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दूब : प्रेम और दैहिक इच्छाओं की एक उदास धुन..

आज की फिल्म: दूब (नो बेड ऑफ रोज़ेज़) (बांग्लादेशी)

 

इरफान खान की अदायगी वाली बांग्लादेशी फिल्म दूब (नो बेड ऑफ रोज़ेज़) अंतत: नेटफ्लिक्स पर रिलीज कर दी गई। कहने को तो मुस्तफा सरवर फारूकी निर्देशित यह फिल्म बांग्लादेश, भारत और फ्रांस समेत कुछ देशों में 2017 में ही रिलीज हो गई थी, लेकिन कुछ विवादों के चलते बांग्लादेश में इस फिल्म पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। विवाद यह था कि इस फिल्म में इरफान खान के संबंध उनकी बेटी की दोस्त से बताए गए हैं और इरफान के किरदार जावेद हसन को बांग्लादेश के मशहूर उपन्यासकार, फिल्मकार, पटकथा लेखक और गीतकार हुमायूं अहमद का किरदार बताया जा रहा था। हुमायूं की 300 से ज्यादा किताबें हैं और बांग्ला में उन्हें काजी नजरुल और शरतचंद्र जैसी लोकप्रियता हासिल है। फिल्म के निर्देशक को अदालत में यह बात कहनी पड़ी कि जावेद हसन का किसी तरह का संबंध हुमायूं अहमद से नहीं है। इसके बाद यह फिल्म रिलीज की जा सकी है।

बहरहाल, यह इरफान की आखिरी फिल्म है। हम तो यही समझे थे कि 29 अप्रैल, 2020 को एक पन्ना हमेशा-हमेशा के लिए बंद हो गया था, जिसे उल्टे पैरों से चलकर ही पढ़ा जा सकता है। लेकिन इरफान ने एक बार फिर चौंकाया और अपने खास अंदाज में कहा कि सीधे पांव चले आओ मियां, हम दूब, लहलहाती घास और समंदर की आवाजों के बीच खड़े हैं। इस फिल्म की सिनेमेटोग्राफी आपको दीवाना कर देगी। डायलॉग के बीच बहुत लंबे-लंबे पॉज हैं। कई जगह सिर्फ डायलॉग हैं, किरदार नहीं। कैमरा दूर किसी तालाब, नदी, समंदर, लंबी और शरशराती घास के मैदानों, दीवार, खिड़की, सीढ़ियां, डूबती रात की टिमटिमाती बिजलियों, आधी धूप-आधी छावं के बीच डोलते लैंप पोस्ट पर फोकस है। और इस सब के बीच जावेद हसन (इरफान), उनकी पत्नी माया, बेटी साबेरी, बेटा अहिर और बेटी की दोस्त नीतू हैं।

फिल्म के शुरू में एक बहुत लंबा डायलॉग है। एक दीवार है। एक खिड़की है। कैमरा खिड़की से पार एक तालाब पर फोकस है और जावेद नीतू से कहता है कि ‘बाबा (पिता) ने इस सत्य को जानने में मेरी मदद की कि आदमी जिसे सबसे ज्यादा प्यार करता है, उससे बात करने का कोई कारण न बचे तो अल्लाह मिया को चाहिए कि वह उस आदमी को उठा ले।’

जावेद और माया ने भागकर शादी कर ली थी। और बीस साल बाद दोनों की सोच के सुर जैसे बेसुरे हो गए। इतने बेसुरे कि वह अपनी बेटी की दोस्त और खुद से 33 साल छोटी नीतू में अपने जीवन का संगीत खोजने लगा। जावेद मशहूर फिल्मकार है। वह बार-बार अपने अतीत में लौटता है। वह एक होलिडे पर माया से कहता है कि ‘तुमको याद हैं वे दिन, जब हमने हनीमून तुम्हारी मां के स्टोर रूम में मनाया था। वे दिन भी क्या दिन थे।’ माया जावेद की बात पर नाराज हो जाती है। वह कहती है कि जो आज है, वो हमारा है। क्या तुम कभी वर्तमान में नहीं रह सकते।ऐसा लगता रहता है जैसे जावेद उकता गया है। या कि मर गया है और अतीत की राख में जीवन की कोई चिंगारी खोज रहा है। जैसा कि उसने नीतू से कहा था कि ‘बाबा कहा करते थे कि जब आदमी मरता है, तब यह जमीन उसके लिए बेमानी हो जाती है। बल्कि पूरी दुनिया बेमानी लगती है।

