कविता जनमत

उम्मीद को अलग-अलग ढंग से पकड़ने की कोशिश हैं रमन की कविताएँ

आर. चेतन क्रांति


रमण कुमार सिंह की इन कविताओं में अपने मौजूदा समय को पकड़ने और उसकी क्षुद्रताओं, उसके खतरों, उसके खतरनाक इरादों और बदलावों को लेकर गहरी बेचैनी है.

कहने की जरुरत नहीं कि देश में के मौजूदा नियंताओं के कुर्सी सँभालने के बाद हमारे आसपास बहुत कुछ बदला है.

शासन की अपारदर्शी पद्धति, आंकड़ों की कलाबाजी, विकास के टोटके लगभग वैसे ही हैं, जैसे हमेशा से रहे आये हैं, बेशक उनका प्रदर्शन कुछ ज्यादा फूहड़ हो चला है. लेकिन बड़ा और चेतावनी जैसा बदलाव हमारी समाज-दृष्टि में आयी गिरावट है.

अंध-श्रृद्धा, व्यक्ति-पूजा, विचारों की असहमति को लेकर असहिष्णुता और धर्म तथा देश को लेकर मनुष्य-विरोध तक कट्टर हो जाना, ये कुछ ऐसी चीजें हैं जो एकदम नयी हैं. राजनीतिक चेतना का ऐसा पतित संस्करण इस समाज में कभी चलन में नहीं रहा.

आज लग रहा है कि किस्म-किस्म के संचार माध्यमों के रास्ते लोग देश, सरकार और राजनीति के बारे में जितना ज्यादा जान रहे हैं, उतना ही गलत जान रहे हैं. ताकत और उसकी सत्ता को जितने नंगे रूप में समाज ने जितनी बेहयाई के साथ इस समय मान्यता दी है, वैसा कभी नहीं था.

रमण ने अपनी कविताओं में इस विडंबना को पकड़ने की बहुत सहज कोशिश की है. ‘नए नायक की तलाश’ में वे उस पूरी प्रक्रिया को समझते और समझाते हैं जो इस समय के दुरागमन का मूल कारण है.

यह दरअसल इस देश के ‘सवा करोड़ लोगों’ की, जैसा इस देश को इधर कहा जाने लगा है, निराशा का नतीजा था कि उन्होंने देश की बागडोर एक ऐसे नायक को सौंप दी, जो सिर्फ इसी अर्थ में नया निकला कि उसकी आँखों के सामने यहाँ सामाजिक संवेदना के ह्रास ने नयी गहराइयाँ हासिल कीं; कि अब हिंसा फैशन हो गयी है, शक्ति का प्रदर्शन जो हमेशा से भारतीय समाज का स्थाई शौक रहा है, अब जैसे संवैधानिक मान्यता पा चुका है. इसके अलावा ऐसा कुछ नहीं हुआ जिसकी उम्मीद की गयी थी.

जनसाधारण जिसका भविष्य उम्मीद पर ही टिका था, अब और ज्यादा निराश है. नतीजा कि, बा वह किसी और नायक की तलाश में जुटे. ‘राष्ट्रीय गौरव’, ‘आप खफा हुए’, ‘डर का कारोबार’, ‘डरो मत सवाल करो’, ‘भक्तजन’, आदि कविताएँ नए नायक के नए समय में हुए नए परिवर्तनों की ही तरफ इशारा करती हैं.

वे बताती हैं कि कैसे हमारी एक भोली उम्मीद ने हमारे सामने कुछ ऐसी चुनौतियाँ ला खड़ी की हैं कि न हम विरोध कर सकते हैं, न सरकार की आलोचना कर सकते हैं, न अपनी दैनिक दिक्कतों, परेशानियों की शिकायत कहीं ले जा सकते हैं. ताकत वालों के खिलाफ आवाज उठाना देशद्रोह हो गया है, गली-गली में ऐसे भक्तजन मिलने लगे हैं जिन्हें जो सामने है वह दिखाई नहीं देता, और जिसे वे हर कहीं देखना चाहते हैं, उसे स्वीकार करने के लिए हिंसा की किसी भी सीमा तक जाने को तैयार हैं. कविताएँ अपनी सहज विवरणात्मकता में इधर के इन सारे बिम्बों को हमारे सामने उकेर देती हैं.

संस्कृति और धर्म में सर से पैर तक डूबे भारतीय समाज की एक और विडम्बना समाज का एक समूह के रूप में बिखर जाना, और इस बिखराव के बावजूद, विकल्प के रूप में किसी समूचे-संपूर्ण व्यक्ति का हासिल नहीं होना है.

समाज एक अवधारणा और एक इकाई के रूप में जिस तरह विभिन्न स्तरों पर बिखरा है, और जिस सम्पूर्णता के साथ वह इकट्ठे एक समूह के रूप में अपने आप को प्रस्तुत करने में असमर्थ हुआ है, उतनी सम्पूर्णता में हमें एक ऐसा व्यक्ति हासिल नहीं हुआ है, जो समाज के उस अभाव को भर सके. ऐसा हो भी सकता था. पर नहीं हुआ.

यह विडंबना अक्सर कविताओं में चिह्नित हुई है, रमण की कविताओं में वह और भी मुखर है. वे देख पा रहे हैं कि जिन मूल्यों के बल पर कोई समाज अपने पैरों पर अपने पूरे सकारात्मक दम-ख़म के साथ खड़ा होता है, वे सब चुक गए हैं.

थोथी चीजें उस सब की जगह आ गयी हैं जो इधर के उथले भारतीय को अपने दिल-दिमाग के लिए भारी लगा. वह चाहे दूसरे के लिए स्पेस हो, या किसी आदर्श के लिए खड़े होने की इच्छा हो, और इस बदलाव को भी वे एक कुशल रचनाकार की तरह अंकित कर रहे हैं.

प्रेम, सौन्दर्य और स्त्री, उन्हें हर सच्चे मन की तरह उम्मीद की तरह दिखती हैं, और इसको वे अपने शब्दों में स्वीकार भी करते हैं.

कई लोग कह चुके होंगे, फिर भी यह दोहराना अप्रासंगिक नहीं है, कि तरह-तरह से नए होते इस देश में शायद स्त्री ही ऐसी एक इकाई है जो अपने नए होने की प्रक्रिया को एक सावधान और कंसिस्टेंट कार्रवाई की तरह अंजाम दे रही है.

