समकालीन जनमत
कविता

कोरोना काल में कविता : ‘ प्रेम संवाद की भाषा बन जाए ’

यह कोरोना काल है। पूरी दुनिया इस महामारी के खिलाफ जंग लड़ रही है। लाॅक डाउन चल रहा है। लोग घरों में हैं। सामाजिक व सांस्कृतिक गतिविधियां बन्द हैं। लोग कहीं आ और जा नहीं सकते। आपस में मिल-जुल नहीं सकते। शारीरिक दूरी इस  महामारी से लड़ने का माध्यम बन गयी है। ऐसे समय में सोशल मीडिया के माध्यम से सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियां की जाय, आपस में संवाद स्थापित  किया जाय तथा इस समय में हस्तक्षेप के नये माध्यम तलाशे जायें – इस संदर्भ में कुछ प्रयास शुरू हुए हैं।
फेसबुक पर लाइव ‘कविता संवाद’ इसी दिशा में पहल है। इसके दूसरे अंक में ‘कोरोना काल में कविता’ शीर्षक के तहत 12 अप्रैल को फेसबुक पर कार्यक्रम हुआ। इसमें जहां इस काल पर विचार हुआ, वहीं इस दौरान लिखी गयी कविताओं का पाठ हुआ। इसका संयोजन जन संस्कृति मंच  उत्तर प्रदेश के कार्यकारी़ अध्यक्ष व कवि कौशल किशोर ने किया।
कोरोना महामारी पर लिखी कविताएं अपने समय में हस्तक्षेप हैं। इनमें जनजीवन और मानव-मन पर पड़ रहा प्रभाव है, चिन्ता है, चिन्तन है। ये कोरोना राजनीति को भी सामने लाती हैं। स्थितियों के वर्णन के साथ कविताएं उस व्यवस्था के प्रति क्रिटिकल हैं जिसके केन्द्र में पूंजी, बाजार, लूट,  झूठ है और जहां से मनुष्य गायब है। ये कोरोना वायरस के साथ भारत की सामाजिक व राजनीतिक व्यवस्था में गहरे मौजूद विषाणुओं से रू ब रू है। कविताएं इस सच्चाई को सामने लाती हैं कि किस तरह लाॅक डाउन ने लोगों के जीवन के लिए बड़ा संकट खड़ा किया और सरकार ने उन्हें वहां पहुंचा दिया जहां मौत उनके जीवन की सच्चाई बन गयी है। कोरोना से ज्यादा भूख का वायरस उनकी जीवन को खत्म कर रहा है। इसीलिए कोरोना के विरुद्ध जंग महामारी तक सीमित नहीं है बल्कि अरुंधती राय  के शब्दों में कहे तो यह ‘नयी दुनिया का प्रवेश द्वार है’
कविता पाठ का आरम्भ युवा कवि शिव कुशवाहा की कविता ‘दुनिया लौट आएगी’ से हुई। कविता लाॅक डाउन के असर को चित्रित करती है कि किस तरह जीवन व्यापार ठप्प हो गया है, अभिव्यक्तियां ठिठक गयी हैं और अव्यक्त डर पसर गया है। भविष्य को लेकर संशय है। लेकिन कविता की आंखें आशान्वित है। उसे मानव की अदम्य शक्ति पर भरोसा है तभी तो कवि कहता है ‘दुनिया लौट आएगी/जल्द अपने रास्ते पर/अभी हवाओं में कुछ जहर ज्यादा है’।
अगली कविता दूसरे युवा कवि विहाग वैभव की थी ‘प्रचलित परिभाषाओं के बाहर महामारी’। कोरोना को लेकर जो परिभाषाएं गढ़ी गयी हैं, प्रचारित हैं, इसके बरक्स कविता इस यथार्थ को व्यक्त करती है कि हमारी सामाजिक व्यवस्था में सदियों से इससे बड़ी महामारी व्याप्त हैं जिसका चरित्र भेदभावपूर्ण, क्रूर और हिंसक है। यह महामारी है जातिगत शोषण। कविता का समापन कुछ यूं  होता है और सोचने को बाध्य भी करता है ‘यदि आपका इतिहास चांदी के चम्मच से/घृणा का खीर खाकर नहीं जवान हुआ है तो/आप सोच पाएंगे कि/जाति की महामारी से मारे गए लोगों की तुलना में/जैविक महामारी में मारे गए लोगों की संख्या कुछ नहीं है’।
कैसी है यह सभ्यता? इस बारे में संजय कुन्दन का कहना है ‘महामारी से नष्ट नहीं होगी यह सभ्यता/महायुद्धों से भी नहीं/यह नष्ट होगी अज्ञान के भार से’। मतलब हम सभ्यता के ऐसे दौर में हैं जहां बुद्धि, ज्ञान, विज्ञान, विवेक को विषाणुओं की तरह देखा जाता है – ‘बुद्धि और विवेक को खतरनाक/जीवाणुओं और विषाणुओं की तरह /देखा जाता था/जो भयानक बीमारियां पैदा कर सकते थे/इसलिए गंभीर लोगों को देखते ही/नाक पर रूमाल रख लेने का चलन था’।
