समकालीन जनमत
कविता

जटिल यथार्थ का सरल कवि जसबीर त्यागी

संजीव कौशल


जसबीर त्यागी आम जीवन में जितने सहज और सरल हैं वही सहजता और सरलता उनकी कविताओं में भी देखी जा सकती है लेकिन उनकी यह सरलता पानी की सरलता है जो बड़ी आसानी से कठोर से कठोर जमीन को भी फोड़  डालता है और उसे नए जीवन के लिए तैयार कर देता है।

जसबीर भी समाज में फैली विषमताओं को आसानी से पकड़ लेते हैं और बिना किसी लाग लपेट के उन्हें अपनी कविताओं में ले आते हैं।

उनकी कविताओं को पढ़ना जैसे सामाजिक घटनाओं के किसी प्रामाणिक ऐतिहासिक दस्तावेज को पढ़ना है। वह जैसा देखते हैं वैसा कविताओं में उतार देते हैं।

उनकी एक कविता है ‘छोटू का हिसाब’। कविता आम बातचीत की तरह शुरू होती है। “छोटू रोटी लाओ” जैसा वाक्य हम सब जैसे सैकड़ों बार सुन चुके हैं और यहीं से जसवीर की कविता अपना काम करना शुरू करती है।

वह पूछते हैं कि कोई इस बात का हिसाब क्यों नहीं रखता कि छोटू को कितनी बार पुकारा गया। आखिर यह बात हमारे ध्यान में क्यों नहीं आती।

हम क्यों हमारे आस पास हो रहे शोषण को रोजमर्रा की आम चीज मानकर देखना ही छोड़ देते हैं। और इसी न देखने के खिलाफ कविता खड़ी हो जाती है।

वैसे साहित्य का पहला काम ही यह है कि वह हमें देखने की नई नजरें देता है नई दृष्टि सोंपता है। जसबीर ठीक यही काम करते हैं।

वह कहते हैं कि छोटू का हिसाब उतना ही जरूरी है जितना जरूरी है ढाबे में आंच का होना।

जहां हम सब बुढ़ापे में बूढ़े होते हैं छोटू छोटू रहकर ही बूढ़ा हो जाता है। काम उसकी उम्र और शक्ति खा जाता है। लोग उस पर चिल्लाते हैं बुरा भला कहते हैं, “कहां मर गया…?/ साला काम चोर।” इसी तरह की एक और कविता है ‘मोची’ जिसमें चौदस पन्द्रह साल का एक बच्चा सड़क किनारे जूता पॉलिश करता है। उसे दुनिया की गति से जैसे कोई मतलब ही नहीं।

वह खुद में इस कदर खोया हुआ है कि सड़क पर दौड़ती गाड़ियां भी उसे दिखाई नहीं देतीं। दिखाई देता है तो सिर्फ अपना काम। इतनी छोटी उम्र में किसी का इस कदर अपने काम में खो जाना सच में एक तरह से मर जाना है।

देखने वाले कहते हैं राहगीर ने जूते पहन रखें हैं लेकिन!चौदह-पन्द्रह साल के मासूम मोची की निग़ाहों से देखिये राहगीर ने जूते नहीं दो रोटियाँ पहन रखी हैं।

इन पंक्तियों को आप आसानी से नहीं पढ़ सकते। हालांकि पढ़ने में बहुत आसान और सरल हैं फिर भी शब्द रुक जाते हैं गले से नीचे नहीं उतरते।

