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ड्रॉपआउट: लड़कियों के शैक्षणिक अलगाव के सामाजिक आर्थिक कारण

बीते रविवार कोरस के फेसबुक लाइव स्त्री संघर्ष का कोरस में ‘ड्रॉपआउट: लड़कियों के शैक्षणिक अलगाव के सामाजिक आर्थिक कारण’ विषय पर मृदुला सिंह ने उर्मिला शुक्ल तथा शिवानी नाग से बातचीत की |

कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए मृदुला ने उर्मिला जी से प्रश्न किया कि लड़कियों के शैक्षणिक अलगाव के सामाजिक आर्थिक कारणों को आप किस तरह से देखती हैं ? इसका जवाब देते हुए उर्मिला जी कहती हैं कि क्योंकि समाज में स्त्री को दोयम दर्जे का स्थान प्राप्त है, इसलिए शिक्षा के क्षेत्र में भी यही स्थिति लागू होती है |  इसे उच्च,मध्यम और निम्न इन तीनों वर्गों की दृष्टि से अलग-अलग  देखा जा सकता है | जो ज्यादा पैसे वाला वर्ग है वह अपने पैसे के अहं में कई बार लड़कियों को शिक्षा से वंचित रखता है वहीं मध्यम वर्ग में कम उम्र में लड़कियों का विवाह कर दिया जाना भी एक बड़ा कारण है | निम्न वर्ग के सामने सबसे पहले रोजी-रोटी का संकट होता है इसलिए परिवार के प्रत्येक सदस्य को कुछ न कुछ काम करना पड़ता है , जिससे वे शिक्षा से वंचित रह जाते हैं |

लड़कियों के शैक्षणिक अलगाव में हमारे समाज का पितृसत्तात्मक ढाँचा कितना कारक है ? इस प्रश्न का जवाब देते हुए शिवानी कहती हैं कि सबसे पहले तो यह समझना बहुत महत्वपूर्ण है कि घर-परिवार द्वारा लड़की की शिक्षा को किसलिए जरूरी समझा जा रहा है उसे कुशल गृहिणी बनाने के लिए या  इसलिए कि शिक्षा द्वारा उसकी स्वतंत्र चेतना का विकास हो सके और वह आत्मनिर्भर बन सके | यही बात तय करती है कि लड़कियों को कहाँ तक और किस तरह से पढ़ाया जाएगा | यह लड़कियों के शैक्षणिक अलगाव के पीछे परिवार के दृष्टिकोण सबंधी एक पक्ष है वहीं दूसरी तरफ लड़कियों के शैक्षणिक अलगाव में समाज और सरकार की एक बड़ी भूमिका है | हमारे देश में जहां स्कूली शिक्षा में इतनी असमानता है वहाँ शोधों से यह बात निकल कर आई है कि कई अभिभावक लड़कों को प्राइवेट स्कूलों में भेजते हैं और लड़कियों को सरकारी स्कूलों में भेजा जाता है | दिनोंदिन बढ़ते शिक्षा के निजीकरण ने लड़कियों की शिक्षा को बहुत प्रभावित किया है , क्योंकि जिस तरह का हमारा सामाजिक ढाँचा है उसमें यदि किसी माँ-बाप की हैसियत एक ही बच्चे को पढ़ा पाने की है तो निश्चित ही वह लड़के को पढ़ाएगा लड़की को नहीं | यदि सरकारी स्कूलों की संख्या और गुणवत्ता बढ़ा दी जाय तो शायद लड़कियों की शैक्षणिक स्थिति में कुछ सुधार संभव हो | दूसरी बात आवासीय विद्यालयों में लड़कियों के शोषण की जिस तरह की खबरें सामने आ रही हैं वह भी एक बड़ा कारण है कि कई माँ-बाप इच्छा होते हुए भी अपनी बच्चियों को आगे पढ़ने के लिए नहीं भेज पाते |

