समकालीन जनमत
कविता

रूपाली सिन्हा की कविताओं में स्त्री जीवन की नई राह गढ़ती दिखाई पड़ती है

कामिनी


पिछले दिनों आथर्स प्राइड पब्लिकेशन से रूपाली सिन्हा का कविता संग्रह ‘असुविधा के लिए खेद नहीं है’ प्रकाशित हुआ है |

इस संग्रह में 2004 से 2020 के बीच लिखी गई उनकी कुल 41 कविताएँ संग्रहीत हैं | कविता संग्रह के शीर्षक से ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि उनकी कविताएँ वर्तमान समय-समाज में अपने मनमाफिक रास्ते पर चलने का उद्घोष करती हैं | उनकी कविता के दो बड़े मोर्चे हैं –पहला यह कि एक स्त्री होने के चलते वे स्त्री-जीवन की विडम्बनाओं को बखूबी समझती हैं और उन्हें स्वर देती हैं | दूसरा पक्ष है फासीवाद की क्रूरताओं और उससे होने वाले अपूरणीय क्षति की पहचान, कवि के शब्दों में जिनसे जूझने में ‘हम सदियों तक खर्च होते रहेंगे’ |

प्रेम ,त्याग ,समर्पण जैसे खूबसूरत शब्दों के साथ स्त्री को हमेशा छला जाता रहा है रूपाली की कवितायेँ इस छल का प्रतिकार करती हैं | उनकी कविता का एक पक्ष वह है जहाँ वे स्त्री जीवन के उस रूप का विश्लेषण करती हैं जो घर के बाहर हर क्षेत्र में पुरुष के कंधे से कंधा मिलाकर काम करती हुई दिखाई पड़ती है लेकिन घर के भीतर दाखिल होते ही वह अपनी उसी पुरानी स्थिति में लौट जाती है जहाँ घर का मालिक पुरुष होता है और स्त्री उसकी संपत्ति है |

इक्कीसवीं सदी में बड़े-बड़े मंचों और सभा-सम्मेलनों में स्त्री के अधिकार, उसकी स्वतंत्रता ,समानता की उद्घोषणा की जा रही है लेकिन वस्तुस्थिति यही है कि स्त्री स्वतंत्र तो दिखाई पड़ती है लेकिन उतनी ही जितना पुरुष चाहता है ,निर्णय लेने के सारे अधिकार पुरुष के पास सुरक्षित हैं | प्रेम ,सदाचार ,वफादारी जैसे सुनने में अच्छे लगने वाले सारे शब्दों को निभाने की जिम्मेदारी स्त्री के कन्धों पर डालकर पुरुष स्वछन्द विचरण करता है |

उनकी कविता में स्त्री जीवन का जो दूसरा पक्ष उभरता है वह प्रतिरोध दर्ज कराती हुई स्त्री का है जो अकेले अपने जीवन की नई राह गढ़ती दिखाई पड़ती है |

महादेवी वर्मा की ‘पंथ होने दो अपरिचित प्राण रहने दो अकेला’ की अनुगूँज रूपाली की कविताओं में सुनी जा सकती है | ऊपर बताई गई स्थितियों को स्त्री अब बहुत कुछ जान-समझ चुकी है इसलिए वह इस बने-बनाए रास्ते पर चलने से इनकार करती है और अपना रास्ता खुद बनाती है |

निश्चित रूप से यह रास्ता कठिन और बीहड़ है लेकिन इस पर आने वाली सारी बाधाओं को झेलने के लिए वह तैयार है | रूपाली की कविता इस बात की ओर भी इशारा करती है कि इस तरह की स्त्रियाँ हमारे समाज को सुहाती नहीं है लेकिन वह अपने आप को किसी बहकावे में नहीं आने देना चाहती |

इसके अलावां रूपाली की कविता फासीवाद के भयानक सच तक भी पहुँचती है | जहाँ सच बोलना या सवाल करना एक जुर्म है | इस नए दौर में चाटुकारिता ने कितनी ऊँची जगह बना ली है कि जो भी व्यवहार कुशल लोग थे उन्होंने चाटुकारिता को अपना मूल्य घोषित कर दिया है |

