सत्‍य को उसकी बहुआयामिता में जानने का जीवट और धैर्य हैं देवेश की कविताएँ

कविता

कुमार मुकुल


वरिष्‍ठ कवि ज्ञानेन्‍द्रपति ने करीब पच्‍चीस साल पहले मेरी कुछ कविताओं से गुजरते लिखा था – … आपकी ये कविताएं मुझे आपकी अगली कविताओं के प्रति उत्‍सुक प्रतीक्षा के भाव से भरती हैं। देवेश पथ सारिया की कविताएं भी मुझे उनकी भविष्‍य की कविताओं के प्रति जिज्ञासु बनाती हैं।

देवेश को देश-विदेश घूमने का मौका मिलता रहता है। इससे उनकी कविताओं में यात्रा वृतांत सी रोचकता रहती है। कुछ यात्रा वृतांत भी उनकी कविताओं में सिमटे दिखते हैं।

देवेश ने अपने पिता से विनोदी स्‍वभाव पाया है जो उनकी कविताओं से भी जाहिर होता है। केदारनाथ सिंह कविता में भाषा के खेल को एक अहम‍ियत देते हैं। इससे पैदा खिलंदड़ापन देवेश की ताकत है।

अपनी कुछ कविताओं में देवेश लंबी कविता के शिल्‍प को साधते दिखते हैं। पीसा की झुकी मीनार शीर्षक कविता उनकी यादगार व अनोखी कविता है। जटिल जीवन संदर्भों को इस तरह ऐतिहासिक तथ्‍यों के साथ एक भव्‍य रोमान में जोड़ पाने को देवेश की खूबी माना जा सकता है। हिंदी में आलोक धन्‍वा के पास ऐसी कविताएं हैं, खासकर सफेद रात उनकी एक खूबसूरत कविता है। नरेश जी की गिरना कविता, जिसमें पीसा की मीनार का संदर्भ आया है, भी बहुत अच्‍छी कविता है। पर वहां रेटारिक का प्रयोग तुलनात्‍मक रूप में एक आसान ट्रिक या शैली लाघव की तरह रचनाकार की मदद करता दिखता है।

देवेश में सत्‍य को उसकी बहुआयामिता में जानने का जीवट और धैर्य है। वे उसे उसकी जटिलता के साथ अभिव्‍यक्‍त करने की कोशिश करते बारहा दिखते हैं –

” भिखारी, दीन-हीन

अपने फटे चीथड़ों में

ख़ज़ाना समाए हैं

जो बेचने की तरकीब जानते हैं

उन्हें लूट ले जाते हैं…”

कवि के भीतर पायी जाने वाली इस सच्‍ची जिद को अपने मनोविनोदी स्‍वभाव के साथ अगर देवेश बनाये रखते हैं तो हम उनमें हिंदी के भावी नये समर्थ कवि की छवि देख सकते हैं।

देवेश की कविताएँ

 

1. गड़रिया

वह एक गड़रिया है
जंगल से सटे गाँव का गड़रिया
अपना रेवड़ लिए
गाँव से जंगल की पगडंडी पर
लाठी खड़काते घूमता है वह

कान में बाली,
भरे चेहरे पर घनी मूँछें
गँवई भाषा
उसके गीतों में
लोकदेवताओं की स्तुति है
जो रेवड़ के लिए संगीत है
और भेड़ों के गले की घंटियाँ
गड़रिये के लिए संगीत

उसके रेवड़ में कोई सौ भेड़ हैं
जिनमें से हर एक को
अलग-अलग पहचानता है गड़रिया

भेड़ें उसकी आवाज़ पर चलती हैं
उसके संकेत पर मुड़ती हैं
उसकी ललकार पर रुकती हैं
मैने उसे देखा है
लाठी लिए हुए,
लाठी खड़काते हुए
पर किसी ने उसे,
कभी नही देखा
किसी भेड़ पर लाठी उठाते हुए