सभी विभाजनों के बीच से रास्ता बनाती हुई वह, हम उम्मीद कर सकते हैं, कि एक ज्यादा खुले, ज्यादा लोकतांत्रिक, ज्यादा सहनशील समय की तरफ जा रही है. यहाँ प्रस्तुत ‘प्रेम करने वाली लड़की’, ‘चौराहे पर लड़की’, ‘खुली आँखों से सपने देखने वाली लड़की’, ‘सूरज को बिंदिया की तरह’ ये सभी कवितायेँ इसी उम्मीद को अलग-अलग ढंग से पकड़ने और पहुंचाने की कोशिश करती हैं.
कोई एक दोस्त, जब मिले थे हम और माँ की बातें इन कविताओं में हमें एक सकारात्मक सामाजिकता के चित्र मिलते हैं, जहां प्यार और लगाव समाज को ज्यादा सहनीय जगह बनाने के विकल्प देते प्रतीत होते हैं ।कवि को उनमें एक बड़ी उम्मीद दिखाई देती है, जो दरअसल धीरे धीरे कम ही होती गयी है।

रमण कुमार सिंह की कविताएँ

1-नए नायक की तलाश
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छह दशकों नाउम्मीदी पसरी थी वहां
एक गहन अंधेरा था
पुराने दरख्तों पर लटके थे चमगादड़
फिर भी उम्मीद की कोंपलें थीं
कि फूटने से बाज नहीं आती थीं

यह उम्मीद उस व्यवस्था से थी
जो सौंपी थी पुरखों ने वर्षों पहले
हर पांच साल पर लोग चुनते थे
अपना प्रतिनिधि नए भोर की तलाश में

दशकों से यह सिलसिला चला आ रहा था
मगर हर बार उनके हिस्से में आता था छल
जिस पर भी वे लगाते थे दांव
(लोकतंत्र में मतदान एक दांव ही तो है )
वही बदल लेता था पाला
हर बार रोशनी से उनका फासला और बढ़ जाता
और हर बार कुछ और तंग हो जाती उनकी जेब

फिर
कॉरपोरेट के रथ पर सवार आया एक नायक
टीवी चैनलों के फ्लैश लाइट की रोशनी में
उस खुरदरे दाढ़ी वाले नायक ने
लोगों से परिवर्तन का वायदा

हर बार छल का शिकार होते लोगों में
उम्मीद की कोंपलें एक बार फिर कुनमुनाई
लोगों ने फिर उस नायक पर किया भरोसा
और करने लगे
अच्छे दिनों का इंतजार

मगर दिन महीने बीतते गए
मौसम बदलते गए
कभी बाढ़ बहा ले गई फसल
तो कभी युवाओं की उम्मीदों पर पड़ गया पाला
वहशी नारों के शोर में घुट गई इंसानियत की चीख
रिश्तों में पैदा किए जाने लगे फर्क
वे दिन इतिहास के पन्नों में दफन हो गए
जब किसी की चीख सुनकर जमा हो जाता था
पूरा शहर
अब तो दर्द को भी मजहब के खांचों में
बांटकर देखा जाने लगा

सवाल पूछना भी हो गया नाफरमानी
विरोध को बताया जाने लगा देशद्रोह
एक पूरा कुनबा ही लगा था इसमें
जो लोग सदियों से रहते आए थे साथ-साथ
वे लड़ने लगे आपस में बात-बात पर
एक मुर्दा खामोशी पसर गई शहर में

मगर मुखर नायक न जाने कहां गुम गया
कभी-कभी टीवी पर किसी दूसरे देश से
सुनाई देती उसकी आवाज

कुछ ऐसे भी बावले थे शहर में
जो पूछने लगे खुलकर कि
क्यों खोती जा रही है बच्चों के चेहरों की मुस्कान
बेटियां क्यों रहने लगी हैं सहमी-सहमी
शहर के बीचोंबीच जो बहता था मोहब्बत का दरिया
वह क्यों सूखता जा रहा है इन दिनों
इतने चुप-चुप और खोए-खोए से क्यों रहने लगे लोग
सच की तलाश चावल में कंकड़ बीनने जैसा क्यों हो गया
क्यों चुप है बड़ी-बड़ी बातें करने वाला नायक

हवा में टंगे रह जाते हैं ये सवाल
कहीं से इनका कोई माकूल उत्तर नहीं मिलता
सिवाय इसके कि-
साठ सालों तक रहे चुप
तो अब क्यों उठाते हो सवाल
तुम्हारे सवाल से आ रही साजिश की बू
नहीं पसंद है यह व्यवस्था तो चले जाओ कहीं और
हम बनाना चाहते हैं एक ऐसा भारत
जहां सब एक ही सुर में बोलेगा
एक ही होगी सबकी पहचान
एक ही होगा सबका खानपान

एक बार फिर छला गया आम आदमी
खुद से ही पूछ रहा है सवाल
कि नए नायक पर भरोसे का फैसला उसका था
या किसी ने फैलाया था भ्रमजाल
बहरहाल वह जानता है कि
एक बार फिर आएगा उसका समय
जब वह सुधार सकता है अपनी गलतियां

फिलहाल वह विकल्प के तौर पर
फिर नए नायक की तलाश में है

2-राष्ट्रीय गौरव
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मत कहो कि बढ रहा है अंधेरा
मत कहो कि फासले बढ़ रहे हैं
दिलों के बीच
मत कहो कि बेटियां घर में भी
नहीं रह गई हैं सुरक्षित
मत कहो कि दुनिया की एक तिहाई
गरीब आबादी रहती है हमारे मुल्क में
हजारों बच्चे मर जाते हर साल
इलाज के बिना तो क्या हुआ
अन्य मुल्कों में भी तो मरते हैं

ये तो बस छोटी-छोटी बातें हैं
बड़ी बात है विकास दर का आंकड़ा
वही है आज राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक

ऐसी बातें कहने से होती है बदनामी
नाम खराब होता है सरकार का
भले लोग सरकार पर सवाल नहीं उठाते
वे सबेरे नहा-धोकर दफ्तर पहुंचते हैं
और शाम को घर लौटकर दूरदर्शन पर
सरकार का गुणगान सुनते हैं
इसके अलावा कॉमेडी शो देखकर
अपने दुख को भुलाने और
हंसने की नाकाम कोशिश करते हैं

सरकार पर सवाल उठाना देशद्रोह है
डाला जा सकता है तुम्हें
इस जुर्म में जेल के अंदर
देखते नहीं दुनिया भर के व्यापारी
ललचाई नजरों से देख रहे हमारी तरफ
हमें उनकी कृपा दृष्टि चाहिए
इसलिए अपनी महान संस्कृति की
शेखी बघारने में नहीं है कोई बुराई