यह जसबीर की कविता की ताकत है कि वह इस तरह पाठक को रोक लेते हैं। सोचने पर मजबूर करते हैं कि जिन बच्चों को खेलना कूदना पढ़ना लिखना चाहिए वे सड़क किनारे बैठे आखिर क्या कर रहे हैं। हमारा समाज इन बच्चों के बारे में क्या सोच रहा है। आखिर यह कैसी व्यवस्था बना डाली है हमने। हमें इस व्यवस्था को समझने और बदलने की कोशिश करनी चाहिए। ‘दड़वे की मुर्गियां’ में जसबीर दार्शनिक अंदाज में समय की विडंबनाओं को समझाते हुए कहते हैं-
“मुर्गियाँ बंद हैं दड़बे में दड़बा बंद है कसाई की हथेलियों में”
चार दाने फेंककर कसाई उठा लेता है एक मुर्गी। मुर्गियां दानों  और मुर्गियों का गणित नहीं समझ पा रही हैं। जसबीर कहते हैं-
“यह समय दानों के लिए एक-दूसरे से लड़ने झगड़ने का नहीं यह समय है दानों से बचने का”

जीवन की इतनी क्रूरताओं को इस सहज तरीके से जसवीर ही रख सकते हैं। वे हमारे समय के ऐसे विरले कवि हैं जो दुर्गम और जटिल हो चुकी हमारी जिंदगी को रेशा रेशा सरल करते जाते हैं।

उनकी कविताओं में अनेकों जीवन सूत्र छुपे रहते हैं, जीवन व्यवहार की बातें छुपी रहती हैं।
जसवीर रिश्तों को भी उसी सरल भाव से देखते हैं।

आज जब रिश्तो को बचाना बनाना सब मुश्किल हो गया है जसवीर न सिर्फ विश्वसनीय दोस्त हैं बल्कि सच्चे अध्यापक पिता और पुत्र हैं।

इन सभी रिश्तों को वे गहराई से समझते हैं और उन्हें सींचने की कोशिश करते हैं। अपनी मां पर लिखी कविता उनकी ‘तस्वीर’ एक बेहद संवेदनशील कविता है, जहां मां की तस्वीर के बहाने वे सच्चाई की तह में उतर जाते हैं कि किस तरह स्त्रियां घरेलू जीवन में अपने आप को खपा देती हैं कि  उन्हें एक तस्वीर की भी फुर्सत नहीं मिलती या कि वे उसे एक गैरजरूरी काम समझती हैं।
उम्मीद करता हूं क्या आप सभी को जसवीर त्यागी की कविताएं पसंद आएंगी और उन्हें आपका स्नेह मिलेगा।

जसबीर त्यागी की कविताएँ-

 

1.छोटू का हिसाब

छोटू रोटी लाओ
छोटू दाल लाओ
चाय लाओ छोटू

तड़के छह बजे से लेकर
रात के बारह बजे तक
कितनी बार
पुकारा जाता है उसका नाम?
वह खुद नहीं जानता
न ही उसके पुकारने वाले

और न ही जानता ढाबे का वह लाला
जो रखता है हिसाब
रोटी,दाल,चाय का
यहाँ तक कि बर्तनों का भी

तो फिर
क्यों नहीं रखता वह हिसाब
छोटू के नाम पुकारे जाने का?

एक-एक चीज का हिसाब रखने वाले
लाला के बहीखाते में
कोई हिसाब नहीं है छोटू का

यह बात नहीं है हल्की
गरमागरम रोटी के स्वाद में भूल जाने की
और न ही चाय की भाप समझकर
फूँक मार-मारकर उड़ा देने की

यह उतनी ही जरूरी है
जितना जरूरी है
ढाबे में आग का होना

छोटू जब पहले-पहल आया था
मैंने पाया वह एक खरगोश है
जो भाग-भागकर फुदकता है
एक मेज से दूसरी मेज पर

मैंने देखा एक रोज
वहाँ फुदकने वाला खरगोश नहीं है
उसकी जगह पर खड़ा है
एक मरियल-सा बैल

फिर बैल से वह
एक बुत में तब्दील हो गया

आने-जाने वाले ग्राहक
पुकार रहे हैं उसका नाम
जोर-जोर से चिल्ला रहे हैं
छोटू….. छोटू…..