वर्तमान सन्दर्भ में उनकी एक कविता ‘बाढ़ का पानी’ बहुत मानीखेज है –
ये बाढ़ जब उतरेगी
छोड़ जायेगी अपने पीछे
ढेर सारा कचरा और दीर्घकालिक बीमारियाँ
हम सदियों तक खर्च होते रहेंगे
उनसे जूझने में
न जाने कितना जहरीला पानी
घुल चुका होगा हमारी नसों में तब तक
हमारे रक्त के साथ
फ़िलहाल बाढ़ अपने उफान पर है
बहुत से डूब रहे हैं
बहुत से उतरा रहे हैं
लेकिन कुछ इसी में सीख रहे हैं तैरना
उन्हें मालुम है बाढ़ का पानी है
एक दिन उतरेगा जरुर

कोरोना संकट के दौरान सरकार द्वारा लगाए गये गैरजिम्मेदाराना लॉकडाउन ने सैकड़ों लोगों से उनकी जिन्दगी छीन ली, न जाने कितने लोग घर से बेघर हो गए | उस दौरान बहुत सारे कवियों ने कविता लिखी ,रूपाली भी उस पीड़ा को छिपा नहीं पातीं और उसे कविता के माध्यम से व्यक्त करती हैं | वे लोग जिन्होंने पूरे शहर को बनाया जब महामारी आयी तो वह शहर ही उनके लिए बेगाना हो गया | इसी तरह रोहित वेमुला की आत्महत्या पर लिखी गयी कविता ‘जब रीत जाते हैं सपने’ जहाँ एक ओर कवि की संवेदना का परिचय देती है वहीं दूसरी ओर रोहित वेमुला या उन जैसे तमाम लोगों को उन परिस्थितियों की ओर ढकेलने वाली व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करती है |

इन सबके बावजूद यह बात सत्य है कि अभी भी रुपाली की कविता को एक लम्बी यात्रा तय करनी होगी | अनगढ़ता का अपना सौन्दर्य होता है लेकिन यह तभी निखरता है जब उसमें एक स्वछंद बहाव व लय हो | रुपाली की कविताओं में बहुत सी जगहों पर हमें यह बहाव व लय देखने को मिलती है और कई जगहों पर इसकी कमी खटकती भी है | यहाँ मैं उनके संग्रह से अपनी पसंद की कवितायेँ दे रही हूँ उम्मीद है आप सब को भी पसंद आएंगी –

 

रूपाली सिन्हा की कविताएँ

 

1. तुमने कहा
तुमने कहा – विश्वास
मैंने सिर्फ तुम पर विश्वास  किया
तुमने कहा – वफ़ा
मैंने ताउम्र वफादारी निभायी
तुमने कहा – प्यार
मैंने टूट कर तुम्हे प्यार किया
मैंने कहा – हक़
तुमने कहा -सबकुछ तुम्हारा ही है
मैंने कहा -मान
तुमने कहा – अपनों में मान-अपमान क्या?
मैंने कहा – बराबरी
तुमने कहा – मुझसे बराबरी?
मैंने कहा -आज़ादी
तुमने कहा – जाओ
मैंने तुम्हें  सदा के लिए मुक्त किया!

 

2. पीठ पर बँधा घर

पीठ पर घर बांधे वे हर जगह मौजूद होती हैं
कभी-कभी उसे उतारकर कमर सीधी  करती
हंसती हैं खिलखिलाती हैं बोलती बतियाती हैं
लेकिन जल्द ही घेर लेता है अपराधबोध
उसी क्षण झुकती हैं वे
घर को उठाती हैं  पीठ पर हो जाती हैं फिर से दोहरी

इक्कीसवीं सदी में उनकी दुनिया का विस्तार हुआ है
वे सभाओं मीटिंगों प्रदर्शनों में भाग लेती हैं
वे मंच से भाषण देती हैं, उडती हैं अंतरिक्ष में
हर जगह सवार होता है
घर उनकी पीठ पर

इस बोझ की इस कदर आदत हो गयी है उन्हें
इसे उतारते ही पाती हैं खुद को अधूरी
कभी कभार बिरले ही मिलती है कोई
खाली होती है जिसकी पीठ
तन जाती हैं न जाने कितनी भृकुटियाँ

खाली पीठ स्त्री
अक्सर स्त्रियों को भी नहीं सुहातीं
आती है उनके चरित्र से संदेह की बू
कभी-कभी वे दे जाती हैं घनी ईर्ष्या भी

इस बोझ को उठाये उठाये
कब झुक जाती है उनकी रीढ़
उन्हें इल्म ही नहीं होता
वे भूल जाती हैं तन कर खड़ी  होना
जब कभी ऐसी इच्छा जगती भी है
रीढ़ की हड्डी दे जाती है जवाब
या पीठ पर पड़ा बोझ
चिपक जाता है विक्रम के बेताल की तरह