हमें गर्व करना चाहिए
अपनी महान सांस्कृतिक विरासत पर
हमारे ऐतिहासिक योद्धाओं ने
लड़े बड़े-बड़े युद्ध
खून से सने हैं हमारे इतिहास के पन्ने
वर्तमान का रोना रोने के बजाय
इस महान संस्कृति पर गर्व करना सीखो वत्स

शांति और सद्भाव किताबी बातें हैं
किताबों में ही लगते हैं अच्छे ये शब्द
अंतरराष्टीय राजनीति में भी होती है
राष्ट्रीय गौरव की जरूरत
पड़ोसी को धमकाने में और
बड़े देशों की चिरौरी कर
निवेश लाने में ही है राष्ट्रीय गौरव

व्यवस्था के खिलाफ बोलकर भी
तुम अब तक सही-सलामत हो
यह क्या कम बड़ी बात है
गौरव के है खिलाफ है तुम्हारा विरोध
भूल से भी मत कहना कभी ऐसा
वर्ना, जानते ही हो कि भक्तजनों की टोली
रहती है हरदम तैयार
ऐसे लोगों को दूर देश भेजने के लिए !

3-फिर भी
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लिबास की कोई कमी नहीं है
ब्रांडेड कंपनियों के लिबास
पहने हैं लोग
एक से बढ़कर एक
रंग और डिजाइन
फिर भी छिप नहीं रही नग्नता

स्वच्छता का एक मुकम्मल अभियान चल रहा
चमकाए जा रहे हैं कोने-कोने
करोड़ों रुपये बहाए जा रहे इस नाम पर
घर से लेकर सड़कों तक की हो रही सफाई
फिर भी गंदगी खत्म होने का नाम नहीं ले रही
गंदगी हटे भी तो कैसे
सदियों से घर किए बैठी है जेहन में

आमदनी बढ़ती जा रही है दिनोंदिन
पैसे इतने हैं कि एक आदमी के पास
कई क्रेडिट और डेबिट कार्ड हैं
फिर भी आदमी किस्तों की जिंदगी जीता
और कर्ज में ही मरता है

बड़े-बड़े मॉल और सुपरबाजार हैं
जहां पैसों से खरीदा जा सकता है कुछ भी
फिर भी सच्ची खुशी और चैन की नींद
के लिए आदमी लौटता है अंत में घर ही

4-नया तोता
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कहते हैं पहले राजाओं की जान
अटकी होती थी तोतों में
राजा इसलिए पालते थे तोता
तोता वही रटता था
जो सिखाते थे राजा

अब बदल गया है जमाना
असली तोते तो अब दिखते हैं कम ही
नए जमाने के राजा ने निकाली है नई तरकीब
अब वह इंसानों के रूप में पालने लगा है तोता
यह नया तोता भी करता रहता है राजा का गुणगान
खास मौकों पर लेता है
राजा के साथ सेल्फियां

5-आप खफा हुए
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हमने मन का खाना खाया
आप खफा हुए

हमने मन का गाना गाया
आप खफा हुए

हमने मन का कपड़ा पहना
आप खफा हुए

हमने अपना दुखड़ा रोया
आप खफा हुए

हमने सच्ची बात कही
तो आप खफा हुए

6. तथाकथित सफल लोगों के बारे में चंद पंक्तियाँ

तथाकथित सफल लोगों क
बचपन से ही पता होता है कि
उन्हें सफल होना है
उन्हें यह भी पता होता है कि
अच्छा या बुरा कुछ भी to iio तरकीबें आजमाते रहते हैं
हालाँकि उनकी जीवनियों में उन तरकीबों का
कोई जिक्र नहीं होता और न ही
जिक्र होता है उन सीढ़ियों का
जिसका इस्तेमाल वे करते आए हैं
शून्य से शिखर तक पहुँचने में

देशकाल, संस्कृति और समाज का दुःख
उन्हें बस उतना ही दुःखी करता है
जितने से उनकी सफलता में कोई बाधा न पहुँचे
उनका भरसक प्रयास होता है कि
ये दुःख भी उनकी सफलता का पाथेय बन जाएँ

अपनी जीवनियों या आत्मकथाओं में वे
मजे से सफलता के च्यूंगम चबाते हुए
रोमानी अंदाज में उन शिक्षकों या
बुजुर्गों का जिक्र करते हैं
जिन्होंने कभी उन्हें बचपना करने के लिए
मारा-पीटा या डाँटा था
और उस चोट के बाद ही
उनकी सफलता का प्रस्थान बिन्दु शुरू हुआ था

कभी-कभी गाँव-कस्बे की उस लड़की का जिक्र भी
रोमानी भाव से ही वे करते हैं
जो किशोर उम्र के भावुक दौर में
उनका पहला क्रश था।
लेकिन उन आत्मकथाओं में
औपचारिकता कृतज्ञता ज्ञापन से अलग
किसी भी स्त्री का जिक्र नहीं होता
जो उनकी सफलता के पीछे होती है।

मित्रो, हो सकता है सफल लोगों के बारे में
और भी बहुत कुछ लिखा जा सके
जिसका मुझे पता नहीं
क्योंकि न तो मैं सफल हो पाया
और न ही ऐसे सफल लोगों का
साथ मुझे पसंद आया
मगर आज मुझे उस मित्र की
बहुत याद आ रही है
जिसने कभी कहा था कि
दूसरों की जेब से
अपनी जेब में रुपए रखवाने की कला ही
जीवन की सबसे बड़ी सफलता है।

7-प्रेम करने वाली लड़की

प्रेम करनेवाली लड़की अक्सर
हो जाती है ख़ुद से ही गाफिल
और दुनिया को अपने ढंग से
बनाने-सँवारने की करती है कोशिश

प्रेम करनेवाली लड़की
हवा में ख़ुशबू की तरह
बिखर जाना चाहती है
उड़ना चाहती है स्वच्छंद
पंछियों की तरह
धूप-सी हँसी ओढ़े वह लड़की
भर देना चाहती है उजास चहुँ ओर

प्रेम करनेवाली लड़की
सोना नहीं, चाँदी नहीं
गाड़ी नहीं, बँगला नहीं
चाहती है बस किसी ऐसे का साथ
जो समझ सके उसकी हर बात
और अपने प्रेम की तपिश से उसे
बना दे कुंदन-सा सुच्चा व पवित्र