मैं बाबा से हर रोज मिलता था और हर रोज उनसे कहता था कि मुझे आपसे जरूरी बात करनी है। मैं उनसे बात करता और कहता था कि बाकी बात कल करूंगा। और इस तरह मैं हर रोज बाबा को उम्मीद से भरा एक दिन और दे देता। इस तरह मैं उनकी मौत को उनसे दूर रखता। फिर मैं अपने फिल्म करियर में बिजी हो गया और बाबा से मिलने कभी-कभी जा पाता। मैं डरता था कि बाबा का कहा सच न हो जाए, कि आदमी मरता है तो दुनिया बेमानी हो जाती है। (या कि दुनिया जब बेमानी लगने लगती है तब आदमी मर जाता है।) और एक दिन यही हुआ।’

फिल्म में जावेद और नीतू के बीच की ऐसी कोई खास बॉन्डिंग नहीं दिखाई गई, जिससे लगे कि वे प्रेम में हैं। हां, ऐसा जरूर लगता रहा कि नीतू जावेद के प्रेम में है। शुरू में यह भी लगा कि जावेद की लोकप्रियता या हीरोइज्म के चलते नीतू उसके संपर्क में रहना चाहती है, लेकिन दोनों के बीच की कुछेक लगभग खामोश मुलाकातें यह भ्रम तोड़ देती हैं। जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते हैं, नीतू की आंखों में जावेद उतरता सा लगता है, लेकिन जावेद की आंखों में कोई चोर जान पड़ता है। केदारनाथ सिंह की कविता में से थोड़ा नमक लेकर कहूं तो जावेद की ढलती देह का गलता नमक, नीतू की अंखुआई देह के ताजा नमक को खाने की ख्वाहिश रखता है।

दोनों के रिश्तों की खबरें जब अखबार में छप जाती हैं, तब माया खुद को जावेद से अलग कर लेती है। जावेद उसे मनाने की कोशिश करता है और झूठ बोलता है कि वे सारे किस्से झूठे हैं जो अखबार में छपे हैं। माया एक बार माफ भी कर देती है और घर लौट आती है, लेकिन हालात ऐसे बनते हैं कि चीजें सामने आ जाती हैं। माया अलग हो जाती है। बेटी जावेद को कभी माफ न करने की बात कहती है और बेटा चुप-चुप रहने लगता है। बेटी मां का साथ देना चुनती है। मां-बेटी के खूबसूरत रिश्ते के लिए भी यह फिल्म देखना चाहिए।

होना यह चाहिए कि प्रेम जीवन को खुशी और सुख से भर दे, लेकिन ऐसा नहीं होता। शायद तमाम ऐसे रिश्तों में ऐसा नहीं होता। जावेद के जीवन का तनाव और अवसाद दर्शकों को अपनी गिरफ्त में ले लेता है। …और एक दिन जावेद की मौत हो जाती है। सिनेमा में या समाज में यह कोई नई बात नहीं है कि उम्र के दो किनारों पर खड़े लोग प्रेम कर बैठते हैं।

हिंदी सिनेमा की बात करें तो 2005 में आई राम गोपाल वर्मा निर्देशित और अमिताभ बच्चन व जिया खान अभिनीत फिल्म ‘निशब्द’ रिश्तों की इसी प्रष्ठभूमि पर है। उसमें भी अमिताभ का किरदार अपनी बेटी की 18 साल की सहेली के साथ रिश्तों में है। इस फिल्म में राम गोपाल वर्मा का ज्यादा ध्यान देह और यौन उच्छृंखलता को दर्ज करना ही जान पड़ा।

उम्र के फासले और सामाजिक ताने-बाने के बीच रिश्तों, उसकी इंटेंसिटी, उसके टेंशन, उसके उत्सव और राग को इससे कहीं ज्यादा बेहतर ढंग से अनंत बालानी के निर्देशन में 2003 में आई फिल्म ‘जॉगर्स पार्क’ में दिखाया गया है।