सरला माहेश्वरी की कविता डायरेक्ट चोट करती है जिसका बोल है ‘लोक त्रस्त ! हिटलर मस्त !’ कवयित्री कहती है कि यह ऐसी हिटलरी सत्ता है जिसकी नजर में वे वायरस हैं जो विरोध में हैं या आलोचना करते हैं। सत्ता ऐसे लोगों को विचार, इतिहास, भूगोल, कपड़े, खाने आदि में खोज रही है ताकि उन्हें नष्ट किया जा सके।
जयप्रकाश कर्दम की कविता ‘दूरी’ का पाठ हुआ। यह सोशल डिसटैंसिंग का क्रिटिक रचती है। इसे कोरोना से लड़ने का हथियार माना गया है, कर्दम उसे  भारतीय परिप्रेक्ष्य में एक नकारात्मक पद मानते हैं। उनके विचार से ‘शारीरिक दूरी’ सही पद है। लेकिन भेदभाव से ग्रस्त भारतीय मानस सामाजिक दूरी को बनाये रखना चाहता है। जातिवाद, अस्पृश्यता, ऊँच-नीच आदि भेदभाव के वायरस हैं जो हमारे समाज में व्याप्त है। वे कहते हैं – ‘शारीरिक दूरी से नहीं होती दूरी/दिलों के बीच/दूरी तो पैदा करती है दिलों के बीच/सामाजिक दूरी/हाथों को साफ करने से /कहीं ज्यादा जरूरी है/दिमाग में बसी/सदियों की गंदगी को साफ करना’।
कर्दम के विचारों को चन्द्रेश्वर अपनी कविता ‘चुंबन दुनिया का सबसे घृणित शब्द है इन दिनों’ में विस्तार देते हैं, उसे तार्किक परिणति तक पहुंचाते हैं – ‘कोरोना वायरस से दुनिया भर में/फैली महामारी ने/कुछ सनातनी लोगों की नजर में/मनुस्मृति और वर्णव्यवस्था को बना दिया है/नए सिरे से प्रासंगिक’। वे कोरोना राजनीति और संस्कृति का रूप कुछ यूं खींचते हैं ‘‘वे खुश हैं कि आधुनिकता का/पराजय काल है यह/वे खुश है कि मानव सभ्यता पुनः/लौट जाएगी/आदिम और बर्बर युग में/जहां मनुष्य नहीं रह जाएगा/सामाजिक प्राणी/….अब सब घर के अन्दर होगे/उनके सारे मुद्दों और सवालों को भी/मार डालेगा/एक कोरोना वायरस का खौफ!’
रंजीत वर्मा कोरोना की पृष्ठभूमि को अपनी कविता ‘कोरोना युग’ में लाते हैं और किस तरह फासीवादी सत्ता के हाथ में कोरोना एक ऐसा हथियार बनकर आता है जिसका इस्तेमाल सत्ता जनता के मुद्दे को दफन करने में करती है। वे  कहते हैं ‘कोरोना युग की राजनीति यहीं से शुरू होती है/लोकतंत्र की सड़के वीरान हो जाती हैं/शाहीनबाग इतिहास होकर रह जाता है/मुसलमानों को संदिग्ध बनाने के काम पर/देश की बिक चुकी मीडिया लग जाती है/…सवाल पूछने वालों की शिनाख्त/देशद्रोही के तौर पर की जाने लगती है’। आगे रंजीत वर्मा की कविता सजग रहने की चेतावनी देती है क्योंकि कोरोना की सबसे घातक मार गरीब-गुरबा, मेहनत-मजूरी करने वालों पर पड़ रही है। ‘आप कई जख्मों के साथ यहां पहुंचे हैं/यह जख्म आपका संसार है/उसे जिंदा रखिए/आपके पीछे यातना की लंबी दास्तान है/उसे सदा अपनी आंखों के भीगे कोरों में संभाले रखिए/आगे लंबी लड़ाई है’।
कविता संवाद कार्यक्रम के अन्तिम कवि थे स्वप्निल श्रीवास्तव। उनका कहना है कि नफरत, विभाजन, लूट, झूठ जैसी  मानव विरोधी संस्कृति आज हावी है। ऐसे में आवश्ययकता मनुष्य को मनुष्य बनाने की है। वे कहते हैं ‘कितना अच्छा हो कि प्रेम का कोई वायरस  हो/और उससे सारी दुनिया संक्रमित हो जाए/तानाशाह मनुष्य  बन जाय/और मनुष्य पहले से श्रेष्ठ मनुष्य’। उनका कहना है कि कोरोना ही मात्र मानवद्रोही वायरस नहीं है, बल्कि नफरत के वायरस से भी दुनिया को विषाक्त बनाया गया है। यदि दुनिया को, मनुष्य को बचाना है तो इसके बरक्स हमें प्रेम के वायरस को फैलाना होगा। हमें पहले मनुष्य बनना होगा। ‘दुनिया में नफरत के विषाणु  फैल चुके  हैं/उन्हें हमारा प्रेम ही नष्ट कर सकता है/कितना अच्छा हो/दुनिया की सारी भाषाएं खत्म हो जाए/और प्रेम ही हमारे संवाद की भाषा बन जाए’।

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