अब वह आईना भी देखती है
तो किसी दूसरे की नज़र से
परखती है स्वयं को
और अपने स्व को दे देती है तिलांजलि

प्रेम करनेवाली लड़की के पाँव
किसी नाप की जूती में नहीं अँटते
समाज के चलन से अलग होती है उसकी चाल
माँ की आँखों में अखरता है उसका रंग-ढंग
पिता का संदेह बढ़ता जाता है दिनों-दिन और
भाई की जासूस निगाहें करती रहती हैं पीछा
गाँव-घर के लोग देने लगते हैं नसीहतें
समझाने लगते हैं ऊँच-नीच अच्छे-बुरे के भेद

मगर प्रेम करनेवाली लड़की
दुनिया को अपने अनुभव से
जानना-समझना चाहती है
और एक माँ की तरह
उसे और सुंदर बनाना चाहती है।

8-बच्चों से हमारी चाहतें
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हम अपने बच्चों में बच्चा नहीं
भविष्य का सफल व्यक्ति ढूंढ़ते हैं

हम चाहते हैं कि उनके शिशु-मस्तिष्क
कंप्यूटर जैसे हों तेज़
और हौसले हीलियम भरे गुब्बारे की तरह
इंसानियत के तमाम गुण हों हमारे बच्चे में
और बड़ों का सम्मान तो भगवान की तरह करे वो

हम अपने बच्चे के औसत या फिसड्डी होने की
तो कभी सोच ही नहीं सकते
औसत या फिसड्डी बच्चे हों भी हमारे तो
उसे अपना कहने में भी शरमाते हैं

हम चाहते हैं कि हम जो हासिल न कर पाये
वो सब कुछ हासिल करें हमारे बच्चे
हम चाहते हैं कि वो
कल्पना चावला की तरह प्रसृद्धि पाएं
मगर उनका हश्र कल्पना चावला जैसा न हो

हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे
सुंदर हों और सुशील भी
उनके दिलों में प्यार हो और उमंगें बेशुमार
मगर हमारी पसंद के बिना वो किसी को न करे पसंद
वे बस हमारी उम्मीदों का माइल स्टोन बनें

हम ये भी चाहते हैं कि
लोग उन्हें मेरे परिचय से नहीं
बल्कि उनके परिचय से हमें जानें

अपने बच्चों को लेकर हमारे मन में
अनंत चाहतें होती हैं
हम चाहते हैं वो ये करे
वो वह करे
सब कुछ करे
लेकिन
अपने मन की न करे…

9-चौराहे पर लड़की
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अपनी चिर-पुरातन पोपली आत्मा और
दादी-नानी द्वारा मिली नसीहतों का कवच उतार
चौराहे पर थी खड़ी लड़की अकेली

उसके आंचल में कुछ फूल थे सूखे हुए
मन में थीं कुछ दबी भावनाएं
कंठ में कोई गीत था उसके
जिसे वह रह-रह कर
गुनगुना उठती थी

आसपास खड़े लोगों में उसको लेकर
कुछ फुसफुसाहटें थीं कुछ जुगुप्सा
– किसकी बेटी है… किसकी पत्नी…
– चीज़ बड़ी ऊंची लगती है…
– हां मगरूर भी…
– कर रही होगी किसी का इंतजार

लोगों के मन में बहुत कुछ है
इस लड़की के विषय में
सिवा किसी सम्मानजनक भाव के

इन सबसे बेपरवाह लड़की
अपने में ही मगन
दृढ़ता से खड़ी है
अकेली
चौराहे पर

10-माफ़ करना मिता
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मैं तुम्हें सोते हुए छोड़कर जा रहा हूं
हालांकि सोते हुओं को बिना जगाये
छोड़कर निकल जाना ठीक नहीं है
मगर माफ़ करना मिता
मैं तुम्हें सोते हुए छोड़कर जा रहा हूं

इतिहास में लांछित है गौतम बुद्ध
यशोधरा और राहुल को
सोते हुए छोड़कर जाने के लिए
हालांकि मैं बुद्ध नहीं हूं

हरेक को निकलना पड़ता है अकेले ही
अकेले ही भोगना होता है भटकाव

जब तुम जगोगी तो तुम्हें यह दुनिया
कुछ बदली-बदली नजर आएगी
आज का समय वही नहीं होगा
जो कल का था
और न ही आज का दुख
कल का दुख होगा
न आज का चुंबन वह होगा
और न आज के आलिंगन में वो खिंचाव
जो कल था

सब कुछ एकदम नया-नया होगा
एक नई शुरुआत के लिए आमंत्रण देता हुआ

11-डर का कारोबार
————–

सदियों से चल रहा है यह
डर का कारोबार
कभी लोक कल्याण के नाम पर
कभी सुरक्षा के नाम पर
कभी धर्म रक्षा के लिए
तो कभी भगवान के नाम पर

संभवतः सभ्यता की शुरुआत में ही
कुछ चतुर सुजानों ने
पहचान लिया था
शून्य लागत वाले इस धंधे का
चोखापन।

तभी तो धार्मिक कही जाने वाली किताबों में
पूरा का पूरा वृत्तांत रचा गया है
डर की बुनियाद पर

लोगों को डराकर अपना वर्चस्व
स्थापित करने के लिए
भयादोहन का रचा गया वृत्तांत
और फैलाया गया भ्रम

भय का यह कारोबार सिर्फ एक शहर
एक नगर एक देश एक घर या
एक दफ्तर तक नहीं है पसरा
इसके धंधेबाज मिल जाएंगे हर कहीं

धर्म का धंधा करने वाले
दफ्तरों में डंडा फटकारने वाले
हथियारों के सौदागर
बाजार के बिचौलिए
सभी करते हैं डर का कारोबार

असल में डर एक हथियार
जिसका किया जाता है इस्तेमाल
दूसरों को नियंत्रित करने और
अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए

चूंकि कारोबार बढ़ाने के लिए
जरूरी होता है विज्ञापन
इसलिए हर विज्ञापन तैयार होता है
भय की बुनियाद पर
और उसमें लगाया जाता है
लालच का तड़का।

12-खुली आंखों से सपने देखने वाली लड़की

सितारे आसमान में नहीं
उसकी आंखों में चमकते हैं
चांद को अपने माथे पर
बिंदिया की तरह सजाकर वह
दिखाती है हवा को रास्ता
खुली आंखो से सपने
देखने वाली वह लड़की
इन दिनों अपने प्यार में
रोशनी की चुनर ओढ
इठला रही है आसमान में