हर गड़रिये का
अपना अलग इशारा होता है
लाठी खड़काने का अलग अंदाज़
जिससे वह नियंत्रित करता है
अपना रेवड़ का साम्राज्य

इन दिनों,
सिकुड़ चुका है जंगल
सिमट गये हैं चरागाह
उसका रेवड़ छोटा हो रहा है
गड़रिये का भविष्य संशय में है
और वह आज के बचे-खुचे चरागाह में
बेफ़िक्र भेड़ चरा रहा है
कल की चिंता नहीं करता गड़रिया

2. नानाजी के श्लोक

सच्चे तौर पर
सम्मान की वजह से डर
मुझे सिर्फ एक पुरुष से लगता था

नानाजी ने मुझे तीन श्लोक बताये थे
सुबह उठते ही दोहराने के लिए

मैं जानता हूँ
पृथ्वी को विष्णुपत्नी कहकर, क्षमा मांगकर भी
मैं रहूंगा
जीवनपालक विष्णु की सभ्यतापोषक प्रिया का अपराधी ही
दोहराता रहूंगा अपराध
जिनसे पृथ्वी होती रहेगी जीवन के लिए संकुचित
बढ़ती रहेगी ग्लोबल वार्मिंग
मैं पृथ्वी की बाकी सब सन्तानो की हत्यारी प्रजाति, मानव हूँ

हाथ में देवी-देवताओं का वास होने की अनुभूति कर भी
इन हाथों से हर काम ठीक ही हो, ऐसा भी नहीं
और कन्धों पर बैठे फ़रिश्ते
दर्ज़ करते रहेंगे अच्छे-बुरे सब काम
बुरे काम दर्ज़ करने वाले फ़रिश्ते की स्याही होगी कुछ ज़्यादा ही ख़र्च

सात चिरंजीवी महापुरुषों का स्मरण
मुझे नहीं बना देगा चिरंजीवी या शतायु
खुद नानाजी भी कहाँ हो पाए शतायु
पर वे जीवन संग्राम के महारथी थे
जब हम किसी के लिए संभावना नहीं थे
वे लड़े अपनी बेटी और उसके बच्चों के भविष्य के लिए

बैंक की जमा रकम के ब्याज से बुढ़ापा काटकर
रुकी हुई पेंशन को पाने की कोशिश करते हुए मरकर
उन्होंने जो दिन काटे फाक़े कर-कर
उनकी लहलहाती फसल हैं हम

एक श्लोक हाथ के मूल में गोविन्द की उपस्थिति बताता है
पर मैं ब्रह्मा पढता हूँ
क्योंकि बहुत साल पहले मेरी स्मृति में नानाजी ने ब्रह्मा बताया था
(या शायद मुझे ही गलत याद रहा हो)

हर सुबह ये श्लोक
मैं लम्बी उम्र या किसी देवी-देवता की प्रसन्नता के लिए नहीं पढता

इनके बहाने मैं याद करता हूँ नानाजी को हर सुबह, वस्तुतः

3. मॉस्को की लड़की

मॉस्को में एक लड़की
जिससे मेट्रो रेल की आपाधापी में
छू गया था मेरा पैर

जैसी कि आदत डाली गयी है
‘लड़कियों से पैर नही छुआते’
तत्क्षण, उसके साथ से अपनी हथेली छुआकर
माथे से लगा ली थी मैंने

यह बस अपने आप हुआ,
एक आदत के तहत
सोच सकने से भी पहले

बहरहाल, अब सोचता हूँ
उसके देश में क्या ऐसा करता होगा कोई
वह मुझे अजीब समझती होगी
या शायद अवसरवादी बदनीयत
ना उसे मेरी भाषा आती थी
ना ही मैं रूसी जानता था
तो हम दोनो मौन रहे

