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बिहार में माले और अन्य वाम दलों को उचित जगह दिए बिना कोई कारगर विपक्षी एकता नहीं बन सकती : दीपंकर भट्टाचार्य

पटना। भाकपा माले के महासचिव कॉमरेड दीपंकर भट्टाचार्य ने कहा है कि बिहार में माले और अन्य वाम दलों को उचित जगह दिए बिना कोई कारगर विपक्षी एकता नहीं बन सकती. भाजपा-जदयू के खिलाफ निर्णायक गोलबंदी इसके बिना संभव ही नहीं है. लेकिन तालमेल को लेकर अभी तक राजद का जो रुख और प्रस्ताव है, वह जनता की भावना और राजनीतिक जरूरत से मेल नहीं खाती है.

दीपंकर भट्टाचार्य आज पटना में पत्रकार वार्ता में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि भाजपा-जदयू की करारी हार सुनिश्चित करने के लिए विपक्ष की व्यापक व कारगर एकता बिहार की जनता की चाहत है, ताकि जनता का आक्रोश संगठित हो सके. लेकिन यह दुर्भग्यपूर्ण है कि इस दिशा में अबतक कोई बड़ी प्रगति नहीं हो सकी है.

उन्होंने कहा कि विपक्षी दलों के बीच कारगर तालमेल नहीं होने की स्थिति में भाकपा-माले की बिहार की जनता से अपील है कि ऊपर के स्तर पर जारी गतिरोध को दरकिनार कर नीचे के स्तर पर जनता के विभिन्न हिस्सों और नीचे के आंदोलनों का मोर्चा बनाएं और विश्वासघाती एनडीए सरकार को निर्णायक शिकस्त देने की तैयारी करें !

माले महासचिव ने कहा कि  मोदी सरकार देश की सच्चाई व वास्तविक स्थितियों से भाग रही है. लॉकडाउन की मार झेल रहे प्रवासी मजदूरों, कोविड के खिलाफ अगली कतार में खड़े डॉक्टर व अन्य स्वास्थ्य कर्मियों की न्यूनतम मांगों, भयानक बेरोजगारी की मार झेलते करोड़ों बेरोजगारों, कर्ज माफी के सवाल पर आंदोलित महिलाओं-किसानों के सवालों-मांगों, स्कीम वर्करों और देश की अन्य दूसरी सच्चाई का सरकार के पास कोई जवाब नहीं है. और इसलिए उसने संसद सत्र में कोई प्रश्नकाल ही नहीं रखा. और संसद की लोकतांत्रिक पद्घति को कमजोर कर रही है.

 लेकिन दूसरी ओर इसी कोविड काल में दिल्ली दंगों के असली अपराधियों को बचाते हुए दलित-मुस्लिम, मानवाधिकार कार्यकर्त्ताओं और वामपंथियों को निशाना बनाया जा रहा है. दिल्ली दंगों में वामपंथी नेताओं को राजनीतिक दुर्भावना से ग्रसित होकर घसीटा जा रहा है. हमारी पार्टी की नेता कविता कृष्णन, आइसा आंदोलन के नेताओं, सीपीआईएम के महासचिव सीताराम येचुरी सहित कई अन्य कार्यकर्ताओं के खिलाफ बिना किसी सबूत के हास्यास्पद बयान दिए जा रहे हैं. भीमा कोरेगांव में दलित कार्यकर्ताओं को प्रताड़ित करने के बाद अब एनआरसी-एनपीआर के खिलाफ आंदोलन चलाने वाले कार्यकर्ताओं पर कहर बरसाया जा रहा है. सरकार कोविड का इस्तेमाल लोकतन्त्र को खत्म करने में किया जा रहा है.

संसद सत्र के पहले दिन 26 सांसदों के कोविड संक्रमित होने, अब तक कई राजनेताओं-अधिकारियों की मौत के बाबजूद भी बिहार में इलेक्शन कराने पर भाजपा-जदयू अड़ी है, यह जनता के जीवन से खिलवाड़ नहीं तो और क्या है? बिहार में कोरोना का लगातार विस्फोट हो रहा है और सरकार झूठे आंकड़ा देकर सच्चाई पर पर्दा डालने की कोशिश कर रही है. छात्रों-अभिवावकों के जबरदस्त विरोध के वावजूद मोदी सरकार ने छात्रों को परीक्षा में धकेल दिया. फासीवादी मोदी शासन के ही नक्शे पर चलते हुए नीतीश सरकार भी इस कोविड काल में छात्रों की परीक्षा लेने पर अड़ी है. यह मानवद्रोही आचरण है.

इसी परिप्रेक्ष्य में बिहार का चुनाव होने जा रहा है. दरअसल, बिहार चुनाव को लोकडौन की आड़ में भाजपा-जदयू हड़प लेना चाहती है. लेकिन, बिहार की जनता इस साजिश को समझ चुकी है और इसका मुक्कमल जवाब देगी. यह चुनाव जनविरोधी व गद्दार सरकार को सत्ता से बेदखल करने का अभियान होगा.

बिहार के स्कीम वर्करों, छात्र-नौजवानों, लॉकडाउन भत्ता व रोजगार की मांग कर रहे प्रवासी मजदूरों, सरकार का विश्वासघात व दमन झेलते शिक्षक समुदाय , छोटे कर्जों को माफ़ी को लेकर आन्दोलरत महिलाओं और अन्य सभी आंदोलनकारी ताकतों से भाकपा-माले विधानसभा चुनाव को एक बड़े राजनीतिक-सामाजिक आंदोलन में तब्दील कर देने और विश्वासघाती नीतीश सरकार को सत्ता से उखाड़ बाहर करने का आह्वान करती है.

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