कभी पलते थे उसकी भी
बंद आंखों में सुनहरे सपने
तब तितली सी नाजुक
फूलों सी सुंदर थी वह
कभी उसके भी सपने में
आते थे सफ़ेद घोड़े पर सवार
किस्से वाले राजकुमार
उस राजकुमार के इंतजार में
न जाने कितने सावन बरसे थे
उसकी चंचल आंखों से
उस राजकुमार के लिए उसने
किताबों में छिपा कर
रखे थे मोरपंख
रूमालों पर काढे थे फूल
तकियों की गिलाफों पर
लिखा था उसका नाम

मगर एक दिन वह राजकुमार
निकला बड़ा जादूगर
और जब तक वह समझ पाती
उसके जादू की असलियत
उसने खुद को पाया
एक सुनहरे पिंजड़े में
काफी तड़पी-छटपटाई थी
मगर तोड़ नहीं पाई पिंजरा
फिर तो धीरे-धीरे भूलने लगी वह
कि बहुत ऊंची उड़ान भरने का
देखा था उसने कभी सपना
आसमान में उड़ने का सपना ही नहीं
भूल बैठी थी वह खुद को भी

पिंजड़े को ही अपनी नियति
मान बैठी थी वह
लेकिन एक दिन अचानक
न जाने क्या जादू हुआ कि
उसकी खुली आंखों में
कौंध गए कुछ सपने
तब से वह देखने लगी है
खुली आंखों से सपने
और रचने लगी है
अपने लिए एक नई दुनिया
जिसमें किसी राजकुमार के लिए
नहीं है कोई जगह

13-बहनों के लिए कुछ शब्द

मेरी बहन,
मेरे पास तुम्हें देने के लिए
कुछ नहीं है सिवाय कुछ शब्द के
तुम इन्हें रखो संभालकर
कि जीवन के कठिन क्षणों में
ये देंगे तुम्हें सहारा

बेशक शब्दों से नहीं भरता पेट
लेकिन रोटी कमाने का साहस देते हैं ये
शब्द मन और जीवन को रखते हैं
उल्लसित एवं ऊर्जावान

मेरी बहन,
तुम्हारे इस अकिंचन भाई के पास
न तो कोई पुश्तैनी संपत्ति है
और न ही कोई खजाना
रोज कुआं खोदकर पानी
पीने वाला तुम्हारा भाई
सौंपता है तुम्हें शब्द-सरिता
जो रखेगा तुम्हारे जीवन को तरल

जब जीवन में कोई राह नहीं मिले
चारों तरफ छाया हो अंधेरा
और बाहरी दुनिया की आपाधापी से
बेचैन होने लगे तुम्हारा अंतर्मन
तुम शब्दों की शरण में जाना
यहीं से मिलेगी तुम्हें उष्मा
यहीं मिलेगी आग जीवन के लिए
और उड़ान भरने के लिए मिलेंगे पंख

मेरी बहन,
मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूं
मगर मैं नहीं चाहता कि
तुम जीयो किसी दूसरे के भरोसे
इसलिए सौंपता हूं तुम्हें शब्द
ताकि तुम स्वतंत्र होकर जी सको
जिंदगी को एक उत्सव की तरह।

14-डरो मत सवाल करो

हद की भी हद होती है
लेकिन यह बे-हद वक्त है मित्रो
जहां दबाई जा रही है
हर सच्ची आवाज
आप पूछ नहीं सकते ऐसा कोई सवाल
जो उन्हें असहज कर दे
आप अपना दुखड़ा रो नहीं सकते
कहने को तो वे कहते हैं कि
आप स्वतंत्र हैं और गर्व कीजिए कि
आप एक महान संस्कृति वाले
देश में जीते हैं
मगर जैसे ही आप याद दिलाते हैं
कथित गो-रक्षकों के उत्पात
समाज में बढ़ते दहशत
बेरोजगारों के मुरझाए चेहरे
लोकतांत्रिक संस्थानों की पतनशीलता
और इस मुल्क की घटती सहनशीलता
तो तुरंत वही पूछने लगते हैं सवाल-
क्या पहले नहीं होता था ऐसा
तब नहीं बोले तो अब क्यों बोलते हो
गजब तो यह है कि शासक की आलोचना
अब समझी जाती है देश के साथ गद्दारी
और तुरंत जारी किया जाता है
दूसरे देश भेजे जाने का

बहुत शातिर हैं ये
गंगा-जमनी तहजीब के शत्रु
समाज के हर क्षेत्र में
इन्होंने कर दिया है बंटवारा
लिजलिजे रीढहीन लोगों को बताकर अपना
न झुकने वाले, सवाल पूछने वाले को
बना दिया गया है दूसरा
वसुधैव कुटुम्बकम की संस्कृति
की जा रही है खतम और
आक्रमक राष्ट्रवाद का उफान है जोर पर

विकास तो एक बहाना है
असली उद्देश्य बहुलता को खत्म कर
देश को एक जाति का कबीला बनना है

मगर यह चुप रहने का नहीं
चीखकर राजा की नंगई बताने का समय है
कितने तानाशाह इस दुनिया में आए
और वक्त की धारा में बह गए
विद्रोही आवाज को चुप कराने की
उनकी कोशिश दम तोड़ गई समय के साथ
मगर आज भी गूंज रही है
विद्रोह की आवाज
इसलिए मित्रो, डरो मत , सवाल करो
क्योंकि डर के आगे जीत है।

15-कौन-सा नया देश बना रहे हैं हम
——————–

भैया, आप मुझे छोड़ देंगे
स्कूल तक अपने साथ?
यह पूछा मुझसे एक स्त्री ने
राष्ट्रीय राजधानी के एक व्यस्ततम सड़क को
पार करते हुए सुबह के पौने आठ बजे

वह अपनी फूल सी बच्ची को
छोड़ने जा रही थी स्कूल
जो मुश्किल से सात साल की रही होगी
इससे पहले कि मैं उससे कुछ पूछता
उसने खुद ही कहा कि सामने पार्क में
बैठा रहता है एक पागल जो
आती-जाती स्त्रियों और लड़कियों को
छेड़ता है सरेआम और लोग चुपचाप
मजा लेते रहते हैं देखते हुए टुकुर-टुकुर