बस इतना याद है
वह मुझ पर हँसी नही थी
और अपना स्टेशन आने तक
देखती रही थी मुझे

4. ‘अनुकंपा ‘

मुझे मंद कहने वालो
ये चमकीले जूते उतारो
आओ फिर दौड़ते हैं
दोनो नंगे पाँव

तुम्हारे जूतों की कीलें
बिछाती आई हैं
काँटे हमारी राहों में

जब तुम्हारे शाही जूते
दौड़ जाते हैं मंद बयार
और मद्धम चाँदनी
चूमते हुए
तब हमें परोसा गया है

ख़ुश्क रास्ता
जहाँ हज़ार नक्कारखाने हैं
और लाख मक्कार साहूकार
जो करते हैं सौदा
हमारी स्वायत्तता का

दौड़कर लहुलूहान
हमारे नंगे पैर
देख रहे होते हैं
अंतहीन लक्ष्य
और हाथ में खिंची
भाग्य की लकीर
हो जाती है
दूसरे के हाथ में स्थानांतरित

इस बीच तुम
सूखे मेवे और ताज़ा फल
खाते रहे हो
‘अनुकंपा’ के जूते पहने हुए

5. फटेहाल का ख़ज़ाना

दुनिया के नामचीन फोटोग्राफर
भटकते हैं
भूखे-नंगे लोगों की बस्ती में
और उन अभावग्रस्त लोगो में से
एक चेहरा चुनते हैं
ऐसा चेहरा, जो निर्दिष्ट कर दे
सारी कहानी उस बस्ती की
उसके लोगों की
उसकी जैसी बहुत सी बस्तियों की

युद्ध शरणार्थी,
अकालग्रस्त, दंगा पीड़ित,
नंगे-भूखे बच्चे की दुहाई दे
कार के बाहर हाथ फैलाई औरत
ऐसे ही चंद दृश्य तलाशते हैं वे
उतारकर ले जाते हैं
किसी का जीवन
एक अदद कैमरे में
बदले में दे जाते हैं
एक दिन या
हद-से-हद एक हफ्ते की रोटी

उस फोटो से
कितने ही पुरस्कार
कितना सम्मान-धन
फोटोग्राफर पर बरसता है
पर उस चेहरे को उसका हिस्सा
देने नही जाता वह
कौन माथा-पच्ची करे और क्यों

फटेहाल चेहरे की कहानी नहीं बदलती
निर्दिष्ट बस्ती की कहानी दीगर बात है

भिखारी, दीन-हीन
अपने फटे चीथड़ों में
ख़ज़ाना समाए हैं
जो बेचने की तरकीब जानते हैं
उन्हें लूट ले जाते हैं,
बड़े सस्ते में…..

6. रिश्ते

जिन्हें धक्का मारना था
उन्हें अपनी तरफ
रहा खींचता

जो बने थे
खुल जाने के लिए
खींचने से
उन्हें धकेलता रहा
अपने से दूर

लोग दरवाज़े थे
और मैं
साइन बोर्ड पढ़ने में अक्षम
अनपढ़, अल्हड

7. अनगढ़ कवि

कभी लिखूंगा इस तरह कविता
कि अनछुए रह जाएंगे बीच के आयाम

कभी इस तरह कि चाहूंगा कह देना
आदि और अंत
सभी कुछ बीच का भी
बाक़ी रह जायेगी गुंजाइश फ़िर भी
पूर्णांकों को दशमलव संख्या बनाए जा सकने की

कभी करूंगा बात सिर्फ दशमलव बिंदु के इर्द-गिर्द
बात किसी एक संख्या
या बहुत सी तितर-बितर पड़ी संख्याओं की
जिसमें खोजी जा सकेंगी सिरों की संख्याएं और तारतम्य
अनुपालन किसी गणितीय प्रमेय, श्रेढ़ी या सूत्र का

भूलकर कभी सारा गणित, सारी भाषा
शुरू करूंगा हर्फ़ और हिज़्ज़े से सफ़र

घूमते चाक पर गीली कच्ची मिट्टी से स्वच्छंद खेलता
रहूंगा मैं अनगढ़ कवि ही

8. क्रय शक्ति

दुनिया के सबसे अमीर आदमी की
क्रय-शक्ति की भी
एक अधिकतम सीमा होती है
जिसके बाद कोई फ़र्क़ नहीं रह जाता
उसमें और मुझमें

