुवाद और स्वतंत्र लेखन के प्रकाशन का जिम्मा बहुत हद तक कुछ सरकारी संस्थानों ने निभाया था । तेलंगाना आंदोलन के साथ जुड़ी तेलुगु पहचान और आंध्र प्रदेश के सवाल ने उस आंदोलन से पुस्तकालयों को जोड़ा ।

स्पष्ट है कि पुस्तकालय केवल कोई इमारत नहीं होता बल्कि सम्पूर्ण सामाजिक ढांचा होता है । किताब में जो जानकारी कूटबद्ध होती है उसे हासिल करने के जरिए हम अपनी सीमित दुनिया से बाहर निकलते हैं । भूगोल की किताब में बने नक्शे को खोलने की उत्तेजना से ही दुनिया अपनी सम्पूर्णता में हमारे लिए बोधगम्य हो पाती है । इसके अतिरिक्त भी किताब ने मनुष्य की बेहद नाजुक मसलों में मदद की है । बोरिस पोलेवोई की ‘असली इनसान’ पढ़कर अवसाद से बाहर निकलते लोगों की मौजूदगी हमारे समाज में मुश्किल नहीं है । कोरोलेंको के उपन्यास ‘अंधा संगीतज्ञ’ के सहारे हमें संसार को समझने के सर्वथा भिन्न तरीके का पता चलता है । इन उदाहरणों से साफ है कि किताब हमें खुद के साथ बाहर को समझने बूझने में बहुत मदद करती है ।

बहुत निजी स्तर पर कहें तो किताब हमारी आत्मा का आईना होती है । अंग्रेजी कहावत है कि मनुष्य की पहचान उसके संगियों से होती है और उसी तर्ज पर कह सकते हैं कि हमारी रुचि का पता उन किताबों से चलता है जो हमें पसंद होती हैं । इसके चलते भी हम कई बार उन किताबों का नाम नहीं लेते जिन्हें पढ़ना पसंद होने के बावजूद सामाजिक तौर पर अच्छी नहीं मानी जातीं । अगर कोई जान ले कि हम कौन सी किताब पढ़ते हैं तो एक तरह से हम उस व्यक्ति के सामने नंगे हो जाते हैं । व्यक्ति की तरह ही देश, सभ्यता और संस्कृति भी अपना परिष्कार और स्तर साबित करने के लिए अक्सर किताबों के नाम गिनाते हैं । सभी संस्कृतियों के पास गिनाने के लिए कोई न कोई ऐसी किताब होती है जो उसकी चरित्रगत विशेषता का लक्षक बन जाती है । यह तो सही बात है कि जरूरत के मुताबिक इन साभ्यतिक विशेषताओं का आविष्कार होता रहता है फिर भी नाम किताब का ही गिनाया जाता है । इस नश्वर संसार में एक हद तक वे अमरता प्राप्त करने का साधन भी होती हैं । लेखक का नाम किताब के रूप में उसके देहावसान के बाद भी बचा रहता है ।

हमने शुरू में कहा कि जेल में पुस्तकालय होते हैं लेकिन कारखानों में पुस्तकालय नहीं होते । कार्यालयों में होते हैं लेकिन कारखानों में नहीं होते । इस मामले में पूंजीवाद ने भी ज्ञान से बहिष्करण की पुरानी जाति और लिंग आधारित व्यवस्था का ही लगभग पुनरुत्पादन किया है। मानसिक श्रम की जगहों पर तो किताब होगी लेकिन शारीरिक श्रम की दुनिया को उससे बाहर रखा जाएगा। मार्क्स ने अपने सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ ‘पूंजी’ के पहले खंड में कहा है कि पूंजी के निर्माण की असलियत को देखना हो तो बाहरी दिखावे से हटकर उत्पादन की उस असली जगह पर जाना होगा जिसके प्रवेशद्वार पर ही बिना काम के अंदर घुसने से रोकने का संदेश लिखा रहता है ।

हम सभी जानते हैं कि इस जगह पर पूंजी का निर्माण जिस चीज के जरिए होता है वह समय है । पूंजी के उत्पादन के लिए जरूरी है कि कामगार अपना समय पढ़ने में न लगाए । पूंजी के नजरिए से पढ़ने में समय लगाना उसका दुरुपयोग है । इसलिए पुस्तकालय खोलना और चलाना परोक्ष रूप से मनुष्य के खाली समय पर उसके अधिकार का समर्थन करना भी है ।

हमारे अपने समय की सबसे बड़ी समस्या के रूप में अंतोनियो नेग्री ने 2018 में पोलिटी से प्रकाशित किताब ‘फ़्राम द फ़ैक्ट्री टु द मेट्रोपोलिस’ में समूचे समाज का एक विराट कारखाने में बदलते जाना बताया है । जो लोग मनुष्य को अपना सम्पूर्ण व्यक्तित्व हासिल नहीं करने देना चाहते वे उसे केवल धन पैदा करने की मशीन बनाना चाहते हैं । मुनाफ़े की उनकी भूख खाली समय को भी लाभप्रद बना देना चाहती है ।

हम सभी देख रहे हैं कि लगातार मनुष्य के समूचे समय का दोहन करने की कोशिश हो रही है । सभी सामाजिक गतिविधियों को बाजार के दायरे में लाया जा रहा है। नींद पर भी विजय पाने के लिए प्रयोग चल रहे हैं ताकि निरंतर जागरण के बावजूद मनुष्य की कर्यक्षमता को बरकरार रखा जा सके । इसका प्रयोग उन सैनिकों पर किया जा चुका है जो दूसरे देशों में जाकर चुने हुए लोगों का एक ही गोली से कत्ल कर लेते हैं । इसके साथ ही काम के निश्चित आठ घंटे बीते युग की बात होते जा रहे हैं । बार-बार काम के घंटे बढ़ाने की चेष्टा कारखानों के मालिक तो करते ही हैं, सरकार भी उनकी इस कोशिश का गाहे ब गाहे बेशर्मी से समर्थन करती है । तमाम किस्म के कामों में अब बारह घंटे का काम नियम बनता जा रहा है ।

जाहिर है कि यह भी लड़ाई का एक नया मोर्चा है । शासक वर्ग हमेशा ही लोगों के समय से लाभ अर्जित करने और मुनाफ़े के लोभ में नए नए कामों को लाभदायक बनाने के लिए मनुष्य को धन पैदा करने की मशीन मात्र में बदलने की कोशिश करता है । इसकी टक्कर में लगभग सभी संघर्षों ने ज्ञान पर जनता के अधिकार को साबित करने के लिए किताब को हथियार के बतौर इस्तेमाल किया है । यह संघर्ष केवल किताब के लिए संघर्ष कभी नहीं रहा । इसमें समय पर अपना हक जताने से लेकर स्वाभिमान के दावे तक बहुत सी चीजें शामिल होती हैं । संस्कृति के उच्च समझे जाने वाले कर्म कभी सामान्य लोगों को नहीं करने दिए जाते। पढ़ना और लिखना ऐसे ही ऊंचे समझे जाने वाले कर्म हैं । उनके करने के लिए दलित वंचित समुदाय को बहुत लम्बा सफर तय करना पड़ता है ।

( प्रो गोपाल प्रधान ने यह लेख जौनपुर स्थित तिलक पुस्तकालय की स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने के मौके पर 21-22 मार्च को आयोजित होने वाले समारोह ‘ जश्ने किताब ‘ के लिखा था. उन्हें इस समारोह में उद्घाटन वक्तव्य देना था. कोरोना महामारी के कारण यह समारोह स्थगित कर दिया गया था. )  

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