और इसे अपनी नियति मान
झुक जाती हैं सदा के लिए

 

3. निंदक नियरे

अब कोई नहीं रखता
निंदक को अपने नज़दीक
निदकों की जगह ले ली है चारणों ने
आँगन में जगह दे दी जाती है उन्हें
और
निंदा की बू आते ही
आदेश दे दिए जाते हैं
आंगन खाली करने के
बहिष्कृत होने के भय से
निंदकों ने भी बदल ली है अपनी चाल
आलोचना अब क्रूरता है
अशिष्टता है, संवेदनहीनता है, फूहड़ता है
मूल्याङ्कन-विश्लेषण तो
परिपाटी थी पुरानी
अब तो प्रश्नचिन्ह तक लगाने की
नहीं छोड़ी जाती है जगह
किसी कार्टून पर किसी चित्र पर या किसी शब्द पर ही
आहत हो उठती हैं भावनाएं
उद्वेलित हो उठती हैं
संसद और सड़कें
संस्कृति पर आसन्न संकट से निपटने
लहराने लगते हैं लाठी-बल्लम
इंसानों को तब्दील किया जा रहा है
देवताओं में
जिनके सामने सर झुकाने पर
मिलता है मनचाहा प्रसाद
“व्यावहारिकता” नए युग का कौशल है
निंदक हो गए हैं व्यवहार पटु
चढ़ रहे हैं सफलता की सीढीयाँ सरपट
इस कौशल ने
प्रशस्तिपत्रों से भर दी है उनकी दीवारें
असफलताओं के सारे दुर्जेय किले
कर लिए हैं फ़तेह उन्होंने
देखते ही देखते।

 

4. असुविधा के लिए खेद नहीं है….

मैं जानती हूँ
मेरे प्रश्न
आपको असहज कर देते हैं
कभी-कभी बहुत क्रोधित भी
लेकिन आपकी असुविधा के लिए
मुझे खेद नहीं है
आपको यूँ देख
मेरे होठों पर तिर जाती है
एक तिरछी मुस्कान
और आप हो जाते है कुछ और असहज
फिर भी
आपकी असुविधा के लिए मुझे खेद नहीं है
मैं आपको और असहज
और असुविधाग्रस्त देखना चाहती हूँ
सुविधाजनक सवालों का वक़्त अब बीत चला है
यह असुविधाग्रस्त होने का वक़्त है
आइए, बिना खेद व्यक्त किए
उठाये जाएँ
असुविधाजनक ढेरों सवाल।

 

5. परिचय

एक
मैं पेड़ नहीं
जो खड़ी रहूँ एक ही जगह
आज्ञाकारी बनकर
तुम जब-तब डाल दो पानी खाद
अपनी मर्ज़ी से
जड़ों से बंधी हुई निःशब्द
छाया और फल देती रहूँ
सहती रहूँ मौसम की मार
और जब ढल जाऊँ
हो जाऊँ चुपचाप निढाल।

दो
मैं दीवार नहीं
जिसके सिर्फ कान हों
जो अभिशप्त हो मौन रहने को
ताउम्र

तीन
मैं चौखट नहीं दरवाज़े की
जिसे जब चाहो लाँघकर
आ जाओ अंदर और
निकल जाओ बाहर
मैं मौन खड़ी रहूँ
मर्यादा की प्रतीक बनकर

 

6. जहाज़ के पंछी

वे उन्हें जहाज़ का पंछी कहती हैं
और आश्वस्त हो जाती हैं
उनके पुनि-पुनि लौट कर आने के लिए
उदारमना होने का सबूत पेश करती हैं
भीतर ही भीतर छलनी होते हुए हुए
बचाती रहती हैं जहाज़ की प्रतिष्ठा, पंछी की लाज
क्या हुआ अगर वे भटकते हैं इधर-उधर?
आ तो जाते ही हैं वापस
भटकना तो उनका स्वभाव होता है।
आरक्षित रहती है पंछियों की जगह जहाज़ पर
जहाँ वे रंगीन वादियों से लौटकर
सुस्ताते हैं
वे कुशल हैं जहाज़ और वादियों के प्रबंधन में
और जहाज़ की स्त्रियां उनके प्रबंधन के भ्रम में
यों उन्हें मालूम हैं सारे रहस्य
कभी गौर से देखना
जहाज़ के पंछी का गुणगान करते
मुस्कुराने की कोशिश में
विद्रूप हो उठते उनके होंठ।