एक सीमा के बाद वह नहीं खरीद सकता
एक समय का राशन तक
यह जानकर, मुझे पर्याप्त लगा
अपनी जेब में पड़ा सौ रुपए का नोट

9. पीसा की झुकी मीनार पर

कोई उसे धक्का मारकर टेढ़ा कर देने का श्रेय लेना चाहता था
कोई जुड़ जाना चाहता था उछलकर
सूरज और मीनार को जोड़ती काल्पनिक सरल रेखा से्
किसी ने कोशिश की उसे अंगूठे से दबा देने की
किसी ने आइसक्रीम के शंकु में भर खा जाने की
ट्रिक फोटोग्राफी करने में जुटे सैलानियों के बीच
मैं विराटता महसूस कर रहा था
पीसा की झुकी मीनार की

अष्टावक्र के एक वक्र सी झुकी
उस मीनार के सामने मेरे पंहुच जाने में
संयोग था तो बस इतना
कि फ्रांस के उस शहर नीस से
जहां मैं काम से गया था
बहुत दूर नहीं था इटली का पीसा शहर
इतना दूर तो हरगिज़ नहीं
कि उन्नीस साल का इंतज़ार उसके सामने घुटने तक दे
और बचपन में स्वयं से किये वादे को पूरा करने के लिए
मैं फूँक ही सकता था
बचाई हुई कुछ रकम

उन्नीस साल पहले
नौवीं कक्षा की पढाई के दौरान
पढ़ा था मैंने गैलीलियो का वह प्रसिद्द प्रयोग
वस्तुओं के द्रव्यमान और पृथ्वी के गुरूत्व के बारे में
जो पीसा की इसी झुकी मीनार से किया गया था
तभी मेरी खुद के साथ एक महत्वपूर्ण बैठक के दौरान
यह तय हुआ था कि मुझे जाना है पीसा
झुकी मीनार पर चढ़ना है
हालांकि तब मेरे पास नहीं होते थे साइकिल का पंक्चर जुड़वाने के भी पैसे
और कई बार जुगाड़* के पीछे लटककर आता था मैं स्कूल

यह जानकर कि जब तक मीनार के द्रव्यमान केंद्र से डाला गया लंब
गिरता रहेगा आधार पर मीनार के
तब तक ही खड़ी रहेगी मीनार
मैं करता रहा हूँ
पीसा की मिट्टी की पकड़ मजबूत होने की प्रार्थना

मीनार तक पंहुचना
मेरी प्रार्थनाओं और अदम्य कोशिशों का फल था
मीनार के ऊपर चमकता वह सूरज
किताबों और टेलिस्कोप डोम में किये
सर्द रतजगों के बाद हुआ था नसीब

चढ़ते हुए मीनार की संकरी सीढ़ियां
मैंने हवा में तैरता हुआ महसूस किया
गैलीलियो का झीने परदे जैसा अस्तित्व
बीच से घिस चुके सीढ़ियों के पत्थरों पर
मैंने ढूँढा उन्हें घिसने में गैलीलियो के पांवों का योगदान
यह उम्मीद रखते हुए
कि चार सौ साल से ज़्यादा के इतिहास में
काश कि ना बदले गए हों सीढ़ियों के पत्थर

मैं नहीं जानता कि
गुरूत्व के अपने प्रयोग के बाद महान गैलीलियो
मीनार के ऊपर से हंसे होंगे या रहे होंगे अविचल
यूं भी दुनिया के सामने सिद्ध करने से पहले
वे स्वयं तो जानते ही थे निपट सच, गुरूत्व के उस पहलू का
वैसे भी यह नहीं था गैलीलियो का एकमात्र प्रयोग
यह एक पड़ाव भर था उनकी अनगिनत उपलब्धियों की यात्रा का