आगे वे कहती हैं कि हमारे समाज का पितृसत्तात्मक ढांचा हमारी पूरी अध्ययन-अध्यापन प्रणाली और सरकारी नीतियों को भी प्रभावित करता है | हमारे स्कूलों में विषयों को जिस तरह से विभाजित किया जाता है, विद्यालय में होने वाले कार्यों को जिस तरह से विभाजित किया जाता है वह भी कई बार शैक्षणिक अलगाव का कारण बनता है | इसी के साथ ही लड़कियों को लेकर बनाई जाने वाली सारी सरकारी योजनाएँ विवाह को केंद्र में रख कर बनाई जाती हैं, मतलब विवाह के बाद भी कोई लड़की पढ़ेगी या पढ़ सकती है इस तरह की कोई चिंता इन योजनाओं में नहीं दिखाई देती | इसके साथ ही महिलाओं की जिस तरह की जीवनचर्या होती है जिसमें शादी –विवाह से लेकर बच्चे तक की सारी ज़िम्मेदारी अमूमन उसी की होती है उस जीवन को ध्यान में रखकर कम से कम योजनाएँ बनाईं जाती हैं | इसका बड़ा असर यह होता है कि वे अपने परिवार और शिक्षा तथा कैरियर में तालमेल बिठा पाने में असमर्थ होती हैं | उच्च शिक्षा में लड़के और लड़कियों के लिए बनाए गये अलग-अलग नियम ,लड़कियों के ऊपर लगाई गईं पाबन्दियाँ तथा शिक्षण- संस्थानों में अभी भी लड़कियों को सुरक्षित और निश्चिंत वातावरण न मिल पाना भी उनके शैक्षणिक अलगाव का एक बड़ा कारण बनता है |  इस तरह से हम देखें तो सरकारी नीतियों से लेकर शिक्षा का निजीकरण , बाजारीकरण आदि भी एक वजह बनते हैं जिससे माँ-बाप चाहते हुए भी लड़कियों को नहीं पढ़ा पाते |

बातचीत को आगे बढ़ाते हुए मृदुला ने शिवानी से पूछा कि महानगरों और ग्रामीण क्षेत्रों में लड़कियों के शैक्षणिक अलगाव में किस तरह का अंतर आप देखती हैं ? इसका जवाब देती हुई शिवानी कहती हैं कि इन दोनों क्षेत्रों की यदि तुलना की जाय तो सबसे बड़ा अंतर तो शिक्षा की पहुँच का है | जो लोग महानगरों में निवास कर रहे हैं उनके पास यह सुविधा है कि वे अपनी स्थिति के अनुसार आस-पास के स्कूलों में अपने बच्चों को भेज सकते है लेकिन जो लोग गाँवों में रह रहे हैं वहाँ तो पास में स्कूल ही नहीं होते जहां वे अपने बच्चों को पढ़ने भेज सकें | गाँव में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की पहुँच एक बड़ी समस्या है वहीं शहरों में रह रहे निम्न वर्ग के वे बहुत सारे लोग जो घरों में काम करते हैं , उनके पास अपने बच्चे को रखने की कोई सुविधा उपलब्ध नहीं होती जिससे वे उन्हें गाँव अपने परिवार के पास भेजने को मजबूर होते हैं | इस तरह से असंगठित क्षेत्रों में काम कर रहे लोगों के लिए किसी तरह के नियम ,कानून का न होना भी उनके बच्चों को शिक्षा से वंचित रखता है |  इसी प्रश्न के जवाब में उर्मिला जी गाँव में शिक्षण –संस्थाओं के दूर होने , कृषि कार्य में लड़कियों के ज्यादा से ज्यादा लगे होने और साथ ही गाँव की भौगोलिक स्थिति को लड़कियों के शैक्षणिक अलगाव का बड़ा कारण मानती हैं | निम्न वर्ग के लोगों की आर्थिक स्थिति एक बड़ा कारण है जिससे लड़कियों की शिक्षा अधूरी छूट जाती है |

महिला आरक्षण बिल के सवाल पर शिवानी कहती हैं कि यदि विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी तो निश्चित ही जो नीतियाँ बनाई जा रही हैं वे उनके जीवन की समस्याओं को ध्यान में रखकर बनेंगी | दूसरी बात यदि हमारे सामने बहुत सारी महिलाएं रोल माडल के रूप में रहेंगी तो शिक्षा के प्रति एक उद्देश्यपूर्ण और रुचिकर समझदारी लड़कियों के मन में भी जागृत होगी |

लड़कियों के शैक्षणिक अलगाव में शिक्षक और विद्यालय परिवेश कितना जिम्मेदार माना जा सकता है ,इसका जवाब देते हुए शिवानी कहती हैं कि यदि कोई शिक्षक पितृसत्तात्मक सोच से ग्रस्त है तो वह हमेशा पढ़ने आई हुई लड़कियों को भी उसी नजरिए से देखता है और शिक्षक कई बार जाने-अनजाने लड़कियों को हतोत्साहित भी करते हैं | लड़कियो के साथ इस तरह का व्यवहार करना कि उनकी शिक्षा मात्र डिग्री पाने का जरिया है जिसका उनके अपने जीवन में स्वतंत्र चेतना के निर्माण से कोई लेना-देना नहीं है उन्हें शिक्षा से दूर कर देता है | एक शिक्षक होने के नाते हमारी यह ज़िम्मेदारी बनती है कि हम अपनी छात्राओं को ऐसा माहौल उपलब्ध करा पाएँ जिससे वह उस पूरे परिवेश को अपना मान पाये और स्वतंत्र रूप से चिंतन करने में सक्षम हो सके |

प्रस्तुति: कामिनी 

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