 

7. सपने -1

मेरे सपने मेरे प्रिय संगी हैं
इनके गरुण पंखों पर सवार हो
कर आती हूँ
कहाँ कहाँ की अगम्य यात्राएँ
गहरी उदासी में भी
बुझने नहीं देते ये उम्मीद की लौ
इनका हाथ थाम पार किये हैं मैंने
बीहड़ लम्बे रास्ते
रोका-टोका भी इन्होंने
मुझे वक़्त -बेवक़्त
सच्चे शुभचिंतक की तरह
लेकिन नहीं पहनाई कभी सुनहरी बेड़ियाँ
सुरक्षा के नाम पर
नहीं खड़ी कीं कभी मेरे लिए
ऊँची अभेद्य पिरमिडें
ये मुझे जीवन देते हैं
गति देते हैं
ऊर्जा देते हैं
मेरे कानों में अक्सर धीमे से कहते हैं
उड़ो आकाश तुम्हारा है
सच करो हमें
बसाओ उन सबकी आँखों में
जिनकी आँखों ने देखे नहीं कभी सपने।

 

8. क्रोध का प्रबंधन

प्रबंधन के इस युग में
सिखाया जा रहा है
क्रोध का प्रबंधन भी
ताकि सहनशक्ति बढ़ सके
संवेदनाएँ हो जाएँ कुंद
और सरोकार को
मारा जा सके बेमौत
अशांति के दूत पढ़ा रहे हैं
शांति का पाठ
उनके क्रूर चेहरे
झाँक-झाँक जाते है
उनके आंसुओं के पीछे से
इतिहास की सुनहरी इबारतों को
मिटाने की हो रही हैं पुरज़ोर कोशिशें
ताकि असहमतियों की आवाज़ों को
स्थानांतरित किया जा सके
चुप्पियों से हमेशा के लिए।
उन्हें नहीं पसंद “उच्छृंखलता” या “उद्दंडता”
उन्हें तो भाती है आज्ञाकारिता
जो इस अपेक्षा पर नहीं उतरेंगे खरे
बाग़ी क़रार दिए जाएँगे
या कुछ और…..
इस भयानक समय में
सिखाया जा रहा है क्रोध का प्रबंधन
ताकि आत्मा का सूरज
खो बैठे अपना ताप
हवा में तनी हुई मुट्ठियाँ
पड़ जाएँ ढीली
आँखों में पल रहा सपना
मर जाये धीरे-धीरे
या लगा ले फंदा अचानक।
आजकल
उनके लिए बहुत ज़रूरी हो गया है
सिखाना क्रोध के प्रबंधन का कौशल।

 

9. जब रीत जाते हैं सपने

जब सपने रीत जाते हैं
ज़िन्दगी हो जाती है ख़ाली
अंदर-बाहर होता है
केवल एक शून्य।
सवाल यह है कि
क्यूँ रीत जाते है सपने
क्यूँ मियाद से पहले ही कोई उम्र
छीज जाती है ?
क्यों सपनों से लदा
एक हरा-भरा पेड़
हो जाता है खोखला
और एक दिन
अपनी चुप्पी का ऐलान कर
खामोश हो जाता है
हमेशा के लिए?
क्यों धरती बहुत छोटी लगने लगती है
और ज़िंदगी सँकरी
बहुत सँकरी
विस्तार की तलाश
मृत्यु के वरण में ही
क्यों पूरी होती है अंततः?
अपनी-अपनी चौहद्दियों में
क़ैद हो जाती हैं विचारधाराएँ
और संवादों के सारे पुल
उड़ा दिए जाते हैं
शत्रुता के डायनामाइट से।
क्यों बंद दिखने लगते हैं
मुक्ति का द्वार दिखाने वाले सारे रास्ते?
सपनों के खून से लथपथ
एक समूची सभ्यता है
जिससे पूछे जाने हैं
ये तमाम सवाल।

 