मैंने कहा, तो आप लोग ही कुछ क्यों नहीं कहतीं उसे?
इससे पहले कि वह कुछ बोले, छोटी-सी बच्ची ने कहा,
मम्मी तो खुद ही डर से कांपने लगती हैं थर-थर
फिर वह स्त्री बोली, भाई साब, हम कुछ बोलें,
इससे क्या, बदनामी तो हमारी ही होगी न
उल्टे बिटिया की पढ़ाई का भी नुकसान होगा सो अलग

हतप्रभ सा रह गया मैं यह सुनकर कि
कौन-सा नया देश बना रहे हैं हम
जहां न बच्ची सुरक्षित है और न मां
जब देश की राजधानी में सुबह-सुबह
असुरक्षित महसूस करती हैं महिलाएं
तो सुदूर इलाकों की क्या स्थिति होगी

मैं भी स्कूल ही जा रहा था बच्चों को छोड़ने
मेरे साथ-साथ स्कूल पहुंची उस स्त्री ने
एक दूसरी महिला को देखते ही कहा,
दीदी, आज भी बैठा है वह पगला पार्क में
मैं तो इनके पीछे छिपते-छिपाते आई हूं अभी
दूसरी महिला ने कहा, बैठे रहने दे उसे
आज मजबूत चप्पल पहनकर आई हूं
तोड़ दूंगी उसके सिर पर।
उस दूसरी महिला का स्वर सुन
कह नहीं सकता कितनी राहत हुई मुझे।

16-प्रेम के लिए जगह
—————–

उसके लिए नहीं थी कोई जगह
इस देश में
जबकि बहुत सारी चीजें
इन दिनों देश में घर बनाती जा रही हैं
मसलन, नफरत, लालच और भ्रष्टाचार

देश अंतरिक्ष में छलांगें मार रहा है
बूलेट ट्रेन के सपने देख रहा है
बड़ी-बड़ी बातें और बड़ी-बड़ी
योजनाएं है देश के पास
मगर नहीं है इतनी सी जगह
कि कोई प्रेमी निर्भय रह सके
गा सके प्रेम का गीत
जला सके प्रेम की ज्योति
अपनी प्रिया के सम्मान में

जाति और मजहब के खांचे में बंटे लोगों ने
उसे प्रेम करने की सजा दी मगर
जीने का अधिकार नहीं दिया
ढाई आखर का उसका प्रेम
किसी की नाक तो किसी की
मूंछ के लिए खतरा बन चुका था
इसलिए उसे इस दुनिया से ही
विदा कर दिया गया

नफरत के हरकारों!
चाहे कितनी भी नफरत फैला लो
कुछ बावरे हमेशा गाते रहेंगे
प्रेम के गीत और हवा में
तैरते रहेंगे प्रेम के किस्से

देवी-देवताओं के इस देश में
सिर्फ प्रेम के लिए ही जगह की तंगी नहीं है
बल्कि दया-धरम के लिए भी नहीं है जगह
मंदिरों-मठों-मस्जिदों में तो आज भी
रस्मी तौर पर जलाए जाते हैं दीये
मगर मन का अंधेरा कायम है सदियों से
जाहिर है ऐसी अंधेर नगरी में
प्रेमियों का मारा जाना तय है!

17-आज भले आदमी का मतलब
(केदार कानन के लिए)

ठीक है कि आप भले आदमी हैं
और पढ़े-लिखे भी
समय से अपना काम निपटाते हैं
और समय से पहुंचते हैं अपने घर
दुनियादारी के पचड़ों में नहीं पड़ते कभी
किसी से नहीं की कभी कोई लड़ाई
न की कभी किसी के साथ धोखाधड़ी
लेकिन आपकी इन अच्छाइयों का क्या
जब आप नहीं बन सकते
किसी के लिए सफलता की सीढ़ी
आज का समय ऐसा ही है बंधु
कि यदि आप किसी के काम के नहीं
तो आपके होने का भी कोई मतलब नहीं

आप किसी के रिश्तेदार को कहीं
लगवा सकते हैं नौकरी
किसी की करा सकते हैं पोस्टिंग
कमाई वाली जगह पर
दूसरों से उधार लेकर
दे सकते हैं किसी को उधार
कर सकते हैं दलाली
सत्ता के गलियारों से बाजार की गलियों तक
अगर ऐसा कुछ नहीं कर सकते तो
इस मतलबी समय में आपके
होने का कोई मतलब नहीं

आज के इस बाजारू समय में
मोल उसी का है जो
बेचने और बिकने के लिए
रहता है हरदम तैयार
वरना आपकी इन अच्छाइयों का
कोई क्या अचार डालेगा

ठीक है कि पहले नहीं था ऐसा
अपने काम से काम रखने वाले
लोगों की भी होती थी कद्र
और दूसरों के दुख-दर्द में काम
आने वाले का नहीं किया जाता था
सीढ़ी की तरह इस्तेमाल

ठीक है कि दुनिया रोज बदलती है
मगर ऐसा बदलाव भी किस काम का कि
आईने में अपना चेहरा भी लगे अपरिचित
और बदलाव के जुनून में आप
खजूर से गिरकर अटक जाएं
बबूल पर।

18-सूरज को बिंदिया की तरह
(अनुप्रिया के लिए)
लड़कियां जूझती रहती हैं मुश्किलों से
हर समय हर दिन क्षण प्रतिक्षण
पता नहीं उसे मुश्किलों से प्यार हो गया है
या मुश्किलों को उससे
लेकिन दोनों के बीच चलती रहती है
नोकझोंक

मुश्किलें कभी सामाजिकता के आवरण में आती हैं
तो कभी प्यार के आवरण में
कभी जेठ की तपती दोपहरी की तरह
तो कभी भादो के टपकते छप्पर की तरह
कभी कभी तो सांप छुछूंदर सी गति हो जाती है
कि प्रिय को छोड़ूं या छोड़ूं पिता को

मगर घबराती नहीं हैं लड़कियां
हर मुश्किल में देती है धैर्य का परिचय
और अपनी मेधा से करती है हर परीक्षा का सामना
अपनी मेहनत और मेधा से लड़कियां
आज धरती और आकाश नाप रही हैं
मुश्किलें चाहे कितने ही कांटे क्यों न बिछाए
उम्मीद के सूरज को बिंदिया की तरह
माथे से चिपकाए घूमती हैं लड़कियां।

19-सावधानी
——

जाने कैसा वक्त आ गया है
हर कोई रहना चाहता है सावधान
किसी को भरोसा नहीं किसी पर
नहीं रहा यकीन लोगों को कि
अगले पल न जाने क्या हो जाए