इसमें एक रिटायर्ड जज ज्योतिन प्रसाद चटर्जी (विक्टर बनर्जी) एक 30 साल की मॉडल जैनी सुरतवाला (परीजाद जोराबियन) के प्रेम में है और यह लगातार महसूस होता रहता है। हालांकि इस फेहरिस्त में माइकल हेनेक की 2001 में आई फ्रेंच फिल्म ‘द पियानो टीचर’ (La Pianiste) इसलिए ज्यादा जरूरी फिल्म हो जाती है, क्योंकि यह फिल्म जस्टीफाई करती है कि बड़ी उम्र की महिला किसी नए लड़के को सेक्स के लिए उकसाती है, उसे तैयार करती है और उससे जबरदस्ती भी करती है तो यह असामान्य हरकत है।

इस फिल्म की किरदार को फिल्मकार ने यौन कुंठित बताया है, जबकि राम गोपाल वर्मा का किरदार सहज है और किसी तरह के गिल्ट में नहीं है। इस कड़ी में जिस फिल्म का जिक्र करना बहुत जरूरी है, वह है 2008 की जर्मन-अमेरिकन फिल्म ‘द रीडर।’ जर्मन लेखक-उपन्यासकार बर्नहार्ड स्लिंक (Bernhard Schlink) के ‘द रीडर’ उपन्यास पर बनी यह फिल्म शुरू तो होती है एक कमसिन लड़के और उम्रदराज़ औरत के शारीरिक आकर्षण और सेक्सुअल रिलेशन से, लेकिन यह फिल्म अपनी यात्रा में जहां पहुंचती है, वहां सिर्फ प्रेम बचता है।

इस फिल्म में हिटलर के यातनागृहों का जिक्र भी है और प्रेम में अपनी मर्जी से स्वीकार की गईं यातनाओं की खामोश त्रासदी भी। यही त्रासदी अपनी तरह से और अपनी कुछ सामाजिक-सांस्कृतिक सीमाओं के दायरे में इरफान खान की फिल्म दूब में भी है।

दूब पर बात करते हुए लगता है कि पता नहीं दो लोगों के रिश्तों की मौत, दो शरीरों की मौत से किस तरह अलग होती होगी। प्रेम और इसकी ‘नैतिकताएं’ अजीब चीज हैं। खासतौर पर भारतीय उपमहाद्वीप के संबंध में। यहां कोई शख्स दस लोगों से नफरत करता है या करती है, तो यह स्वीकार्य न भी हो तो बहुत ऐतराज वाली बात नहीं है। लेकिन प्रेम के संबंध में यह बात नहीं कही जा सकती। हिंदी सिनेमा के सबसे मकबूल गीतकारों में शुमार शैलेंद्र भी एक गीत के मार्फत कहते हैं- ‘सुनते हैं प्यार की दुनिया में/ दो दिल मुश्किल से समाते हैं/ क्या गैर वहां अपनों तक के/ साये भी न आने पाते हैं।’ लेकिन देह का मनोविज्ञान समाज की नैतिकताओं से अलग होता है। जब वह समाज में स्वीकार्य नहीं होता, तो जावेद की तरह झूठ भी बोलता है और नीतू के साथ रिश्ता भी कायम करता है। …और माया (मायाएं) इस खेल में खुद को ठगा हुआ महसूस करती है। शायद इसलिए कि इस खेल में ‘नैतिकता’ और सामाजिक मूल्यों की क्रीज से बाहर खेलने की पहल जावेद ने की थी।

यथार्थ यही है कि प्यार की दुनिया में दो दिल मुश्किल से समाते हैं। यह मनोज रूपड़ा की कहानी ‘ईश्वर का द्वंद्व’ की तरह जादुई और खूबसूरत नहीं होता, जिसमें दो से ज्यादा होने पर भी दिल जख्मी नहीं होते।

फिल्म के एक आखिरी हिस्से में हम देखते हैं कि माया के घर में सोफे पर जावेद का पजामा इस तरह लटका हुआ है, जैसे वहां जावेद बैठा है। जिस रोज जावेद के मरने की खबर आती है, माया रोज की तरह तैयार हो रही है।

वह कहती है कि जावेद की मौत की खबर सुनकर उसे खुशी हुई। उसे जावेद के मरने की खुशी नहीं थी। उसे अपने प्रेम के किसी और की जद से बाहर आने की, आजाद हो जाने की खुशी थी। बेटी पिता को आखिरी बार देखने जाती है। माया नहीं जाती। माया दरवाजा खोलकर जावेद की याद को अंदर आने देती है और उससे बातें करती है।

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