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कविता

महेश्वर स्मृति आयोजन में युवा कवि अदनान कफ़ील दरवेश और विहाग वैभव का काव्य पाठ

महेश्वर चाहते थे कि कवि-लेखकों और जनता के बीच कम से कम दूरी हो: आलोक धन्वा
महेश्वर की लड़ाई को आगे बढ़ाने की जरूरत है: संतोष सहर

पटना, 24 जून . ‘‘महेश्वर चाहते थे कि कवि-लेखकों और जनता के बीच कम से कम दूरी हो, क्योंकि जनता ही रचना का अनंत स्रोत होती है। वह जनता जो मेहनत करती है, ईमान की रोटी खाती है। खून और कत्लोगारत में डूबो देने की नृशंसता से संघर्ष करते हुए वही जीवन को बचाती है।’’

आज बीआईए सभागार में दो दिवसीय महेश्वर स्मृति आयोजन में वरिष्ठ कवि आलोक धन्वा ने कवि, पत्रकार, जनमत संपादक, विचारक, संस्कृतिकर्मी और जसम के महासचिव महेश्वर को याद करते हुए ये बातें कहीं। उन्होंने कहा कि महेश्वर को भाषा, दर्शन और इतिहास की अच्छी समझ थी। वे कहते थे कि भारत में अज्ञान का मलबा बहुत बड़ा है, उससे मुक्ति जरूरी है।

 

 हिरावल-जन संस्कृति मंच की ओर से आयोजित महेश्वर स्मृृति आयोजन के पहले दिन दो युवा कवि अदनान कफ़ील दरवेश और विहाग वैभव के काव्य-पाठ का आयोजन हुआ। दिल्ली से आए अदनान कफ़ील दरवेश ने गमछा, एक प्राचीन दुर्ग की सैर, सन् उन्नीस सौ ब्यानबे, बरसात और गांव, घर, बातें, हम मारे गए लोग, वो एक दुनिया थी, अपने गांव को याद करते हुए, मेरी दुनिया के तमाम बच्चे, फजिर, मोअज्जिन शीर्षक कविताओं को पढ़ा। उन्होंने एक ग़ज़ल भी सुनाई। उनकी कविताओं में गांव के जीवन की मर्मस्पर्शी यादें तो थी हीं, सांप्रदायिक उन्माद और नफरत की राजनीति ने जिस तरह की अमानवीयता, अकेलेपन और असुरक्षा को पैदा किया है, उसका बेहद बेचैन करने वाला अहसास भी था। उनकी कविता बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद ध्वंस के अनवरत सिलसिले की शिनाख्त करती है। उनके शब्दों में- जो गिरा था, वह शायद एक ईमारत से बड़ा था। अपनी एक दूसरी कविता में उन्होंने सवाल उठाया कि हिंदुस्तान को किस कमबख्त की नजर लग गई है? हिंदुस्तान को फिलीस्तीन और सीरिया बनाए जाने की कोशिशों की उनकी कविता निशानदेही करती है।


बनारस से आए विहाग वैभव की कविता में हमारे समय के शासन-व्यवस्था के खिलाफ गहरा तंज और तल्खी मौजूद थी। उन्होंने ‘हत्या पुरस्कार के लिए प्रेस विज्ञप्ति’, ‘देश के बारे में शुभ शुभ सोचते हुए’, ‘सपने’, ‘खुल रहे ग्रहों के दरवाजे’, ‘लड़ने के लिए चाहिए’, ‘मृत्यु और सृजन के बीच एक प्रेमकथा’, ‘पार्श्व में नगाड़े बजते हैं’, ‘बलात्कार और उसके बाद’, ‘मोर्च पर विदा गीत’, ‘ईश्वर को किसान होना चाहिए’, ‘तुम्हारे लिए सिर्फ तुम्हारे लिए’ शीर्षक कविताओं का पाठ किया। ‘ईश्वर को किसान होना चाहिए’ कविता में उन्होंने एक दिलचस्प सवाल उठाया कि ईश्वर की कल्पना किसान के रूप में क्यों नहीं की गई। कवि के शब्दों में- “मुझे लगता है ईश्वर किसान होने से डरता है/इस देश में ईश्वर होना किसान होने से/ कई गुना आसान है।”
आलोक धन्वा ने दोनों कवियों की कविताओं की तारीफ़ की और कहा कि इन कविताओं में नई दुनिया आ रही है।
काव्य-पाठ से पूर्व हिरावल के संतोष झा, सुमन कुमार, प्रीति प्रभा, मिली, रोशनी, अराध्या, रागिनी, अंजली, निक्की, नेहा, रेशमा, पलक, राम कुमार और राजन कुमार ने महेश्वर के तीन जनगीतों- कवन रंगरेजवा रंगी मोरी चुनरी, दरिया के मौज में हजार दिखे चंद्रमा और सृष्टिबीज का नाश न हो हर मौसम की तैयारी है- को गाकर सुनाया।


कार्यक्रम के आरंभ में महेश्वर के साथ काम कर चुके लेखक-संस्कृतिकर्मी संतोष सहर ने कहा कि महेश्वर को सिर्फ़ 45 साल का जीवन मिला, पर लगातार बीमारियों और हर तरह का तनाव झेलते हुए भी उन्होंने बहुआयामी रूप से रचनात्मक योगदान दिया। उन्होंने अपनी ज़्यादादातर कविताएं बीमारी की दौर में लिखी। उन्होंने जनगीत रचे, समकालीन जनमत का संपादन किया। हिरावल का गठन किया। आम अवाम की जिस साझी लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिए वे लेखकों-संस्कृतिकर्मियों के बीच एकजुटता कायम करते रहे, आज जब सत्ता ज्यादा खूंखार हो गई है, तब उस लड़ाई को आगे बढ़ाने की बेहद जरूरत है।
संचालन जसम के राज्य सचिव सुधीर सुमन ने किया। मंच पर महेश्वर के साथी संतलाल और अनिल अंशुमन भी मौजूद थे। इस मौके पर सभागार में जसम, पटना के संयोजक राजेश कमल, कवि रंजीत वर्मा, शहंशाह आलम, अस्मुरारी नंदन मिश्र, सुनील श्रीवास्तव, सुमन कुमार सिंह, सुनील चौधरी, अरविंद पासवान, पत्रकार साकिब, कवि-आलोचक राजकिशोर राजन, रंगकर्मी समता राय, शहनवाज खान, अभिनव, कवि रंगकर्मी विक्रांत, संस्कृतिकर्मी रूनझुन, उमेश सिंह, कवि प्रियदर्शनी मैत्री शरण, प्रकाश कुमार, सुजीत कुमार, काजी रूमी एकता आदि मौजूूद थे।

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