कहाँ मर गया…?
साला कामचोर ।

2. मोची

ठसाठस भरी बसें
चमचमाती कारें
और चीखते-चिल्लाते स्कूटर
रोज निकलते हैं
उसकी आँखों के सामने से

लेकिन!चौदह-पन्द्रह साल का
वह सांवला लड़का
गर्दन झुकाये
चिपका रहता है किसी जूते पर

उसकी तल्लीनता देखकर
लगता है वह दुनिया का
सबसे व्यस्त मोची है

जिसे तनिक भी फुर्सत नहीं है
भागती हुई दुनिया को देखने की
हाँ! इतना ज़रूर है
जब कोई पैदल चलता राहगीर
निकलता है उसकी बगल से

लड़का चेहरा नहीं
पैरों की ओर देखता है
कातर निग़ाहों से

देखने वाले कहते हैं
राहगीर ने जूते पहन रखें हैं

लेकिन! चौदह-पन्द्रह साल के
मासूम मोची की निग़ाहों से देखिये
राहगीर ने जूते नहीं
दो रोटियाँ पहन रखी हैं ।

3. दड़बे की मुर्गियाँ

मुर्गियाँ बंद हैं दड़बे में
दड़बा बंद है
कसाई की हथेलियों में

मुर्गियाँ धीरे-धीरे घट रही हैं
और कसाई की हथेलियाँ
फैलती जा रही हैं

उनके सामने
फेंक दिया गया है दाना
मुर्गियाँ झपट रही हैं दानों पर

कसाई फेंक कर चार दानें
हर बार उठा लेता है एक मुर्गी
मुर्गियाँ नहीं समझ रहीं हैं
चार दाने और एक मुर्गी का गणित

कसाई के चाकू की चमक
गिर रही है मुर्गियों की गर्दनों पर

दड़बे की मुर्गियों
जागो,समझो,संभलो
और एकजुट हो जाओ

यह समय
दानों के लिए एक-दूसरे से
लड़ने झगड़ने का नहीं

यह समय है
दानों से बचने का।

 

4. तस्वीर

घर में सभी की तस्वीर है
एक माँ को छोड़कर

कई बार सोचा भी था
किसी रोज उतरवाएँगे
माँ की एक बढ़िया-सी तस्वीर

माँ है कि अपनी दुनिया में मस्त
बच्चों की भीड़ में
मन्दिर में या फिर
चिड़ियों को दाना खिलाने में व्यस्त

पता नहीं क्यों माँ को?
तस्वीर खिंचवाना  भाता न था

अक्सर पूछने पर वह डांट देती थी
‘तस्वीर….
कोई  देखेगा तो क्या कहेगा?’
मानो कुछ अप्रत्याशित घटा हो

फिर एक रोज
माँ ने पकड़ ली चारपाई
हम सब दवा-दारू में जुट गए

किसी को भी
यह ख्याल नहीं आया

कि माँ की एक भी तस्वीर
नहीं है घर में

माँ अपनी सबसे अच्छी तस्वीर भी
ले गयी अपने साथ

अब माँ नहीं है
और न ही माँ की कोई तस्वीर

लेकिन! जब कभी
बात चलती है तस्वीर खिंचाने की

मुझे याद आता है
चिता की लपटों में जलता
माँ का शरीर।

5. माँ और आग

माँ को अँधेरे से सख्त नफरत है
जहाँ कहीं भी उसे वह दिखता है
झट से रोशनी कर देती है

मैंने माँ को अनेक बार
आग के इर्द-गिर्द ही देखा है
सुबह-शाम और देर रात में

माँ भोर में उठ,फूँक मार-मारकर
आग से धुआं हटाती रहती है
उसके आँसू बहुत बार
आग पर झरते रहते हैं

फिर भी वह हार नहीं मानती
और आग जलाकर
सबकी आग शांत करती है

शाम को दिन भर की थकान
उतार फेंकती है आग में

माँ देर रात तक मशाल लिए
सिरहाने बैठी रहती है
हम चैन की नींद सोते रहते हैं

मैं नहीं जानता माँ
तेरा आग से रिश्ता कितना पुराना है?
पर हाँ! इतना ज़रूर जानता हूँ
कि तूने अपनी ज़िंदगी के दमकते दिन
इसी आग में झोंक दिए हैं

कभी- कभी लगता है
कि माँ बावरी हो गयी है
तूझे आग से बिल्कुल भी डर नहीं लगता?