कभी किसी उदासी के दौर में
जब दबाया बजा रहा था विज्ञान को पोंगी आवाज़ों के द्वारा
शायद कभी उदास बैठने आए हों गैलीलियो मीनार पर
तब शायद हंसे हों वे पूरी दुनिया की मूर्खता पर
मीनार की दीवार से पीठ सटाकर
या, हँसते-हँसते चढ़ीं हों मीनार की सीढ़ियां शायद

उन्हीं सीढ़ियों पर चढ़ने के बाद
लटके हुए, बड़े-से ऐतिहासिक घंटे के सामने
चुपचाप चला आया था मेरे सामने
कितने ही जीवित बिम्बों का सैलाब
कुछ मेरे हिस्से का इतिहास
कुछ गैलीलियो के बारे में पठित-कल्पित का फ्यूज़न

पीसा की झुकी मीनार के सबसे ऊपर पंहुचकर
मैं तनकर नहीं खड़ा था, ज़रा सा भी
मेरी आँखें थीं नम
और मैं फ़िर नौवीं कक्षा में था

10. एक बूंद की कहानी

बर्फ
आसमान से गिरी
एक बड़े से पत्ते पर
और पिघल गयी
पत्ते ही पर

अपनी ही जैसी
पत्ते पर पहले गिरी बर्फ के
पिघलने से बने पानी में
घुलमिल
उसने आकार ले लिया एक बूंद का
और पत्ते की सपाट देह में
ढलान की गुंजाइश पाते ही
पत्ते से नीचे
लुढ़कने चली बूंद

अपनी देह का जितना वजन
सह सकती थी वह
उससे अधिक होते ही
टपक पड़ी धरती पर
टूटकर एक बड़ी सी बूंद में
अब पत्ते पर बची रह गयी
बस नन्ही सी बूंद
जो गिर सकने जितनी वज़नी नहीं थी

फ़िर ऐसा हुआ
कि रूक गया हिमपात
पत्ते पर टिकी बूंद से
ना जुड़ पाया और पानी मिलकर
ना बढ़ पाया उसके अस्तित्व का दायरा
टपकते-टपकते रह गयी
वह नन्हीं बूंद
पत्ते के धरती की ओर समर्पित भाव में झुके
कोने पर

रात भर ठण्ड में
दृढ़ता से टिकी रही एक बूंद
गुरूत्वाकर्षण बल के विरूद्ध
धरती को तरसाते हुए

धरती रही
एक बूंद प्यासी

 

 

 

 

(कवि देवेश पथ सरिया ताइवान के शिनचू शहर में में खगोल विज्ञान में पोस्ट डॉक्टोरल फेलो हैैं. इनकी यूनिवर्सिटी का नाम नेशनल चिंग हुआ यूनिवर्सिटी है जहां ये अगस्त 2015 से कार्यरत हैं. इनका शोध का विषय Extrasolar planets और Star Clusters पर केंद्रित है. राजस्थान के अलवर जिले के राजगढ़ तहसील से बी. एस. सी. करने के बाद इन्होंने अलवर से 2008 में भौतिक शास्त्र में एम. एस. सी. की. उसके बाद ARIES वेधशाला, नैनीताल से पी. एच. डी. की. कई साहित्यिक पत्रिकाओं, ब्लॉग्स और समाचार पत्रों में इनकी कविताएँ प्रकाशित हुई हैं.

 देवेश पथ सारिया का ताइवान का पता

पोस्ट डाक्टरल फेलो, रूम नं 522, जनरल बिल्डिंग-2, नेशनल चिंग हुआ यूनिवर्सिटी, नं 101, सेक्शन 2, ग्वांग-फु रोड, शिन्चू, ताइवान, 30013, फ़ोन: +886978064930, ईमेल: [email protected]

टिप्पणीकार कुमार मुकुल समकालीन कविता का चर्चित नाम हैं और राजस्थान पत्रिका के सम्पादक मण्डल से जुड़े हुए हैं। संपर्क:+918769942898)

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