10.  सीढ़ियां

मैंने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा
एक बार जो मिल गईं ये सीढ़ियां
मैंने नहीं देखा पीछे मुड़कर
दोहराया नहीं पढ़ा हुआ पाठ
न ही उसे परखने की कोई चेष्टा
रटा हुआ अपने सफ़री झोले में डाल बढ़ चला।
आगे की चाह
पीछे देखने की ज़रूरत को
धता बताती रही हमेशा
इस धुन या मुग़ालते में
सोचा ही नहीं कि
कुछ अपने पीछे रह गए
कुछ छूट गए रास्ते में
कुछ चुपचाप लौट गए उदास कदमों से
इन सँकरी सीढ़ियों ने दूर कर दिया उन्हें हमेशा को
काश कि मैंने चुने होते चौड़े रास्ते
बेशक कच्चे ही सही
घुमावदार ही सही
बेहतर होते वे इन ज़ंग लगी कठोर सीढ़ियों से
जो सिर्फ़ ऊपर का रास्ता दिखाती हैं
रास्तों की तरह न तो सुस्ताने की जगह
न ही सोचने की मोहलत और
न ही नए रास्तों का कोई विकल्प देती हैं
यह जानते हुए भी कि
पीछे से नहीं छूटता पीछा कभी भी
मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा
अब जबकि बहुत आगे आ गया हूँ
पीछे देखने से बचना चाहता हूँ मैं
पीछे मुड़कर देखने पर
दिखेंगी वे परित्यक्त ढलानें
जहाँ से मैं ऊपर चढ़ आया
दिखूंगा मैं कई हिस्सों में, कई टुकड़ों में
जो खड़े देखते रहे मुझे
इन ज़ंग लगी लोहे की सीढ़ियों पर चढ़ते
आँख चुराता हूँ उनसे
वे जानते हैं मुझे और मेरी यात्रा के रहस्य को
मैं पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहता।

 

11. फ़ासिस्ट…

वे आए अलग-अलग भेष में
रंग-बिरंगी पोशाकें पहने
तरह-तरह के करतब दिखाकर
धीरे-धीरे
वश में कर लिया सबकुछ
फिर..
उन्होंने जला दी सारी किताबें
जो रौशनी देती थीं
नेस्तनाबूद कर दीं सारी इमारतें
जिनमें पलते थे विचार
काट दिए सारे पुराने पेड़
जो मुसीबत की घड़ी में
कुव्वत भर छांव देते थे
नदियों के मिले-जुले पानी में
घोल दिया ज़हर
छीन लिया लोगों से
उनका सुकून उनका आराम
और वादा किया सब कुछ नया बनाने का
गो उनके पास नए नक्शे नहीं थे
ना ही योजना थी कोई
उन्होंने पुराने नक्शे को नोच डाला था
जिसे बनाया था कुशल नक्शनवीसों ने
बड़ी मशक्कत से बरसों में
वे सबकुछ तहस-नहस करते रहे
और लोग नए की उम्मीद में
उनके अभियान में हाथ बंटाते रहे
वे अब सफलता के शिखर पर थे
बदल चुकी थी उनकी भाव-भंगिमा
उनकी देह-भाषा
गूंज रहे थे उनके अट्टाहास अब
दिग-दिगंत में।

लोग धीरे-धीरे लौटने लगे खाली हाथ
घायल आत्मा लिए
अंधेरे में टटोलते
अपने पुराने ठिकानों की ओर
जो तब्दील हो चुके थे अब खंडहर में
वहां पंहुचकर उन्होंने सबसे पहले
वो अलाव सुलगाई
जिसे वे छोड़ गए थे पीछे
जिसकी राख के नीचे
अब भी बची थी थोड़ी आग।

 

12. फ़ेल हुई स्त्रियाँ

पीढ़ी दर पीढ़ी
वे परीक्षार्थी ही रही थीं
इस परीक्षा के लिए
उम्र की कोई सीमा न थी
अर्हताओं को पूरा करतीं
वांछनीय को पनपातीं
अवांछित की करते हुए काट छाँट
वे जुटी रहती थीं पाठ कंठस्थ करने में
आजीवन।

कठोर परिश्रम के बावजूद
अनुत्तीर्ण ही रहती थीं हर परीक्षा में
कभी-कभार कृपांक देकर
कुछ को उत्तीर्ण कर दिया जाता
व्यवस्था के लिए
ज़रूरी था यह
वे धन्य हो जातीं।

इधर कुछ को दोष दिखने लगा था
पाठ्यक्रम में ही
संदेह पैदा हो गया था
वे डाल रही थीं इसे
जंग खाए पुराने संदूकों में
फेल हुई स्त्रियाँ
पढ़ने से इनकार कर रही थी
परीक्षा की दहलीज़ पर
ताउम्र खड़ी रहने वाली औरतें
लौट रही थीं वापस धीरे धीरे
हालांकि उनके सामने थीं
दूसरी कठिन परीक्षाएं।

 

13. मामूली चीजों की पीड़ा….