पता नहीं कितनी बार
जला होगा तेरा हाथ इसी आग में माँ

मैं यह भी जानता हूँ
तू इसी आग को जलाती-जलाती
खुद ही स्वाहा हो जायेगी एक दिन

फिर भी तू कभी माँ
यह आग जलाना क्यों नहीं भूलती?

 

6. अभी भी दुनिया में

अभी भी फूलों से
आती है सुगन्ध
अभी भी संगीत पर
थिरकते हैं पांव

अपने नवजात शिशुओं को
घोसलों में अकेला छोड़
अभी भी चिड़िया
निकलती हैं चुगने दाना

परदेस गये लोगों का
अभी भी
करते हैं इंतजार परिवार में
बुज़ुर्ग अभी भी किसी भटके हुए राहगीर को
दिखाते हैं रास्ता

अभी भी प्रेम में
की गई हल्की-सी शरारत पर
कोई बोल सकता है
धत! बुद्धू कहीं के

मेह में भीगते हुए
किसी अजनबी को देख
अभी भी लोग
खोल देते हैं किवाड़

बेहिचक दे देते हैं
लत्ते-कपड़े और चप्पल
खिला देते हैं
पेट भर खाना अभी भी

बहुत सारी नयी-नयी चीजें
ले रही हैं जन्म अभी भी

अभी भी दुनिया में
बचा है बहुत कुछ सुंदर
और वह बचा रहेगा तब तक
जब तक बचा रहेगा
पृथ्वी पर एक भी आदमी शेष।

7. महानगर की सड़क

महानगर की सड़क के एक छोर पर
काफी देर से खड़ा है एक बूढ़ा आदमी

पाँच साल के पोते की थामे बांह
उसके कंधे पर झूल रहा है
बालक का बस्ता

महानगर की सड़क पार कर
वृद्ध को समय पर पहुँचना है घर

आता ही होगा नौकरी पेशा
बेटे-बहु का फ़ोन

बूढ़ा आदमी चश्मे से झाँकती
आँखों के तराजू में तोलता है
दौड़ते ट्रैफिक का भार

बार-बार पलट जाता है
बूढ़े की पलकों का पलड़ा

फिसल-फिसल जाता है
धैर्य के धनुष का तीर

कम नहीं हो रही है
गाड़ियों की कतार
बढ़ रही है  ह्रदय की रफ़्तार

महानगर की सड़क है
बालक और बुजुर्ग को
सुरक्षित पहुँचना है घर

सोचता हूँ मैं
सोचिए जरा आप भी
सोचते हैं सब मिलकर साथ-साथ

सभी की साझा सोच के सेतु से
पार कर लेंगे हम
महानगर की सड़क

बचा ही लेंगे हम
अपने समय के बच्चों और बुजुर्गों को।

8. खोटे सिक्के

वे लगभग अपनी आधी उम्र
पार कर चुके थे

नौकरी तलाशते-तलाशते
थक गये उनके पांव
पकने लगे बाल

अख़बार और किताबों को उलटते-पलटते
आँखों के इर्द-गिर्द
बनते टूटते थे जाले

वे अब भागकर नहीं पकड़ पाते थे
अपनी रोज़मर्रा की बस

पूछे जाने पर
झट से नहीं बता पाते थे
वीर रस का स्थायी भाव

उनकी जीवन की बगिया से
धीरे-धीरे सूखते चले गये
लाल,पीले, और गुलाबी रंगों के फूल

प्रेमिकाएं रोती- बिलखती
करती हुई बार-बार मिन्नतें मनुहार
ब्याही गयीं सात समन्दर पार