पिता बरत रहा सावधानी बेटे के प्रति
कि कहीं कुल का नाम न डुबो दे
बेटा सावधान है कि
कहीं दूसरे के नाम न कर दे संपत्ति

पति पत्नी की करवा रहा जासूसी
तो पत्नी सूंघ रही है दांपत्य जीवन में
किसी दूसरी की उपस्थिति

लड़कियां रहने लगी हैं सावधान
सिर्फ बाहर ही नहीं, घरों में भी
कि कहीं पिता और भाई के अंदर का मर्द
जानवर बनकर टूट न पड़े उस पर

सरकारें सावधान हैं कि कहीं
बेरोजगारी से नाराज युवक
चल न पड़े अपराध की राह पर
कोई आतंकी संगठन बहका न दे
उन्हें उसके खिलाफ

राजा सावधान है कि
कोई आस्तीन का सांप
विरोधियों से न जा मिले

जीवन में भय इतना गहरा गया है
कि लोग प्रेम करते हुए भी
अब रहने लगे बेहद सावधान।

20-भक्तजन
——–
बड़े भोले होते हैं भक्तजन
नहीं सुन सकते
अपने आराध्य के खिलाफ कुछ भी

तर्क और वैज्ञानिकता से नहीं होता
उनका कोई लेना-देना

अक्सर वे दिमाग से खाली
और अक्ल से पैदल होते हैं

इन्हीं के बल पर चलती है हमारे देश में
बहुत से पाखंडियों की दुकानदारी

इनकी आस्था पर सवाल उठाना
खुद को भेड़ियों के बीच
अरक्षित छोड़ना।

21. कोई एक दोस्त हो
—————-_

कोई एक दोस्त हो
भले ही न रहे हमारे साथ
तन्हा ही गुजारनी पड़े रात
लेकिन लगे कि है कोई पास

जो न आए मेरे घर कभी
पर मुझे लगे कि जरूरी है मिलना उससे
भले ही मेरी कविता पर वाह- वाह न करे
खुलकर कहे तो कि कविता के कसाई हो तुम

स्वतंत्र रहें हम और महसूस करें जुड़ाव
भले ही उसे औरों से भी हो लगाव

कभी तपती दोपहरी पहुंचूं उसके घर
और वह पानी के लिए भी न पूछे
लेकिन बचा रहे उसकी आंखों में पानी

उसका दुख लगे मुझे अपना
उसकी सफलता पर गर्व कर सकूं
डांट-फटकार, रूठने-मनाने का सिलसिला रहे
एक दोस्त हो जिसे
घर से निकलते वक्त सौप सकूं चाबी
और वह मुझे संभलकर जाने की हिदायत दे

कोई एक दोस्त हो जो
छीनकर फेंक दे
होठों से लगी सिगरेट
और जबर्दस्ती मांगकर
ले जाए कोई किताब

पल भर के लिए ही सही
एक दोस्त हो जिस पर
अडिग रहे भरोसा
ताकि मरने के बाद लोग न कहें-
तन्हा ही रहा हमेशा !

22. जब मिले थे हम
—————–

वह सूखे पत्तों का मौसम नहीं था मीता
जब मिले थे हम

हवा सरसराती थी तो बज उठता था संगीत
कलियां खोल देती थीं अपनी पंखुड़ियां
लता और पेड़ की तरह लिपट जाते थे हम
हंसी थी आंसू थे दुख था और
खुशियां थीं छलकती हुईं

हम लड़ते-झगड़ते भी थे कभी
तो चांद से करते थे एक दूसरे की शिकायत
फूलों से पूछते थे उदासी का सबब
छुपम-छुपई का खेल खेलते थे अक्सर
और ढ़ूंढ़ लेने पर मिलते थे ऐसे
जैसे मिलें हों बरसों बाद

मृत्यु थी कहीं दूर डराती हुई
हम रोज सूरज से मांग लेते थे
एक दिन उम्र और

किसी नियम में नहीं बंधा था जीवन
चांद से गपशप करते और
सूरज को हथेली पर
लिये घूमते थे हम

भरोसे के खंभे पर उम्मीद की छत
डालकर बनाया हमने घर
और बसाया अपना अड़ोस-पड़ोस
अड़ोस-पड़ोस से मांग बांटकर
चल जाता था काम
एक घर के चूल्हे से
आग जलती थी पूरे कुनबे में
और एक घर जन्मा बच्चा होता था
पड़ोसियों का भी लाडला

फिर आए पंडित पुरोहित राजा मंत्री और सिपाही
उन्होंने बनाई नैतिकताएं और नियमों की किताब
फिर हममें से ही किसी को घोषित किया चोर
और खेलने लगे चोर-सिपाही

हालांकि ऐसा कुछ नहीं सोचा था हमने शुरू में

नियम बने तो नियमों को
तोड़ने का सिलसिला भी हुआ शुरू
नैतिकताएं बनीं तो अनैतिकता भी

हालाँकि विकल्पहीन नहीं रहे हम कभी
मगर सुविधाओं के शामियाने में मनाते रहे उत्सव
और खुशफहमी की मार झेलते गए

हमने चुप रहना सीखा और
तोता बनने में ही भलाई समझी

मीता, हम ही थे जिन्होंने नंगी बेटियों को
बताया सुंदर और पहनाया ताज
हमने ही रचा ऐसा वीभत्स नया सौंदर्यशास्त्र
हमने ही जलाया बच्चों औरतों और स्कूलों को
हम ही थे जो करते रहे तिकड़म और प्रपंच
और हम ही खेलते रहे खून की होली

इस तरह नफरत हिंसा और अपराध बने
हमारे सामाजिक पर्यावरण का हिस्सा
आपसी लेनदेन के बदले हमने
शुरू किया व्यापार और
धीरे-धीरे बेचने लगे बहुत कुछ
अंततः हमने अपनी आत्मा भी बेच डाली
और बन गए खांटी उपभोक्ता

मगर ऐसा कहां सोचा था हमने शुरू में
जब मिले थे हम मीता
सूखे पत्तों का मौसम तो
नहीं ही था जीवन और
ऐसा होना भी तो नहीं चाहिए था।

 

 23. माँ की बातें
————-

मां थी तो जीवन बहुत सुंदर लगता था
उसके रहते मुझे कभी किसी
देवता की जरूरत महसूस नहीं हुई
मां थी तो घर-आंगन भरा-भरा था
लेकिन मां के जाते ही कई रिश्ते
अपने-आप खत्म हो गए।
बहुत दिन हुए मैं ननिहाल नहीं गया
वहां से भी किसी को हमारे घर आए
न जाने बीत गए कई बरस

