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मुक्तिबोध की कविताएं आज के अंधेरे में मशाल की तरह हैं

 

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के बरगद लॉन में बुधवार को छात्रों की साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था ‘परिवेश’ के तहत गजानन माधव मुक्तिबोध की जयंती की याद में एक दिन पहले जनगीत, कविता पाठ का आयोजन किया गया।

कार्यक्रम की शुरुआत कॉमरेड विवेक ने ‘जमाने की हालत बदल कर रहेगी’ जनगीत को गाकर की। इसी कड़ी में आगे सांप्रदायिकता के विरोध में, प्रेम की पक्षधरता में, शोषितों, वंचितों की पक्षधरता में दिवाकर, अंकुल, अनुराग, लेनिन, आशीष, प्रवीण, पृथ्वीराज, मुकेश कुमार (अभय), संपूर्णानंद, वसुंधरा ने कविताएं पढ़ीं।

कॉम. शशांक ने मुक्तिबोध को याद करते हुए आज के संदर्भ में कहा, कि उनकी कविताएं आज के अंधेरे समय में मशाल की तरह रोशन हैं।

कॉम.आर्यन ने मुक्तिबोध को याद करते हुए उनकी कविता ‘एक भूतपूर्व विद्रोही का आत्म-कथन’ पढ़ी और नामवर सिंह के 1958 की बात के हवाले से कहा कि “जो अपने आपको पूरे परिवेश के सन्दर्भ में जानने, समझने, खोजने और पाने की ईमानदार कोशिश कर रहे हैं, उनके लिए नये कवियों में यदि कोई एकदम ‘अपना कवि’ है, तो गजानन माधव मुक्तिबोध ।” आयोजन का अंत शोधार्थी महुआ ने फैज़ साहब की नज़्म ‘ हम देखेंगे ’ को गाकर किया।

 

कार्यक्रम का संचालन और आभार ज्ञापन आइसा इलाहाबाद विश्वविद्यालय इकाई की अध्यक्ष कॉमरेड सोनाली ने किया। कार्यक्रम में कॉम. मनीष, साक्षी, भानु, शिवांगी, शशि भूषण, मंटू, अभिषेक, मानवेन्द्र, अमित मनोज, शिवरतन, विनीत, अभिराम, अनुराग, पिंकी, अमृता, कशू, रोशनी, ज़ैनब आदि इलाहाबाद विश्वविद्यालय और संघटक कॉलेज के विद्यार्थी, शोधार्थी उपस्थित रहे।

रपट

आर्यन

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