जूते….

घरों में उपेक्षित पड़े
सड़कों पर लहू रिसते
पाँवों तक पहुँचने के लिए
तड़पते रहे।

छतरियाँ….

सिकुड़ी हुई बैठी रहीं
इंतज़ार में
उधर आफ़त बरसती रही
मूसलाधार।

साइकिलें….

पहिये गतिहीन थे
वक़्त ने उनमें
कर दिए थे कई छेद
मरम्मत में जुटी है अब ज़िन्दगी।

घर….

अपने लिए अब
थोड़ा वक़्त चाहता है
सांस लेने को सुस्ताने को
थोड़ी खुली और खाली जगह भी।

14. हमसे चाहा गया

हमसे चाहा गया
हम मछलियाँ बनें
गिलहरियाँ बनें
चीटियाँ बन रेंगते  रहें
नदी और झरने बन
बहते रहें चुपचाप

आकर्षक पेंटिंग बन
टंगे रहें दीवार पर
घास बन बिछे रहें
फूल, पत्ती बनें
सरस और सघन बन
ताप हरते रहें

चादर बनें
गद्दे रजाइयां बनें
जिन्हें ओढ़ा बिछाया जा सके
ज़रूरत के मुताबिक
मदिरा या कुछ और बनें
जिन्हें पीकर भूले जा सकें
ज़िन्दगी के  दुख दर्द
जो सुरूर में भी ढाल दिया करें
कभी कभार
बने रहने की इन तमाम चाहतों के बीच
धीरे धीरे हम भी बनते रहे
कुछ गढ़ते रहे
एक दिन
आपकी चाहतों के पृष्ठों पर छपे
वर्गीकृत विज्ञापनों की दुनिया से
निकल आए बाहर।
अब हम रूप नहीं धरते
वरण किये जाने के लिए
अब विचरते हैं
अपनी दुनिया में मुक्त
हम अवांछनीय।

15. चलना

इस असह्य पीड़ा, और अपमान को
हमने टांक लिया है अपने सीनों पर
हमारे रक्त रंजित पाँवों को मत देखो
देख सको तो देखो
हमारे दिलों से रिसते रक्त को
जिससे भीग चुकी है हमारी आत्मा
और नहा चुकी हैं तुम्हारी सड़कें
भीगी हुई आत्मा को ढोना
बहुत भारी हो गया है अब
इस मुश्किल सफ़र में
कहाँ रखें इसे उतार कर
कोई ठौर नहीं
रक्त रिस रहा है
आत्मा भीग रही है
सड़कें नहा रही हैं
देश की आला अदालत को
हमारा यूँ चलना
कुछ भला-भला सा लग रहा है।

 

 

(गोरखपुर में जन्मी और पली-बढ़ी  कवयित्री रूपाली सिन्हा ने गोरखपुर विश्वविद्यालय से त्रिलोचन की कविता पर 1998 में पी एच डी पूरी की । लगभग बीस वर्षों तक दिल्ली में अध्यापन करने के बाद 2017 -2019 तक इन्होंने अज़रबैजान यूनिवर्सिटी ऑफ़ लैंग्वेजेज़, बाकू में अध्यापन किया। सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों से गहरा सरोकार रखने वाली रूपाली छात्र जीवन में प्रगतिशील छात्र राजनीति में सक्रिय रहीं।  इनकी कविताएँ,लेख,समीक्षाएँ और अनुवाद विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और ब्लॉग्स में प्रकाशित होते रहे हैं। ‘असुविधा के लिए खेद नहीं है’ इनका सद्यः प्रकाशित कविता संग्रह है। सम्पर्क : [email protected]

टिप्पणीकार कामिनी जन्म 1985 इलाहबाद में, ग्रेजुएशन से लेकर पीएचडी तक की पढ़ाई इलाहबाद विश्वविद्यालय से. जन संस्कृति मंच से सम्बद्ध और स्त्री मुद्दों पर मुखर और लेखन में रूचि रखती हैं. फिलवक़्त कोरिया, छत्तीसगढ़ स्थित नवीन कन्या डिग्री कॉलेज में प्राध्यापक हैं. संपर्क: [email protected] 

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