शहर से जब भी गांव जाता
मां बताती थी गांव की बातें
किस खेत में हुई कितनी फसल
और किसमें बीज का दाम
निकालना भी हुआ मुश्किल
कि अबकी धान को
खखरी कर गया कीड़ा
मां की बातों में दुख ही नहीं होता था
छोटी-छोटी खुशियां भी होती थीं
जैसे, तुमने जो रोपा था नए बाग में कटहल का पौधा
वह अब बड़ा हो गया है
अगले साल शायद उसमें
फल भी लगने लगे
और घर के पिछवाड़े तुम्हारे रोपे आम में
इस बार लगे थे कुछ टिकुला
लेकिन कुछ तो खुदरु बच्चों ने तोड़ लिए
और कुछ अपने आप ही तू कर झड़ गए

अरे एक बात तो बताया ही नहीं
अपने मजदूर जोगेंदर की बेटी का हुआ लगन
घर-वर अच्छा है, लड़का कमासुत है
ऐसे ही भगवान सबका मंगल करे।

ऐसी बहुत सी जानकारी थी जो
मिलती थी सिर्फ मां से ही
मां की बातें लिखना संभव नहीं मुझसे
कई किताबों से बड़ा था मां का जीवन
मां किसी किताब
किसी कविता में नहीं समा सकती
मां की बातें लिखने के लिए
मां जैसा दिल भी चाहिए
जो पूरी दुनिया को अपने बच्चे की तरह
अपने आंचल की छांव में
बचाकर रखने को हो तत्पर।

24. बिसराया हुआ प्रेम

(उन अनाम प्रेमिकाओं के लिए, जिन्होंने कुलीनता के कैदखाने में अपने प्रेम को घुटकर मर जाने दिया।)

बिछुड़ा हुआ प्रीत
बिसरा हुआ नहीं होता
बरसों-बरस उसका दर्द
टहकता रहता है उनींदी रातों में

ओ भूतपूर्व प्रेमिकाओ
क्या अब नहीं आती तुम्हें याद
उन लड़कों की जो कभी आता था
तुम्हारे सपने में घोड़े पर सवार
किसी राजकुमार की तरह

जिसके लिए तुमने रखे कई व्रत
अपने घरवालों से छिप-छुपाकर
किताबों और काॅपियों में ही नहीं
अपने दिल में भी अंकित कर रखे
उसके नाम शिलालेख की तरह

जिसने तुम्हारी खातिर सहे
दुनिया के जुल्म-ओ-सितम
मगर तैयार था सात जन्मों तक
साथ निभाने के लिए
जो तुम्हारे कदमों में खुद को ही नहीं
दुनिया को झुका देने का दावा करता था
जिसकी याद में लिखी थी तुमने
न जाने कितनी चिट्ठियां
मगर पिंजरे में फंसी परी की तरह
उन खतों को नहीं डाल पाई डाकखाने में

न जाने कितने रूमालों पर
सुई-धागे से काढे उसके नाम
और छिपाकर रख दिया कहीं
किताबों में रखा गया गुलाब
या मोरपंख सब कुछ
बस उसी के नाम था

और एक दिन जब तुम किसी के साथ
लेने जा रही थी अग्नि के सात फेरे
उन खतों को, जिनमें कभी
धड़कता था तुम्हारा प्यार भरा दिल,
कर दिया अग्नि के हवाले और
तुम्हारे घरवालों ने दी तुम्हें
नए जीवन की बधाई
दूब-धान से भर दिया गया
तुम्हारा आंचल
दुधों नहाओ और पूतों फलो के
आशीष से लदी तुम चली
अनजान डगर पर
उस पुरुष के संग
जो नहीं था तुम्हारा प्रेमी
और अब बन गया था स्वामी

सच-सच बताना तो जरा
विदाई के वक्त तुम्हारी आंखों में
जो आंसू थे वे सिर्फ
घरवालों के बिछोह में थे
या उस प्रेमी के नाम भी था अश्रु-तर्पण

आज जब किसी महंगे रेस्तरां में
अपने कमाऊ पति के पैसे पर
उसके साथ मना रही हो वेलेंटाइन डे
क्या तुम्हें उसकी भी याद आई
कभी जिसके लिए धड़कता था
तुम्हारा दिल
पति के संग शानदार डिनर करते हुए
तुमने कभी सोचा कि
उसने कुछ खाया भी होगा या नहीं
जिसके लिए तुम बना के ले जाती थी कभी
तरह-तरह के डिश और खिलाती थी
पहला कौर अपने हाथों से उसके मुंह में

अपने हबी डार्लिंग के साथ कहकहे लगाती
बात-बात पर उसे हनी कहती
ओ भूतपूर्व प्रेमिकाओं कभी सोचा तुमने फिर
अपने उस अभूतपूर्व प्रेम या प्रेमी के बारे में
जिसने पहली बार तुम्हें
तुम्हारी खासियत से परिचय कराया था
जिसने एहसास कराया था कि
एक छुअन में होता है कितना जादुई रोमांच
कि एक चुंबन होता है काफी कायांतरण के लिए
कि प्रेम करते हुए हर दुख से
निपटना होता है आसान
कि प्रेम सब कुछ सिखा देता है
कि प्रेम में तमाम बुराइयों के बाद भी
लगती है यह दुनिया भली-भली
और जीने का रोमांच बढ जाता है कई गुना।

ओ भूतपूर्व प्रेमिकाओ
बेशक तुम्हें भी कम दुख नहीं हुआ होगा
उस रिश्ते के टूटने और प्रेम के बिछड़ने पर
कोई न कोई मजबूरी तो रही ही होगी
या कोई न कोई दबाब जरूर रहा होगा
कि जी न सकीं अपना इच्छित जीवन
मगर क्या तुम दे सकती हो अपने बच्चों को
अपने ढंग से अपना जीवन जीने की आजादी

 (कवि रमण कुमार सिंह गणपति मिश्र साहित्य साधना सम्मान से सम्मानित हैं, हिंदी तथा मैथिली कविता में एक चर्चित नाम हैं और अमर उजाला अख़बार में उप-संपादक के पद पर कार्यरत हैं.)  टिप्पणीकार आर. चेतनक्रांति भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार से सम्मानित और हमारे दौर की कविता की दुनिया का चर्चित नाम है)

 

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