वे माँ-बाप
घर-परिवार, समाज
सभी की निगाहों में
खोटे सिक्के ही साबित हुए

वास्तव में उनकी हालत
संग्रहालय में रखी प्राचीन पुस्तकों जैसी थी

जिनके अनमोल पृष्ठ
पलटे जाने पर हर बार
डर लगता था फट जाने का ।

9. बेरोज़गार लड़के का चेहरा

बेकारी के
अंधेर भरे दिनों में

बेरोज़गार
लड़के के चेहरे पर

कभी-कभी ही
पड़ती है प्रसन्न्ता की धूप

बेरोज़गार
लड़के का चेहरा

किसी सधे हुए
चित्रकार के हाथों से

बनाया गया
कोई चित्र लगता है ।
10. अख़बार बेचने वाला लड़का

पीरागढ़ी चौक की लाल बत्ती पर
जब थमता है गाड़ियों का काफिला

सड़क के किसी कोने से
फटी कमीज और ‘हाफ पैंट’ पहने
नंगे पाँव दौड़ता है
तेरह-चौदह साल का लड़का

हाथों में लिए अखबारों का पुलिंदा
और अपनी पूरी शक्ति से चिल्लाता है
पाँच रूपये में अख़बार लो
पाँच रूपये में

बोलता है इस लहज़े में
जैसे दस रूपये की कोई चीज़
बेच रहा हो पाँच रूपये में

लड़का बार- बार
अपनी आवाज की अँगुलियों से
खटखटाता है राहगीरों के
मस्तिष्क का दरवाजा

लेकिन! उसकी कोमल आवाज दब जाती है
भारी-भरकम वाहनों के शोर तले

यात्रियों की नजर
अख़बार बेचने वाले लड़के पर नहीं
हर बार ठहर जाती है
हरी बत्ती की चमक पर

रोज सड़कों पर
बढ़ रही है गाड़ियों की भरमार
जिस समय लड़के को करनी थी
स्कूल की कॉपी-किताबों से दोस्ती

उस समय वह
धूप- धुँए के बीच घिरा
हुआ बेच रहा है अख़बार

क्यों नहीं देखती यह दृश्य
मेरे देश की संसद और सरकार?

अखबारों में स्थानीय खबरों के साथ-साथ
हर दिन छपते हैं
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय समाचार

लेकिन! किसी पन्ने पर नहीं छपती
अख़बार बेचने वाले लड़के की ख़बर

मैं इंतजार में हूँ
किस दिन छपेगी
अख़बार बेचने वाले लड़के की
भूख,गरीबी और बेबसी की तस्वीर।

11. काला कौवा

एक दिन
एक काले कौवे ने
दूसरे कौवे से कहा-

अबे काले कौवे-चुप
कांव-कांव करता रहता है
सारा दिन
साला कलुवा कहीं का….
पीड़ित कौवे ने
ऊपर से नीचे तक
आगे से पीछे तक
गौर से अपने आप को देखा

और फिर
बार-बार निहारा
अधिकारी कौवे को
कोई अंतर नहीं पाया

बस एक अंतर ज़रूर था
फटकारने वाला कौवा
एक राजनीतिक दल का कौवा था

और सुनने वाला
एक सामान्य कौवा ।

 

(हिन्दी अकादमी दिल्ली के नवोदित लेखक पुरस्कार से सम्मानित कवि जसबीर त्यागी  दिल्ली के गाँव बूढ़ेला के रहने वाले हैं और दिल्ली विश्वविद्यालय के राजधानी कॉलेज के हिंदी-विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर हैं. अनेक पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ व लेख प्रकाशित। ‘अभी भी दुनिया में’ शीर्षक नाम से एक काव्य-संग्रह प्रकाशित। कुछ कविताएँ पंजाबी, तेलुगू, गुजराती भाषाओं में अनूदित। हिंदी के प्रसिद्ध आलोचक डॉ. रामविलास शर्मा पर, ‘सचेतक और डॉ. रामविलास शर्मा’ शीर्षक से पुस्तक का तीन खण्डों में  सह -सम्पादन। टिप्पणीकार संजीव कौशल समकालीन कविता का चर्चित नाम हैं और दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं.)

कवि संपर्क: [email protected]

 

प्रस्तुति : उमा राग

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